निश्चित ही राष्ट्रीय खेलों के सफलतापूवर्क आयोजनों का श्रेय मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी को जाता है लेकिन इनकी तैयारियों के पीछे पुरानी सरकारों की भूमिका को नकारा नहीं जा सकता है। भारतीय ओलम्पिक संघ के महासचिव रहे राजीव मेहता ने हरीश रावत के मुख्यमंत्रित्वकाल में इसकी योजना बनानी शुरू कर दी थी। उनके समय से ही उत्तराखण्ड राष्ट्रीय खेलों की मेजबानी का दावा कर दिया था। राज्य में खेलों के लिए मूलभूत ढांचा कई वर्षों की मेहनत का नतीजा है
उत्तराखण्ड में राष्ट्रीय खेलों का आयोजन प्रदेश की क्षमताओं को प्रदर्शित करने का एक शानदार और यादगार आयोजन साबित हुआ। 38वें राष्ट्रीय खेलों का उद्घाटन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा उत्तराखण्ड की राजधानी देहरादून में किया गया तो वहीं हल्द्वानी में समापन समारोह में केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह की उपस्थिति हुआ। गृहमंत्री अमित शाह समापन समारोह के मुख्य अतिथि थे। 38वें राष्ट्रीय खेल उत्तराखण्ड के लिए मील का पत्थर साबित हुए, वहीं मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की
राजनीति को भी एक नई राजनीतिक ऊर्जा दे गए। खेलों के सफल आयोजन से अमित शाह जहां गदगद दिखे, वहीं उन्होंने मुख्यमंत्री धामी के नेतृत्व की भी जमकर प्रशंसा की। उत्तराखण्ड के खिलाड़ियों ने पदक तालिका में एक लम्बी छलांग लगाते हुए जहां 107 मेडल जीतकर अहसास कराया कि सरकारें सुविधाएं उपलब्ध कराएं तो उत्तराखण्ड में खिलाड़ी कोई भी बाधा पार कर पाने में सक्षम हैं, वहीं युवा मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की राजनीतिक सफलताओं में राष्ट्रीय खेल एक तमगा और जोड़ गए। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी राष्ट्रीय खेलों के उद्घाटन अवसर पर मुख्यमंत्री धामी की पीठ थपथाकर गए थे।

उत्तराखण्ड राज्य के 25वें वर्ष में प्रवेश के समय राज्य की रजत जयंती के अवसर पर 38वें राष्ट्रीय खेलों का आयोजन शायद बेहतरीन पल था। राष्ट्रीय खेलों में 16 हजार से ज्यादा खिलाड़ियों, साथ ही खेल से जुड़े सभी लोगों के लिए अच्छी से अच्छी सुविधाएं जुटाना आसान नहीं था। उत्तराखण्ड की भौगोलिक परिस्थितियों के चलते यहां राष्ट्रीय खेल करवाना चुनौतीपूर्ण था। लेकिन शायद असली चुनौतियां यहीं पर होती हैं जहां स्वयं को सिद्ध करना होता है। इससे पूर्व 37वें राष्ट्रीय खेल गोवा में आयोजित किए गए थे। पूरे देश की निगाहें उत्तराखण्ड राज्य पर थी कि अपेक्षाकृत युवा व छोटा राज्य क्या सफलतापूर्वक, गैरविवादित रूप से राष्ट्रीय खेल आयोजित कर पाएगा। यहां पर उत्तराखण्ड का राजनीतिक नेतृत्व, अधिकारी और सबसे महत्वपूर्ण उत्तराखण्ड के खिलाड़ी खरे उतरे। उत्तराखण्ड के हौसले का ही नतीजा था कि गृहमंत्री अमित शाह ने उत्तराखण्ड को ‘देवभूमि’ के साथ ‘खेलभूमि’ के नाम से भी नवाजा। यहां ये भी याद रखना होगा कि भले ही उत्तराखण्ड में राष्ट्रीय खेल मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की नेतृत्व वाली सरकार के समय आयोजित किए गए हैं लेकिन इसमें पूर्व की सरकारों के योगदान को नकारा नहीं जा सकता। उत्तराखण्ड में खेल की मूलभूत सुविधाओं के विकास की शुरुआत नारायण दत्त तिवारी के मुख्यमंत्रित्वकाल में ही शुरू हो गई थी। राष्ट्रीय खेलों के आयोजन की कवायद हरीश रावत के मुख्यमंत्री रहते शुरू हो गई थी।
