Uttarakhand

नायक पर भारी खलनायक

लोकसभा चुनाव के दौरान जिस समान नागरिक संहिता (यूसीसी) को भाजपा की रैलियों में चुनावी हथियार बनाया गया वह कानून लागू कर उत्तराखण्ड को देश का पहला राज्य बनने का गौरव प्राप्त हुआ। पहाड़ की जनता हिमाचल प्रदेश की तर्ज पर उत्तराखण्ड में भी जिस सख्त भू-कानून के लागू करने की मांग वर्षों से कर रही थी वह भी सदन में पास हुआ। राज्य के वृहद विकास के लिए अब तक का रिकाॅर्ड तोड़ते हुए पहली बार ऐसा बजट लाया गया जो एक लाख करोड़ पार कर गया। सात साल के अथक प्रयासों के बाद मेजबान बन उत्तराखण्ड ने 38वें नेशनल गेम्स का न केवल सफल आयोजन किया, बल्कि 103 मेडल हासिल कर 24वें से 7वें स्थान पर जा पहुंचा। कम अर्से में इतनी सफलता हासिल करने के बाद भी धामी सरकार को जिस तरह का श्रेय मिलना चाहिए था वह उससे वंचित रह गई। अपनी उक्त उपलब्धियों की बदौलत नायक के रूप में आगे बढ़ रहे मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी पर खलनायक कहे जा रहे प्रेमचंद अग्रवाल के विवादास्पद बोल भारी पड़ गए। कैबिनेट मंत्री अग्रवाल के विधानसभा में कहे गए एक दुर्भाग्यपूर्ण वक्तव्य ने सारा पासा ही पलट दिया। इस प्रकरण से सरकार की उपलब्धियों की चर्चा होने की बजाय ‘पहाड़-मैदान’ की बहस में तब्दील हो गई

21 फरवरी का दिन था जब विधानसभा भवन देहरादून में

उत्तराखण्ड बजट के दौरान सदन में नियम 58 पर चर्चा हो रही थी। इस दौरान संसदीय कार्य मंत्री प्रेमचंद अग्रवाल ने पहाड़ मैदान के मुद्दे पर एक ऐसा वक्तव्य दे दिया जिससे उत्तराखण्ड विधानसभा की गरिमा तार तार हो गई। अग्रवाल के द्वारा कहे गए एक अमर्यादित शब्द ने आग लगा दी। इस विवादित वक्तव्य का वीडियो जैसे ही वायरल हुआ प्रदेशभर में बवाल खड़ा हो गया। लोग सोशल मीडिया में संसदीय कार्य मंत्री को कोसने लगे और पहाड़ मैदान के मुद्दे पर बहस छिड़ गई और उत्तराखण्ड का जन जन तक प्रेमचंद अग्रवाल के खिलाफ खड़ा हो गया। लोगों ने पहाड़ की अस्मिता और संस्कृति पर हमला बताकर सरकार को जमकर निशाना बनाया। हालांकि केबिनेट मंत्री प्रेमचंद अग्रवाल ने अपने
विवादास्पद बयान को लेकर माफी भी मांगी लेकिन बावजूद इसके लोगों का आक्रोश कम होने का नाम नहीं ले रहा है। लेकिन इस दौरान एक महत्वपूर्ण बात यह हुई कि मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने अपने कार्यकाल में जो नए संकल्प लिए और उन्हें साकार कर दिखाया उनको ही लोगों ने भुला दिया

लोकतंत्र के मंदिर में फिल्मी ड्रामा

उत्तराखण्ड की भाजपा सरकार में फिलहाल एक फिल्म चल रही है। यह फिल्म जब चली तो नायक (पुष्कर सिंह धामी) के वह सपने साकार होते हुए दिखाए गए जिनको वर्षों से जनता देख रही थी। इन्हीं सपनों को पूरा करने की मांग के साथ जनता ने धरना-प्रदर्शन से लेकर आंदोलन भी किए। लेकिन जब नायक जनता के लिए देखें इन सपनों को हकीकत बना रहे थे तो दुर्भाग्य से लोकतंत्र के मंदिर में एक ऐसा शब्द गूंजा जिसने लोगों के दिलों को घायल कर दिया। देखते ही देखते नायक की वे उपलब्धियां खलनायक (प्रेमचंद अग्रवाल) के विवादास्पद बयान से दबकर रह गई। दिलचस्प बात यह है कि कि धामी सरकार ने पिछले एक महीने में ही इनमें से कई उपलब्धियां हासिल की हंै।

