मेरी बात

गत्  पखवाड़े जनप्रतिनिधियों के दुराचरण के दो मामले ऐसे सामने आए जिन्होंने हर उस भारतीय को शर्मसार करने का काम किया जो संवेदनशील है, जागरुक है और किसी विचारधारा विशेष के प्रभाव से दूर, किसी भी प्रकार की भक्ति से परे केवल और केवल गुण-दोष के नजरिए से अपना दृष्टिकोण तय करता है। प्रखर समाजवादी चिंतक और लोकसभा सांसद डॉ. राममनोहर लोहिया ने दशकों पहले भारतीय संसद की बाबत जो कहा था, गत् सप्ताह संसद के विशेष सत्र के दौरान भाजपा सांसद रमेश बिधूड़ी ने अपने बेहद निम्न स्तर के आचरण से उसे प्रमाणित करने का काम किया है। ऐसा आचरण जिसके लिए उन्हें धिक्कारा जाना, उनको दण्डित किया जाना जरूरी हो जाता है। डॉ . लोहिया का कथन था- ‘संसद को स्वांग, पाखंड और रस्म अदायगी का अड्डा बना दिया गया है। सरकार और सदस्य जानवरों की तरह जुगाली करते हैं।’ रमेश बिधूड़ी ने जो कुछ संसद में विपक्षी सांसद दानिश अली को लेकर कहा वह बेहद निंदनीय है। उसकी कठोरतम् शब्दों में निंदा विपक्षी दल कर भी रहे हैं और जैसा अपेक्षित था भाजपा नेतृत्व खामोशी अख्तियार कर अपने इस उद्दंड सांसद को अप्रत्यक्ष रूप से समर्थन देती नजर आ रही है। विपक्ष भी लेकिन दूध का धुला नहीं है। उत्तराखण्ड में कांग्रेस के एक विधायक ने बीते दिनों एक शिक्षण संस्थान के निदेशक संग शराब के नशे में धुत हो गाली गलौज कर सार्वजनिक जीवन में अपेक्षित नैतिक आचरण को तार-तार करने का काम किया। उक्त विधायक पर कार्यवाही करने के बजाए कांग्रेस के प्रदेश नेतृत्व ने रक्षात्मक शैली अपना अपने विधायक को बचाने का प्रयास कर यह दर्शा दिया कि नैतिकता और शुचिता को लेकर उसके मापदण्ड भाजपा समान ही हैं। इन दो प्रसंगों के जरिए चलिए थोड़ा समझने का प्रयास करते हैं कि भारतीय संस्कृति का दंभ भरने वाली भाजपा और उसके दंभ को छद्म बता स्वयं को नैतिक मूल्यों में उच्चतर मानने वाली कांग्रेस इस नैतिकता के धरातल पर कहां खड़ी हैं।

पहले बात उत्तराखण्ड कांग्रेस की जिसके एक नेता और द्वाराहाट विधानसभा सीट से विधायक मदन सिंह बिष्ट राज्य के प्रतिष्ठत सरकारी शिक्षण संस्थान द्वाराहाट इंजीनियरिंग कॉलेज के निदेशक द्वारा उनके फोन न उठाने से इस कदर कुपित हो बैठे कि निदेशक के घर शराब के नशे में चूर हो जा धमके। निदेशक के घर के बाहर उन्होंने तांडव शुरू कर दिया। भद्दी-भद्दी गालियां देने लगे। उनके निशाने पर निदेशक के साथ-साथ राज्य के मुख्यमंत्री भी थे। सोशल मीडिया में वायरस ऑडियो और वीडियो में सुना-देखा जा सकता है कि किस प्रकार विधायक महोदय निदेशक और राज्य के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की बाबत बेहद अभद्र भाषा का इस्तेमाल कर रहे हैं। उनके इस आचरण के सार्वजनिक होने बाद होना तो यह चाहिए था कि महात्मा गांधी के जीवन मूल्यों को अपनी धरोहर बताने वाली कांग्रेस