उत्तर प्रदेश से अलग होने के बाद उत्तराखण्ड में जमीन की खरीद-फरोख्त को लेकर कई बार कानून बनाए गए। सरकारों ने अपने-अपने स्तर से भू-कानून की परिभाषा तय की। बावजूद इसके प्रदेश में जमीनों की लूट नहीं रूकी। फिलहाल धामी सरकार का भू-कानून सुर्खियों में है। इसके सख्त प्रावधानों के कारण पहाड़ से लेकर मैदान तक जमीनों की लूट-खसोट पर नकेल कसने की उम्मीदें जगी हैं। अब सरकारी मशीनरी इन प्रावधानों के अनुरूप व्यवस्था बनाने में जुट गई है। देखना यह होगा कि भविष्य में धामी सरकार का भू-कानून कितना भू-परिवर्तन कर पाएगा?
नौ नवम्बर 2000 को जैसे ही पृथक राज्य उत्तराखण्ड की नींव रखी गई ठीक वैसे ही राज्य की जमीनों की लूट की भी नींव रख दी गई या यूं कहें कि राज्य की वेशकीमती भूमि की लूट का रास्ता खोल दिया गया। हैरानी की बात यह है कि अविभाजित उत्तर प्रदेश के समय जिन पहाड़ों की जमीनों को कोई पूछता तक नहीं था लेकिन राज्य बनने के बाद यही पहाड़ बाहरी राज्यों के लोगों की पंसद बन गए। इन वर्षों के दौरान सरकारें आईं और गईं लेकिन जमीनों की लूट को रोकने के लिए कोई मजबूत कानून नहीं बनाया जा सका हालांकि भू-काननू जरूर राज्य के नसीब में आया लेकिन उसमें इतने पेंच छोड़ दिए गए कि इसका महत्व ही खत्म होता चला गया। इसके चलते राज्य में जमीनों को बेचने का सिलसिला आरम्भ होने लगा। इसका परिणाम यह हुआ कि जमीनों की कीमतें आसमान छूने लगी। धीरे-धीरे शहरी क्षेत्रों में जमीनें खत्म होती चली गई तो शहरी क्षेत्र से लगी हुई ग्रामीण क्षेत्रों की जमीनों पर बिल्डरों, भू-कारोबारियों की निगाहें उठी तो ग्रामीण क्षेत्रों में भी जमीनों की जमकर खरीद-फरोख्त होने लगी। अनेक बड़े-बड़े भू-कारोबारियों ने आवासीय भवनों और काॅलोनियों के नाम पर जमीनें खरीदी और बड़े-बड़े आवासीय काॅम्पलेक्स, काॅलोनियां यहां तक कि व्यावसायिक भवनों का निर्माण करके ग्रामीण क्षेत्रों को पाट दिया।
ऐसा नहीं है कि इसके लिए राज्य सरकारों ने कोई चिंता नहीं की हो। इसके लिए राज्य में भू-कानून भी लाए गए जिसमें सबसे पहला भू-कानून राज्य की पहली कांग्रेस की निर्वाचित तिवारी सरकार द्वारा लगाए गए। फिर 2007 में भाजपा की खण्डूड़ी सरकार द्वारा भू-कानून में संशोधन करके उसे और भी मजबूत किया गया। 2017 में भाजपा की त्रिवेंद्र रावत सरकार द्वारा फिर से संशोधन किए गए और वर्ष 2022 में पुष्कर सिंह धामी सरकार ने भी भू-कानून में संशोधन करके उसे नए सिरे से लागू किया।
राज्य के भू-कानून की बात करें तो सबसे पहले प्रदेश की जमीनों के रकबे को समझना होगा। प्रदेश में जमीनों का कुल रकबा 55 लाख 95 हजार 361 हेक्टेयर है जिसमें 88 प्रतिशत पर्वतीय क्षेत्र का है शेष 12 प्रतिशत मैदानी हैं। इस सम्पूर्ण रकबे में 34 लाख 98 हजार 447 हेक्टेयर वन भूमि है तथा 10 लाख 15 हजार 41 हेक्टेयर बंजर या बेनाप भूमि है। इसी तरह से 2 लाख 94 हजार 756 हेक्टेयर अयोग्य श्रेणी में है। प्रदेश में कुल कृषि भूमि का रकबा 8 लाख 31 हजार 225 हेक्टेयर है, जिसमें 14 फीसदी कृषि भूमि मैदानी इलाकों तथा महज करीब 4 फीसदी पर्वतीय इलाके में है। राज्य बनने के बाद विकास के कार्यों के लिए सबसे ज्यादा कृषि भूमि पर ही असर पड़ा है जिससे लगभग 1 लाख हेक्टेयर कृषि भूमि कम हो गई। कुल वन भूमि 3800 वर्ग किमी. है। 