बंगाल की राजनीति में नाम, सम्बोधन और इतिहास कभी तटस्थ नहीं रहे। बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय और वंदे मातरम् से लेकर रवींद्रनाथ टैगोर, श्यामा प्रसाद मुखर्जी और जनसंघ-मुस्लिम लीग के पुराने गठबंधनों तक, हर प्रतीक आज के चुनावी संघर्ष में नए अर्थों के साथ सामने लाया जा रहा है। ‘बंकिम दा’ जैसे एक शब्द से उपजा विवाद दरअसल इस बड़ी लड़ाई का हिस्सा है कि बंगाल की सांस्कृतिक और राष्ट्रवादी विरासत का असली वारिस कौन है? दिलचस्प यह भी है कि भाजपा के मौजूदा बड़े चेहरों में से अधिकांश कभी तृणमूल कांग्रेस का हिस्सा रहे हैं लेकिन आज वही ममता बनर्जी को ‘हटाने’ की निर्णायक लड़ाई का हिस्सा बन चुके हैं। चुनावी साल में इतिहास, नाम और स्मृति को हथियार बनाकर असली सवालों, शासन, रोजगार और जवाबदेही, से ध्यान हटाने की यह राजनीति और तीखी होती जा रही है
भारतीय राजनीति में नाम में क्या रखा है?’ का सवाल साधारण नहीं होता और पश्चिम बंगाल में तो यह सवाल सबसे ज्यादा राजनीतिक हो जाता है। विलियम शेक्सपीयर ने ‘रोमियो एंड जूलियट’ में प्रेम के संदर्भ में कहा था कि नाम बदल देने से गुलाब की खुशबू नहीं बदलती लेकिन बंगाल की राजनीति में नाम गुलाब नहीं बल्कि हथियार होते हैं। यहां नाम, सम्बोधन और ऐतिहासिक संदर्भ सत्ता, अस्मिता और नैतिक अधिकार तय करते हैं। एक शब्द पूरे विमर्श को शासन और नीतियों से हटाकर पहचान और अपमान की ओर मोड़ सकता है।
संसद के हालिया सम्पन्न शीतकालीन सत्र में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय को ‘बंकिम दा’ कहे जाने की घटना इसी राजनीति का ताजा उदाहरण है। तकनीकी रूप से यह एक भाषाई चूक थी जिसे उन्होंने तुरंत सुधार भी लिया लेकिन बंगाल की राजनीति में मामला वहीं खत्म नहीं हुआ है। बंकिमचंद्र ‘वंदे मातरम्’ के रचयिता हैं और ‘वंदे मातरम्’ आज भाजपा की राष्ट्रवादी राजनीति का केंद्रीय प्रतीक बन चुका है। ऐसे समय में, जब अगले वर्ष बंगाल में विधानसभा चुनाव होने हैं, भाजपा द्वारा बंकिमचंद्र और वंदे मातरम् की विरासत को राजनीतिक रूप से भुनाने की कोशिश स्वाभाविक है। ठीक इसी पृष्ठभूमि में ‘बंकिम दा’ एक शब्द नहीं बल्कि एक सांस्कृतिक टकराव बन जाता है या बनाया जा रहा है।
बंगाल में ‘दा’ और ‘बाबू’ जैसे सम्बोधन सामाजिक अनुशासन का हिस्सा हैं। बंकिमचंद्र, रवींद्रनाथ टैगोर या शरतचंद्र चट्टोपाध्याय जैसे ऐतिहासिक व्यक्तित्वों के लिए ‘बाबू’ कहना सम्मान और ऐतिहासिक दूरी का संकेत है। ‘दा’ आत्मीयता का शब्द है जो जीवित सामाजिक सम्बंधों और साझा स्मृति से पैदा होता है। जब यह आत्मीयता ऊपर से, चुनावी मंचों से गढ़ी जाती है तो वह बनावटी लगती है। तृणमूल कांग्रेस इसी बिंदु को पकड़कर इस चूक को ‘बाहरीपन’ और ‘सांस्कृतिक अज्ञानता’ के प्रमाण के रूप में पेश करने में अब जुट गई है।
