दिल्ली चुनाव में लगभग तीन दशक बाद मिली बम्पर जीत से भाजपा नेतृत्व ने एक बार फिर सबको चैंकाते हुए महिला मुख्यमंत्री बना एक तीर से कई निशाने साधने की कोशिश की है

इसी महीने पांच फरवरी को हुए दिल्ली विधानसभा की सभी 70 सीटों के चुनाव नतीजे आठ फरवरी को आए जिसमें आम आदमी पार्टी को 22 और भाजपा को मिली बम्पर 48 सीटों के साथ दिल्ली में 27 साल बाद भाजपा की सत्ता में वापसी हुई है। चुनाव नतीजे आने के बाद से ही मुख्यमंत्री के नाम का इंतजार किया जा रहा था। नई दिल्ली से पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल को हराने वाले पूर्व सांसद प्रवेश वर्मा और रोहिणी से तीसरी बार विधायक चुने गए विजेंद्र गुप्ता इस पद के प्रबल दावेदार माने जा रहे थे। लेकिन नतीजों के बारह दिनों बाद गत सप्ताह 20 फरवरी को भाजपा ने रेखा गुप्ता को मुख्यमंत्री बनाकर एक बार फिर सबको चैंका दिया है। ऐसे में सवाल उठ रहे हैं कि आखिर रेखा गुप्ता को ही दिल्ली का सीएम क्यों बनाया गया। इसके अलावा भी पार्टी में कई दिग्गज नेता थे उन्हें क्यों नहीं? इसके पीछे क्या कारण हैं?

राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि इसके पीछे कई कारण हैं। सबसे पहला कारण यह कि महिला मुख्यमंत्री बनाकर पार्टी नेतृत्व ने न सिर्फ कई राजनीतिक समीकरण साधने की कोशिश की है, बल्कि यह संदेश भी दिया है कि वह महिला नेतृत्व को बढ़ावा देने के साथ अपने कोर वोट बैंक वैश्य समुदाय को खुश करने का काम किया है। दिल्ली समेत मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, हरियाणा व अन्य राज्यों की तरह दिल्ली में भी भाजपा को सत्ता में लाने में महिलाओं ने अहम भूमिका निभाई है। रेखा गुप्ता वैश्य समुदाय से हैं और पहली बार शालीमार बाग से विधायक चुनी गई हैं।

दूसरा दिल्ली में 40 विधानसभा क्षेत्रों में महिलाओं ने पुरुषों से ज्यादा मतदान किया है और इनमें से 28 पर भाजपा को जीत मिली है। 15 विधानसभा क्षेत्रों में महिलाओं का मतदान पुरुषों के मुकाबले एक फीसदी कम रहा। इनमें से भी 12 पर भाजपा को जीत मिली। दिल्ली के अलावा अन्य 13 राज्यों में भाजपा की सरकार है, लेकिन इनमें से किसी में भी महिला मुख्यमंत्री नहीं है। विपक्ष अक्सर इस बात पर सवाल उठाता रहता है, लेकिन अब पार्टी ने उसे जवाब दे दिया है। रेखा गुप्ता वैश्य समुदाय से हैं। वैश्य मतदाता को बीजेपी का कोर वोटर माना जाता है। अरविंद केजरीवाल के सीएम बनने के बाद दिल्ली में इस समुदाय का झुकाव आम आदमी पार्टी की तरफ चला गया था लेकिन इस चुनाव में वैश्य समुदाय ने बीजेपी को भरपूर सहयोग दिया है। इसके अलावा वर्तमान में बीजेपी शासित राज्यों में कोई भी बनिया समुदाय से सीएम नहीं था लेकिन अब बीजेपी ने साफ संदेश देने का प्रयास किया है कि पार्टी सभी को साथ लेकर चलेगी। पार्टी का नारा भी है ‘सबका साथ, सबका विकास और सबका विश्वास।’

दिल्ली में महिला नेताओं का इतिहास रहा है। बीजेपी ने पहली बार अक्टूबर 1998 में सुषमा स्वराज को दिल्ली का मुख्यमंत्री बनाया था। वे दो महीने तक इस पद पर रहीं। उनके नेतृत्व में बीजेपी ने 1998 में दिल्ली विधानसभा चुनाव लड़ा लेकिन उसे हार का सामना करना पड़ा। उनके बाद कांग्रेस की शीला दीक्षित मुख्यमंत्री बनीं। वह 15 साल तक दिल्ली की मुख्यमंत्री रहीं। सितम्बर 2024 में अरविंद केजरीवाल के इस्तीफे के बाद आप नेता आतिशी मार्लेना को मुख्यमंत्री बनाया गया। ऐसे में अब भाजपा के रेखा गुप्ता को सीएम बनाने का सबसे बड़ा कारण यह कि रेखा के चयन के पीछे उनका विवादों से दूर रहना और संगठन से लेकर नगर निगम तक में अहम जिम्मेदारियां निभाना शामिल है। कई अहम जिम्मेदारियां निभाने के बावजूद उन पर न तो भ्रष्टाचार का कोई आरोप है और न ही वह किसी बयान या अन्य वजह से विवादों में रही हैं। वह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और भाजपा की मजबूत विचारधारा से जुड़ी रही हैं। एबीवीपी से अपने राजनीतिक सफर की शुरुआत करने वाली रेखा दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र संघ की सचिव और अध्यक्ष रहीं। दिल्ली प्रदेश भाजपा युवा मोर्चा की सचिव, प्रदेश भाजपा की महासचिव और नगर निगम में तीन बार पार्षद रहीं। निगम की कई समितियों में भी रह चुकी हैं। इस तरह उनके पास सांगठनिक और प्रशासनिक दोनों तरह का अनुभव है। लेकिन उनके सामने पार्टी के वो वायदे जरूर मुश्किल कड़ी कर सकते हैं जो पार्टी ने चुनाव में किए और जनता ने उन पर विश्वास किया।