यूसीसी हुआ लागू

उत्तराखण्ड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी द्वारा उत्तराखण्ड में जब समान नागरिक संहिता (यूसीसी) लागू किया तो इसे न केवल उत्तराखण्ड बल्कि पूरे भारत के लिए एक ऐतिहासिक कदम बताया गया। इस चलते उत्तराखण्ड देश का इकलौता ऐसा राज्य बना जहां पहली बार यूसीसी लागू किया गया। मुख्यमंत्री ने इसे समाज में समानता स्थापित करने का एक महत्वपूर्ण प्रयास बताते हुए कहा कि यह निर्णय संवैधानिक अधिकारों को सबके लिए समान रूप से लागू करने का प्रयास है। इस अवसर पर यूसीसी पोर्टल लाॅन्च किया गया, जहां मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने स्वयं अपने विवाह का पंजीकरण कर उदाहरण प्रस्तुत किया। इस पंजीकरण का प्रमाणपत्र मुख्य सचिव राधा रतूड़ी ने धामी को सौंपा। मुख्यमंत्री ने कार्यक्रम में यूसीसी के तहत पंजीकरण कराने वाले पहले पांच आवेदकों को भी प्रमाणपत्र प्रदान किए। सरकार की तरफ से दावा किया जा रहा है कि यूसीसी के लागू होने के साथ ही जाति, धर्म और लिंग आधारित कानूनी भेदभाव समाप्त हो जाएगा। सभी धर्मों की महिलाओं को समान अधिकार प्राप्त होंगे। यह निर्णय महिलाओं की सुरक्षा और सशक्तिकरण को सुनिश्चित करेगा। इसके साथ ही हलाला, तीन तलाक और इद्दत जैसी कुप्रथाओं पर रोक लगाई जाएगी।

The Chief Minister of Uttarakhand

विधानसभा लोकतंत्र का मंदिर है। यहां मर्यादा में रहकर बहस होनी चाहिए। सत्ता और विपक्ष, दोनों को संसदीय मर्यादाओं का पालन करना चाहिए। राज्य में रहने वाला हर व्यक्ति ‘उत्तराखण्डी’ है। सभी को राज्य के विकास के लिए मिलकर काम करना चाहिए। सभी प्रकार के भड़काऊ बयानों को गंभीरता से लिया जाएगा। उत्तराखण्ड की अस्मिता से खिलवाड़ करने वालों पर सख्त कार्यवाही की जाएगी। मंत्री हो या कोई भी विधायक किसी को भी माफ नहीं किया जाएगा।

पुष्कर सिंह धामी, मुख्यमंत्री उत्तराखण्ड

गौरतलब है कि यूसीसी का ड्राफ्ट तैयार करने के लिए विशेषज्ञ समिति ने 2.35 लाख से अधिक लोगों से राय ली थी। इस प्रक्रिया में नागरिकों की चिंताओं और सुझावों को प्राथमिकता दी गई। बुद्धिजीवियों का कहना है कि यह निर्णय संविधान निर्माता डाॅ. बी.आर. अंबेडकर और संविधान सभा के सदस्यों को श्रद्धांजलि देने जैसा है। यह उत्तराखण्ड के 1.25 करोड़ निवासियों के लिए भी गर्व का विषय है।

हिमाचल की तर्ज पर सख्त भू कानून

प्रदेश में हिमाचल प्रदेश की तर्ज पर कठोर भू कानून बनाए जाने की मांग वर्षों से की जा रही थी। इसके दृष्टिगत ही मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने 2022 के विधानसभा चुनावों में अपने चुनावी घोषणा में इसे लोगों के समक्ष प्रस्तुत किया। पहाड़ पर बाहरी लोगों के बढ़ते दबाव को देखते हुए स्थानीय लोग भू- कानून लेकर बनाने की मांग कर रहे थे। इसका मसौदा विधानसभा के चालू बजट सत्र में पेश किया गया। तीन साल बाद अपने वादे को निभाते हुए मुख्यमंत्री धामी ने विधानसभा में भू कानून पास कराकर मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी तिवारी सरकार, खंडूड़ी सरकार और त्रिवेंद्र सरकार के बाद इस फेहरिस्त में शामिल हो गए।

