हरिद्वार भूमि घोटाले में 10 अधिकारियों का निलम्बन, एलयूसीसी सहकारी घोटाले और यूकेएसएसएससी पेपर लीक में सीबीआई जांच के आदेश स्पष्ट नजर आ रहा है कि मुख्यमंत्री धामी अब ‘जीरो टाॅलरेंस’ की नीति पर चलते हुए ताबड़तोड़ कार्रवाई में जुट गए हैं, जिससे संदेश जाए कि उनकी सरकार भ्रष्टाचार के खिलाफ समझौता नहीं करेगी। विपक्ष लेकिन इतने भर से सहमत नहीं है। वह पूछ रहा है कि क्या ये वाकई भ्रष्टाचार पर निर्णायक वाॅर हैं या फिर इन आदेशों के पीछे कोई राजनीतिक गणित काम कर रहा है?
उत्तराखण्ड की राजनीति और प्रशासन में इन दिनों एक नए अध्याय की शुरुआत देखी जा रही है, एक ऐसा अध्याय जहां मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी भ्रष्टाचार के विरुद्ध स्पष्ट और कड़ा रुख अपनाते दिखाई दे रहे हैं। बीते सप्ताह राज्य सरकार ने तीन बड़े मामलों में ऐसी कार्रवाई की जिसकी गूंज न केवल देहरादून, बल्कि दिल्ली तक सुनाई दी। इस कार्रवाई ने नौकरशाही और राजनीतिक गलियारों में भी हलचल पैदा कर दी। हरिद्वार नगर निगम भूमि घोटाले में 10 वरिष्ठ अधिकारियों का निलंबन, बहुराज्यीय सहकारी संस्था एलयूसीसी के घोटाले और अधीनस्थ सेवा चयन आयोग (यूकेएसएसएससी) के पेपर लीक प्रकरण में केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) जांच का आदेश, ये निर्णय धामी सरकार के भ्रष्टाचार पर ‘जीरो टाॅलरेंस’ के दावे को जमीनी हकीकत में तब्दील करते हैं।
गौरतलब है कि हरिद्वार नगर निगम द्वारा किए गए भूमि क्रय में 15 करोड़ रुपए मूल्य की जमीन के बदले 54 करोड़ रुपए का भुगतान किए जाने का मामला किसी सामान्य प्रशासनिक त्रुटि से कहीं अधिक गम्भीर है। इस घोटाले में रिश्वत, फाइलों का गुम होना, दर निर्धारण में हेरफेर जैसी अनियमितताएं सामने आई हैं। मुख्यमंत्री धामी ने इस पर तेज प्रतिक्रिया देते हुए हरिद्वार के जिलाधिकारी, नगर आयुक्त, दो वरिष्ठ आईएएस, एक पीसीएस अधिकारी समेत कुल 10 अफसरों को निलम्बित कर दिया है। अपनी प्रारम्भिक जांच वरिष्ठ आईएएस रणवीर सिंह चौहान ने 29 मई को प्रस्तुत की थी। जांच में यह तथ्य सामने आया कि जमीन की खरीद की फाइल में आवश्यक दस्तावेजों की अनुपस्थिति के बावजूद अनुमोदन किया गया, दरों में संशोधन फाइलों में मनमाने ढंग से किया गया और भूमि मूल्यांकन रिपोर्ट के कई अहम बिंदु जान-बूझकर हटा दिए गए। यह पूरा षड्यंत्र तब रचा गया, जब नगर सीमा विस्तार से सम्बंधित परियोजना का बजट पास हो चुका था, यह स्पष्ट संकेत है कि अधिकारियों को इस ‘विकास’ से लाभ पहुंचाना ही असल उद्देश्य था।
इस घोटाले की गूंज राजनीतिक स्तर पर भी सुनाई दी। कांग्रेस ने मुख्यमंत्री धामी पर निशाना साधते हुए कहा कि जब शासन की नींव ही भ्रष्टाचार पर टिकी हो तो योजनाएं कागजों में ही रह जाती हैं। हालांकि भारतीय जनता पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व ने धामी के फैसलों को खुला समर्थन देते हुए स्पष्ट किया कि दोषी चाहे कोई भी हो, उसे बख्शा नहीं जाएगा।