यह पहली बार नहीं है जब प्रधानमंत्री मोदी का बंगाल से संवाद शब्दों के स्तर पर टकराया हो। 2021 के विधानसभा चुनावों में उनका दीदी ओ दीदी’ सम्बोधन भी बंगाल में स्वीकार नहीं किया गया था। हिंदी पट्टी में यह भले ही राजनीतिक व्यंग्य रहा हो लेकिन बंगाल में इसे उपहास और अवमानना के रूप में देखा गया। ऐसे प्रसंग भाजपा के लिए ‘बाहरी पार्टी’ के आरोप को और मजबूत करते हैं, जिसे तृणमूल लगातार चुनावी हथियार बनाती रही है।
यह विवाद केवल भाषा तक सीमित नहीं है बल्कि इतिहास की चयनात्मक स्मृति से भी जुड़ा है। जब भाजपा वंदे मातरम् और बंकिमचंद्र को अपने राष्ट्रवादी नैरेटिव में केंद्र में रखती है, तब तृणमूल यह याद दिलाती है कि यही बंगाल वह भी है जहां हिंदू राष्ट्रवाद के बड़े प्रतीक माने जाने वाले डाॅ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी मुस्लिम लीग के साथ बनी सरकार का हिस्सा रहे थे। यह ऐतिहासिक तथ्य है कि 1941 में ए.के. फजलुल हक के नेतृत्व वाली बंगाल सरकार में श्यामा प्रसाद मुखर्जी वित्त मंत्री थे और उस सरकार में मुस्लिम लीग शामिल थी। यही नहीं, स्वतंत्रता-पूर्व दौर में बंगाल, सिंध और उत्तर- पश्चिम सीमांत प्रांत जैसे इलाकों में हिंदू महासभा और मुस्लिम लीग के बीच सत्ता-साझेदारी के उदाहरण मिलते हैं। तृणमूल इसी इतिहास को सामने रखकर भाजपा के राष्ट्रवादी दावों की चयनात्मकता को उजागर करती है।
इतिहास का यह अध्याय यहीं खत्म नहीं होता। 1942 में जब पूरा देश ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ के साथ अंग्रेजी हुकूमत को चुनौती दे रहा था तब डाॅ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने 26 जुलाई 1942 को बंगाल के तत्कालीन ब्रिटिश गवर्नर सर जाॅन हर्बर्ट को एक पत्र लिखा। इस पत्र में उन्होंने कांग्रेस द्वारा चलाए जा रहे आंदोलन को कानून-व्यवस्था के लिए खतरा बताते हुए प्रशासन से उसे सख्ती से दबाने की सलाह दी थी। यह पत्र आज भी मौजूद है और स्वतंत्रता संग्राम के उस दौर की जटिल राजनीतिक सच्चाइयों को सामने लाता है। यही श्यामा प्रसाद मुखर्जी आज भाजपा और संघ परिवार के लिए राष्ट्रवाद के निर्विवाद प्रतीक माने जाते हैं।
प्रधानमंत्री मोदी के पूर्व में दिए गए कई वक्तव्यों में भी कई बार भावनात्मक और ऐतिहासिक कथाएं तथ्यात्मक जांच में टिक नहीं पाईं। 