38वें राष्ट्रीय खेलों में असली हीरो देश के कई राज्यों से आए वो 16 हजार से अधिक खिलाड़ी रहे जिन्होंने ऊर्जा व शानदार प्रदर्शन से खेलों को यादगार बनाया। यहां 58 नए रिकाॅर्ड बने जिनमें नौ तो राष्ट्रीय रिकाॅर्ड थे और 49 राष्ट्रीय खेलों के थे और खास बात ये है कि इन रिकाॅडर््स में महिला खिलाड़ी आगे रहीं। कुल 1490 पदक 38वें राष्ट्रीय खेलों में बांटे गए। मलखंब और योगा की प्रतिस्पर्धाएं पहली बार राष्ट्रीय खेलों में शामिल की गई। रीवर राफ्टिंग की प्रतियोगिताएं रात्रि में आयोजित कर एक नया प्रयोग किया गया। प्रदेश के खिलाड़ियों ने अपने शानदार प्रदर्शन से एक नई लकीर खींची जो उत्तराखण्ड के लिए भविष्य में नई सम्भावनाएं खोल सकता है। बशर्ते सरकार राष्ट्रीय खेलों के सफल आयोजन की खुमारी से उतर पुराने ढर्रे पर न जाए। प्रदेश के खिलाड़ियों ने साबित किया कि सीमित संसाधनों के साथ भी वो शानदार प्रदर्शन करते हैं। यहां पर खिलाड़ियों के लिए भले ही राष्ट्रीय खेलों में विश्व स्तरीय उपकरण उपलब्ध कराए हों लेकिन राष्ट्रीय खेलों की तैयारी खिलाड़ियों ने सीमित संसाधनों के साथ ही की थी। पिछले राष्ट्रीय खेल जो गोवा में खेले गए थे उसमें उत्तराखण्ड पदक तालिका में 25वें पायदान पर था। उसका अब 7वें स्थान पर आना कोई मामूली उपलब्धि नहीं है। राज्य स्थापना के बाद अन्य राज्यों में हुए राष्ट्रीय खेलों में उत्तराखण्ड 13वें से 26वें स्थान तक रहा था। इस बार उत्तराखण्ड ने 24 स्वर्ण, 35 रजत और 44 कांस्य पदक के साथ कुल 103 पदक प्राप्त किए और 7वें स्थान पर रहा। पदक जीतने में सर्विसेज पहले स्थान पर रही जिसने कुल 121 पदक जीते, वहीं महाराष्ट्र पदकों की तालिका में दूसरे व हरियाणा तीसरे स्थान पर रहा। कर्नाटक के श्रीहरि नटराज पुरुष व कर्नाटक की ही धीनिधि दोसंधू महिला चैम्पियन रहे।
उत्तराखण्ड के 38वें राष्ट्रीय खेल उत्तराखण्ड के लिए तो नए कीर्तिमान गढ़ ही गए, साथ ही एक लम्बी लकीर खींच गए आने वाले समय के लिए उत्तराखण्ड जैसे छोटे और भौगोलिक रूप से कठिन राज्य के लिए राष्ट्रीय खेलों के लिए सुविधाएं जुटाना आसान नहीं था। खासकर पहाड़ी क्षेत्र में लेकिन उत्तराखण्ड का कोई भी क्षेत्र राष्ट्रीय खेलों के आयोजन से अछूता नहीं रहा। फिर वो सीमांत पिथौरागढ़ हो या फिर गुलरभोज जैसा क्षेत्र। खटीमा, रूद्रपुर, देहरादून, हल्द्वानी, हरिद्वार, ऋषिकेश, अल्मोड़ा सहित उत्तराखण्ड के कई शहरों में आयोजित राष्ट्रीय खेलों की प्रतिस्पद्र्धाओं ने पूरे उत्तराखण्ड के खिलाड़ियों को जोड़े रखा। हल्द्वानी के इंदिरा गांधी अंतरराष्ट्रीय खेल परिसर में आयोजित उत्तराखण्ड और केरल के मध्य हुए फुटबाॅल के फाइनल की भीड़ ने दिखाया कि उत्तराखण्ड के लोगों में खेल का जज्बा कितना है। अन्य राज्यों से आए खिलाड़ी उत्तराखण्ड के लोगों का खेलों के प्रति लगाव की प्रशंसा करते दिखे। उत्तराखण्ड सरकार ने राष्ट्रीय खेलों के लिए विभिन्न शहरों में स्थाई आधारभूत ढांचा विकसित किया। इस बीच 3 राष्ट्रीय स्तर के स्टेडियम 6 बहुउद्देशीय खेल हाॅल, 3 इंडोर हाॅल और एक शूटिंग रेंज नए स्थापित किए गए। भले ही उत्तराखण्ड में राष्ट्रीय खेल 2025 में आयोजित किए गए हों लेकिन इनकी तैयारियों के पीछे पुरानी सरकारों की भूमिका को नकारा नहीं जा सकता है। भारतीय ओलम्पिक संघ के महासचिव रहे राजीव मेहता ने हरीश रावत के मुख्यमंत्रित्वकाल में इसकी योजना बनानी शुरू कर दी थी। उनके समय से ही उत्तराखण्ड राष्ट्रीय खेलों की मेजबानी का दावा कर दिया था। राज्य में खेलों के लिए मूलभूत ढांचा कई वर्षों की मेहनत का नतीजा है।
