Editorial

टूटे वादे, अधूरे सपने और नववर्ष

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में बीते एक दशक में जिस ‘न्यू इंडिया’ की कल्पना की गई, उसके केंद्र में दो प्रतीकात्मक परियोजनाएं रहीं, बुलेट ट्रेन और दिल्ली-मुम्बई एक्सप्रेसवे। ये दोनों केवल परिवहन योजनाएं नहीं थीं बल्कि उस राजनीतिक नैरेटिव का हिस्सा हैं जिसमें भारत को तेज, आधुनिक और वैश्विक प्रतिस्पर्धा के योग्य दिखाया गया है लेकिन 2025 के अंत में खड़े होकर जब हम इन दोनों परियोजनाओं की स्थिति देखते हैं तो सवाल उठते हैं कि क्या सपने रफ्तार से आगे निकल गए? क्या जमीनी हकीकत पीछे छूट गई?

सबसे पहले बात उस सड़क की जिसे देश की विकास धमनियों में सबसे अहम माना गया, दिल्ली-मुम्बई एक्सप्रेसवे। 1,386 किलोमीटर लम्बा यह एक्सप्रेसवे दिल्ली को देश की आर्थिक राजधानी मुम्बई से जोड़ने के लिए डिजाइन किया गया है। दावा किया गया था कि यह दुनिया के सबसे लम्बे ग्रीनफील्ड एक्सप्रेसवे में से एक होगा। यात्रा समय लगभग आधा कर देगा और लाॅजिस्टिक्स लागत में भारी कमी लाएगा। चार राज्यों, राजस्थान, मध्य प्रदेश, गुजरात और महाराष्ट्र से गुजरने वाला यह प्रोजेक्ट 53 टुकड़ों में बांटा गया ताकि काम तेजी से पूरा हो सके।

कागज पर योजना आकर्षक है लेकिन जमीनी स्तर पर तस्वीर उलट निकली। गुजरात के बडोदरा-विरार सेक्शन के मात्र 87 किलोमीटर के तीन टुकड़े, जुजुवा-गांडेवा, करवाड़-जुजुवा और तलसारी-करवाड़, पूरी परियोजना के लिए सबसे बड़ा रोड़ा बन गए हैं। 2021 में इन तीन स्थानों पर एक्सप्रेसवे निर्माण का ठेका दिया गया, लेकिन काम की रफ्तार शुरू से ही धीमी रही। पुल, फ्लाईओवर, सर्विस रोड, सब कुछ समय-सीमा से पीछे चलता रहा। नतीजा यह हुआ कि मार्च 2023 में नेशनल हाईवे अथॉरिटी ने दो ठेकों के ठेके रद्द कर नए टेंडर जारी किए।
यहां से कहानी दिलचस्प और चिंताजनक हो जाती है। नए टेंडर में पुरानी कम्पनी ही सबसे कम बोली लगाकर फिर विजेता बन गई और नवम्बर 2023 में उसे दोबारा काम सौंप दिया गया। सवाल लाजमी है कि जिस ठेकेदार के कारण पहले देरी हुई उसे फिर मौका क्यों दिया गया? कायदे से दूसरी बार ठेका नहीं दिया जाना चाहिए था लेकिन तर्क यह दिया गया कि नियमों के मुताबिक एल-1 यानी सबसे कम बोली लगाने वाले को रोकना आसान नहीं होता। ‘क्योर पीरियड’ जैसी व्यवस्थाओं का हवाला दिया गया जिसके तहत ठेकेदार को सुधार का अवसर देना पड़ता है।

चार साल बीत जाने के बाद भी इन तीन स्थानों में प्रगति 5 प्रतिशत से 36 प्रतिशत के बीच ही सिमटी हुई है। पूरी परियोजना की अनुमानित लागत लगभग 1.03 लाख करोड़ रुपए है जिसमें से 71,000 करोड़ रुपए से अधिक खर्च हो चुके हैं। यानी पैसा पानी की तरह बह चुका है लेकिन सड़क अब भी अधूरी है। कुछ हिस्सों जैसे दिल्ली-लालसोट जैसे सेक्शन पर अवश्य एक्सप्रेसवे का काम पूरा हो चुका है लेकिन जब तक पूरी श्रृंखला नहीं जुड़ती तब तक इसके आर्थिक लाभ अधूरे ही रहेंगे। लाॅजिस्टिक्स कम्पनियों, उद्योगों और यात्रियों के लिए यह सड़क हाल-फिलहाल तक ‘टुकड़ों में विकास’ का उदाहरण बनी हुई है।

