कितनी अद्भुत बात है कि आदियोगी और माता पार्वती के दाम्पत्य में भी मानव दाम्पत्य सरीखी ही डायनामिक्स देखने को मिलते हैं। सती माता प्रसंग के बाद शायद शिव जी भी इस बात को समझ गए थे कि उनका साथ सुहाते हुए भी कुछ दिन मां पार्वती अपनी ऊर्जा के लिए अपने माता-पिता का सानिध्य चाहती हैं। इस विषय पर मैं जितना सोचती हूं मुझे यही समझ आता है कि भावनाएं तो हर स्थान पर एक सा बंधन प्रगट करती हैं। पूरे ब्रह्माांड का निर्वहन करने वाले ईश्वर भी इस बंधन से पूर्णतया मुक्त नहीं हो सकते। मैं बहुत व्यथित भाव से कहना चाहती हूं कि कुमाऊं भर के नंदा देवी मंदिरों के दर्शन मैंने अवश्य किए हैं लेकिन एक पृथक हिमालय राज्य होने के बावजूद मुझे इस बात का क्षोभ है कि इस विषय में जितने विस्तार से कहा जाना चाहिए, उतने प्रयास नहीं हुए हैं और हमारी पीढ़ी तक आते-आते तो ये कथा विलुप्त सी होती जा रही है
श्वेता मासीवाल
सामाजिक कार्यकर्ता
उत्तराखण्ड की अधिष्ठात्री देवी मां नंदा के प्रसंग के दूसरे भाग में आज हम उनसे जुड़ी लोक मान्यताओं को समझने का प्रयास करेंगे।
चांदपुर गढ़ी के राजाओं द्वारा नंदा राजजात परम्परा को शुरू किया गया था। जब आप भावपूर्ण प्रसंग से देखने का प्रयास करेंगे तो भक्ति और मानवीय संवेदनाओं का एक सुंदर समन्वय आपके भीतर हिलोरे लेने लगेगा। कहते हंै एक महिला कितनी भी जिम्मेदारियां क्यों न ओढ ले अपने पिता के घर में हमेशा एक राजकुमारी की तरह ही महसूस करती है, जहां दुनियाभर की चिंताओं से परे वो फिर से किसी की पुत्री, किसी की बहन बनकर लाड़ मनवाती है और अपने बचपन को फिर से जीने लगती है। माता पार्वती, हमारी मां नंदा भी इससे अपवाद नहीं थी। श्मशान के भयावह सन्नाटे में बसने वाले हमारे भोले बाबा के दिव्य प्रेम में शैलपुत्री मां ब्रह्मचारिणी बन अंततः चंद्रघंटा स्वरूप में कैलाश निवासिनी तो वे हो गईं लेकिन एक स्त्री के कोमल हृदय में माता-पिता के आंगन की याद हमेशा बसी ही रहती है।
पिता हिम वन्त और माता मैनावती की लाडली कन्या विवाह कर कैलाश चली तो गईं लेकिन निर्जन बियाबान की नीरवता में उनकी कोमल भावनाएं मुरझाने लगी। इसी तरह बारह वर्ष बीत गए और अंततः निराश मां नंदा ने अपने मायके वालों को हृदय से याद किया और जब मायके से आदर स्वरूप बुलावा आया और माता नंदा थोड़े दिनों के लिए मायके आईं और यहां के वात्सल्य को दिलभर जी लेने के बाद वो फिर अपने ससुराल चली गईं। सखियों से और माता-पिता से बिछड़ते हुए क्षण थोड़े भारी थे तो भाई लाटू देवता और सखियों और गांव वाले बहुत आगे तक भेंट इत्यादि के साथ मां नंदा को वापस छोड़ने गए। इसी परम्परा का निर्वहन आज तक होता आ रहा है।