रेखा की चुनौतियां

चुनौतियों की बात करें तो वैसे तो नई सरकार का फोकस प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ओर से चुनाव प्रचार के दौरान की गई घोषणाओं और पार्टी मैनिफेस्टो में दिल्ली की जनता से किए गए वादों को पूरा करने पर रहेगा लेकिन कुछ काम ऐसे हैं जिन्हें पूरा करना इतना भी आसान नहीं है। खासकर केजी से पीजी तक फ्री शिक्षा, जल, जमीन और हवा की सफाई, परिवहन और स्वास्थ्य, सहित आयुष्मान भारत योजना जैसी कई जनहित योजनाएं लागू करनी होंगी। ये काम न सिर्फ कहीं न कहीं दिल्ली के शासन में जवाबदेही और पारदर्शिता सुनिश्चित करने का काम करेंगे, बल्कि दिल्ली को बड़ी समस्याओं से निजात दिलाने के लिहाज से भी बेहद अहम साबित होंगे।

शिक्षा : शिक्षा की बात करें तो आम आदमी पार्टी ने अपने कार्यकाल के दौरान शिक्षा को लेकर सबसे ज्यादा काम करने का दावा किया। बजट में भी इसकी झलक देखने को मिलती है। बीजेपी ने अपने चुनावी दावे में कहा है केजी से पीजी तक फ्री शिक्षा दी जाएगी। यही नहीं बीजेपी ने 2026 तक तीन नए काॅलेज और प्रतियोगी परीक्षा में भाग लेने वाले छात्रों को 15 हजार रुपए की सहायता देने का भी वादा किया है। इसके साथ ही अनुसूचित जाति और जनजाति के तकनीकी शिक्षा प्राप्त करने वाले छात्रों को 1,000 प्रतिमाह देने का वायदा किया है। शिक्षा खर्च को लेकर जानकार कहते हैं कि सबसे बड़ी बात यह है कि आम आदमी पार्टी ने निजी स्कूलों की फीस नहीं बढ़ने दी। वहीं सरकारी स्कूलों को निजी स्कूलों के स्तर पर ला खड़ा किया है। ऐसे में बीजेपी शिक्षा व्यवस्था में क्या परिवर्तन लाएगी यह देखना होगा।

जल, जमीन और हवा की सफाई

इस चुनाव में बीजेपी ने यमुना की सफाई को एक बड़ा मुद्दा बनाया था। बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष वीरेंद्र सचदेवा ने तो बाकायदा प्रदूषित यमुना में डुबकी लगाकर अरविंद केजरीवाल को चैलेंज किया था। ऐसे में यमुना की सफाई बीजेपी की सरकार का सबसे प्रमुख एजेंडा रहेगा।

भाजपा ने 3 साल में यमुना को साफ करने और रिवर फ्रंट बनाने का भी वादा किया है। पिछले कुछ वर्षों में आठ हजार करोड़ रुपए यमुना की सफाई पर खर्च हो चुके हैं। जहां तक दिल्ली में वायु प्रदूषण का सवाल है बीजेपी सरकार की असल चुनौती यह है कि इस समस्या से निपटाने के लिए कितनी जल्दी आधारभूत ढांचा खड़ा कर पाती है। आम आदमी पार्टी इसके लिए आधारभूत ढांचा नहीं बना पाई। इसके लिए बीजेपी सरकार को एक बेहतर योजना बनानी होगी।

परिवहन और स्वास्थ्य

दिल्ली में करीब 13 हजार ई बस का संचालन करने का वादा बीजेपी ने चुनाव प्रचार के दौरान किया। इसके लिए करीब 20 हजार करोड़ रुपए की आवश्यकता होगी। दिल्ली के आसपास 65 हजार करोड़ रुपए के हाईवे भी तैयार होंगे। मेट्रो विस्तार पर भी 2,700 करोड़ रुपए की जरूरत है। दिल्ली सरकार ने सड़कों के विकास पर व्यय पिछले बजट के मुकाबले घटा दिया है। वित्त वर्ष 2023-24 में 3,126 करोड़ रुपए खर्च करने का प्रस्ताव था उसे 2024-25 में घटाकर 1,768 करोड़ रुपए कर दिया गया।