11563 वर्ग किमी संरक्षित क्षेत्र है। इसमें वर्ष 2010 तक राज्य निर्माण के बाद विकास के नाम पर 14123 हेक्टेयर वनभूमि स्थानांतरित की जा चुकी है।
सरकार जन भावनाओं के अनुरूप भू-कानून लाई है, सरकार का उद्देश्य है कि राज्य के हित में मजबूत से मजबूत कानून आए। इस कानून में यह भी है कि जिस प्रयोजन से भूमि ली गई है अगर वह प्रयोजन नहीं किया गया है तो भूमि सरकार में निहित हो जाएगी। लेकिन यह कानून एक शुरुआत है, अगर राज्य हित में कोई अन्य बातें सामने आती हैं तो समय-समय पर उसमें संशोधन किया जाएगा। राज्य हित सर्वोपरि है।
मनवीर चौहान, प्रवक्ता, भारतीय जनता पार्टी, उत्तराखण्ड
अब भू-कानून की बात करें तो वर्ष 2000 में पृथक उत्तराखण्ड राज्य का गठन हुआ तो राज्य में भूमि के लिए कोई अलग से कानून नहीं बनाया जा सकता। जिसके चलते 2003 तक राज्य में देश को कोई भी व्यक्ति जितनी चाहे जमीन खरीद सकता था। राज्य बनने के बाद सबसे अधिक मांग राज्य की जमीनों को बचाने के लिए मजबूत भू-कानून की मांग तेजी से उठी तो राज्य की पहली निर्वाचित कांग्रेस की नारायण दत्त तिवारी सरकार ने भू-कानून अधिनियम बनाने की दिशा में काम शुरू किया। तत्कालीन समय में प्रदेश में उत्तर प्रदेश के ही दो भूमि कानून चलन में थे
जिनमें एक कुमाऊं एंड गढ़वाल जमींदारी एवोल्यूशन एक्ट 1962 जिसे सामान्य तौर पर कूजा एक्ट कहा जाता था, साथ ही दूसरा उत्तर प्रदेश जमींदारी एंड लैंड रिफोर्म एक्ट (यूपीजेडएलआरए) प्रचलित था जिसे राज्य बनने के बाद सरकार ने यह प्रावधान किया कि कोई भी बाहरी व्यक्ति या गैर कृषक 500 वर्गमीटर से अधिक भूमि नहीं खरीद सकता। तिवारी सरकार के इस पहले भू-कानून के लागू होने से राज्य में जमीनों की बेहताशा खरीद-फरोख्त पर कुछ हद तक रोक तो लगी लेकिन इसमें भी कई पेंच छोड़ दिए गए थे जिसमें साढे बारह एकड़ तक कृषि भूमि खरीदने की अनुमति देने के लिए जिलाधिकारियों को अधिकार दे दिया गया जबकि चिकित्सा स्वास्थ्य और उद्योग के लिए भूमि खरीदने के लिए शासन की अनुमति अनिवार्य कर दी गई।
तिवारी सरकार के भू-कानून में तमाम ऐसे पेंच थे जिसका जमकर दुरुपयोग होने लगा। इसमें एक बात यह भी महत्वपूर्ण थी कि 90 दिनों तक जमीन खरीदने की अनुमति नहीं मिलती है तो अनुमति को स्वतः ही मान लिया जाएगा। इसके चलते अनेक ऐसे मामले सामने आए जिसमें अनुमतियों की फाइलें 90 दिनों तक लम्बित रही या जान-बूझकर लम्बित की गई, लेकिन इसका फायदा जमीन खरीदने वालों को ही हुआ। साथ ही नगर निकायों को इस कानून से बाहर रखा गया था जिसके चलते नगर किए गए। फिर से जमीनों की खरीद-बिक्री बढ़ने लगी। इस बड़ी खामी के चलते राज्य में भू-कानून के दुरुपयोग को लेकर आंदोलन तक हुए और हर जगह से मजबूत भू-कानून की मांग फिर से उठने लगी।
