उत्तराखण्ड में आगामी विधानसभा चुनाव भले अभी दूर हों लेकिन प्रदेश की राजनीति ने अभी से करवट लेनी शुरू कर दी है। पहाड़ और मैदान के समीकरण, संगठन और नेतृत्व की मजबूती, विकास बनाम स्थानीय मुद्दों की बहस इन सबके बीच राजनीतिक दल अपनी-अपनी जमीन मजबूत करने में जुट गए हैं। 70 सीटों वाली विधानसभा में सत्ता का रास्ता जितना छोटा दिखता है उतना ही पेंचीदा भी है। वर्तमान में प्रदेश की राजनीति चुनावी मोड़ पर खड़ी है। एक ओर जहां भाजपा सत्ता बचाने की जद्दोजहद में है तो कांग्रेस खोई जमीन वापस पाने की कोशिश में। छोटे दल और स्थानीय मुद्दे समीकरण बदल सकते हैं। अंततः जनता विकास,
रोजगार और स्थिर नेतृत्व के आधार पर फैसला करेगी। पहाड़ की राजनीति में अंतिम दौर तक हवा बदलती रहती है इसलिए 2027 की तस्वीर अभी भले धुंधली हो लेकिन मुकाबला कड़ा और रोचक होने के पूरे आसार हैं। इस बीच धामी सरकार के चार साल पूरे होने के मौके पर 7 मार्च को हरिद्वार में सरकार और संगठन का बड़ा कार्यक्रम प्रस्तावित है, जिसमें केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह भी शामिल होंगे। शाह का यह दौरा सियासी पारा बढ़ाने वाला माना जा रहा है। कहा जा रहा है कि इस दौरान वे जनसंवाद करेंगे, प्रदेश सरकार के विकास कार्यों की समीक्षा करेंगे और ‘प्रदेश टोली’ की बैठक में चुनावी नब्ज टटोलने के साथ ही चुनाव का औपचारिक बिगुल फूंक सकते हैं।

राजनीतिक जानकारों का मानना है कि भाजपा का केंद्रीय नेतृत्व प्रदेश में नेतृत्व परिवर्तन की चर्चाओं पर पूर्ण विराम लगाने और राजनीतिक स्थायित्व का संदेश देने की तैयारी में है। लगातार दो कार्यकाल के बाद यदि कहीं एंटी-इनकंबेंसी का असर है तो उसे प्रो-इनकंबेंसी में बदलने की रणनीति पर भी मंथन होगा। यही नहीं शाह के कार्यक्रम के बाद 23 मार्च को प्रधानमंत्री मोदी के भी उत्तराखण्ड दौरे की चर्चा ने पहाड़ का सियासी पारा हाई कर दिया है। मीडिया और सोशल मीडिया में चर्चा जोरों पर है कि भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व का उत्तराखण्ड आगमन का स्पष्ट संकेत है कि भाजपा पूरी तरह चुनावी मोड में आ चुकी है।

गौरतलब है कि मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी युवा नेतृत्व के प्रतीक के रूप में सामने आए हैं। समान नागरिक संहिता और सख्त नकल विरोधी कानून जैसे फैसलों के जरिए सरकार ने निर्णायक नेतृत्व का संदेश देने की कोशिश की है। हालांकि चुनौतियां भी कम नहीं हैं। खासकर बेरोजगारी, पलायन, महंगाई और पहाड़ी जिलों में बुनियादी सुविधाओं की कमी विपक्ष को हमलावर होने का अवसर दे रही है।

भाजपा को अपने पारंपरिक वोट बैंक के साथ नए मतदाताओं को साधने के लिए ठोस विकास माॅडल पेश करना होगा। दूसरी ओर 2022 में मामूली अंतर से सत्ता से बाहर रह गई कांग्रेस अब 2027 में वापसी के लिए संगठनात्मक मजबूती पर जोर दे रही है। पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत भले सक्रिय राजनीति में सीमित भूमिका में हों लेकिन उनका अनुभव और जनाधार कांग्रेस की बड़ी पूंजी माना जाता है। कांग्रेस महंगाई, बेरोजगारी, सामाजिक संतुलन और पहाड़ी अस्मिता को चुनावी मुद्दा बनाने की तैयारी में है। हालांकि आंतरिक गुटबाजी उसके लिए अब भी चुनौती बनी हुई है।

क्षेत्रीय दलों की बात करें तो उनकी भूमिका सीमित रही है लेकिन उत्तराखण्ड क्रांति जैसे दल करीबी मुकाबले में असर डाल सकते हैं। यदि भाजपा और कांग्रेस के बीच कांटे का मुकाबला होता है तो छोटे दल और निर्दलीय उम्मीदवार ‘किंगमेकर’ बन सकते हैं। चुनावी मुद्दों पर नजर डालें तो पहाड़ से पलायन, रोजगार सृजन, चारधाम व पर्यटन विकास बनाम पर्यावरण संतुलन, आपदा प्रबंधन, और युवा व महिला मतदाताओं की भूमिका प्रमुख रहेंगे।

कुल मिलाकर उत्तराखण्ड की राजनीति 2027 की ओर बढ़ते हुए नए मोड़ पर खड़ी है। भाजपा सत्ता बचाने की
जद्दोजहद में है तो कांग्रेस खोई जमीन वापस पाने की कोशिश में। छोटे दल और स्थानीय मुद्दे समीकरण बदल सकते हैं। अंततः जनता विकास, रोजगार और स्थिर नेतृत्व के आधार पर फैसला करेगी। पहाड़ की राजनीति में अंतिम दौर तक हवा बदलती रहती है इसलिए तस्वीर अभी भले धुंधली हो लेकिन मुकाबला कड़ा और रोचक होने के पूरे आसार हैं।

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