भारत के संविधान में जाति के आधार पर भले ही भेदभाव को समाप्त करने का संकल्प लिया गया हो, लेकिन सामाजिक असमानताएं आज भी हमारे समाज का कड़वा सच हैं। जिसे दूर करने के लिए जातिगत जनगणना की मांग की जा रही है। राजनीतिक और जनता के दबाव के चलते 30 अप्रैल को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा घोषणा की गई है कि 2026 में होने वाली जनगणना के साथ जातिगत जनगणना कराई जाएगी। केंद्र सरकार के अनुसार यह कदम सामाजिक न्याय और पिछड़े समुदायों के कल्याण को देखते हुए उठाया गया है। आजाद भारत में पहली बार होगा जब राष्ट्रीय स्तर पर जातिगत जनगणना की जाएगी। ऐसे में सवाल उठ रहे हैं कि क्या जातिगत जनगणना भारत के सामाजिक भविष्य को अधिक समावेशी, न्यायसंगत और संतुलित बना पाएगी?
भारत एक जातीय विविधता वाला देश है, जहां समाज की संरचना प्राचीनकाल से ही जातियों में विभाजित रही है। संविधान में जाति के आधार पर भले ही भेदभाव को समाप्त करने का संकल्प लिया गया हो, लेकिन सामाजिक असमानताएं आज भी हमारे समाज का कड़वा सच हैं। जिसे दूर करने के लिए जातिगत जनगणना की मांग की जा रही है।
राजनीतिक और जनता के दबाव के चलते 30 अप्रैल को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा घोषणा की गई है कि 2026 में होने वाली जनगणना के साथ जातिगत जनगणना कराई जाएगी। केंद्र सरकार के अनुसार यह कदम
सामाजिक न्याय और पिछड़े समुदायों के कल्याण को देखते हुए उठाया गया है। आजाद भारत में पहली बार होगा जब राष्ट्रीय स्तर पर जातिगत जनगणना की जाएगी। ऐसे में सवाल उठ रहे हैं कि क्या जातिगत जनगणना भारत के सामाजिक भविष्य को अधिक समावेशी, न्यायसंगत और संतुलित बना पाएगी?
विपक्षी दलों ने भी जातीय जनगणना के फैसले का स्वागत किया है। कांग्रेस, सपा, डीएमके जैसे दल इसे अपनी मांग का नतीजा बता रहे हैं। कांग्रेस ने पारदर्शी जनगणना और आरक्षण सीमा बढ़ाने की मांग की है। कांग्रेस का कहना है कि जाति जनगणना के बाद 50 प्रतिशत आरक्षण सीमा हटाने हेतु संविधान संशोधन किया जाए। जिसके बाद आरक्षण प्रावधान को अनुच्छेद 15(5) के अंतर्गत निजी शैक्षणिक संस्थाओं में तुरंत लागू किया जाए। गौरतलब है कि साल 2014 में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा भी निजी शिक्षण संस्थानों में एससी, एसटी और ओबीसी के आरक्षण को वैध ठहराया गया था। जाति जनगणना के बाद सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने इसे भारत की जीत बताते हुए पिछड़े, दलित और अल्पसंख्यक वर्गों को यानी ‘पीडीए’ को सतर्क रहने की अपील की है। जेडीयू और नीतीश कुमार लम्बे समय से इसके पक्ष में रहे हैं, वहीं डीएमके ने इसे अपनी मेहनत की जीत बताया है।
तेलंगाना माॅडल के पक्ष में क्यों है कांग्रेस