2007 में राज्य में विधानसभा चुनाव हुए तो भाजपा ने इसको चुनाव में जमकर भुनाया और वादा किया कि सत्ता में आने के बाद राज्य में मजबूत भू-कानून लाया जाएगा। चुनाव में भाजपा की जीत हुई और उक्रांद के सहयोग से भाजपा की सरकार वजूद में आई और बीसी खण्डूड़ी मुख्यमंत्री बने।
मनोज रावत
मुझे दुख होता है कि 2018 में त्रिवेंद्र रावत सरकार ने भू-कानून में जो संशोधन किए उससे पहाड़ों की जमीनों को बर्बाद करने का रास्ता बना दिया गया। किसी ने इसका विरोध नहीं किया। मैंने सदन में विरोध किया लेकिन मेरा साथ किसी ने नहीं दिया। धारा 143(क) जो राज्य की जमीनों को बचाने में मामूली सी ही सही लेकिन कुछ रक्षा कवच का काम करती थी उसे भी धामी सरकार ने हटा दिया। दुख इस बात का है कि सभी धामी सरकार के मजबूत भू-कानून की बात करते हैं लेकिन आज तक किसी ने धामी सरकार से यह नहीं पूछा कि आपने धारा 143(क) को क्यों हटा दिया? अब कैसे सरकार अपनी जमीनों को बचाएगी। मीडिया हो या भू-कानून की बात करने वाले, सारे पहाड़ की चिंता करने वाले लोग हो, कोई भी एक आदमी ऐसा नहीं है जो धामी सरकार से यह सवाल पूछे कि यह धारा क्यों हटाई गई है और सरकार क्यों मजबूत भू-कानून का दावा कर रही है। मैं साफ-साफ कह सकता हूं कि जो पाप त्रिवेंद्र रावत सरकार ने 2018 में किए थे धामी सरकार ने अब महापाप किया है।
मनोज रावत, पूर्व विधायक, केदारनाथ
खण्डूड़ी ने अपना चुनावी वादा निभाते हुए राज्य के भू-कानून में बड़े संशोधन करके उसमें कई शर्तें जोड़ दीं जिसमें 90 दिनों की समय-सीमा को खत्म तो किया ही, साथ ही इसमें यह भी प्रावधान कर दिया कि जिसके लिए जमीन खरीदी गई है उसके समय पर पूरा न होने पर उक्त भूमि सरकार में निहित हो जाएगी। साथ ही 500 वर्ग मीटर की सीमा को भी घटा कर 250 वर्गमीटर कर दिया गया। खण्डूड़ी सरकार के भू-कानून में तिवारी सरकार के सभी प्रावधान यथावत रखे गए जिसमें नगर निकायों में जमीन खरीदने पर छूट को भी जारी रखा गया।
भू-कानून में इस कमी का सबसे ज्यादा दुष्प्रभाव देखने को मिला। निकाय क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर जमीनों की खरीद-बिक्री होने से नगरों में भूमि की उपलब्धता ही खत्म हो गई तो इसके लिए सरकार और शासन ने एक नया रास्ता अपनाया और नगर निकायों की सीमा विस्तार को जमकर अपनाते हुए सैकड़ों गांवों को नगर निगम, नगर पालिका, नगर पंचायतों में तो शामिल किया ही, साथ ही राज्य बनने के समय से लेकर 2010 तक जहां एक नगर निगम, नगर पालिका परिषद 32 और नगर पंचायत 30 थी, वहीं 2025 तक आते-आते 11 नगर निगम, 45 नगर पालिकाएं तथा 61 नगर पंचायतें हो गई हैं।