एन डी तिवारी ने जहां सूबे से बाहर के लोगों के लिए 500 वर्ग गज भूमि खरीदने का कानून बनाया था तो वहीं भुवन चंद्र खंडूड़ी ने इसे 250 वर्ग गज कर दिया था। इसके बाद जब त्रिवेंद्र सिंह रावत सरकार ने भू कानून में संशोधन किया तो उद्योग धंधे स्थापित करने के नाम पर बाहरी लोगों के लिए जमीन खरीदने की खूली छूट दे दी गई। पहाड़ों पर बाहर के लोग बहुतायत में जमीन खरीद रहे थे। इस कारण डेमोग्राफिक बदलाव भी काफी तेजी से देखा जा रहा था। अभी तक उत्तराखण्ड में बिना मंजूरी के 250 वर्ग मीटर जमीन और मंजूरी के साथ 12 एकड़ से ज्यादा जमीन कृषि और उद्यान के लिए खरीद सकते थे, लेकिन धामी सरकार के द्वारा भू कानून लागू होने के बाद जमीन खरीदने पर पूरी तरह से रोक लगा दी गई है।

इस प्रकार की भाषा किसी भी जिम्मेदार व्यक्ति से अपेक्षित नहीं है। नाराजगी स्वाभाविक है, जो वीडियो मैंने देखा और सुना, वह पूरी तरह से आपत्तिजनक था। प्रेमचंद अग्रवाल हमारे संसदीय कार्य मंत्री हैं, वे विधानसभा अध्यक्ष रह चुके हैं और कई बार विधायक भी रहे हैं। ऐसे में उनसे इस प्रकार की भाषा और आचरण की उम्मीद किसी को नहीं थी।इसे कोई भी उचित नहीं ठहरा सकता। हम सब उत्तराखण्ड के लोग हैं और हमें राज्य का सौहार्द बनाए रखना चाहिए। अगर कुछ लोग इस विवाद को और भड़का रहे हैं तो यह भी उचित नहीं है। लेकिन हां, जो प्रेमचंद अग्रवाल जी ने कहा, मुझे नहीं लगता कि उसे कोई उचित ठहरा सकता है। उन्हें खुद भी समझ आ गया होगा जो वो सही नहीं है उन्हें इसके लिए माफी मांगनी चाहिए।

त्रिवेंद्र सिंह रावत, सांसद हरिद्वार एवं पूर्व मुख्यमंत्री उत्तराखण्ड

नए कानून के तहत राज्य में भूमि खरीद-फरोख्त के लिए एक समर्पित पोर्टल बनाया गया है जहां बाहरी लोगों की ओर से की गई सभी खरीद दर्ज की जाएगी। इसके अलावा नए कानून में यह प्रावधान है कि राज्य के बाहर के लोगों को धोखाधड़ी और अनियमितताओं को रोकने के लिए जमीन खरीदने से पहले एक हलफनामा प्रस्तुत करना होगा। इस विधेयक के पारित होने के बाद 2017 के कानून के तहत सभी प्रावधान निरस्त हो जाएंगे। इसमें भूमि खरीद पर 250 वर्ग मीटर की सीमा हटा दी गई थी। नए भू कानून के तहत भूमि का उपयोग केवल भूमि-उपयोग नियमों के अनुसार ही किया जा सकेगा। यदि कोई भी इस बात का उल्लंघन करता है, तो उसकी जमीन जब्त कर ली जाएगी।

उल्लेखनीय है कि पहाड़ी जिलों में सख्त भू-कानून की मांग लम्बे अर्से से उठ रही थी। राज्य सरकार ने दो मैदानी जिलों हरिद्वार और ऊधमसिंह नगर को छोड़कर नए भू-कानून को अन्य 11 जिलों में लागू कर दिया है। इस कानून से पहले जिलाधिकारी स्तर पर जमीन खरीद की आसानी से मंजूरी मिल रही थी। लेकिन अब कृषि और उद्यान जमीन को छोड़कर किसी को विशेष प्रयोजन के लिए जमीन लेनी होगी तो उनको मंजूरी जिलाधिकारी नहीं देंगे बल्कि उसे शासन को भेजना होगा, जो अपने स्तर पर जमीन देने या नहीं देने पर निर्णय लेगा।

