Uttarakhand

दिल से दिल की बात-68 : भूलाए नहीं भूलता मार्च 2016/भाग-6

दल-बदलू अर्थात उज्याडू बल्दों तथा भाजपा के नवोदित दल-बदल एक्सपर्ट श्री कैलाश विजयवर्गी की भाव भंगिमाएं भी निराशा दर्शा रही थी। श्रीमती इंदिरा हृदयेश जी का इन उज्याडू बल्दूओं में से कुछ के साथ अच्छा सम्बंध था। मैंने इंदिरा जी से कहा कि आप कुछ देर के लिए अपने कक्ष में जाकर एक-दो लोगों बुलाकर उनसे बात कीजिए। इंदिरा जी जब 15 मिनट में लौटकर की आई तो उन्होंने मुझे बताया कि भाजपा के नेता श्री विजय बहुगुणा से नाराज है और उनको गाली-गलौच दे रहे हैं। संख्या नहीं जुट रही है। इसी दौरान मेरे पास सूचना आई कि भाजपा के शीर्ष नेताओं में से एक ने मगरमच्छ प्रेमी विधायक की पत्नी से सम्पर्क साध लिया है। शायद उन तक और एक विधायक/विधायिका की पुत्री से भी सम्पर्क साधने का प्रयास हो रहा है। मैंने, माननीय विधानसभा अध्यक्ष जी से आग्रह किया कि बजट पर वोटिंग जितनी जल्दी सम्भव हो, करवा दी जाए। अध्यक्ष जी ने मुझे सूचित किया कि यह एक प्रक्रिया है, समय लगेगा। सत्ता की तरफ से कोई न बोले तो समय बचाया जा सकता है। इसी उपापोह में समय की घड़ी तेजी से आगे बढ़ रही थी। मैंने कागज का पर्चा भेज कर, मगरमच्छ प्रेमी विधायक से अनुरोध किया कि क्या वह मुझसे अभी तत्काल मेरे कक्ष में मिल सकते हैं। पर्ची देखने के बाद वह अपनी सीट से उठे और श्री विजय बहुगुणा जी के पास बैठकर उन्हें वह पर्ची दिखाई और हाथ फैला कर, सीना तानकर वह कहां खड़े होंगे उसकी घोषणा कर दी। खून, धन शक्ति के आगे पानी होता जा रहा था और दोनों विधायक न विधानसभा के अंदर थे, न कहीं अगल-बगल दिखाई दे रहे थे। उलझनें और चिंता बढ़ती जा रही थी। मैंने अपने साथी विधायकों से कहा कि वह किसी भी घटना के लिए तैयार रहें। मुझे इस बात की खुशी है कि मेरे सहयोगियों में इस सारे घटनाक्रम के बावजूद भी बहुत चिंता का भाव नहीं था। श्रीमती इंदिरा हृदयेश जी सहित कई साथियों ने मुझसे कहा कि जो भी परिणाम होगा, भुगत लेंगे। उनमें श्री विजय बहुगुणा और श्री हरक सिंह जी के आचरण/व्यवहार को देखकर बहुत गुस्सा था

हरीश रावत
पूर्व मुख्यमंत्री, उत्तराखण्ड

 

चैदह मार्च को भारतीय जनता पार्टी ने एक बड़ा प्रदर्शन कर हमारी सरकार के खिलाफ विधानसभा पर हल्ला बोल कार्यक्रम आयोजित किया। प्रत्येक विपक्षी दल विधानसभा सत्र से पहले या उस दौरान विधानसभा कूच का आयोजन करते ही हैं। 14 मार्च को ऐसे ही हल्ला बोल को एक निर्धारित स्थान पर रोकने के लिए स्थानीय पुलिस ने अपने घुड़सवार दस्ते का उपयोग किया, उस घुड़सवार दस्ते में शक्तिमान भी सम्मिलित था। भाजपा के प्रदर्शनकारियों के जत्थे का नेतृत्व एक बाहुबली विधायक कर रहे थे, उन्होंने डंडे से घोड़ों के पांव पर प्रहार करना प्रारम्भ किया। अपने को उस प्रहार से बचाने के लिए शक्तिमान पीछे की तरफ जाता रहा और इस दौरान उसका पांव गड्ढे में फंस गया और उस पांव पर लगातार प्रहार होने से उसका पांव टूट गया। किसी तरीके से पुलिस ने इन डंडेबाजों को रोका और शक्तिमान को अस्पताल तक लेकर आए और उसके जख्मों की स्थिति को देखते हुए यह निर्णय लिया गया और शक्तिमान को हर उपलब्ध चिकित्सा सुविधा मौहया करवाई जाए। उच्च चिकित्सा परामर्श और चिकित्सकों की सेवा ली जाए। चेन्नई और अमेरिका से भी विशेषज्ञ बुलाने का निर्णय हुआ। सम्पूर्ण पुलिस बल भावनात्मक रूप से शक्तिमान के साथ जुड़ा हुआ था, उसकी बेबसी को देखकर उन पुलिस अधिकारियों और पुलिस कर्मियों के भावना पूर्ण चेहरे और उनकी डबडबाती आंखों को देखकर मैं भी अपने आंसुओं को लुढ़कने से रोक नहीं पाया था। शक्तिमान की आंखें सबसे सवाल कर रही थी कि क्या मैं फिर अपने पांव पर खड़ा हो सकूंगा? घोड़े की टांग टूटने का अर्थ मौत होता है। हमने शक्तिमान की आसन्न मौत से लड़ने का फैसला किया। पुलिस कर्मियों को इस बात का संतोष था कि सरकार ने विधायक सहित सब पर कठोर धाराओं में मुकदमा चलाने का फैसला किया है और अपराधियों को पकड़कर जेल भेजा है। दो बार हमें ऐसा लगा कि शक्तिमान अपने पैर पर खड़ा हो जाएगा, उसके लिए कृत्रिम पांव भी मंगाया गया। मगर अनंतोगत्वा शक्तिमान के जीवन को बचाने की लड़ाई हम हार गये और शक्तिमान 20 अप्रैल को शहीद हो गये। हमने व्यापक परामर्श के आधार पर फैसला किया कि रेसकोर्स में एक उच्च स्थान पर शक्तिमान का स्टैच्यू लगाया जाए, उसका स्टैच्यू बनाया भी गया। मगर राज्यपाल महोदय के परामर्श के बाद हमने कुछ दिनों के लिए उस स्टैच्यू को पुलिस संग्रहालय में रख दिया। हमने यह सोचकर कि चुनाव के बाद हम पूरे सम्मान के साथ इस स्टैच्यू को स्थापित करेंगे, उस प्रसंग को और आगे नहीं बढ़ाया। मगर शक्तिमान हमेशा हमारे और पुलिस कर्मियों के दिल में जिंदा रहेगा और एक कर्तव्यनिष्ठ घोड़े के रूप में उच्च आदर्श के तौर पर आदर पाता रहेगा।

