Uttarakhand

दिल से दिल की बात-62 : उत्तरा-खण्ड-यत

उत्तराखण्ड राज्य बने हुए अब पच्चीस वर्ष होने जा रहे हैं। इस राज्य के दो भूभाग पहाड़ व तराई हैं। दोनों ओर से हम बड़ी संख्या में नए लोगों व सामाजिक समूहों का आगमन देख रहे हैं। पहाड़ों से बड़ी संख्या में लोग पलायनित होकर मैदानों में आ रहे हैं और बस रहे हैं। उत्तराखण्ड में बेहतर आजीविका की तलाश में बड़ी संख्या में भिन्न-भिन्न मान्यताओं व संस्कारों के लोग आ रहे हैं और बस रहे हैं। इसके परिणाम स्वरूप मैदानी भाग में एक अजीब सी सामाजिक आर्थिक सांस्कृतिक कशमकश बढ़ रही है। इस कशमकश के सामाजिक तनाव के रूप में बढ़ने की सम्भावना है। यह आगे न बढ़े इस हेतु एक सुनियोजित प्रशासनिक, सामाजिक, सांस्कृतिक व आर्थिक अभियान चलाना आवश्यक है। इन नवोदित सामाजिक समूहों में हमें ऐसा नेतृत्व तैयार करना पड़ेगा जिसमें इस नवोदित राज्य के बनने से पहले की स्थापित सांस्कृतिक सामाजिक सोचों के साथ तारतम्य बैठाने की क्षमता हो। हमें भी थोड़े से सांस्कृतिक अपभ्रंश के लिए तैयार रहना पड़ेगा। इस प्रकार का सामंजस्यपूर्ण बदलाव आपको अन्यत्र भी देखने को मिलता है। उत्तराखण्ड कोई अपवाद नहीं है। धीरे-धीरे इन नवोदित सामाजिक समूहों का भी राज्य की मुख्य सांस्कृतिक धाराओं के साथ जुड़ाव पैदा होगा। हां, इस नई चुनौती का गहन अध्ययन कर इस दिशा में प्रशासनिक व सामाजिक प्रयास अभी से प्रारम्भ करने आवश्यक हैं। भाषा-बोलियां, पहनावे-वस्त्र, आभूषण, खान-पान, तीज-त्यौहार, आचरण-व्यवहार समाज के आंतरिक व वाह्य, दोनों प्रकार के आभूषण या पहचानें हैं। उत्तराखण्डियत हमारे परिवेश के साथ इन पहचानों की सामूहिकता को प्रतिविम्बित करती है। यह एक ऐसी इन्द्रधनुषी आभा है जिसके आलोक में हम सब गौरवान्वित होते हैं। इस आभा में संर्कीणता का कोई स्थान नहीं है। इन्द्र धनुष की भांति हमारी संस्कृति की यह आभा राज्य के सभी क्षैतिजों को हृदयगम करती दिखाई देती है। प्रकृति का इन्द्र धनुष तो सात रंगों से सजा हुआ है। सौभाग्य से उत्तराखण्डियत रूपी यह इन्द्र धनुष कई अधिक रंगों-उप रंगों से सुसज्जित है। हमारा भाव इस में और चमक-चटक व रंग जोड़ने का होना चाहिए। हमें सबको साथ लेकर चलने की क्षमता अर्थात ‘‘यत’’ के महत्व को किसी भी स्थिति में कमजोर नहीं पड़ने देना है 

  • हरीश रावत
    पूर्व मुख्यमंत्री, उत्तराखण्ड

 