उत्तराखण्ड के राष्ट्रीय खेलों के सफल आयोजन ने उत्तराखण्ड को उन राज्यों की श्रेणी में ला खड़ा किया है जिन्होंने राष्ट्रीय खेलों का आयोजन किया है। उत्तर प्रदेश जैसा बड़ा राज्य राष्ट्रीय खेलों का आयोजन नहीं कर पाया है। साथ ही हरियाणा, राजस्थान, बिहार और कई राज्य हैं जो राष्ट्रीय खेलों के आयोजन की हिम्मत नहीं जुटा पाए हैं। उत्तराखण्ड के राष्ट्रीय खेलों के राजनीतिक मायने भी कम नहीं है खासकर भारतीय जनता पार्टी की अंदरूनी राजनीति में मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी को जहां इन्होंने मजबूत किया है, वहीं धामी कैबिनेट में खेलमंत्री रेखा आर्य के कद में इजाफा किया है। रेखा आर्य धामी कैबिनेट की सबसे सक्रिय मंत्री हैं। जिस प्रकार गृहमंत्री अमित शाह ने विशेष रूप से मुख्यमंत्री धामी और रेखा आर्य को मंच पर बुलाकर तालियां बजवाई उससे भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व की नजर में धामी के बढ़ते नए कद का अहसास कराता है। उत्तराखण्ड के राष्ट्रीय खेल शायद एक पड़ाव है उत्तराखण्ड और उसके खिलाड़ियों को 38वें राष्ट्रीय खेलों के ध्येय वाक्य ‘संकल्प से शिखर तक’ की तर्ज पर उत्तराखण्ड के लिए एक बड़ा फलक अभी आगे है।
नींव को भुला दिया
उत्तराखण्ड में खेले गए 38वें राष्ट्रीय खेलों का सफल आयोजन मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की एक बड़ी उपलब्धि के रूप में देखा जा रहा है। लेकिन उनकी इस सफलता के गुणगान में शायद उन चंद लोगों को भुला दिया गया जिन लोगों ने इन सफल आयोजन की नींव कई साल पहले रख दी थी। हल्द्वानी के इंदिरा गांधी अंतरराष्ट्रीय खेल परिसर की परिकल्पना स्व. डाॅ. इंदिरा हृदयेश की थी। इस परिसर में क्रिकेट, तैराकी, इंडोर खेलों से सम्बंधित वो सभी सुविधाएं मौजूद हैं जो इसे अंतरराष्ट्रीय स्तर का बनाती है।
हल्द्वानी के मिनी स्टेडियम के जीर्णोद्धार की शुरुआत भी स्व. इंदिरा हृदयेश द्वारा की गई थी। नारायण दत्त तिवारी के मुख्यमंत्रित्वकाल में इसकी नींव जरूर रखी गई थी लेकिन 2007 से 2012 तक की अवधि में जिसमें इंदिरा हृदयेश विधायक नहीं थी ये सिर्फ शिलान्यासों तक ही सीमित रहा। 2012 में कांग्रेस की सरकार आने के बाद इंदिरा हृदयेश की प्राथमिकताओं में स्टेडियम और अंतरराज्यीय बस अड्डा था। कांग्रेस की अंदरूनी राजनीति के चलते इसके निर्माण की शुरुआत में विलम्ब जरूर हुआ लेकिन 2016 में क्रिकेट स्टेडियम का उद्घाटन कर उन्होंने हल्द्वानी की जनता को एक गर्व का अहसास करवाया। आज गौलापार का स्टेडियम इंदिरा हृदयेश की परिकल्पनाओं के कारण ही वजूद में आ पाया। अगर इंदिरा हृदयेश की जिद न होती तो इस स्टेडियम का हश्र भी अंतरराज्यीय बस अड्डे और अंतरराष्ट्रीय जू की तरह होता जो उस राजनीति का शिकार हो गया जिसमें हल्द्वानी का विकास हमेशा अवरुद्ध किया। आज जनप्रतिनिधि भले ही दावा करें लेकिन इस बात को कहने में कोई गुरेज नहीं कि इंदिरा हृदयेश ने हल्द्वानी की जो तस्वीर बदली थी उसे भाजपा सरकार आगे बढ़ाने में नाकाम रही है। अगर सरकार ईमानदार होती तो राजनीतिक द्वेष को किनारे कर हल्द्वानी में विकास की नई इबारत लिख सकती थी। आज जब उत्तराखण्ड में पुष्कर सिंह धामी एक सशक्त मुख्यमंत्री के रूप में काबिज हैं तो वो सारे राजनीतिक विरोधों को नकार कर अंतरराज्यीय बस अड्डं व जू के बारे में पहल करें तो कोई कारण नहीं कि गौलापार जैसे उपयुक्त स्थान पर बस अड्डा नहीं बन पाए। बहरहाल, सरकार व भाजपा भले ही 38वें राष्ट्रीय खेल के सफल आयोजन पर अपनी पीठ ठोकें लेकिन उनके इस जश्न की बुनियाद में डाॅ. इंदिरा हृदयेश की विकास की ही परिकल्पना है। कम से कम हल्द्वानी के संदर्भ में तो ये कहा ही जा सकता है।