इस विधायक को दंडित करती लेकिन हुआ ठीक उलट। राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री और कांग्रेस वर्किंग कमेटी के सदस्य हरीश रावत ने अपने विधायक के आचरण को सही बताने का प्रयास करते हुए सोशल मीडिया में लिखा- ‘अधिकारी टेलीफोन उठाते नहीं। जनप्रतिनिधियों को आवश्यक सम्मान नहीं दिया जाता। यह अकेले श्री मदन सिंह बिष्ट जी की समस्या नहीं। यह दर्द और शिकायत, विपक्ष के सभी नेतागणों और सामाजिक कार्यकर्ताओं की है।’ हरीश रावत ने अपनी इस टिप्पणी में एक भी शब्द मदन सिंह बिष्ट की अमर्यादित भाषा पर, उनके नशे में चूर होने पर अथवा उनके द्वारा राज्य के मुख्यमंत्री की बाबत अपशब्दों पर नहीं कर यह स्पष्ट संदेश दे दिया है कि सार्वजनिक जीवन में शुचिता के प्रति वे अथवा उनकी पार्टी कितनी संवेदनशील है। लेकिन जब बात भाजपा सांसद रमेश बिधूड़ी की सामने आई तो हरीश रावत के सुर बदल गए। वे अपनी सोशल मीडिया में जारी पोस्ट में लिखते हैं- ‘अब भारत की संसद भी और वह भी नई आकांक्षाओं का नया संसद भवन घृणा उद्बोधन का केंद्र बनने जा रहा है। भारतीय जनता पार्टी के एक वरिष्ठ सांसद ने जिस तरीके से घृणास्पद शब्दों का प्रयोग किया है, एक दूसरे सांसद के लिए, वह बहुत दुर्भाग्यजनक है। भाजपा ने जो संस्कार अपने नेताओं/कार्यकर्ताओं में डाले हैं, वह घृणा जिस तरीके से उगल करके सामने आ रही है वह बहुत चिंताजनक है। श्री रमेश बिधूड़ी कोई सामान्य सांसद नहीं हैं, उनका आचरण निंदनीय है। भाजपा को देश से क्षमा मांगनी चाहिए और अपने सांसद को बर्खास्त करना चाहिए।’
है न कमाल की बात। हरीश रावत भाजपा से तो उसके सांसद की बेहूदगी के लिए क्षमायाचना की मांग कर रहे हैं। लेकिन अपनी पार्टी  के विधायक के आचरण को लेकर न केवल खामोश हैं, बल्कि उसे जस्टिफाई भी करने का प्रयास कर रहे हैं। हालांकि भाजपा सांसद का संसद में दिया गया कथन कांग्रेस विधायक के कुकृत्य के मुकाबले कहीं ज्यादा गंभीर दुराचरण है। उन्होंने बसपा सांसद दानिश अली को निशाने पर रखकर जो घृणास्पद बातें कहीं वह सीधे तौर पर भाजपा और उसके पृत संगठन राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ पर लगने वाले आरोपों की पुष्टि करती है कि धार्मिक धुव्रीकरण के जरिए भारत को हिंदू राष्ट्र बनाने और अल्पसंख्यकों की देशभक्ति को निशाने पर रख सांप्रदायिकता को इन दोनों के द्वारा विस्तार दिया जा रहा है। रमेश बिधूड़ी ने संसद में जो कुछ कहा वह तो घोर निंदनीय है ही, भाजपा नेतृत्व का उनके आचरण पर चुप्पी साधे रखना उससे कहीं ज्यादा निंदनीय और चिंताजनक है। जब रमेश बिधूड़ी लोकसभा में दानिश अली की बाबत अनर्गल बाते कह रहे थे तो उनके साथ बैठे भाजपा सांसद हर्षवर्धन और रविशंकर प्रसाद (दोनों पूर्व केंद्रीय मंत्री) अपने साथी सांसद की बेहूदगी का आनंद लेते नजर आ रहे थे। इससे