पर्वतीय जिलों में भी नए-नए नगर निगमों, नगर पालिका और नगर पंचायतों का गठन किया गया। इस तरह से निकायों की संख्या को बढ़ाया जाता रहा और इनमें ग्रामीण क्षेत्रों को शामिल करके उन्हें निकाय क्षेत्रों की सीमा में रख दिया गया। इससे ग्रामीण क्षेत्रों में भू-कानून की 250 वर्ग मीटर भूमि ही खरीदने की शर्त भी समाप्त हो गई जिसके चलते इन नए क्षेत्रों में फिर से बेहताशा जमीनें खरीदे और बेचे जाने का सिलसिला बहुत तेजी से बढ़ने लगा। ऐसा नहीं है कि निकायों को बढ़ाने के लिए कोई एक सरकार को ही दोष दिया जाए। राज्य बनने के बाद हर सरकार ने इन 24 वर्षों में निकायों का गठन किया और उनमें नए-नए क्षेत्रों को शामिल करते हुए भू-कानून के नियमों को कानूनी तौर पर कमजोर किया जाता रहा। इसका नतीजा यह रहा कि ग्रामीण क्षेत्रों में जमीनें कम होती चली गई। यहां तक कि खेती की जमीनों पर कंक्रीट के जंगल उभरते चले गए।
वर्ष 2017 में भाजपा की प्रचंड बहुमत की सरकार आई और तत्कालीन मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र रावत द्वारा निवेश को बढ़ाने के लिए भू-कानून में संशोधन करने के लिए कार्यवाही शुरू की और पूर्व में चले आ रहे भू-कानूनों में कई ऐसे संसोधन कर दिए जिससे भू-कानून की आत्मा ही एक तरह से खत्म हो गई। इस नए संशोधन से पर्वतीय क्षेत्रों में बची-खुची जमीनों की लूट-खसोट का नया रास्त खोल दिया गया।
भू-कानून और मूल निवास का विषय एक दूसरे से जुड़ा है। सरकार ने ऐसा भू-कानून बनाया है जो मूल निवास को चुनौती देता है। भाजपा जिस विकास की बात करती है वह धरातल पर कभी नहीं उतरता है। विकास के नाम पर भाजपा के भ्रष्टाचार ने जल, जंगल और जमीन तक को बेचने का काम किया है। सरकार भू-कानून की बात करती है, मगर भू-कानून के नाम पर जनभावना की अनदेखी की गई है। सरकार ने घुमा-फिरा कर भू-माफिया को संरक्षण देने का काम किया है। ऊधमसिंह नगर, हरिद्वार और देहरादून में नदियों को बाहरी ठेकेदारों के हाथों में सौंप दिया है। बाहर के लोग आकर यहां पर अराजकता का माहौल बना रहे हैं। शराब माफिया का कब्जा आज पूरे उत्तराखण्ड में हो गया है। विभागीय बजट को खर्च करने तक की जिम्मेदारी सरकार पूरी नहीं कर पा रही है। सरकार एक तरफ आधा-अधूरा भू-कानून तो लेकर आई जिसमें दो जिलों में अलग कानून और बाकी 11 जिलों में अलग कानून काम करेगा जो समझ से परे है। वहीं दूसरी तरफ मूल निवास के मामले में सरकार चुप्पी साधे हुए है। कुल मिलाकर भाजपा का शासनकाल हताश और निराश करने वाला है। हमारी जनता से अपील है कि भाजपा के कुशासन को उखाड़ फेंकने के लिए तैयार रहें।
शिवप्रसाद सेमवाल, केंद्रीय अध्यक्ष, राष्ट्रवादी रीजनल पार्टी
