Uttarakhand

देवभूमि में राजनीति की तार-तार मर्यादा

पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत के खिलाफ एआई के जरिए राष्ट्रविरोधी छवि गढ़ने का मामला हो, अंकिता भंडारी हत्याकांड में सत्ता से जुड़े नामों को लेकर उठते नए सवाल हों या फिर जैनी प्रकरण से लेकर नैनीताल दुग्ध संघ के अध्यक्ष मुकेश बोरा पर लगे यौन उत्पीड़न के आरोप उत्तराखण्ड की राजनीति आज गहरे नैतिक संकट के दौर से गुजरती दिखाई दे रही है। हालांकि देवभूमि अपवाद नहीं है, राष्ट्रीय स्तर पर भंवरी देवी हत्याकांड, तंदूर कांड से लेकर पूर्व प्रधानमंत्री एचडी देवगौड़ा के पोते सांसद रहे प्रज्ज्वल रेवन्ना, कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री बीएस येदुरप्पा आदि से जुड़े मामले गवाही देते हैं कि भारतीय राजनीति के हमाम में ‘नंगों’ की तादाद बढ़ती जा रही है


उत्तराखण्ड की राजनीति इन दिनों केवल सत्ता और विपक्ष की पारम्परिक लड़ाई भर नहीं रह गई है। बीते कुछ समय में सामने आए घटनाक्रमों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि देवभूमि में राजनीति अब नैतिकता, जवाबदेही और लोकतांत्रिक मर्यादाओं की कसौटी पर खड़ी है। एक ओर राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री और पूर्व केंद्रीय कैबिनेट मंत्री हरीश रावत के खिलाफ एआई तकनीक के दुरुपयोग से गढ़े गए आपत्तिजनक वीडियो का मामला सामने आया है तो दूसरी ओर अंकिता भंडारी हत्याकांड में सत्ता से जुड़े नामों को लेकर नई बहस छिड़ गई है। इसी के साथ भाजपा के भीतर से भी असहज सवाल उठने लगे हैं, जिसने पूरी राजनीतिक तस्वीर को और गम्भीर बना दिया है।

डिजिटल झूठ और साम्प्रदायिक उकसावे का आरोप

देहरादून के नेहरू काॅलोनी थाना क्षेत्र में दर्ज एफआईआर संख्या 0417/2025 उत्तराखण्ड की राजनीति में आई नैतिक गिरावट का ताजा तरीन मामला है। इस प्राथमिकी में हरीश रावत ने पुलिस को विस्तार से बताया है कि किस तरह एआई तकनीक का इस्तेमाल कर एक भ्रामक और आपत्तिजनक वीडियो तैयार कर उसे सोशल मीडिया पर प्रसारित किया गया है। एफआईआर के अनुसार इस वीडियो का उद्देश्य उनकी सार्वजनिक छवि को नुकसान पहुंचाना, उन्हें राष्ट्र विरोधी और ‘पाकिस्तानी एजेंट’ के रूप में प्रस्तुत करना तथा हिंदू-मुस्लिम समुदायों के बीच वैमनस्य फैलाना है। एफआईआर में कहा गया है कि वीडियो में प्रयुक्त शब्द, दृश्य और तथ्य न केवल अपमानजनक थे बल्कि धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने वाले और समाज में अशांति फैलाने की क्षमता रखने वाले थे।

शिकायत में यह भी दर्ज है कि यह वीडियो 18 दिसम्बर 2025 को एक ऐसे सोशल मीडिया प्लेटफाॅर्म पर पोस्ट किया गया, जिसे कथित रूप से भाजपा के उत्तराखण्ड संगठन से जुड़े लोग संचालित करते हैं।  रिपोर्ट में इस तरह की सामग्री को भारत की सामाजिक एकता, अखंडता और साम्प्रदायिक सौहार्द के लिए गम्भीर खतरा बताया गया है।

पुलिस ने इस मामले में आईटी अधिनियम, 2008 की धाराएं 66 डी और 67 तथा भारतीय न्याय संहिता 2023 की धाराएं 196, 299 और 353 के तहत अपराध दर्ज कर जांच शुरू की है। यह मामला इसलिए भी गम्भीर माना जा रहा है क्योंकि इसमें केवल मानहानि नहीं बल्कि डिजिटल तकनीक के जरिए राजनीतिक चरित्र हनन और समाज को विभाजित करने के प्रयास का आरोप है।
 