संविधान के अनुच्छेद 246 के अनुसार जनगणना का मामला केंद्र सरकार का है। चूंकि संवैधानिक रूप से राज्य जनगणना नहीं करा सकते थे इसलिए कर्नाटक, बिहार और तेलंगाना जैसे राज्यों द्वारा कास्ट सर्वे का नाम देकर इस दिशा में कदम उठाए गए हैं। साल 2015 के दौरान कर्नाटक में सिद्धारमैया सरकार ने कास्ट सर्वे कराया था। हालांकि उसका नतीजा सामने नहीं आ सका। वहीं, बिहार में जेडीयू-आरजेडी सरकार ने और तेलंगाना में कांग्रेस सरकार ने 2023 में जातिगत सर्वेक्षण कराया और इसके नतीजे भी जारी किए गए। इस तरह देश के सामने जातिगत जनगणना के दो माॅडल प्रस्तुत हुए। एक बिहार का तो दूसरा तेलंगाना का।
बिहार के माॅडल की बात करें तो साल 2022 में नीतीश सरकार द्वारा जाति आधारित सर्वे को मंजूरी दी गई थी। इसके बाद साल 2023 के दौरान दो चरणों में जातीय जनगणना करवाई गई। पहले चरण में मकानों की गिनती और परिवारों की संख्या जुटाई गई। दूसरे चरण में हर परिवार की जाति, सामाजिक स्थिति, शिक्षा, आय, रोजगार आदि का डेटा लिया गया था। जिसके आधार पर बिहार में आरक्षण सीमा 65 प्रतिशत तक बढ़ाई गई। इस फैसले को उच्च न्यायालय में चुनौती मिली और न्यायालय ने इसे रद्द कर दिया। अब मामला सर्वोच्च न्यायालय में है।
बिहार जैसे राज्यों में इसके छोटे स्तर पर प्रयास हुए हैं। यह पहली बार होगा जब सभी वर्गों के सटीक आंकड़े सामने आएंगे, जिससे विशेष रूप से पिछड़े वर्गों को लाभ पहुंचाने वाली नीतियां बनाना संभव होगा।
सुनील कश्यप, पत्रकार ‘कारवां’
कांग्रेस नेता राहुल गांधी के मुताबिक इन दोनों माॅडल में तेलंगाना का माॅडल आदर्श है। इस माॅडल को विस्तृत कंसल्टेशन की प्रक्रिया के तहत तैयार किया गया है। कांग्रेस के अनुसार तेलंगाना सरकार द्वारा 2014 में कराया गया जातिगत सर्वेक्षण का डेटा नीति निर्माण की दिशा में एक साहसिक और उपयुक्त कदम है। जो अन्य राज्यों को भी प्रेरित कर सकता है। इस सर्वे को “Intensive Household Survey” कहा गया। इस सर्वे में 1.09 करोड़ घरों को कवर कर किया गया था। हर घर की सामाजिक, आर्थिक और जातीय स्थिति का दस्तावेजीकरण किया गया। सर्वे में जाति, आय, सम्पत्ति, शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार आदि का डाटा एकत्र किया गया। इसके अलावा सर्वे का उद्देश्य पिछड़े वर्गों (ओबीसी), अनुसूचित जातियों (एससी), अनुसूचित जनजातियों (एसटी) और अन्य वर्गों की वास्तविक स्थिति को जानना रहा। अनुसूचित जाति की 59 उपजातियों को पहचानकर तीन उप वर्ग में बांटा गया है, वहीं ओबीसी को पांच उप वर्ग में बांटा गया है। सर्वे के आधार पर तेलंगाना सरकार ने अनुसूचित जाति और ओबीसी को उप वर्ग में बताकर आरक्षण और कल्याणकारी योजनाओं का लाभ देने का फैसला लिया है। तेलंगाना के जातीय जनगणना कराने का तरीका बिहार के तरीके से कुछ अलग रहा है। इस सर्वेक्षण में जमीन से जुड़े आंकड़े, राजनीति, सरकारी नौकरी और न्यायपालिका या फिर व्यवसाय में किस जाति की कितनी भागीदारी है इसका भी आंकड़ा एकत्रित किया गया है। आंकड़ों के आधार पर जाति के अंदर तेलंगाना की सरकार ने उप वर्गीकरण का फैसला लिया है। इसी आधार पर कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने तेलंगाना माॅडल को सबसे बेहतर बताया है।
आर्थिक और सामाजिक स्तर पर क्या होगा जातिगत जनगणना का असर