कितनी अद्भुत बात है कि आदियोगी और माता पार्वती के दाम्पत्य में भी मानव दम्पत्ति सी ही डायनामिक्स देखने को मिलते हैं। सती माता प्रसंग के बाद शायद शिव जी भी इस बात को समझ गए थे कि शिव का साथ सुहाते हुए भी कुछ दिन मां पार्वती अपनी ऊर्जा के लिए अपने माता-पिता का सानिध्य चाहती हैं। इस विषय पर मैं जितना सोचती हूं मुझे यही समझ आता है कि भावनाएं तो हर स्थान पर एक सा बंधन प्रगट करती हैं। पूरे ब्रह्मांड का निर्वहन करने वाले ईश्वर भी इस बंधन से पूर्णतया मुक्त नहीं हो सकते।
मैं बहुत व्यथित भाव से कहना चाहती हूं कि कुमाऊं भर के नंदा देवी मंदिरों के दर्शन मैंने अवश्य किए हैं लेकिन एक पृथक हिमालय राज्य होने के बावजूद मुझे इस बात का क्षोभ है कि इस विषय में जितने विस्तार से कहा जाना चाहिए, उतने प्रयास नहीं हुए हैं और हमारी पीढ़ी तक आते-आते तो ये कथा विलुप्त सी होती जा रही है। न बहुत ज्यादा डाॅक्यूमेंट्री बनी हैं, न ज्यादा लिट्रेचर है। लोक कलाकारों ने इस विषय पर बहुत कुछ गाया है लेकिन अफसोस की उन पारम्परिक गीतों को वो सम्मान न मिल सका जो मिलना चाहिए था। आखिर ये हमारी सांस्कृतिक, धरोहर है जिसे सहेजना हम सबकी जिम्मेदारी है। खैर, इतना इतिहास जरूर सबको शायद पता हो कि मां नंदा गढ़वाल से कुमाऊं कैसे आईं?

बधाणगढ़ी के सभी लोगों व राजा की मां के प्रति अटूट आस्था होने के कारण प्रजा की मांग पर राजा ने मां भगवती को बधाणगढ़ी में विराजित होने के लिए प्रार्थना की तब राजा की प्रार्थना मां भगवती ने स्वीकार की। इसके पश्चात 1620 के आस-पास मां नंदा भगवती भाद्रपद मास में चमोली के सिद्ध पीठ कुरुड़ से कैलाश यात्रा कर वापस बधाणगढ़ी के दक्षिणेश्वर काली मंदिर में विराजित हुईं। मां नंदा भगवती की डोली के साथ मां भगवती का सिंहासन व नंदा भगवती की स्वर्ण मूर्ति भी बधाणगढ़ी के दक्षिणेश्वर काली मंदिर में विराजमान रहती थी जिसे बधाणगढ़ी का मंदिर भी कहा जाता है। बधाणगढ़ी पहले से ही धन-धान्य से परिपूर्ण रहा है इसलिए बधाणगढ़ी पर अन्य शासकों की हमेशा नजर रहती थी और वे आक्रमण तथा लूट के लिए सदैव तत्पर रहते थे। सन 1670 में चंद्र वंश के राजा बाज बहादुर चंद ने बधाणगढ़ी पर आक्रमण कर दिया। राजा बाज बहादुर चंद की सैन्य शक्ति अधिक होने के कारण उन्होंने बधाणगढ़ी के शासक को युद्ध में हरा दिया। चंद शासक ने गढ़ में बहुत लूटमार की तथा यहां से कीमती वस्तुएं लूट कर ले गए तथा दक्षिणेश्वर काली मंदिर से (जहां सिद्धपीठ कुरुड़ की नंदा भगवती विराजमान थी) नंदा देवी की स्वर्ण मूर्ति को भी अल्मोड़ा ले आए और उसे अपने मल्ला महल (वर्तमान कचहरी) में रखवा दिया।
1690-91 में तत्कालीन राजा उद्योत चंद ने उद्योत चंद्रेश्वर तथा पार्वती चंद्रेश्वर मंदिर बनवाए। 1815 में अंग्रेजी कमिश्नर ट्रेल ने मल्ला महल से नंदा भगवती की मूर्ति उद्योत चंद्रेश्वर मंदिर में रखवा दी।