अक्टूबर 2018 को तत्कालीन त्रिवेंद्र रावत सरकार द्वारा विधानसभा सदन में राज्य के भू-कानून उत्तर प्रदेश जमींदारी एंड लैंड रिफाॅर्म एक्ट 2007 में संशोधन करते हुए धारा 154(2) और धारा 143(ए) जोड़कर पूर्व के कानून में साढ़े बारह एकड़ भूमि की सीमा को समाप्त कर दिया गया, साथ ही राज्य में कृषि भूमि की खरीद पर कृषक होने की अनिवार्य शर्त को भी खत्म कर दिया गया। इसके अलावा कृषि भूमि का भू उपयोग बदलने के लिए जरूरी बाध्यताएं और शर्तों को बेहद आसान कर दिया गया। जबकि पूर्व में भू उपयोग बदलना एक बहुत बड़ी समस्या रही है लेकिन त्रिवेंद्र सरकार ने भूमि और उसका भू उपयोग बदलने के लिए राह बेहद आसान कर दी। इस नए संशोधन से कोई भी व्यक्ति चाहे वह बाहरी राज्यों को हो और वह गैर कृषक हो वह जितनी चाहे भूमि खरीद सकता था और उसका आसानी से भू उपयोग परिवर्तन कर सकता था।
गौर करने वाली बात यह है कि 2018 में किए गए संशोधन राज्य के पर्वतीय जिलों में उद्योगों के निर्माण के नाम पर किए गए थे। सरकार ने सदन में स्पष्ट किया कि उद्योग से आशय चिकित्सा स्वास्थ्य, शैक्षणिक संस्थान, और पर्यटन और औद्योगिक इकाइयां हैं जिसमें सर्विस सेक्टर को सबसे ज्यादा वरीयता दिए जाने की बात कही गई थी। इसके चलते जो पर्वतीय क्षेत्र पूर्व में भूमि की लूट से बचे रह गए उनको भी मैदानी क्षेत्रों के सामान ही खुली लूट का मार्ग खोल दिया गया। गौर करने वाली बात यह है कि पर्वतीय क्षेत्रों में सबसे ज्यादा या तो वन भूमि है या फिर कृषि भूमि। लेकिन इस नए संशोधन से पहाड़ी क्षेत्र की रही-सही कृषि भूमि पर सबसे ज्यादा खतरा पैदा कर दिया गया।
त्रिवेंद्र रावत सरकार ने संशोधन तो किए लेकिन सम्भवतः सरकार को भी इस संशोधन में जमीनों की बेहताशा खरीद का भय भी था जिसके लिए राज्य सरकार ने कानून में धारा 143(क) में एक प्रावधान जोड़ दिया जिसके तहत कितनी भी कृषि भूमि जो कि औद्योगिक प्रयोजन के लिए खरीदी गई है उसको धारा 154 के आधीन खरीदने पर वह भूमि स्वतः ही गैर कृषि मान ली जाएगी। लेकिन इसी धारा 142(क) में एक परंतु शब्द भी जोड़ दिया गया जिसमें यह स्पष्ट कर दिया गया कि जिस उद्देश्य के लिए भूमि खरीदी गई है अगर दो वर्ष तक उस उद्देश्य को पूरा नहीं किया जाता तो उक्त भूमि राज्य सरकार में निहित हो जाएगी। इस परंतु शब्द एक पहाड़ी जिलों में खेती की जमीनों की लूट को बचाने के लिए बड़ी राहत के तौर था लेकिन पुष्कर सिंह धामी सरकार ने इस पंरतु को भी पूरी तरह से हटा दिया और जो सुरक्षा कवच त्रिवेंद्र रावत ने बनाकर रखा था उसे पूरी तरह से खत्म कर दिया।
आश्चर्य की बात यह है कि त्रिवेंद्र रावत सरकार ने विधानसभा में बड़ी आसानी से इस संशोधन को पास करवा लिया क्योंकि कांग्रेस पार्टी ने इसका कोई विरोध तक नहीं किया। कांग्रेस की वरिष्ठ नेता इंदिरा हृदयेश ने तो सरकार से इस बात का विरोध किया कि जिस तरह से पर्वतीय क्षेत्रों में निवेश के लिए छूट दी गई है उस तरह की छूट मैदानी जिलों को भी मिलनी चाहिए। सरकार ने भी कांग्रेस नेत्री की इस मांग को मान लिया और यह संशोधन समूचे प्रदेश के लिए लागू कर दिया गया। गौर करने वाली बात यह है कि शुरुआत में सरकार इस नए संशोधन को सिर्फ पर्वतीय जिलों के लिए ही सदन में लेकर आई थी जिसमें मैदानी जिलों को इससे बाहर रखा गया था लेकिन कांग्रेस की मांग पर मैदानी जिलों को भी इसमें शामिल कर लिया गया।