उत्तराखण्ड नाम के शब्दार्थ ही हैं ऐसी श्रेष्ठ समय जो सबको साथ लेकर चलती है। उत्तर शब्द बोधक है श्रेष्ठ हिमालय का। खंड बोधक है इसकी विभिन्न भौगोलिक आंचलिकताओं और यत शब्द का अर्थ है समाहित करने की क्षमता अर्थात दूसरों को साथ ले चलने की क्षमता। इस आंचलिकता में विकसित संस्कृति धाराओं के तीन मूल स्रोत है। पहला मूल स्रोत था शिल्प आधारित संस्कृति। हस्तशिल्पी जिन्हें कालांतर में शिल्पकार शब्द का उद्बोधन प्राप्त हुआ। समय के साथ दो संस्कृतियां जिन्हें हम थोड़ा बोली आदि के अंतर के कारण गढ़वाली व कुमाऊनी, पहचानें या संस्कृतियां कह सकते हैं, विकसित हुई। इनसे इतर हिमालय की गोद में और कई संस्कृतियां व सहसंस्कृतियां भी विकसित हुई हैं, कुछ पहले-कुछ बाद में। जौनसारी, रवाई, जौनपुरी, गोर्खाली, रंग व जौहारी संस्कृति जिसकी एक धारा पैन खंडियत है, गंगोली, दानपुरी, सौराली, राठी संस्कृतियों या सह संस्कतियों ने भी इस अंचल के सामाजिक उद्भव में योगदान दिया है। दोसानों की मिश्रित बोली व वस्त्रभूषा आधारित अंतर ने भी इस उद्गम को प्रभावित किया और हम एक समावेशी समाज की दिशा में आगे बढ़े। तथ्य परखता यह है कि कुमाऊं व गढ़वाली पहचानें इन सब उप संस्कृतियों को मिलाकर कर ही विकसित हुई हैं। इनके जुड़ाव से ही यह संस्कृतियां विकसित हुई और इन्होंने अपनी कठिन पर्यावरणीय विशेषताओं व आध्यात्म आधारित परंपराओं, खानपान, वस्त्र व भावनागत श्रेष्ठता से सबको प्रभावित किया और कालांतर में शैक्षिक श्रेष्ठता का वस्त्र पहनकर आज समाज के नेतृत्व की स्थिति में आई है। समाजों के विभिन्न वर्गों की परम्पराओं व अन्य सांस्कृतिक उप धाराओं को आत्मसात् करने के इनके गुणों का प्रभाव है कि आज थरवाट व पंजाबियत भी इनसे लिपटी नजर आती है। सौभाग्य से इस धरती पर श्री गुरुनानक देव जी के आगमन चलते सिक्खी सोच के साथ भी हमारा सम्पर्क हुआ और हम सांस्कृतिक रूप से कुछ और धनी बने। देश की स्वतंत्रता के तत्काल बाद यहां कुछ बंगाली और पूर्वांचल के लोग आब बसे और अपने साथ भिन्न भाषा-बोली व परम्पराएं लाए। कुमाऊं व गढ़वाल की तराई का भौगोलिक जुड़ाव व सम्पर्क उस क्षेत्र से है जहां इस्लाम धर्म को मानने वाले बड़ी संख्या में हैं। कुमाऊं की तलहटी में बरैलवी तथा गढ़वाल में देवबंदी इस्लामी धाराओं का धार्मिक व सांस्कृतिक प्रभाव इन क्षेत्रों पर है। इस्लाम की इन दोनों धाराओं के मध्य एक और उप धारा है सूफिइज्म। सौभाग्य से इस धारा का एक बड़ा मरकज है सूफी संत साबिर साहब की दरगाह कलियर शरीफ। यह विश्व प्रसिद्ध दरगाह उत्तराखण्ड में स्थित है। इस उप धारा पर स्पष्ट तौर पर सनातन के उदार व आध्यात्मिक गुणों का अधिक असर दिखाई देता है। हरिद्वार के उत्तराखण्ड राज्य का हिस्सा बनने के बाद किसान वर्गों का एक बड़ा हिस्सा हमसे जुड़ा है। अपनी धार्मिक सोच व परम्पराओं के कारण इनका उत्तराखण्डियत से जुड़ाव बनने में कोई बाधा नहीं है। सिर्फ हमें अपनी सांस्कृतिक धारा में इनके तीज त्यौहारों, खान-पान व सांस्कृतिक विशेषताओं को जोड़ता है। आज तीज, करवा-चैथ, लोहड़ी, गणेश पूजन हरेला जैसे त्यौहार राज्य के बड़े हिस्से में मनाए जाते हैं जो पहले नहीं मनाए जाते थे। हमें सूफी परम्परा की कव्वालियों व रागनियों से तारतम्य पैदा करना चाहिए, इसके प्रभाव स्वरूप हिंदु-मुसलमान खेतिहर वर्गों से हमारी संस्कृति का लगाव स्थापित होगा। राज्य के मैदानी क्षेत्रों में बसे अनुसूचित वर्ग में प्रमुखतः रविदासिए व वाल्मीकि हैं। यह अपनी धार्मिक आस्था व उत्तराखण्ड में एक प्रबल शिल्पकार वर्ग (अनुसूचित) की उपस्थिति के कारक स्वरूप हमारी बड़ी आंचलिकता उत्तराखण्डियत से जुड़ने में इन्हें कोई संकोच नहीं होना चाहिए, आवश्यकता है हमें अपनी सोच व समझ को विस्तृत करने की। उपरोक्त सभी सामाजिक समूहों में धीरे-धीरे बदलाव आ रहा है। राज्य को सुनियोजित तौर पर इस बदलाव को प्रोत्साहन देना चाहिए।

