पश्चिम बंगाल इस समय एक गम्भीर राजनीतिक उथल-पुथल से गुजर रहा है। एक ओर राज्य में साम्प्रदायिक तनाव और प्रशासनिक गतिरोध बढ़ रहे हैं, वहीं दूसरी ओर केंद्र और राज्य के सम्बंधों में गहराता टकराव लोकतांत्रिक संस्थाओं को नई चुनौती दे रहा है। राज्य की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और राज्यपाल के बीच लम्बे समय से चला आ रहा तनाव अब खुलकर सामने आ चुका है। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और राज्यपाल आनंद बोस के रिश्ते रसातल पर हैं और राजनीतिक गलियारों में आशंका जताई जा रही है कि विधानसभा चुनाव से पहले राज्य में राष्ट्रपति शासन लगाया जा सकता है
पश्चिम बंगाल मुर्शिदाबाद और मालदा जिलों में हाल ही में धामिर्क आधार पर फैली हिंसा ने सरकार की कानून-व्यवस्था की क्षमता पर प्रश्न खड़े किए हैं। सरकारी सम्पत्तियों को नुकसान, पुलिस से भिड़ंत और अनेक नागरिकों के विस्थापन ने स्थिति को और गम्भीर बना दिया है।
भाजपा ने इन घटनाओं को तृणमूल सरकार की विफलता बताया है, वहीं ममता बनर्जी ने इन घटनाओं को ‘राजनीतिक साजिश’ करार देते हुए केंद्र पर आरोप लगाए हैं कि यह सब राष्ट्रपति शासन लागू करने की पूर्व योजना का हिस्सा है। गौरतलब है कि वर्ष 2021 के विधानसभा चुनाव में 294 सीटों में से 217 सीटें जीतकर तृणमूल कांग्रेस ने निर्णायक बहुमत प्राप्त किया था। भारतीय जनता पार्टी 77 सीटों के साथ मुख्य विपक्षी दल बनी। बहुमत के लिए 148 सीटों की आवश्यकता होती है, अत: तृणमूल फिलहाल पूरी तरह सत्ता में सशक्त बनी हुई है। बावजूद इसके, राज्य में जिस प्रकार की हिंसा और प्रशासनिक अस्थिरता देखी जा रही है, उसने केंद्र सरकार के लिए हस्तक्षेप के विकल्पों की राह खोल दी है।
हाल ही में केंद्र सरकार द्वारा पारित वक्फ संशोधन अधिनियम 2025 ने बंगाल सहित कई राज्यों में मुस्लिम समुदाय में बेचैनी फैला दी है। इस कानून के तहत वक्फ सम्पत्तियों के पंजीकरण, ट्रांसफर और सरकारी हस्तक्षेप को लेकर व्यापक बदलाव किए गए हैं, जिसे मुस्लिम समुदाय अपनी धामिर्क और सामाजिक स्वायत्तता पर चोट मान रहा है। बंगाल में बड़ी संख्या में वक्फ सम्पत्तियां हैं और इनके प्रबंधन से जुड़े वर्गों ने इसके खिलाफ विरोध-प्रदर्शन किए, जो बाद में हिंसक हो गए। बंगाल की राजनीति अब जातीय और धामिर्क पहचान की ओर तेजी से झुकती दिख रही है। भाजपा ने हाल के वर्षों में हिंदू मतदाताओं को एकजुट करने की रणनीति अपनाई है, जबकि तृणमूल कांग्रेस ने मुस्लिम बहुल इलाकों में अपनी जड़ें मजबूत रखी हैं। यह विभाजन अब सड़कों पर भी दिखाई देने लगा है, जहां मामूली विवाद भी साम्प्रदायिक रूप ले लेता है।
राज्य में तृणमूल और भाजपा के बीच की राजनीतिक प्रतिस्पर्धा अब केवल चुनावी नहीं रह गई, बल्कि जमीनी कार्यकर्ताओं के बीच संघर्ष का रूप ले चुकी है। हिंसा की घटनाओं में अक्सर एक पारी के कार्यकर्ताओं पर दूसरी पार्टी के कार्यकर्ताओं द्वारा हमला करने के आरोप सामने आते हैं। पंचायत चुनावों से लेकर लोकसभा की तैयारियों तक, हर चुनावी मौसम के पहले राजनीतिक हिंसा में इजाफा देखा गया है।
बंगाल के कई सीमावर्ती जिले जैसे मुर्शिदाबाद, मालदा, उत्तर दिनाजपुर बांग्लादेश से सटे हुए हैं। यहां गैरकानूनी घुसपैठ, जाली नोट कारोबार, नशीले पदार्थों की तस्करी और संदिग्ध कट्टरपंथी संगठनों की गतिविधियों की भी खबरें समय-समय पर आती रही हैं। राज्य पुलिस और खुफिया एजेंसियों की चेतावनियों के बावजूद इन इलाकों में सुरक्षा ढांचे की कमजोरी बनी हुई है, जिससे स्थानीय विवाद आसानी से हिंसा में बदल जाते हैं।
केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह संग पश्चिम बंगाल के राज्यपाल आनंद बोस
भाजपा का आरोप है कि जब भी कोई साम्प्रदायिक या राजनीतिक हिंसा होती है तो स्थानीय पुलिस तत्काल कार्रवाई करने से कतराती है। इसकी बड़ी वजह राजनीतिक हस्तक्षेप और दबाव है। तृणमूल के शासन में पुलिस और प्रशासन पर पार्टी की पकड़ इतनी मजबूत हो चुकी है कि निष्पक्ष कार्रवाई दुर्लभ हो गई है, जिससे हिंसा और अपराधियों का मनोबल बढ़ा है।
पश्चिम बंगाल के राज्यपाल सी. वी. आनंद बोस एक वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी रह चुके हैं और केंद्र सरकार के निकट माने जाते हैं। उनकी राज्यपाल नियुक्ति नवम्बर 2022 में हुई थी। उनकी पूर्ववर्ती, जगदीप धनखड़ के साथ भी ममता बनर्जी की सरकार के सम्बंध बेहद तनावपूर्ण रहे थे और वह अब भारत के उपराष्ट्रपति हैं। बोस ने हाल ही में हिंसा प्रभावित क्षेत्रों का दौरा किया, जिसे लेकर मुख्यमंत्री ने उन्हें ‘संवैधानिक सीमाओं’ का उल्लंघन करने का आरोप लगाया। विश्वविद्यालयों में नियुक्तियों से लेकर पुलिस प्रशासन तक, राज्यपाल की हस्तक्षेप कारी भूमिका को लेकर राज्य सरकार लगातार विरोध जता रही है। यह टकराव अब सार्वजनिक रूप से संस्थागत टकराव का रूप ले चुका है।
अभिषेक बनर्जी पर जांच और भाजपा का ‘एजेंसी मॉडल’
भाजपा के आरोपों को निराधार बताते हुए तृणमूल का मानना रहा है कि भाजपा केंद्रीय जांच एजेंसियों के सहारे उसके नेताओं को टारगेट कर रही है। तृणमूल कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और ममता बनर्जी के भतीजे अभिषेक बनर्जी पर प्रवर्तन निदेशालय द्वारा कोयला खनन और तस्करी से जुड़े मामलों में लगातार पूछताछ हो रही है। उन पर मनी लॉन्ड्रिंग से सम्बंधित आरोप हैं। उनके परिवार के सदस्यों से भी पूछताछ हो चुकी है। ममता बनर्जी का आरोप है कि यह सब एक नियोजित राजनीतिक अभियान है जिससे तृणमूल नेतृत्व को दबाव में लाया जा सके। बीते वर्षों में तृणमूल कांग्रेस के कई दिग्गज नेता भाजपा का दामन थाम चुके हैं, जिनमें पूर्व परिवहन मंत्री और ममता बनर्जी के विश्वासपात्र रहे शुभेंदु अधिकारी, मिहिर गोस्वामी, तापस रॉय, वैशाली डालमिया, और अर्जुन सिंह जैसे नेता जिन्होंने या तो भाजपा जॉइन की या बीच में वापसी की। ममता बनर्जी का कहना है कि ये दल-बदल ‘ईडी और सीबीआई के भय’ से प्रेरित हैं और भाजपा इसे एक रणनीतिक साधन के रूप में उपयोग कर रही है।
राष्ट्रपति शासन की संवैधानिक कसौटी
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 356 तब लागू होता है जब किसी राज्य में संविधान के अनुरूप शासन संभव न हो। इसके लिए राज्यपाल की रिपोर्ट या गंभीर कानून-व्यवस्था की स्थिति आधार बनती है। परंतु सर्वोच्च न्यायालय के 1994 के ऐतिहासिक फैसले ‘एस.आर. बोम्मई बनाम भारत संघ’ ने स्पष्ट किया कि राष्ट्रपति शासन सिर्फ राजनीतिक बहाने से नहीं लगाया जा सकता। संसद और न्यायपालिका इसकी न्यायिक समीक्षा कर सकती है। वर्ष 2016 में उत्तराखण्ड में तत्कालीन मुख्यमंत्री हरीश रावत की सरकार को बहुमत परीक्षण से पूर्व ही बर्खास्त कर दिया गया था। यह मामला भी बोम्मई केस की कसौटी पर खरा नहीं उतरा और अदालत ने हस्तक्षेप कर सरकार को बहाल किया। इसी तरह अरुणाचल प्रदेश में भी चुनी हुई सरकार को हटाने के निर्णय को सुप्रीम कोर्ट ने रद्द कर दिया।