इसके साथ ही बीजेपी अपनी स्वास्थ्य क्षेत्र की पंसदीदा योजना पीएम आयुष्मान भारत योजना को भी दिल्ली में लांच करेगी। इसके तहत पांच लाख रुपए तक का इलाज फ्री दिया जाएगा। इसमें 70 साल तक के बुजुर्गों का इलाज होगा। साथ ही गर्भवती महिलाओं को 21 हजार रुपए की वित्तीय सहायता के साथ छह न्यूट्रिशन किट भी दी जाएंगी। लेकिन दिल्ली के अस्पतालों को और भी बेहतर बनाने के लिए 10 हजार करोड़ की जरूरत है। वहीं 30 मिनट के सफर वाले रास्तों में डेढ़ से दो घंटे लग रहे हैं। ऐसे में एक यातायात व्यवस्था की अच्छी आधारभूत सरंचना को तैयार करना एक बड़ी चुनौती है।

पानी की सप्लाई और जलभराव की रोकथाम

जल्द ही गर्मी आने वाली है और उसके बाद मानसून। इस दौरान दिल्ली वासियों को दो बड़ी समस्याओं का सामना करना पड़ता है। गर्मियों में पानी की किल्लत न हो और बारिश में वाटरलाॅगिंग की समस्या गम्भीर न बने इसके लिए तुरंत काम शुरू करने होंगे। नए वाटर ट्रीटमेंट प्लांट, नालों की सफाई और जलभराव वाले इलाकों में खास कदम उठाने होंगे। दूसरी तरफ आम आदमी पार्टी अब विपक्ष में है और उसकी निगाहें बीजेपी पर होंगी। बीजेपी पिछली सरकार की योजनाओं में क्या बदलाव करती है और अपनी कौन सी योजनाएं लाती है इसपर भी सबकी निगाहें होंगी। दिल्ली का इस वित्तीय वर्ष का बजट 76 हजार करोड़ रुपए है। इसमें सबसे ज्यादा खर्च शिक्षा पर 16,396 करोड़ रुपए निर्धारित है। वहीं आवास और शहरी विकास 9,800 करोड़ रुपए, स्वास्थ्य सेवा पर 8,685 करोड़ और परिवहन पर 7,470 करोड़ रुपए निर्धारित है। जल आपूर्ति और स्वच्छता 7,195 करोड़ रुपए और सामाजिक सुरक्षा कल्याण 6,694 करोड़ रुपए का खर्च प्रमुख है।

कर केंद्रीय सहायता और गैर कर स्रोतों से आय की बात करें तो 2024-25 के समापन तक 64,142 करोड़ से 62,415 करोड़ रुपए अनुमानित की गई थी। ऐसे में बीजेपी के सामने अपने वायदों को पूरा करने के लिए आय बढ़ाना कठिन होगा। राजनीतिक विश्लेषक कहते हैं कि दिल्ली में राजस्व का कोई बड़ा स्रोत नहीं है। राजस्व बढ़ाने के लिए नए रास्ते तलाशने होंगे। हालांकि अब केंद्र और राज्य दोनों जगह भाजपा सरकार है। ऐसे में स्पेशल पैकेज के तहत दिल्ली सरकार को सहायता मिलेगी तभी ही बात बनेगी।

फ्री योजनाएं और मासिक पेंशन बढ़ाएंगी बोझ

महिलाओं को 2500 रुपए प्रतिमाह देने के वायदे को पूरा करने के लिए करीब 11 हजार करोड़ रुपए खर्च होने का अनुमान लगाया गया है। आम आदमी पार्टी की गणना को ही मान लें तो 38 लाख महिलाएं इसकी पात्र हैं। चुनाव आयोग की रिपोर्ट के अनुसार दिल्ली में करीब साढ़े 24 लाख ऐसे बुजुर्ग हैं जिनकी उम्र 60 साल से अधिक है। इन्हें ढाई से तीन हजार रुपए मासिक पेंशन का वादा किया गया है। इनकी मासिक पेंशन पर भी 4,100 करोड़ रुपए के खर्च का अनुमान है।
फ्री बिजली और पानी योजना को जारी रखने के लिए भी करीब 11 हजार करोड़ रुपए की आवश्यकता होगी। 500 रुपए में गैस सिलेंडर और होली और दिवाली पर इसे फ्री देने की पेशकश भी सरकार का बजट बढ़ाएगी। यही नहीं आॅटो, टैक्सी और ई-रिक्शा चालकों सहित गिग वर्कर्स को 10 लाख रुपए का जीवन बीमा और 5 लाख का स्वास्थ्य बीमा भी बजट पर बोझ बनेगा, वहीं झुग्गियों की अटल कैंटीन 5 रुपए में भोजन भी भारी पड़ेगा। हालांकि वित्तीय बोझ तो है लेकिन केंद्र शासित प्रदेश होने के कारण केंद्र सरकार की जिम्मेदारी बढ़ गई है।

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