दूसरा स्वप्न दिखाया गया था उस परियोजना का जिसे भारत की तकनीकी छलांग के तौर पर पेश किया गया, बुलेट ट्रेन। मुम्बई-अहमदाबाद बुलेट ट्रेन परियोजना की आधारशिला 2017 में रखी गई थी। तब कहा गया था कि 2023 तक भारत की पहली हाई-स्पीड ट्रेन 320 किमी प्रति घंटे की रफ्तार से दौड़ने लगेगी। यह परियोजना जापान के सहयोग से शिंकानसेन तकनीक पर आधारित है और इसे भारत-जापान रणनीतिक साझेदारी का प्रतीक बताया गया। लेकिन आठ साल बाद स्थिति यह है कि ट्रेन अभी पटरी पर आने से काफी दूर है।

परियोजना की कुल लम्बाई 508 किलोमीटर है और अनुमानित लागत 1.08 लाख करोड़ रुपए के आस-पास बताई गई। गुजरात में निर्माण अपेक्षाकृत तेज दिखता है, वहां वायाडक्ट, पिलर और कुछ स्टेशन संरचनाएं आकार ले चुकी हैं। लेकिन महाराष्ट्र में कहानी बिल्कुल अलग रही। भूमि अधिग्रहण, पर्यावरणीय मंजूरियां, राजनीतिक खींचतान और स्थानीय विरोध के कारण वर्षों तक काम शुरू ही नहीं हो पाया। मुम्बई के बीकेसी स्टेशन और ठाणे-पालघर सेक्शन पर काम बहुत देर से शुरू हुआ। इस देरी का असर समय-सीमा पर साफ दिखता है। 2023 की जगह पहले 2026, फिर 2028 और अब अनौपचारिक तौर पर 2030 तक की बातें होने लगी हैं। तकनीक और फंडिंग पर सवाल नहीं हैं, जापान से सस्ता ऋण, उन्नत तकनीक और विशेषज्ञता उपलब्ध है। असली समस्या है निष्पादन यानी जमीन पर फैसलों को लागू करने की क्षमता।

दिल्ली-मुम्बई एक्सप्रेसवे और बुलेट ट्रेन, दोनों को एक साथ रखकर देखें तो एक समान पैटर्न उभरता है। बड़े-बड़े वादे, भव्य घोषणाएं, शिलान्यास के समारोह लेकिन उसके बाद ठेकेदारों की लापरवाही, प्रशासनिक ढील, राजनीतिक हस्तक्षेप और जवाबदेही की कमी। नतीजा यह कि परियोजनाएं समय से पीछे खिसकती जाती हैं और जनता केवल नई तारीखें सुनती रहती है।

इस देरी का असर केवल यात्रियों की असुविधा तक सीमित नहीं है। यह सार्वजनिक धन के उपयोग, आर्थिक योजना और शासन की विश्वसनीयता से जुड़ा मामला है। जब एक एक्सप्रेसवे समय पर पूरा नहीं होता तो उद्योगों की लागत बढ़ती है। बुलेट ट्रेन परियोजना के अधर में लटकने से भारत की तकनीकी छवि पर सवाल उठने लगे हैं। सबसे अहम बात यह कि हर देरी के साथ जनता का भरोसा कमजोर होता जा रहा है। हालांकि ‘काम’ अभी भी बतौर आर्केटिंग टूल खासे सफल हैं, उम्मीद की जा सकती है कि आज नहीं तो कल जनता सवाल पूछेगी जरूर। सरकार का तर्क है कि इतने बड़े प्रोजेक्ट्स में चुनौतियां आती हैं, भूमि अधिग्रहण आसान नहीं, पर्यावरणीय संतुलन जरूरी है और कानूनी प्रक्रियाएं समय लेती हैं। यह तर्क पूरी तरह गलत भी नहीं है। लेकिन सवाल यह है कि क्या इन चुनौतियों का आकलन पहले नहीं किया जा सकता था? क्या समय-सीमा तय करते वक्त इन जोखिमों को ध्यान में नहीं रखा जाना चाहिए था?