पहली बार बजट एक लाख करोड़ पार

मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की सरकार ने उत्तराखण्ड राज्य गठन के रजत जयंती वर्ष में सभी वर्गों को साधते हुए अवस्थापना विकास के लिए बड़ी राशि आवंटित की। प्रदेश में यह पहली बार है जब राज्य का बजट 1 लाख करोड़ रुपए के आंकड़े को पार कर गया है। इस बजट को राजस्व सरप्लस और कर मुक्त बताया गया है। इस दौरान विनियोग विधेयक के साथ 29 विभागों का बजट भी पास हुआ। विपक्ष द्वारा नौ मदों में बजट कटौती के प्रस्ताव रखे गए थे, जो बहुमत के अभाव में अस्वीकृत हो गए।

सरकार ने इस बजट में गरीब, युवा, अन्नदाता और महिलाओं के लिए 5,000 करोड़ रुपए से अधिक की राशि आवंटित की है। सामाजिक सुरक्षा योजनाओं के तहत कमजोर एवं वंचित वर्गों के लिए 3,000 करोड़ रुपए का बजट रखा गया है। इस तरह 18 फरवरी से 22 फरवरी तक उत्तराखण्ड विधानसभा का बजट सत्र कुल 37 घंटे 49 मिनट तक चला। विभिन्न मुद्दों पर विपक्ष ने सरकार से तीखे सवाल पूछे और नौ मदों में बजट कटौती प्रस्ताव भी रखे, जिन्हें सदन ने अस्वीकार कर दिया।

नेशनल गेम्स का सफल आयोजन

 

28 जनवरी से 14 फरवरी तक नेशनल गेम्स के दौरान उत्तराखण्ड में देशभर की खेल प्रतिभाओं ने अपना प्रदर्शन किया। इस आयोजन में मेजबान उत्तराखण्ड ने अभूतपूर्व सफलता हासिल करते हुए 24 वे स्थान से सातवें स्थान पर छलांग लगाकर सफलता की ऊंची उड़ान भरी। उत्तराखण्ड जैसे अपेक्षाकृत छोटे राज्य को राष्ट्रीय खेलों की तैयारी के लिए बहुत कम समय मिला। सफल आयोजन किसी चुनौती से कम नहीं था, क्योंकि उत्तराखण्ड को राज्य बने सिर्फ 25 वर्ष हुए हैं। चैंकाने वाली बात यह है कि जिस पड़ोसी पर्वतीय राज्य हिमाचल के माॅडल को अपनाने की अक्सर बातें होती हैं, उसे राष्ट्रीय खेलों की मेजबानी अभी तक नहीं मिली है। मणिपुर और असम के बाद उत्तराखण्ड राष्ट्रीय खेल कराने वाला तीसरा हिमालयी राज्य बना। वर्ष 2000 में उत्तराखण्ड के साथ राज्य का दर्जा हासिल करने वाले झारखंड ने वर्ष 2011 में राष्ट्रीय खेल कराए हैं, जबकि छत्तीसगढ़ मेजबानी मिलने के बावजूद इसका आयोजन नहीं करा पाया था। उत्तराखण्ड ने 38 वें राष्ट्रीय खेलों के लिए मजबूत आधारभूत ढांचा तैयार किया। अत्याधुनिक उपकरण मंगवाए। इस वजह से कई रिकार्ड भी टूटे। दस हजार खिलाड़ियों के लिए जरूरी सुविधाएं उपलब्ध कराई गई।

 

उत्तराखण्ड में पूरे देश से लोग रहने आते हैं और सभी लोग इसी राज्य के हैं और यह हमारा है। मैंने सदन में भी स्पष्ट किया था कि कुछ लोग मेरे बयान को तोड़-मरोड़ कर पेश कर रहे हैं। मैंने कहा था कि उत्तराखण्ड में देश के सभी हिस्सों से लोग रहते हैं। हम सभी उत्तराखंड के हैं और उत्तराखण्ड हमारा है। मुझे लगता है कि इससे कई लोगों की भावनाएं आहत हुई हैं। मेरी वजह से किसी को दुख पहुंचाना मेरा स्वभाव नहीं है। इसलिए जाने-अनजाने में जिस किसी को भी ठेस पहुंची है, मैं उसके लिए दिल से खेद व्यक्त करता हूं और उनसे माफी मांगता हूं।