जाति जनगणना को लेकर दिल्ली विश्वविद्यालय की छात्रा नंदिनी पवार और छात्र शुभम प्रकाश पक्ष में हैं। उनका मानना है कि इससे सरकार को वंचित वर्गों के लिए बेहतर नीतियां बनाने में मदद मिलेगी। जातिगत जनगणना होने से आर्थिक और सामाजिक नीतियों पर सकारात्मक और नकारात्मक दोनों तरह से प्रभाव पड़ सकता है। विपक्षी दलों के मुताबिक जातिगत जनगणना वंचित वर्गों (ओबीसी, एससी, एसटी) की वास्तविक स्थिति उजागर कर उन्हें न्यायसंगत आरक्षण और सुविधाएं दिलाने में मदद कर सकती है। राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि सटीक आंकड़े के बिना सही नीतियां बनाना मुश्किल है। हालांकि इससे सामाजिक तनाव, जातिगत ध्रुवीकरण और वोटबैंक की राजनीति को बढ़ावा भी मिल सकता है।
जातिगत जनगणना का उद्देश्य सामाजिक न्याय, आरक्षण और कल्याण पर नीतियां बनाने के लिए विभिन्न जाति समूहों के सामाजिक-आर्थिक वितरण को समझना है। भले ही इसे वंचित तबका समर्थन दे रहा है लेकिन एक बड़ी आबादी महिलाओं की भी है। नवम्बर 2023 में प्रधानमंत्री ने कहा था कि मैं सिर्फ चार जातियां जानता हूं-युवा, गरीब और किसान, महिला अब इन्हीं की गणना होगी। ऐसे में सवाल उठता है कि जातिगत जनगणना महिलाओं और थर्ड जेंडर पर क्या प्रभाव डालेगी।
इस विषय को लेकर स्त्रीवादी लेखिका एवं स्तंभकार- शोभा अक्षर कहती हैं कि मूल बात यह है कि जाति, जातिवाद और जातीय चेतना में स्पष्ट विभेद किए बिना जातिगत जनगणना के विशेषताओं को नहीं समझा जा सकता है। जाति जनगणना के उद्देश्य के मूल में न्याय की गुहार और न्याय का पक्ष है- हर वर्ग के लिए सामाजिक न्याय। जाहिर है सामाजिक न्याय की परिधि में थर्ड जेंडर और स्त्रियों पर हो रहे अत्याचारों को भी उनकी संख्या का लगभग सही आकलन करने के बाद और सूक्ष्म तरीके से खत्म करने के प्रयास किए जा सकेंगे। इन दो वर्गों पर अन्याय, जिसका एक मुख्य आधार उनका थर्ड जेंडर का होना और स्त्रियों का उत्पीड़न सिर्फ इसलिए कि वे स्त्रियां हैं जिसे हम होमोफोबिक और स्त्रीद्वेष जैसी शब्दावलियों से भी सम्बोधित करते हैं, के कारण भी है। स्त्रियों और थर्ड जेंडर के संदर्भ में भी यह बाकियों की तरह जेंडर विमर्श, उनकी अस्मिता और लैंगिक चेतना के लिए भी कारगर साबित हो सकती है। चेतना सबसे पहले तो अभिव्यक्ति देती है, अभिव्यक्ति अपने अधिकारों की आवाज उठाने के लिए। यदि वर्तमान सरकार की मंशा जातिगत जनगणना को लेकर साफ है तो इससे निश्चित ही स्त्रियों और थर्ड जेंडर के लिए तमाम सरकारी तंत्र में एक मजबूत भागीदारी सुनिश्चित करने में उसे सहायता मिलेगी। क्योंकि स्त्रियों के मामले में विशेषकर आधी-आबादी का शोर अभी भी अमूर्त संख्या और दृश्य है। जाति जनगणना से यह सिर्फ एक शोर नहीं होगा, बल्कि मूर्त रूप में एक दस्तावेज होगा शक्ति और सत्ता के बंटवारे में स्त्रियों की वाजिब हिस्सेदारी सुनिश्चित करने के लिए।
भारत में पिछड़ी जातीय जनगणना का ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य