इसी दौरान 17 मार्च की रात को मेरे पास कांग्रेस विधायकों के टेलीफोन आने लगे कि उन्हें दल-बदल के लिए दस-दस करोड़ रुपए के प्रलोभन दिये जा रहे हैं। एक सदस्य ने बताया कि उनकी गाड़ी में 5 करोड़ रूपया डाल दिया गया था जिसे उन्होंने लेने से इनकार कर दिया और कहा कि मैं प्राण दे सकता हूं, दल नहीं बदल सकता। उन्होंने इस संदर्भ में एक पूर्व मुख्यमंत्री का नाम लिया। एक-दो सदस्यों ने मीडिया के सम्मुख भी इस बात को कहा। मैंने ऐसे संभावित दल-बदल कर सकने वाले सदस्यों से सम्पर्क भी किया। मैंने पुनः सदस्यों के निलंबन वाले अपने प्रस्ताव पर श्रीमती इंदिरा हृदयेश जी से बात की और उनसे कहा, क्या यह उचित नहीं होगा कि आप सदन के प्रारंभ होते ही भाजपा सदस्यों के कल के व्यवहार की निंदा करते हुये उनकी सदस्यता के निलंबन का प्रस्ताव सदन में लाएं! श्रीमती इंदिरा हृदयेश जी ने मुझे सलाह दी कि हमें ऐसा कोई कदम नहीं उठाना चाहिए। जिसके लिये हमारी भारी आलोचना हो। विपक्ष के साथ इस तनातनी के माहौल का प्रारम्भ, पुलिस के एक बहुत प्यारे घोड़े शक्तिमान का पांव तोड़े जाने और उसमें भाजपा के एक हष्ट-पुष्ट विधायक की भूमिका से प्रारम्भ हुआ था। मैंने पुलिस जनों की भावनाओं को देखते हुए निर्देश जारी किया कि शक्तिमान कांड के दोषी चाहे वह व्यक्ति किसी भी पद पर है उनको कानून अपनी गिरफ्त में ले। मुझे इस दौरान यह भी सूचना मिली कि भाजपा ने अचानक सभी विधायकों को एक होटल में अपने कपड़े आदि लेकर पहुंचने को कहा है। पुलिस अधिकारियों ने मुझे बताया की ऐसी स्थिति में शक्तिमान घोड़े की टांग तोड़ने वाले विधायक की गिरफ्तारी कठिन है। मैंने गिरफ्तारी के प्रसंग को पुलिस अधिकारियों के विवेक पर छोड़ दिया। सदन में जाते-जाते मुझे सूचना मिली कि उन विधायक महोदय को उनके साथियों सहित गिरफ्तार कर लिया गया है। इस दौरान 18 मार्च को भाजपा सदस्यों का व्यवहार पहले दिन की तुलना में आश्चर्यजनक तौर पर पूर्णतः शांत था। दल-बदल के एक सम्भावित अगवा मंत्री, सदन के पटल पर पूरी शक्ति और तर्कों के साथ अपने मंत्रिमंडल की अनुदान की मांगों का पारण करवा रहे थे। मैंने ऐसे सम्भावित तीन विधायकों से बातचीत की। एक विधायक को अपने शहर के मेयर और मेरे राजनीतिक सलाहकार की निकटता से चिंता थी। मैंने यह कहकर उनकी चिंता का निवारण किया कि मैने 2012 में सबके विरोध के बावजूद आपको पार्टी प्रत्याशी बनाने का अनुरोध पार्टी से किया और आप विजय हो इसके लिए सम्पूर्ण शक्ति लगाकर काम किया, आपको 2017 में किसी प्रकार की चिंता करने की आवश्यकता नहीं है। मुझे विश्वास था कि सम्बंधित विधायक धन के लिए दल बदल नहीं करेंगे। मेरा विश्वास कुछ ही घंटों के अंदर गलत साबित हो गया। एक सम्भावित दल-बदलू महिला सदस्य स्वयं मेरे पास आई ढेर सारे प्रस्तावों पर मुझसे आदेश करवाए। कुछ अधिकारियों को मौखिक आदेश भी करवाए। मेरे साथ दोपहर का भोजन किया और मुझको यह कह कर गई कि आपके साथ विश्वास घात करना, बाबा केदार के साथ विश्वासघात करने के बराबर है। कोई कुछ भी कहे मैं पार्टी के साथ हूं और रहूंगी। एक बड़बोले मगरमच्छ प्रेमी विधायक जी मेरे पास स्वयं आए और कहा कि मैंने भाजपा और विजय बहुगुणा, दोनों को दुत्कार दिया है और कहां है कि मेरी रगो में राजपूती खून है, मेरा खून पानी नहीं हो सकता है। मुझसे जिला अधिकारी हरिद्वार से लेकर कई विभागों में लम्बित कामों की स्वीकृति जारी करने के आदेश करवाए। पुलिस की खुफिया तंत्र ने भी मुझे सूचित किया कि तीन विधायकों तक अभी धनराशि नहीं पहुंची है और संयोग से मैं उन तीनों विधायकों से बातचीत कर चुका था। मंत्री का सदन में व्यवहार और विधायकों से बातचीत के बाद मैं और संसदीय कार्य मंत्री श्रीमती इंदिरा हृदयेश जी आश्वस्त हो गये कि सरकार को कम से कम बजट सत्र में कोई खतरा नहीं है।