कुछ समय बाद कमिश्नर ट्रेल जब हिमालय के नंदा देवी चोटी की तरफ गए तथा वापस आने पर उनकी आंखें खराब हो गई लोगों ने उन्हें विश्वास दिलवाया कि देवी का दोष हो गया। इस पर लोगों की सलाह पर 1816 में उन्होंने चंद्रेश्वर मंदिर परिसर में ही नंदा का मंदिर बनवाया तथा वहां नंदा देवी की मूर्ति को स्थापित करवाया। बाद में उन्होंने ही नैनीताल में भी मंदिर स्थापित किया। सिद्ध पीठ कुरुड़ की नंदा ही बधाणगढ़ी में तथा 215 वर्ष से वही नंदा भगवती अल्मोड़ा में पूजी जाती है।
अल्मोड़ा शहर सोलहवीं सदी के छठे दशक के आस-पास चंद राजाओं की राजधानी के रूप में विकसित किया गया था। यह मेला चंद वंश की राज परम्पराओं से सम्बंध रखता है तथा लोक जगत के विविध पक्षों से जुड़ने में भी हिस्सेदारी करता है।
इस मेले के दौरान पंचमी तिथि के दिन दो भव्य देवी प्रतिमाएं बनाई जाती हैं। पंचमी की रात्रि से ही जागर भी प्रारम्भ होती है। यह प्रतिमाएं कदली स्तम्भ से निर्मित की जाती हैं। नंदा की प्रतिमा का स्वरूप उत्तराखण्ड की सबसे ऊंची चोटी नंदादेवी के सद्वश बनाया जाता है। स्कंद पुराण के मानस खंड में बताया गया है कि नंदा पर्वत के शीर्ष पर नंदादेवी का वास है। कुछ लोग यह भी मानते हैं कि नंदादेवी प्रतिमाओं का निर्माण कहीं न कहीं तंत्र जैसी जटिल प्रक्रियाओं से सम्बंध रखता है। भगवती नंदा की पूजा तारा शक्ति के रूप में षोडशोपचार, पूजन, यज्ञ और बलिदान से की जाती है। सम्भवतः यह मातृ-शक्ति के प्रति आभार प्रदर्शन है जिसकी कृपा से राजा बाज बहादुर चंद को युद्ध में विजयी होने का गौरव प्राप्त हुआ। षष्ठी के दिन गोधूली बेला में केले के पेड़ों का चयन विशिष्ट प्रक्रिया और विधि-विधान के साथ किया जाता है।
षष्टी के दिन पुजारियों द्वारा गोधूली के समय पूजन का सामान और श्वेत वस्त्र लेकर केले के झुरमुटों के पास जाते हैं और पूजा कार्य होने के बाद धूप दीये जलाकर अक्षत मुट्ठी में लेकर कदली स्तम्भ की ओर फेंके जाते हैं। मान्यता अनुसार सबसे पहले हिलने वाले स्तम्भ से देवी नंदा की प्रतिमा बनाई जाती है और जो स्तम्भ द्वितीय स्थान पर हिलता डुलता है उससे सुनंदा का निर्माण किया जाता है बाकि अन्य स्तभों द्वारा देवी शक्तियों के हाथ पैर बनाए जाते हैं। इस प्रकार नंदा राजजात के अलावा प्रत्येक वर्ष नंदा देवी उत्सव मनाया जाने लगा। ये वही समय होता है जब पूरा देश गणपति उत्सव मना रहा होता है। कुछ अंक पहले मैंने आपके साथ साझा किया था कि अलग-अलग प्रांतों की पृथक सभ्यता होते हुए भी ये कितना बड़ा संयोग है कि शिव जी के पावन सावन मास के पूजन के बाद भाद्रपद में मां पार्वती और गणेश जी का उत्सव होता है।
पार्थिव पूजन और नंदा देवी पूजन को बचपन से देखती आ रही हूं इसलिए भी मुझे गणेश उत्सव में विसर्जन कभी भी अजीब नहीं लगा। पुराणों में इसी प्रकार के पूजन को सर्वोतम बताया गया है। कोलकाता में भी शारदीय नवरात्रि के बाद मां दुर्गा की प्रतिमा का विसर्जन ही किया जाता है। ये पूजन कार्य हमें ये भी सिखाता है कि लगन आंतरिक होनी चाहिए। केवल बाह्य नहीं। ईश्वर या तो ज्ञान में हैं या भाव में। बाकी वैसे सभी बाह्य आडम्बर है लेकिन