हालांकि सदन में कांग्रेस के केदारनाथ विधायक मनोज रावत ही एक मात्र ऐसे विधायक थे जिन्होंने इस संशोधन का मुखर होकर विरोध किया लेकिन उनका विरोध किसी काम नहीं आया। उनकी ही पार्टी कांग्रेस ने भी उनका सदन में साथ नहीं दिया और सरकार आसानी से पहाड़ी जिलों में खेती की जमीनों को निवेश के नाम पर लुटवाने के रास्ते बनाने में सफल हो गई।
वर्ष 2022 में राज्य में भाजपा की सत्ता में फिर से वापसी हुई और पुष्कर सिंह धामी को ही मुख्यमंत्री बनाया गया। धामी ने मुख्यमंत्री बनते ही राज्य के भू-कानून में एक बार फिर से संशोधन करते हुए धारा 142(क) को पूरी तरह से समाप्त कर दिया। इस धारा के हटने के बाद अब प्रदेश में कोई भी व्यक्ति कितनी भी भूमि खरीद सकता है और वह चाहे तो जिस उद्देश्य के लिए जमीन खरीदी गई हो वह उस पर काम करे या न करे, उक्त जमीन को राज्य सरकार अपने अधीन नहीं ले सकती है। यानी त्रिवेंद्र रावत सरकार का एक महत्वपूर्ण कवच जो कि जमीन को सरकार में निहित करने का रखा गया था उसे भी खत्म कर दिया गया। सामान्य तौर पर इसे ऐसे समझा जा सकता है कि पूर्व में कोई निवेशक 100 बीघा भूमि अस्पताल या अन्य उद्योग के लिए खरीदता था और अगर वह दो वर्ष के भीतर उस परियोजना पर काम नहीं कर पाता था तो धारा 143(क) के तहत राज्य सरकार उक्त परियोजना की भूमि को सरकार में निहित कर सकती थी लेकिन अब वह उस परियोजना पर दस साल भी काम नहीं कर पाता है तो भी उक्त भूमि पर उसकी का अधिकार रहेगा और वह चाहे तो उस भूमि को किसी अन्य प्रयोजन के लिए बेच भी सकता है सरकार इस पर कानूनी तौर पर कोई कार्यवाही नहीं कर सकती।
वर्ष 2024 में धामी सरकार नया भू-कानून बना चुकी है। जिसमें कई संशोधन भी किए गए हैं। जिसके तहत राज्य के तीन मैदानी जिलों देहरादून, हरिद्वार और ऊधमसिंह नगर को छोड़कर शेष जिलों में कोई भी बाहरी व्यक्ति सरकार की अनुमति के बगैर एक इंच भूमि भी नहीं खरीद सकता। लेकिन औद्योगिक निवेश और ईकाइयों के लिए जो छूट पूर्व से दी जा रही है उसे जारी रखा गया है। साथ ही त्रिवेंद्र रावत सरकार के समय साढे बारह एकड़ भूमि की शर्त को हटा दिया गया था उसकी भी समीक्षा करने की बात सरकार द्वारा कही गई है। इसके अलावा दिलचस्प बात यह है कि जहां राज्य सरकार का दावा है कि जिस प्रयोजन के उद्देश्य से खरीदी गई भूमि का उपयोग प्रयोजन के हिसाब से नहीं किया जाता है तो वह भूमि सरकार में निहित हो जाएगी लेकिन धामी सरकार ने अपने नए संशोधित भू-कानून में 2018 के संशोधन में किए गए प्रावधान धारा 143(क) को ही 2022 में हटा दिया गया है। खास बात यह है कि 2024 के संशोधन में भी धारा 143(क) की बाध्यता नहीं रखी गई है जिसके चलते भूमि को सरकार में निहित करने के दावे पर गम्भीर सवाल खड़े हो रहे हैं, साथ ही मजबूत और सश्क्त भू-कानून के दावे पर भी प्रश्न चिन्ह खड़े हो रहे हैं।