प्रेमचंद अग्रवाल कैबिनेट मंत्री उत्तराखण्ड

पदकों की कुल संख्या 103 पर पहुंचना भी एक रिकार्ड रहा। पदकों का सैकड़ा जड़ कर उत्तराखण्ड ने सबको चकित कर दिया है। इसी तरह स्वर्ण पदकों की संख्या 24 रही। पदक तालिका में उत्तराखण्ड का 24 वें स्थान से सातवें स्थान पर आना सुखद परिणाम देकर गया। पश्चिम बंगाल, पंजाब, ओडिसा, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, गुजरात, आंध्र, जम्मू कश्मीर जैसे बडे़ राज्य पदक तालिका में उत्तराखण्ड से पीछे हैं। राष्ट्रीय खेलों में सबसे अहम हरित पहल रही। ग्रीन गेम्स की थीम को अमल में लाने के लिए भी कई कदम उठाए गए। रायपुर में 2 .77 हेक्टेयर जमीन पर खेल वन तैयार किया गया तो वहीं दूसरी तरफ पदक विजेताओं के नाम के 1600 पौधे लगाए गए। खेलों में जीतने वाले खिलाड़ियों के लिए पदक हों या मेहमानों के लिए आमंत्रण पत्र, सभी ई-वेस्ट से तैयार कराए गए। शुभंकर राज्य पक्षी मोनाल को बनाया गया। नेशनल गेम्स का शुभारंभ देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तो समापन गृहमंत्री अमित शाह के हाथों हुआ।

दिल्ली में चला धामी का जादू

दिल्ली विधानसभा चुनावों के नतीजों के बाद भाजपा कार्यकर्ताओं और राजनीतिक विश्लेषकों के बीच ‘धामी मैजिक’ की जबरदस्त चर्चा रही। कहां गया कि मुख्यमंत्री धामी ने दिल्ली चुनाव में भाजपा की सफलता की नींव रखी और यह साबित कर दिया कि वे सिर्फ उत्तराखण्ड तक सीमित नहीं हैं, बल्कि उनकी रणनीति राष्ट्रीय स्तर पर भी कारगर साबित हो सकती है। दिल्ली चुनाव में धामी का प्रदर्शन भाजपा के लिए बेहद फायदेमंद साबित हुआ। धामी ने दिल्ली में कुल 23 सीटों पर प्रचार किया। जिसमें से 18 पर हुई जीत ने न केवल भाजपा के लिए सफलता सुनिश्चित की बल्कि धामी की नेतृत्व क्षमता और प्रभावशाली प्रचार शैली को भी राष्ट्रीय स्तर पर स्थापित किया। मुख्यमंत्री धामी ने दिल्ली के मतदाताओं के सामने समान नागरिक संहिता (यूसीसी) लागू करने की बात भी जोर-शोर से उठाई थी। निश्चित तौर पर इससे वह राष्ट्रीय राजनीति में एक बड़े चेहरे के रूप में उभरे हैं। उत्तराखण्ड में यूसीसी लागू करने की उनकी प्रतिबद्धता ने पूरे देश में भाजपा की विचारधारा को मजबूती दी।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि धामी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह के भरोसे पर खरा उतरते हुए दिल्ली में भाजपा के अभियान को मजबूती दी। खासकर आम आदमी पार्टी की सरकार पर सीधा हमला बोलते हुए धामी केजरीवाल सरकार की विफलताओं को जनता के सामने उजागर किया। इसका सबसे बड़ा उदाहरण नई दिल्ली सीट है, जहां भाजपा प्रत्याशी प्रवेश साहिब सिंह वर्मा ने खुद मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल को पराजित किया।
उत्तराखण्ड के मुख्यमंत्री के रूप में धामी ने कई सख्त और ऐतिहासिक फैसले लिए हैं, जिससे वे सिर्फ राज्य ही नहीं, बल्कि पूरे देश में चर्चित हो गए हैं। धर्मांतरण विरोधी कानून, नकलरोधी कानून, दंगारोधी कानून और सरकारी भूमि को अतिक्रमण मुक्त कराने जैसे उनके फैसलों की सराहना हर जगह हो रही है। दिल्ली चुनाव में उनके प्रभावी प्रचार अभियान के बाद ये सब बातें मतदाताओं के समक्ष प्रस्तुत की गई। जिसका भाजपा को फायदा मिला।

 

आक्रोश की आग

 