आज स्थिति यह है कि बुलेट ट्रेन पूरी तरह रुकी नहीं है लेकिन वह उस रफ्तार से भी नहीं बन रही जिस रफ्तार से उसका सपना बेचा गया था। दिल्ली-मुम्बई एक्सप्रेसवे भी पूरी तरह ठप नहीं है लेकिन चार साल की देरी ने उसे विकास के प्रतीक से प्रशासनिक विफलता के उदाहरण में बदल दिया है।

इन दोनों परियोजनाओं की कहानी बड़े सवालों की ओर इशारा करती है कि क्या भारत में मेगा प्रोजेक्ट्स केवल राजनीतिक प्रतीक बनते जा रहे हैं? क्या घोषणाओं की राजनीति ने निष्पादन की राजनीति को पीछे छोड़ दिया है? जब तक इन सवालों के जवाब नहीं मिलते तब तक हर नई परियोजना के साथ संदेह भी जुड़ता रहेगा।
तेज भारत का सपना बुरा नहीं है। बुलेट ट्रेन और एक्सप्रेसवे जैसे प्रोजेक्ट्स देश की जरूरत भी हैं लेकिन सपनों को जमीन पर उतारने के लिए केवल इच्छाशक्ति नहीं बल्कि सख्त अनुशासन, पारदर्शिता और जवाबदेही चाहिए। वरना नतीजा वही होगा जो आज दिख रहा है, सड़कें अधूरी, ट्रेनें प्रतीक्षा में और जनता के सामने हंसते, प्रसन्नचित्त भगवान राम। सपनों की बात छोड़ हकीकत की तरफ लौटता हूं। नववर्ष 2026 का आगमन हो चुका है। सभी को नूतन वर्ष की समस्त अशेष शुभकामनाओं के साथ कविवर अशोक वाजपेयी की एक कविता यह याद दिलाने के लिए कि हम कैसे समय में जी रहे हैं-

अब हम ऐसे समय में आ गए हैं
कि झूठ को सच की तरह देख सकते हैं:

उज्ज्वल, अदम्य और स्पष्ट!
जो असल में सच है

वह हमारे समय में पिछड़ता जाता है
और उसे दृश्य से बाहर हकाले जाते देखना हमने बंद कर दिया है।

सच अब हमारे भरोसे या सहारे नहीं है
और हम राहत महसूस करते हैं

कि हमें उसके लिए परेशान नहीं होना पड़ता।
हमें अब किसी अदालत में हलफ नहीं उठाना है

क्योंकि अदालत ने
जैसी-तैसी गवाही पर यकीन कर हमें दोषी नहीं पाया:

हमने नरसंहार दूर से देखा
पर हमारे साफ धुले कपड़ों पर ख़ून का एक भी दाग नहीं है।

जब वह सब हुआ तो मौके पर हम मौजूद नहीं थे:
हमारा न होना साबित है,

अपने होने को साबित करने की हमें अब दरकार नहीं।
हम बदलाव चाहते थे

और खुशकिस्मती से दुनिया भी ऐसी बदल गई
कि सच का भय जाता रहा।

हम कर्मठ लोग हैं:
कर्म में विश्वास करते हैं, उसके फल में नहीं।

हमारी कार से कोई पिल्ला दब जाए तो हमें दुःख जरूर होता है
कि ड्राइवर ने सावधानी नहीं बरती।

पर हमें जल्दी होती है
कहीं वक्त पर पहुंचना ऐसी छोटी-सी वारदात के लिए रुकने से

ज्यादा जरूरी होता है।
वैसे अब हमें सच की ख़ास जरूरत नहीं,

झूठ से काम अच्छा निकलता है,
वह सच जैसा अड़ियल भी नहीं है।

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