पता चलता है कि भाजपा का शीर्ष नेतृत्व बिधूड़ी जैसों को संरक्षण देता है क्योंकि इससे उनके राजनीतिक हितों की पूर्ति होती है। जर्मन तानाशाह एडोल्फ हिटलर का कहना था- ‘I must not measure the speech of a statesman to his people by the impression it makes on a university professor but rather by the effect it has on its folk’ (मुझे किसी राजनेता के भाषण से पड़ने वाले प्रभाव को मापने के लिए उस भाषण का प्रभाव किसी विश्वविद्यालय के प्रोफेसर पर कैसा पड़ा इसके बजाए आम जनता पर पड़े प्रभाव से जानना चाहिए।) वर्तमान भाजपा नेतृत्व हिटलर के इस कथन पर अमल करता है। आम जनता को धर्म के नाम पर अपनी तरफ आकर्षित कर ही उसने बीते दो लोकसभा चुनाव और कई राज्यों के चुनाव जीते हैं और भविष्य में होने जा रहे चुनावों में भी इसी आचरण को अमल में लाया जाना तय है। हिटलर के सहयोगी जोसेफ गोएबेस्ल का मानना था कि ‘हमें वही भाषा बोलनी चाहिए जो आम जनता समझती हो।’ धर्म और जाति के दलदल में गले तक धंसे देश में बिधूड़ी की भाषा भी वह भाषा है जिसे जनता समझती है। यही कारण है कि भाजपा नेतृत्व अपने सांसद की इस भाषा का मौन समर्थन करता नजर आ रहा है। अब धर्मनिरपेक्ष होना समझदारी की, गर्व की बात नहीं है, बल्कि एक गाली है। अब ‘गर्व से कहो हम हिंदू हैं’ का दौर है। ऐसे में संभावना पूरी है कि उत्तराखण्ड के कांग्रेसी विधायक मदन सिंह बिष्ट भी भाजपा में जल्द शामिल कर लिए जाएं क्योंकि उनकी भाषा भी वही है जिसे जनता आसानी से समझ लेती है। 21वीं सदी में संभवत विश्वगुरु बनने के लिए भी यही भाषा जरूरी हो। फिर भी मेरे लिए तो यह आचरण धिक्कार योग्य है और रहेगा। हालांकि मुझे अपनी सीमाओं का पता है। मैं जानता-समझता हूं कि मेरे अथवा मुझ सरीखे अन्यों के कहा लिखने-बोलने से कुछ बदलने वाला नहीं। धर्म और जाति के दलदल में बहुसंख्यक आबादी इस कदर धंस चुकी है कि सही और गलत का अंतर करने में वह पूरी तरह असमर्थ हो चली है। फिर भी अपने दिल और अपनी आत्मा की पुकार को अनसुना कर पाना मेरे लिए संभव नहीं। मैं कहना चाहता हूं कि हमारी राजनीति और राजनेता, दोनों का आचरण हमें विश्वगुरु बनाने की राह से कोसों दूर एक ऐसे गहरे दलदल की तरफ ले जा रहा है जहां से बाहर निकल पाना संभव नहीं। इस दलदल में केवल और केवल झूठ का मायाजाल है। इस मायाजाल में संकुचित स्वार्थ ही सब कुछ है। हम केवल अपने अथवा अपनी जाति और धर्म के हितों को देखने लगे हैं। लोहिया कहते थे ‘झूठ और प्रपंच के सर्वग्राही दलदल में पक्की जमीन तैयार कर पाना किसी नरम या व्यापक सदिच्छा वाले कार्यक्रम से संभव नहीं। दलदल के सिद्धांत और नीति के मजबूत खम्भे गाड़ने होंगे।’ प्रश्न यह कि ऐसा करने के लिए कब और कौन अवतार अवतरित होगा? होगा भी या नहीं?

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