राज्य बने हुए हमें अब पच्चीस वर्ष होने जा रहे हैं। इस राज्य के दो भूभाग पहाड़ व तराई हैं। दोनों ओर से हम बड़ी संख्या में नए लोगों व सामाजिक समूहों का आगमन देख रहे हैं। पहाड़ों से बड़ी संख्या में लोग पलायनित होकर मैदानों में आ रहे हैं और बस रहे हैं। उत्तराखण्ड में बेहतर आजीविका की तलाश में बड़ी संख्या में भिन्न-भिन्न मान्यताओं व संस्कारों के लोग आ रहे हैं और बस रहे हैं। इसके परिणाम स्वरूप मैदानी भाग में एक अजीब सी सामाजिक आर्थिक सांस्कृतिक कशमकश बढ़ रही है। इस कशमकश के सामाजिक तनाव के रूप में बढ़ने की सम्भावना है। यह आगे न बढ़े इस हेतु एक सुनियोजित प्रशासनिक, सामाजिक, सांस्कृतिक व आर्थिक अभियान चलाना आवश्यक है। इन नवोदित सामाजिक समूहों में हमें ऐसा नेतृत्व तैयार करना पड़ेगा जिसमें इस नवोदित राज्य के बनने से पहले की स्थापित सांस्कृतिक सामाजिक सोचों के साथ तारतम्य बैठाने की क्षमता हो। हमें भी थोड़े से सांस्कृतिक अपभ्रंश के लिए तैयार रहना पड़ेगा। इस प्रकार का सामंजस्यपूर्ण बदलाव आपको अन्यत्र भी देखने को मिलता है। उत्तराखण्ड कोई अपवाद नहीं है। धीरे-धीरे इन नवोदित सामाजिक समूहों का भी राज्य की मुख्य सांस्कृतिक धाराओं के साथ जुड़ाव पैदा होगा। हां, इस नई चुनौती का गहन अध्ययन कर इस दिशा में प्रशासनिक व सामाजिक प्रयास अभी से प्रारम्भ करने आवश्यक हैं।

तेजी से हो रहे इन बदलाओं तथा सामाजिक घर्षण से एक नई सोच उभर रही है, वह है मेरा राज्य-मेरा उत्तराखण्ड की सोच। लोगों ने समावेशित तौर पर एक भगौलिक प्रशासनिक ईकाई की महत्ता को स्वीकार करना प्रारम्भ कर लिया है। मैं अपने व्यापक जनसम्पर्क के दरम्यान इस भाव की तपिश का अनुभव करता हूं। आप आए कहीं से है, ऊपर-नीचे, बाहर कहीं से भी आए हैं। आज लोगों में अपने राज्य उत्तराखण्ड का बोध बढ़ता जा रहा है, यह शुभ लक्षण है, इसे निरंतर प्रोत्साहित व प्रचारित करना आवश्यक है। हम एक राज्य हैं, सोच अब बहुत कम ही सही राज्य के प्रवासियों में भी विकसित हो रही है। मैंने दिल्ली के यमुना पार के क्षेत्रों में देखा व पाया कि उत्तराखण्ड से इन क्षेत्रों में बसे हिंदु (पर्वतीय मूल) व हरिद्वार क्षेत्र के मुसलमान भाई भी उत्तराखण्डी मूल के उम्मीदवारों के पक्ष में वोट करते हैं। इन क्षेत्रों में बसे हरिद्वार के मुस्लिम भाई, उत्तराखण्डी मूल के भाजपा उम्मीदवार को वोट देते हैं।