तेलंगाना और बिहार से पहले कांग्रेस द्वारा भी साल 2011 सामाजिक- आर्थिक और जाति आधारित आंकड़े (सोशियो-इकोनाॅमिक एंड कास्ट सेंसस, एसतईसीसी) एकत्र किए गए थे। लेकिन ये आकड़े सार्वजनिक नहीं किए गए थे। गौरतलब है कि आजाद भारत में भले ही जातिगत जनगणना अब हो रही हो लेकिन इसका इतिहास पुराना रहा है।
1853 में अंग्रेजों द्वारा नाॅर्थ वेस्टर्न प्राॅविंसेज में पहली जनगणना कराई गई थी। इसके बाद 1901 में उन्होंने सेंसस एडमिनिस्ट्रेटर एच रिजले के नेतृत्व मे वर्ण व्यवस्था और पेशे के आधार पर अलग-अलग जाति समूह को वर्गीकृत कर जनगणना की। अंग्रेजों ने 1901 में भारत में पहली जनगणना तो करा ली, लेकिन जातिगत जनगणना वे 1931 में करा सके। ऐसे में कहा जा सकता है कि देश में पहली जातिगत जनगणना 1931 में की गई थी। इस दौरान 4,147 जातियों की पहचान हुई थी। 1951 से 2011 तक की गई जनगणना में भले ही एससी और एसटी की आबादी भी दर्ज की गई हो, लेकिन किसी अन्य जाति समूह के लोगों की गणना नहीं की गई थी।
जातिगत जनगणना भारत की राजनीति में बड़ा बदलाव ला सकती है। इससे सरकार को यह स्पष्ट जानकारी मिल सकती है कि किन जातियों की जनसंख्या कितनी है और कौन-से वर्ग वास्तव में सामाजिक, शैक्षणिक और आर्थिक रूप से पिछड़े हैं। लेकिन यही जानकारी राजनीतिक दलों के लिए वोट बैंक साधने का हथियार भी बन सकती है। वे जनसंख्या के अनुपात में आरक्षण और प्रतिनिधित्व की मांगों को हवा देकर चुनावी लाभ उठाने की कोशिश कर सकते हैं। इसलिए इसका प्रभाव चुनावों पर सीधा और गहरा पड़ेगा। सकारात्मक भी और नकारात्मक भी यह इसके इस्तेमाल पर निर्भर करेगा।
बृजेश शर्मा, डिजिटल प्रमुख ‘समाचार प्लस’
साल 2011 में यूपीए सरकार ने सामाजिक, आर्थिक और जातिगत जनगणना (एसतईसीसी) कराई, जो आजाद भारत में राष्ट्रीय स्तर पर इस तरह का पहला कदम था। लेकिन साल 2014 में यूपीए सरकार की विदाई के साथ ही इसके आकड़े भी सामने नहीं आए। भाजपा सरकार ने सत्ता में आने के बाद साल 2018 में लोकसभा को बताया कि सामाजिक आर्थिक और जातिगत जनगणना 2011 के कास्ट डेटा की प्रोसेसिंग में कुछ गलतियों का पता चला है। जिस वजह से इसके आकड़े सार्वजनिक नहीं किए जा सकते हैं। वहीं 2021 में केंद्र सरकार ने सर्वोच्च न्यायलय में हलफनामा दायर कर कहा कि एससी, एसटी के सिवा बाकी लोगों के बीच कास्ट सेंसस ‘कराना प्रशासनिक रूप से बेहद मुश्किल और जटिल कार्य है। हर जनगणना में जातियों की संख्या बढ़ती गई है, 1901 में ये जातियां 1,646 से बढ़कर 1931 में 4,147 हुई। मंडल आयोग ने 1980 में ओबीसी की 3,428 जातियां बताईं, जो अब हजारों में हैं। 2011 की एसईसीसी में गड़बड़ियों के कारण 46 लाख जातियों/उपजातियों का आकड़ा सामने आया। इस जातिजगणना में केंद्र और राज्यों की ओबीसी लिस्ट में भारी अंतर रहा – केंद्र में 2,500 जातियां, वहीं राज्यों में 3,000से ज्यादा जातियां हैं। कई जातियां राज्य में ओबीसी हैं, लेकिन केंद्र में नहीं। एक ही जाति की स्थिति राज्य दर राज्य अलग-अलग हंै, जिससे भ्रम और असमानता बढ़ती है। वैश्य समुदाय की कुछ जातियां कुछ राज्यों में ओबीसी हैं तो कुछ में जनरल। जाट कुछ राज्यों में ओबीसी हैं, कुछ में नहीं।