अब मुख्यमंत्री धामी ने 24 जुलाई को इस मामले की सीबीआई जांच की औपचारिक स्वीकृति दे दी है। यह निर्णय न केवल जांच को निष्पक्ष बनाएगा, बल्कि हरियाणा, पंजाब और उत्तर प्रदेश में फैले नेटवर्क की परतें भी खोल सकेगा। अधिकारियों का मानना है कि एसटीएफ और सीआईडी की सीमित जांच के बाद अब सीबीआई की गहन पड़ताल से निवेशकों में विश्वास बहाल होगा और आर्थिक अपराधों पर कठोर नियंत्रण लगेगा।
इसी क्रम में तीसरा बड़ा मामला है, उत्तराखण्ड अधीनस्थ सेवा चयन आयोग की वर्ष 2022 में हुई परीक्षा का पेपर लीक घोटाला। इस मामले में एसटीएफ की जांच में यह खुलासा हुआ कि 15 लाख रुपए प्रति पेपर के हिसाब से 260 से अधिक अभ्यर्थियों को लाभ पहुंचाया गया। करीब 35 गिरफ्तारियां हुईं, लेकिन राजनीतिक हस्तक्षेप और राज्य एजेंसियों की सीमित शक्ति के कारण जांच अधूरी रह गई।
विपक्ष ने इस मामले की केंद्रीय जांच एजेंसी से जांच कराने की मांग बार-बार उठाई है। कांग्रेस का आरोप है कि सरकार इस पूरे प्रकरण को दबाने और असली दोषियों को बचाने में लगी रही। मुख्यमंत्री धामी ने फरवरी 2023 में सीबीआई जांच का आश्वासन दिया था, लेकिन अब जाकर फिर से इस मामले को केंद्रीय एजेंसी को सौंपे जाने की प्रक्रिया शुरू हुई है।
तीनों मामलों की पृष्ठभूमि और वर्तमान कार्रवाई स्पष्ट करती है कि धामी सरकार अब नारा नहीं, ठोस एक्शन के मोड में है। हरिद्वार का घोटाला शहरी प्रशासन में भ्रष्टाचार की बानगी है, तो एलयूसीसी कांड ने ग्रामीणों और वरिष्ठ नागरिक निवेशकों को धोखे में डाला और पेपर लीक घोटाले ने युवाओं के भविष्य के साथ खिलवाड़ किया। सीबीआई जांच का आदेश इन कार्रवाइयों में प्रथम कदम है, लेकिन जनता की नजर अब न्यायिक प्रक्रिया की पारदर्शिता, गति और दोषियों को न्याय मिलने पर टिकी है।
राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार यदि ये कार्रवाइयां समयबद्ध न्याय की दिशा में जाती हैं तो भाजपा को इसका लाभ 2027 के विधानसभा चुनावों में मिल सकता है। दूसरी ओर यदि ये कदम केवल दिखावा साबित हुए तो जनता का भरोसा और गहरा आघात झेलेगा। प्रशासनिक दृष्टिकोण से देखें तो सतर्कता निदेशालय और सीबीआई के बीच समन्वय स्थापित करने, शीघ्र चार्जशीट दाखिल करने और अभियोजन की शुरुआत करने की जिम्मेदारी अगले दो से तीन महीनों में पूरी होनी चाहिए। तभी सरकार की ‘भ्रष्टाचार पर शून्य सहनशीलता’ नीति की सार्थकता सिद्ध होगी।
कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि इन तीनों मामलों में हुई कार्रवाई उत्तराखण्ड की राजनीति में निर्णायक मोड़ लाने की क्षमता रखती हैं। अगर सरकार इन मामलों में निष्पक्षता और दृढ़ता से आगे बढ़ती है तो न केवल भ्रष्टाचार पर लगाम लगेगी, बल्कि जनता का विश्वास, प्रशासन की साख और भविष्य की राजनीतिक दिशा भी निर्धारित होगी।
बात अपनी-अपनी