हमें इन समस्त भिन्नाताओं में एकता के सूत्र को पकड़कर एक बड़ी पहचान देनी पड़ेगी। इस पहचान को एक नाम या उद्बोध नाम देना आवश्यक है। व्यापक अर्थ व समावेसिता रखने वाला यह शब्द उत्तराखण्डी और समावेसित सामूहिक पहचान का आत्मिक आवरण उत्तराखण्डियत ही हो सकता है। यह शब्द हमारी सामूहिक संस्कृति व प्रवृति को साकार करता है। यह एक ऐसा अर्थमूलक आहवाहन है जिसमें हमारी बहुलता व विभिन्नताओं को समेटने की शक्ति है। यह शब्द स्वःस्फूरित तौर पर चलन में आया है। मैं तो इस शब्द का ढोलची मात्र हूं।

  • भाषा-बोलियां हमारे संस्कारों को ढालती हैं और संस्कार व परम्पराओं से संस्कृति का उद्भव होता है। उत्तराखण्ड में कई भाषाएं व बोलियां प्रचलित हैं और हमारी समृद्ध बहुलता को दिग्दर्शित करती हैं। हिंदी, गढ़वाली, कुमाऊनी, जौनसारी, रंग, बंगाली, उर्दू, पंजाबी भाषा के रूप में वर्गीकृत की जा सकती है। शेष बोलियों हैं। भाषायें व बोलियों, दोनों बहुत समृद्ध हैं। लोककला, लोगगीतों को स्वर देने वाली ये बोलियां कई संदर्भों में भाषाओं से अधिक समृद्ध हैं। इन में हमारी पीढ़ियों का संचित ज्ञान, बौद्धिक सम्पदा के रूप में संजोया पड़ा है। बोलियों व भाषाओं के ह्रास का अर्थ है कि पीढ़ी दर पीढ़ी अर्जित व वर्णित ज्ञान का विलुप्त होने का खतरा तथा इनसे जुड़ी हुई भाषाओं का कमजोर होना। हमारी सरकार ने वर्ष 2015 में इस दिशा में सुधार हेतु कुछ कदम उठाए:

    1. भाषा-बोली उन्नयन संस्थान स्वीकृत किया और उसके संचालन के लिए परिषद गठित की।
    2. लोकसेवा आयोग व अधिनस्थ सेवा चयन आयोग के साथ बैठक कर इनकी परिक्षाओं के प्रश्नों में भाषा-बोलियों व परिवेश से सम्बंधित प्रश्नों का 30 प्रतिशत तक समावेषण।
    3. हिंदी, संस्कृत, उर्दू, बंगाली, पंजाबी भाषा के समुचित विकास हेतु अकादमी का गठन किया।
    4. कुमाऊं व गढ़वाल विश्व विद्यालयों में गढ़वाली, कुमाऊनी, रंग,
    जौनसारी भाषाओं के अध्यनार्थ पृथक फैकल्टी का गठन किया गया।
    5. स्थानीय भाषा-बोलियों में साहित्य, लेख, पत्र, पत्रिकाओं के प्रकाशन व रंग कर्मियों व कलाकारों को प्रोत्साहन की राज्य नीति का निर्धारण किया।

मैं नहीं जानता की आज उपरोक्त दिशा में क्या स्थिति है। हमें अपनी इस बिखरी हुई बौद्धिक सम्पदा व समृद्ध परम्पराओं का विधिवत संरक्षण व संवर्धन करना चाहिए। यह समय की आवश्यकता है। भाषा-बोलियां, पहनावे-वस्त्र, आभूषण, खान-पान, तीज-त्यौहार, आचरण-व्यवहार समाज के आंतरिक व वाह्य, दोनों प्रकार के आभूषण या पहचानें हैं। उत्तराखण्डियत हमारे परिवेश के साथ इन पहचानों की सामूहिकता को प्रतिविम्बित करती है। यह एक ऐसी इन्द्रधनुषी आभा है जिसके आलोक में हम सब गौरवान्वित होते हैं। इस आभा में संर्कीणता का कोई स्थान नहीं है। इन्द्र धनुष की भांति हमारी संस्कृति की यह आभा राज्य के सभी क्षैतिजों को हृदयगम करती दिखाई देती है। प्रकृति का इन्द्र धनुष तो सात रंगों से सजा हुआ है। सौभाग्य से उत्तराखण्डियत रूपी यह इन्द्र धनुष कई अधिक रंगों-उप रंगों से सुसज्जित है। हमारा भाव इस में और चमक-चटक व रंग जोड़ने का होना चाहिए। हमें सबको साथ लेकर चलने की क्षमता अर्थात ‘‘यत’’ के महत्व को किसी भी स्थिति में कमजोर नहीं पड़ने देना है।

(यह लेखक के अपने विचार हैं।)

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