28 जून 2018 को मगहर में उन्होंने कहा कि संत कबीर, गुरु नानक और बाबा गोरखनाथ एक साथ बैठकर आध्यात्मिक चर्चा करते थे जबकि बाबा गोरखनाथ का काल कबीर और गुरु नानक से कई सदियों पहले का माना जाता है। इसी क्रम में उनका वह बयान भी चर्चा में आया जिसमें उन्होंने कहा कि वे बचपन में सुबह साढ़े पांच बजे रेडियो पर रवींद्र संगीत सुना करते थे। यह बात सुनने में आत्मीय लगी लेकिन बाद में आकाशवाणी के प्रसारण रिकाॅर्ड से यह स्पष्ट हुआ कि उस समय नियमित रूप से रवींद्र संगीत का प्रसारण नहीं होता था। बंगाल की राजनीति में इसे भी सांस्कृतिक आत्मीयता को गढ़ने की कोशिश के रूप में देखा गया। लेकिन तथ्यात्मक चूकें केवल प्रधानमंत्री तक सीमित नहीं हैं। ममता बनर्जी भी अतीत में कई बार ऐतिहासिक और साहित्यिक संदर्भों में गलतियां कर चुकी हैं। 1947 के दंगों के दौरान टैगोर द्वारा गांधी जी को जूस पिलाने का कथन हो या टैगोर की शेक्सपीयर और कीट्स से मित्रता जैसे बयान इसके उदाहरण हैं। फर्क बस इतना है कि बंगाल में उन्हें ‘अपनी’ नेता माना जाता है, इसलिए उनकी गलतियां राजनीतिक रूप से उतनी घातक नहीं बनतीं।
इस पूरी बहस में एक और महत्वपूर्ण परत जुड़ती है और वह है भाजपा का मौजूदा बंगाल नेतृत्व। आज भाजपा के जिन बड़े चेहरों को तृणमूल कांग्रेस के खिलाफ सबसे मुखर देखा जाता है, उनमें से अधिकांश कभी न कभी खुद तृणमूल का हिस्सा रहे हैं। शुभेंदु अधिकारी, मुकुल राॅय जैसे नेता कभी ममता बनर्जी के सबसे करीबी सहयोगियों में गिने जाते थे। तृणमूल छोड़कर भाजपा में आए इन नेताओं ने पार्टी को बंगाल में संगठनात्मक मजबूती तो दी लेकिन साथ ही भाजपा के ‘बाहरी बनाम स्थानीय’ नैरेटिव को और जटिल भी बना दिया। तृणमूल इसी तथ्य को उछालकर यह तर्क देती है कि भाजपा का बंगाल चेहरा भी मूलतः उसी राजनीति से निकला है जिसे वह आज बदलने का दावा कर रही है।
अब यह पूरी बहस 2026 के पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव की ओर बढ़ रही है। मौजूदा विधानसभा में कुल 294 सीटें हैं, जिनमें तृणमूल कांग्रेस के पास 213 विधायक हैं जबकि भाजपा 77 विधायकों के साथ मुख्य विपक्षी दल है और कांग्रेस व वाम दल लगभग हाशिए पर हैं। 2021 के चुनाव में तृणमूल कांग्रेस को करीब 48 प्रतिशत वोट मिले थे जबकि भाजपा ने लगभग 38 प्रतिशत वोट हासिल किए थे। यह आंकड़े दिखाते हैं कि भाजपा ने बंगाल में तेजी से अपनी जमीन बढ़ाई है लेकिन सत्ता से अभी भी वह काफी दूर है।
यही वजह है कि अब बंगाल की लड़ाई खुलकर शुरू हो चुकी है। भाजपा हर हाल में ममता बनर्जी को सत्ता से हटाकर राज्य में अपनी सरकार बनाना चाहती है और तृणमूल इस चुनौती को बंगाल की अस्मिता और सांस्कृतिक स्वाभिमान से जोड़कर देख रही है। आने वाले महीनों में आरोप-प्रत्यारोप और तेज होंगे, नामों, प्रतीकों और इतिहास पर बहस और तीखी होगी। ऐसे में सवाल यह नहीं है कि नाम में क्या रखा है बल्कि यह है कि इन नामों की लड़ाई के बीच बंगाल के असली मुद्दे, शासन, रोजगार और भविष्य, कहां खड़े रह जाते हैं।

