Uttarakhand

देवभूमि के जलते जंगल

उत्तराखण्ड में प्रचंड वनाग्नि ने चारों ओर हाहाकार मचा रखा है। वन विभाग के अधिकारी जहां वनाग्नि पर काबू पाने का दावा कर रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ काले पड़े पहाड़ वन विभाग के नकारेपन की गवाही दे रहे हैं। विभाग को आग बुझाने से लेकर वृक्षारोपण सहित कई अन्य कार्यों के लिए हर वर्ष करोड़ों का बजट मिलता है लेकिन वनाग्नि से हुए नुकसान के लिए सरकार अधिकारियों की जिम्मेदारी तय नहीं कर पाई है। अकेले पौड़ी जनपद की ही बात करें तो अप्रैल माह तक विभिन्न क्षेत्रों से जंगलों में आग लगने की 230 से अधिक घटनाएं सामने आ चुकी हैं जिसमें लगभग 258.825 हेक्टेयर जंगल जलकर राख हो चुके हैं। जंगलों में आग लगाने के मामले में खिर्सू क्षेत्र से पांच लोगों को गिरफ्तार भी किया गया है।

विषम भौगोलिक परिस्थितियों वाले पौड़ी जनपद के विभिन्न क्षेत्रों के जंगलों में एक के बाद एक आग की घटना सामने आने के बाद अब प्रशासन एनडीआरएफ की मदद ले सकता है। वनाग्नि की बढ़ती घटनाओं को लेकर जिलाधिकारी डाॅ. आषीश चैहान ने बताया कि जंगलों में लग रही आग को बुझाने में कई विभाग जुटे हैं। उनका कहना है कि एनडीआरएफ से सहयोग के लिए उन्होंने मुख्यालय में बात की है। उम्मीद जताई जा रही है कि जल्द ही एनडीआरएफ की टीम भी जनपद में पहुचं जाएगी।

दावानल से काले पड़े पहाड़ों को देख सामाजिक कार्यकर्ता कमल रावत का कहना है कि सिर्फ वन विभाग और तस्करों को ही लाभ होता है। उन्होंने कहा कि दावानल की भयावहता के पीछे सीधे तौर पर वन विभाग और तस्करों की मिलीभगत ही नजर आ रही है। उत्तराखण्ड में वनाग्नि से वन एवं वन्यजीव तथा पादपों अस्तित्व का खतरा पैदा हो गया है। वनाग्नि से प्रदेश को अरबों का नुकसान हो चुका है। पिछले कुछ दिनों से बड़े पैमाने पर वनसम्पदा को नुकसान पहुंचाने की खबर है। क्षेत्र में धुवां फैलने से जहां लोगों के आंखों में जलन की शिकायत मिलने लगी है, वहीं दमा के रोगियों की परेशानियां बढ़ गई हैं। समय रहते आग पर काबू नहीं पाया गया तो स्थिति भयावह हो सकती है।

उत्तराखण्ड के जंगलों में आग लगना एक गंभीर समस्या है। राज्य बने 23 साल बीत चुके हैं लेकिन वन महकमा आज तक इसका तोड़ नहीं ढूंढ़ पाया है। यही वजह है कि हर साल करोड़ों की वन संपदा आग की भेंट चढ़ती जा रही है। हर साल गर्मी का सीजन शुरू होते ही वनों में आग लगने का सिलसिला शुरू हो जाता है, लेकिन साधन सुविधाओं के अभाव में वनकर्मी आग पर काबू पाने में सफल नहीं हो पाते हैं। जब आग लगती है तो झाड़ियों का झाडू बनाकर आग पर काबू पाने का प्रयास किया जाता है, लेकिन पहाड़ की भौगोलिक परिस्थितियों में तेज हवा आग में घी का काम करती है। वन विभाग द्वारा पहले वनाग्नि को रोकने के लिए बनाए जाने वाली फायर लाइनें अब दिखाई नहीं देती।

जंगलों में भड़कती आग को रोकते समय निहत्थे वनकर्मियों के सामने वन संपदा को जलते देखने के सिवा दूसरा चारा नहीं बचता है। जंगलों में बेकार पड़े पिरूल को समय से पहले जलाने का काम भी किया जाता है, लेकिन कारण जो भी हो यह कार्य भी खानापूर्ति से आगे नहीं बढ़ पाता है। सरकार ने कुछ साल पहले पिरूल से कोयला बनाने की योजना लागू की थी, लेकिन यह योजना भी दूर-दूर तक दिखाई नहीं दे रही है। सरकार वन विभाग को हर वर्ष करोड़ों का बजट आग बुझाने को देती है।

वन महकमे के अधिकारी भी वनाग्नि को रोकने में संसाधनों की कमी का रोना रोकर अपनी जिम्मेदारी से बचने की कोशिश कर रहे हैं। कमजोर सूचना तंत्र भी वन महकमे की विफलता की एक बड़ी वजह है। जंगल की आग पर काबू पाने के लिए कागजों का पेट भरना बदस्तूर जारी है। वन अफसर अपनी-अपनी डिवीजन में ताबड़-तोड़ वनाग्नि सुरक्षा समिति की बैठक, फायर प्रोटेक्शन फोर्स, कम्युनिटी रिस्पांस टीम के गठन, फायर सीजन से पूर्व जगह-जगह अग्नि सुरक्षा सप्ताह के तहत सेमिनारों पर लाखों रुपए फूंक रहे हैं। प्रशिक्षण कार्यक्रम के नाम पर विभाग फायर सीजन की तमाम तैयारियां करता तो है लेकिन नतीजा शून्य ही रहता है।

स्थानीय निवासी गणेश नेगी के मुताबिक जंगलों से जुड़े अभियान में ग्रामीणों की सहभागिता जरूरी है, क्योंकि ग्रामीण और जंगल एक दूसरे पर निर्भर हैं। दूसरी तरफ चीड़ के जंगलों से मिलने वाला उत्पाद रेजिन यानी लीसा बड़े पैमाने पर मिल रहा है जो ग्रामीणों के लिए आर्थिकी का बड़ा जरिया भी साबित हो रहा है। कई जगहों में वन पंचायत जंगलों के लिहाज से बड़ा अच्छा काम कर रही हैं। प्रदेशभर में 12 हजार से ज्यादा वन पंचायतें हैं जो अपनी कार्यशैली के जरिए वनों को सुरक्षित रखने में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका पहले से निभाती रही हैं। उम्मीद की जानी चाहिए कि ‘आने वाले समय मे दावानल जैसी बड़ी घटनाओं को रोकने में वन पंचायतों का अहम रोल देखने को मिलेगा।’

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