सरकार का यह सराहनीय कदम है। हरिद्वार भूमि घोटाले, यूएलसीसी घोटाले और यूके ट्रिपलसीसी भर्ती घोटाले की सीबीआई जांच होना धामी सरकार का बहुत ही सही कदम है, क्योंकि जब सीबीआई जांच होगी तो कई बड़े मगरमच्छ जो आज तक नहीं फंसे वे इन्हीं सरकार के फंसते हुए दिखेंगे। अच्छा कदम है और स्वागत योग्य है, अगर भाजपा सरकार इसी तरह घोटालेबाजों के खिलाफ सीबीआई जांच करती होती तो कौन धामी सरकार की बुराई कर रहा होता। बड़े दुःख की बात है कि देर से उठाया गया कदम है लेकिन सही है। अब देखते हैं कि कितने बड़े अपराधी इसमें फंसते हैं।
शांति प्रसाद भट्ट, उक्रांद नेता, उत्तराखण्ड
जब से उत्तराखण्ड राज्य बना है तब से इस प्रदेश को भ्रष्टाचार की प्रयोगशाला बना दिया गया है, यहां की सरकारों ने। मैं किसी राजनीतिक पार्टी की बात नहीं कर रहा हूं चाहे भाजपा हो या कांग्रेस हो, सभी ने भ्रष्टाचार को बढ़ावा तो दिया ही है साथ ही उसको राजनीतिक संरक्षण भी दिया है। धामी सरकार ने कुछ मामलों में कार्यवाही की है, यह अच्छी बात है, हम इसका समर्थन करते हैं। लेकिन सरकार की नियत पर संदेह तब होता है जब चुनिंदा मामलों में तो कार्यवाही होती है और कई मामलों में कार्यवाही नहीं होती। हरिद्वार भूमि घोटाले में कुछ पर कार्रवाई की गई लेकिन इस मामले में असली गुनाहगारों को लेकर कुछ नहीं हो रहा है। छोटे लोगों को पकड़ा जा रहा है और बड़े लोगों को छोड़ दिया जा रहा है। ऐसे बहुत से मामले हैं जिन पर भ्रष्टाचार साबित हो चुका है लेकिन जांच तक नहीं की जा रही है। अवैध खनन के कितने ही मामले आ चुके हैं उन पर कार्यवाही नहीं की जा रही है। इसलिए सरकार की नियत पर संदेह हो रहा है।
प्रो. एस.एन. सचान, राष्ट्रीय सचिव, समाजवादी पार्टी
धामी सरकार में हुए हरिद्वार भूमि घोटाला हो या एलयूसीसी सहकारी घोटाला या पेपर लीक और भर्ती घोटाले इसमें केवल छोटी मछलियों को ही नापा जा रहा है, सफेद पोश बड़े मगरमच्छ हर बार बचकर निकल जा रहे हैं? एलयूससीसी घोटाले में तो एक तरफ जहां धामी सरकार ने सीबीआई जांच की बात कही तो दूसरी ओर अनिल बलूनी चार वर्तमान सांसदों को लेकर गृहमंत्री अमित शाह से मिलने पहुंच गए। यह बताता है कि भाजपा में सब कुछ ठीक-ठाक नहीं चल रहा और भाजपा के ही सांसदों को धामी की कार्यवाही पर कोई भरोसा नहीं है, वहीं दूसरी ओर एलयूसीसी घोटाले की ही तरह के.एस. पवार की पत्नी की कम्पनी का 200 करोड़ का मनी लाॅन्ड्रिंग घोटाला 2022 में उजागर हुआ था, पवार पूर्व मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत के औद्योगिक सलाहकार के पद पर थे जब घोटाला उजागर हुआ। उसकी जांच कहां तक पहुंची और उसमें किसको क्या सजा हुई? तीसरी बात यह कि धामी सरकार को अब आत्म अवलोकन करना चाहिए कि उनकी ही सरकार में अपराधों और भ्रष्टाचारों की बरसात क्यों हो रही है? प्रदेश के अंदर कोई भी पत्थर उठाओ उसके नीचे से या तो बलात्कारी या भ्रष्टाचारी निकल रहा है। क्या इसका मतलब यह समझा जाए कि धामी सरकार का कोई डर-भय या रसूख अपराधियों में व्याप्त नहीं है। एक तरफ धामी स्वयं को धाकड़ कहते हैं और दूसरी ओर अपराधों में हो रही बढ़ोतरी सरकार और प्रशासन के मुंह में तमाचा मार रही है।
गरिमा माहरा दसौनी, मुख्य प्रवक्ता, उत्तराखण्ड कांग्रेस