संवैधानिक सीमाओं की ऐतिहासिक व्याख्या
भारतीय लोकतंत्र की संरचना में केंद्र और राज्यों के बीच शक्ति-संतुलन को बनाए रखना एक संवेदनशील विषय रहा है। भारतीय संविधान का अनुच्छेद 356 केंद्र को यह अधिकार देता है कि वह किसी राज्य में ‘संवैधानिक तंत्र के विफल’ होने की स्थिति में राष्ट्रपति शासन लागू कर सके। परंतु स्वतंत्र भारत के इतिहास में कई बार इस प्रावधान का राजनीतिक हितों के लिए दुरुपयोग हुआ है। ऐसे ही एक अवसर पर सर्वोच्च न्यायालय ने एस.आर. बोम्मई बनाम भारत संघ प्रकरण में एक ऐतिहासिक निर्णय देते हुए अनुच्छेद 356 के उपयोग की स्पष्ट सीमाएं निर्धारित कीं।
एस.आर. बोम्मई, कर्नाटक राज्य के मुख्यमंत्री थे और जनता दल के नेता थे। वर्ष 1989 में राज्यपाल ने यह रिपोर्ट भेजी कि सरकार का बहुमत खत्म हो गया है। बोम्मई ने सदन में बहुमत परीक्षण की मांग की, परंतु उनकी बात को अनसुना करते हुए केंद्र सरकार ने अनुच्छेद 356 के अंतर्गत राष्ट्रपति शासन लागू कर दिया और राज्य विधानसभा को भंग कर दिया गया। बोम्मई ने इस आदेश को चुनौती देते हुए सर्वोच्च न्यायालय का रुख किया और सवाल उठाया कि क्या राज्यपाल की रिपोर्ट और केंद्र सरकार की कार्यवाही संविधान की भावना के अनुरूप है।
सर्वोच्च न्यायालय की नौ न्यायाधीशों की पीठ ने इस मामले में गहन विचार-विमर्श कर 1994 में निर्णय सुनाया। अदालत ने राष्ट्रपति शासन के प्रयोग के लिए संवैधानिक मानदंड स्थापित किए।
किसी सरकार के बहुमत पर संदेह की स्थिति में अंतिम निर्णय विधानसभा के भीतर ही लिया जाना चाहिए। राज्यपाल द्वारा भेजी गई रिपोर्ट केवल एक प्रशासनिक मत हो सकती है, इसका अंतिम निर्णय सदन में होना चाहिए। यह निर्णय पूर्णत: ‘राजनीतिक’ नहीं माना जाएगा। यदि राष्ट्रपति शासन के लिए दिए गए कारण अनुचित, भ्रामक, या दुर्भावना से प्रेरित हों तो न्यायालय इसे खारिज कर सकता है। जब तक संसद राष्ट्रपति शासन को मंजूरी नहीं देती, तब तक विधानसभा को भंग करने के बजाय निलम्बित रखा जाना चाहिए। इससे विधायिका की स्वायत्तता को संरक्षित किया जा सकता है।भारत की संघीय प्रणाली के तहत राज्यों को पूर्ण राजनीतिक स्वतंत्रता मिलनी चाहिए। केंद्र सरकार इस स्वतंत्रता में अनुचित हस्तक्षेप नहीं कर सकती। इस मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने यह भी कहा कि किसी राज्य की सरकार को केवल राजनीतिक मतभेद के कारण नहीं हटाया जा सकता। अनुच्छेद 356 एक आपातकालीन प्रावधान है और इसे केवल तभी लागू किया जाना चाहिए जब संविधान के अनुरूप शासन करना असम्भव हो जाए। हालांकि बोम्मई सरकार को वापस सत्ता में नहीं लाया गया क्योंकि विधानसभा का कार्यकाल समाप्त हो चुका था, लेकिन अदालत ने उसकी बर्खास्तगी को असंवैधानिक करार दिया। यह निर्णय संविधान की मूल भावना की रक्षा करने वाला सिद्धांत बन गया। इसके बाद कई बार जब राष्ट्रपति शासन का प्रयोग किया गया, अदालतों ने बोम्मई केस को आधार बनाकर दखल दिया।
‘एस.आर. बोम्मई बनाम भारत संघ’ मामला केवल एक राज्य सरकार की बर्खास्तगी का प्रश्न नहीं था, बल्कि यह निर्णय भारतीय संघीय ढांचे, राज्य की स्वायत्तता और लोकतंत्र की रक्षा की दृष्टि से संविधान का रक्षक सिद्धांत बन गया है। इस फैसले ने केंद्र और राज्य के बीच की शक्ति-सीमा स्पष्ट की और अनुच्छेद 356 के अनुचित प्रयोग पर संवैधानिक लगाम कस दी। आज जब भी किसी राज्य में राष्ट्रपति शासन की चर्चा होती है, बोम्मई केस का उल्लेख एक संवैधानिक प्रकाश स्तम्भ की तरह किया जाता है।