दल-बदलू अर्थात उज्याडू बल्दों तथा भाजपा के नवोदित दल-बदल एक्सपर्ट श्री कैलाश विजयवर्गी की भाव भंगिमाएं भी निराशा दर्शा रही थी। श्रीमती इंदिरा हृदयेश जी का इन उज्याडू बल्दूओं में से कुछ के साथ अच्छा सम्बंध था। मैंने इंदिरा जी से कहा कि आप कुछ देर के लिए अपने कक्ष में जाकर एक-दो लोगों बुलाकर उनसे बात कीजिए। इंदिरा जी जब 15 मिनट में लौटकर की आई तो उन्होंने मुझे बताया कि भाजपा के नेता श्री विजय बहुगुणा से नाराज है और उनको गाली-गलौच दे रहे हैं। संख्या नहीं जुट रही है। इसी दौरान मेरे पास सूचना आई कि भाजपा के शीर्ष नेताओं में से एक ने मगरमच्छ प्रेमी विधायक की पत्नी से सम्पर्क साध लिया है। शायद उन तक और एक विधायक/विधायिका की पुत्री से भी सम्पर्क साधने का प्रयास हो रहा है। मैंने, माननीय विधानसभा अध्यक्ष जी से आग्रह किया कि बजट पर वोटिंग जितनी जल्दी सम्भव हो, करवा दी जाए। अध्यक्ष जी ने मुझे सूचित किया कि यह एक प्रक्रिया है, समय लगेगा। सत्ता की तरफ से कोई न बोले तो समय बचाया जा सकता है। इसी उपापोह में समय की घड़ी तेजी से आगे बढ़ रही थी। मैंने कागज का पर्चा भेज कर, मगरमच्छ प्रेमी विधायक से अनुरोध किया कि क्या वह मुझसे अभी तत्काल मेरे कक्ष में मिल सकते हैं। पर्ची देखने के बाद वह अपनी सीट से उठे और श्री विजय बहुगुणा जी के पास बैठकर उन्हें वह पर्ची दिखाई और हाथ फैला कर, सीना तानकर वह कहां खड़े होंगे उसकी घोषणा कर दी। खून, धन शक्ति के आगे पानी होता जा रहा था और दोनों विधायक न विधानसभा के अंदर थे, न कहीं अगल-बगल दिखाई दे रहे थे। उलझनें और चिंता बढ़ती जा रही थी। मैंने अपने साथी विधायकों से कहा कि वह किसी भी घटना के लिए तैयार रहें। मुझे इस बात की खुशी है कि मेरे सहयोगियों में इस सारे घटनाक्रम के बावजूद भी बहुत चिंता का भाव नहीं था। श्रीमती इंदिरा हृदयेश जी सहित कई साथियों ने मुझसे कहा कि जो भी परिणाम होगा, भुगत लेंगे। उनमें श्री विजय बहुगुणा और श्री हरक सिंह जी के आचरण/व्यवहार को देखकर बहुत गुस्सा था।

क्रमशः
(यह लेखक के अपने विचार हैं।)

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