गट्टू बना विवाद का नया केंद्र

उत्तराखण्ड की राजनीति पर सबसे गहरा असर अंकिता भंडारी हत्याकांड का रहा है। पौड़ी जिले के गंगा-भोगपुर क्षेत्र स्थित वनंतरा रिसाॅर्ट में कार्यरत अंकिता की 18 सितम्बर 2022 को हत्या कर दी गई थी। बाद में उनका शव चीला बैराज से बरामद हुआ। अदालत ने इस मामले में दोषियों को उम्रकैद की सजा सुनाई, लेकिन इसके बावजूद ‘वीआईपी’ एंगल को लेकर उठे सवाल कभी पूरी तरह शांत नहीं हुए। हत्या से पहले अंकिता पर ‘एक्स्ट्रा सर्विस’ के नाम पर दबाव, ऑडियो रिकॉर्डिंग में किसी प्रभावशाली व्यक्ति का संकेत और जांच के दौरान कुछ डिजिटल साक्ष्यों का सामने न आना, ये सभी पहलू आज भी सार्वजनिक विमर्श का हिस्सा है। हाल के दिनों में अभिनेत्री उर्मिला सनावर के बयानों के बाद यह बहस फिर तेज हो गई।
 
सुरेश राठौर की पत्नी के आरोप और ‘गट्टू’ का नाम

भाजपा के पूर्व विधायक सुरेश राठौर की दूसरी पत्नी बताई जाने वाली अभिनेत्री उर्मिला सनावर ने अपने वायरल वीडियो और बयानों में दावा किया है कि अंकिता भंडारी हत्याकांड से जुड़ी रात को ‘कौन जा रहा था’ इसकी रिकाॅर्डिंग उनके पास है। उन्होंने ‘गट्टू’ नाम का उल्लेख करते हुए कहा कि अंकिता के मना करने पर उसकी हत्या कर दी गई।

इन बयानों और उर्मिला द्वारा जारी कुछ ऑडियो के बाद सार्वजनिक चर्चाओं में ‘गट्टू’ के रूप में दुष्यंत कुमार गौतम का नाम सामने आने लगा। यह बात फिलहाल आरोप और सार्वजनिक दावों के स्तर पर है और जांच एजेंसियों की ओर से इसकी कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं की गई है। उर्मिला सनावर ने यह भी कहा है कि उन्हें अपनी जान का खतरा है और दबाव बनाकर उनके बयान बदलवाने की कोशिश हो सकती है।

गौरतलब है कि दुष्यंत कुमार गौतम भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ संगठनात्मक नेता हैं और लम्बे समय से पार्टी की केंद्रीय राजनीति में सक्रिय भूमिका निभाते रहे हैं। वे भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव रह चुके हैं जो पार्टी के शीर्ष संगठनात्मक पदों में से एक माना जाता है। इससे पहले और समानांतर रूप से वे पार्टी के अनुसूचित जाति मोर्चा से जुड़े रहे हैं और संगठन को जमीनी स्तर तक विस्तार देने में उनकी भूमिका रही है। दुष्यंत कुमार गौतम राज्यसभा सांसद भी रह चुके हैं। वे वर्ष 2020-22 तक हरियाणा से राज्यसभा के सदस्य रहे और इस दौरान संसद के उच्च सदन में भाजपा का प्रतिनिधित्व किया।

पार्टी संगठन में उनकी भूमिका केवल संसदीय नहीं रही बल्कि उन्हें विभिन्न राज्यों में केंद्रीय संगठन का प्रतिनिधि और प्रभारी बनाकर भेजा गया। इसी क्रम में वे भारतीय जनता पार्टी के उत्तराखण्ड प्रभारी भी रह चुके हैं।
 
उत्तराखण्ड प्रभारी के रूप में उनकी जिम्मेदारी राज्य में पार्टी संगठन, चुनावी रणनीति, सरकार और संगठन के बीच समन्वय तथा केंद्रीय नेतृत्व तक राज्य की राजनीतिक स्थिति की रिपोर्टिंग की रही। इस भूमिका में वे उत्तराखण्ड के मुख्यमंत्री, प्रदेश अध्यक्ष और संगठन के वरिष्ठ पदाधिकारियों के साथ सीधे संवाद में रहे और कई अहम राजनीतिक फैसलों में उनकी मौजूदगी दर्ज की गई।

दुष्यंत कुमार गौतम का राजनीतिक सफर संगठन आधारित राजनीति का रहा है। वे उन नेताओं में गिने जाते हैं जिन्हें पार्टी ने दिल्ली, हरियाणा और उत्तराखण्ड जैसे अहम राजनीतिक क्षेत्रों में जिम्मेदारी दी। हाल के वर्षों में उन्होंने दिल्ली विधानसभा चुनाव भी लड़ा, जहां उन्हें भाजपा ने करोल बाग (अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित) सीट से उम्मीदवार बनाया था। चुनावी हार के बावजूद पार्टी संगठन में उनकी भूमिका और पहचान बनी रही। इस प्रकार, दुष्यंत कुमार गौतम केवल एक स्थानीय या सीमित क्षेत्र के नेता नहीं हैं बल्कि वे राष्ट्रीय स्तर के संगठनात्मक पदों, राज्यसभा सांसद और उत्तराखण्ड प्रभारी जैसी जिम्मेदारियां निभा चुके एक वरिष्ठ भाजपा नेता हैं। ऐसे में उनके नाम का किसी भी गम्भीर आरोप या प्रकरण से जुड़ना, भले ही वह आरोप के स्तर पर ही क्यों न हो, राजनीतिक रूप से अत्यंत संवेदनशील है और इसी कारण इस पूरे मामले में निष्पक्ष जांच की मांग को लेकर बहस तेज हुई है।
 