इस विधा में रूप गढ़ने से लेकर उसे जल में समाहित करने के पीछे ये भाव कितना अलौकिक है कि ईश्वर ही प्रकृति है और प्रकृति ही ईश्वर है। उन्हें कहीं बाहर खोजने की आवश्यकता नहीं है। बढ़ते हुए पर्यावरण प्रदूषण में अगर मनुष्य की आस्था प्रकृति के प्रति गहरा जाए तो परिदृश्य ही बदल जाए। हमारी संस्कृति ने वैसे भी हमें पेड़ों का नदियों का और हिमालय का संरक्षण करने की शिक्षा दी है लेकिन अफसोस मनुष्य ने इसे भी प्रदूषित कर दिया।
खैर अद्भुत कथा के प्रसंग के बाद थोड़ा उस पर्वत की तरफ चलते हैं जो मां नंदा के अस्तित्व को प्रमाणित करता है। मां नंदा देवी पर्वत के पश्चिम में ऋषि गंगा और पूर्व में गौरी गंगा स्थित है। भले ही हम आज भी मां नंदा को हिमालय की पुत्री के भाव से पूजते हंै पर वो आदियोगी की अर्धांगिनी भी हैं और शक्ति भी इसलिए भौगोलिक रूप में भी वो एक माता की तरह, संरक्षक बतौर देखी जाती हैं। इस पर्वत के गर्भ में कई रहस्य छिपे हुए हैं। चाहे वेदिनी बुग्याल रूपकुंड हो जाना न जाने कैसे नरकंकाल पड़े हुए हैं या यहां का अद्भुत फ्लोरा फौना।
नंदा देवी राष्ट्रीय उद्यान को 1988 में यूनेस्को विश्व धरोहर के रूप में भी मान्यता मिली है। चमोली जिले में स्थित इस चोटी का एक रहस्य और भी है। 1965 में अमेरिकी खुफिया एजेंसी और इंडियन इंटेलिजेंस ब्यूरो ने चीन की न्यूक्लियर एक्टिविटीज पर नजर रखने हेतु एक न्यूक्लियर पावर्ड सर्विलांस उपकरण यहां सेट करने का प्रयास किया परंतु हिमालय के तूफान में ये डिवाइस कहीं खो गया। अभी भी नंदा चोटी के गर्भ में ये उपकरण कहीं दबा हुआ है। इसलिए यहां जाने में अब रोक लगी हुई है। बस कुछ वर्षों के अंतराल में सरकार की तरफ से शोध के लिए एक टीम पर्यावरणीय परिवर्तनों पर शोध के लिए भेजी जाती है।
एक साधक होने के नाते मेरी भावना तो यही है कि मां के गर्भ में छिपा ये डिवाइस कभी भी कोई अनिष्ट नहीं करेगा। कहते हैं जो होता है अच्छे के लिए होता है। इस डिवाइस के खो जाने के बाद जो पाबंदी लगी उसका एक फायदा ये हुआ कि यहां मानव के आने पर जो रोक लगी उससे यहां का पर्यावरण आज भी बाकी हिमालय क्षेत्र से पृथक है।
मुझे ये भी लगता है कि यहां रसायन पर नहीं कृषि पर प्रयास होना चाहिए। हिमालय के फल-फूल सभी में वो गुण हैं जो मनुष्य को शतायु होने तक स्वस्थ रखे और ये सबसे ज्यादा नंदा देवी क्षेत्र में पाए जाते हैं। विश्व प्रसिद्ध फूलों की घाटी भी यहां से ज्यादा दूर नहीं है। इन्हीं अद्भुत कथाओं का संसार है हमारा अखंड हिमालय क्षेत्र। मेरा आपसे अनुरोध है कि हमारे हिम प्रदेश की मां नंदा देवी हमारी पौराणिक सांस्कृतिक धरोहर है इसलिए इनकी कथाओं में हम रुचि दिखाएं ताकि आने वाली पीढ़ी भी शक्ति के इस स्वरूप से भावनात्मक रूप से जुड़ सके।
साम्ब सदाशिव!
(लेखिका रेडियों प्रजे़न्टर, एड फिल्म मेकर तथा वत्सल सुदीप फाउंडेशन की सचिव हैं)


श्वेता मासीवाल