पुराना लेकिन प्रासंगिक सवाल

उत्तराखण्ड की राजनीति में नैतिक गिरावट की चर्चा हरक सिंह रावत से जुड़े जैनी प्रकरण के बिना अधूरी है। असम की युवती जैनी ने आरोप लगाया था कि उसके साथ यौन शोषण किया गया। यह मामला दो दशक पहले सामने आया और उस समय राज्य की राजनीति में तीखी हलचल मची थी। समय बीतने के साथ यह प्रकरण राजनीतिक शोर में दब गया, लेकिन यह उदाहरण आज भी यह बताता है कि महिलाओं द्वारा लगाए गए गम्भीर आरोप किस तरह सत्ता और प्रभाव के आगे कमजोर पड़ जाते हैं। हरक सिंह इस प्रकरण के बाद भाजपा के निशाने पर रहे थे और फिर 2016 में हरीश रावत की सरकार गिराने में अहम भूमिका निभा वे भाजपा की नजरों में पाक-साफ भी हो गए। अब चूंकि वे एक बार फिर से ‘धर्म निरपेक्ष’ हो कांग्रेस में वापसी कर चुके हैं इसलिए यह ‘उजाडू बल्द’ अब भाजपा को खटकने और कांग्रेस को सुहाने लगा है।

इसी क्रम में लालकुआं दुग्ध संघ से जुड़े प्रकरण और उसके तत्कालीन अध्यक्ष भाजपा नेता मुकेश बोरा पर लगे यौन शोषण के आरोप भी लम्बे समय तक चर्चा में रहे। इन मामलों में भी वही पैटर्न दिखाई दिया, पहले इनकार, फिर राजनीतिक बचाव और अंततः चुप्पी।
 
उत्तराखण्ड कोई अपवाद नहीं

उत्तराखण्ड में जो कुछ हो रहा है, वह दरअसल देशव्यापी राजनीतिक गिरावट का हिस्सा है। कर्नाटक के हासन से सांसद रहे प्रज्वल रेवन्ना, जो पूर्व प्रधानमंत्री एच. डी. देवेगौड़ा के पोते हैं, उन पर सैकड़ों महिलाओं के यौन शोषण, वीडियो रिकाॅर्डिंग और ब्लैकमेलिंग जैसे गम्भीर आरोप सामने आए। यह मामला सत्ता, वंशवाद और संरक्षण के खतरनाक मेल की मिसाल बना।

राजस्थान का ‘भंवरी देवी हत्याकांड’ भी इसी कड़ी का एक भयावह उदाहरण है। 2011 में इस हत्या का आरोप तत्कालीन कांग्रेस सरकार में मंत्री महिपाल मदेरणा पर लगा था। लम्बी जांच और न्यायिक प्रक्रिया ने दिखाया कि जब सत्ता और अपराध आमने-सामने आते हैं तो न्याय कितना कठिन हो जाता है।

वर्ष 1995 में दिल्ली का कुख्यात ‘तंदूर कांड’, जिसमें कांग्रेस नेता सुशील शर्मा को दोषी ठहराया गया था, इस केस में भी इसी नैतिक पतन की याद दिलाता है। इन सभी मामलों में एक समान सूत्र दिखाई देता है, सत्ता और प्रभाव, महिलाओं का शोषण, जांच पर दबाव और फिर लम्बी चुप्पी। उत्तराखण्ड में हरीश रावत का डिजिटल चरित्र हनन, अंकिता भंडारी की हत्या, जैनी प्रकरण और लालकुआं जैसे मामले उसी श्रृंखला की कड़ियां हैं।
 
देवभूमि के लिए आत्म मंथन का समय

देवभूमि उत्तराखण्ड आज केवल राजनीतिक संघर्ष नहीं बल्कि नैतिक संघर्ष से गुजर रही है। जब एक पूर्व मुख्यमंत्री को एआई के जरिए राष्ट्र विरोधी दिखा दिया जाए, हत्या के मामलों में सत्ता से जुड़े नामों पर सवाल उठें और यौन शोषण के आरोप बार-बार सामने आकर दब जाएं तो सवाल किसी एक पार्टी या व्यक्ति का नहीं रहता।
 
सवाल पूरी राजनीतिक

संस्कृति का हो जाता है। देवभूमि के नाम पर राजनीति करने वालों के लिए यह आत्म मंथन का क्षण है या तो मर्यादा लौटेगी या इतिहास दर्ज करेगा कि कथित तौर पर सच्चे और ईमानदार कहलाए जाने वाली पहाड़ी ने भी हमाम में नंगे होने में देर नहीं लगाई।

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