विधानसभा में कैबिनेट मंत्री प्रेमचंद अग्रवाल द्वारा शुरू किए गए ‘देसी-पहाड़ी’ विवाद ने उत्तराखण्ड की राजनीति को गरमा दिया है। दिल्ली से लेकर देहरादून तक और रुद्रपुर से लेकर मुनस्यारी तक हर तरफ इस मुद्दे पर लोगों में अग्रवाल के खिलाफ आक्रोश चरम पर जा पहुंचा है। कही पर प्रेमचंद अग्रवाल का पुतला दहन किया जा रहा है तो कही पर सांकेतिक शव यात्रा निकाली जा रही है। प्रदेश के लगभग हर शहर में धरना-प्रदर्शन हो रहे हैं। जनता अग्रवाल को मंत्री पद से बर्खास्त करने की मांग कर रही है। एक तरफ भाजपा सरकार इसे तूल न देने की अपील कर रही है, वहीं दूसरी ओर राजनीति दल कांग्रेस ने इसे बड़ा मुद्दा बनाया है। विपक्ष सदन में सरकार को घेरने के साथ-साथ सड़कों पर भी आंदोलन कर रहा है। सबकी नजर इस पर लगी हुई है कि आने वाले दिनों में यह मामला किस ओर करवट लेता है? क्या सरकार इस विवाद को शांत करने में सफल होती है या नहीं?

कैबिनेट मिनिस्टर प्रेमचंद अग्रवाल ने जिस तरह विधानसभा पीठ के समक्ष पहाड़ी समुदाय के लिए शब्द का चयन किया वो एक जनप्रतिनिधि को कतई शोभा नहीं देता। मैं सहमत हूं कि उत्तराखण्ड में रहने वाले सभी उत्तराखण्डी है परंतु मूल निवास और मूल निवासी की अवधारणा इससे कहीं ऊपर है। जो सदियों से यहां रहते आए जिन्होंने इन जंगलों को रहने योग्य बनाया उनके अधिकार और सम्मान सर्वोपरि है। कोई 10 या 20 साल से उत्तराखण्ड में रहने वाला उत्तराखण्डी तो हो सकता है लेकिन मूल निवासी नहीं यह बात सबको समझनी चाहिए। एक प्रतिनिधि का स्वभाव शालीन और वाणी मधुर होनी चाहिए। प्रदेश ने विधायकी दी है मंत्रालय मिला है अब वाणी में सयम नहीं तो मुश्किलें आएंगी ही। आज उत्तराखण्ड पहाड़ मैदान में बट रहा है, कुछ लोग इस आड़ में राजनीतिक हवा भी दे रहे हैं। मेरा उनसे भी अनुरोध है कि वो निजी स्वार्थ के लिए उत्तराखण्ड को पहाड़-मैदान में न बाटें क्योंकि किसी एक की गलत बोलने पर पूरे समाज को या समुदाय को कटघरे में नहीं खड़ा किया जा सकता और प्रदेश के मुख्यमंत्री जी भी जनता की भावनाओं को समझते हुए कोई ठोस कदम अवश्य उठाएं।

अनुपम खत्री, प्रदेश महासचिव व मुख्य प्रवक्ता, रालोद

प्रेमचंद अग्रवाल ने जो बोला वह शब्द बहुत गलत थे। उत्तराखण्ड सभी लोगों का है। उन्होंने उत्तराखण्ड विधानसभा में पहाड़ियों को गाली दी जिसकी देशभर में आलोचना हो रही है। उत्तराखण्ड को बनाने में हमारी माता बहनों ने बहुत शहादत दी है। मेरी मम्मी भी एक आंदोलनकारी है उन्होंने भी इस आंदोलन में काफी सक्रिय भूमिका निभाई है। बहुत संघर्ष के बाद हमें यह उत्तराखण्ड राज्य मिला है। जिसकी हमने कल्पना की थी कि वह बहुत ही सुंदर राज्य होगा। लेकिन बाहरी लोग आकर इस शांतिपूर्ण राज्य देवभूमि में अशांति फैला रहे हैं। जैसे उत्तराखण्ड को पाने के लिए जन आंदोलन हुआ था वैसे ही ऐसे नेता को हटाने के लिए भी जन आंदोलन होगा। उत्तराखण्ड में ऐसे नेता को बिल्कुल भी बर्दाश्त नहीं किया जा सकता हैं जो देवभूमि की अस्मिता और संस्कृति के साथ खिलवाड़ कर रहे हैं। सरकार अग्रवाल के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं कर रही है। प्रेमचंद अग्रवाल के खिलाफ कड़ी से कड़ी कार्रवाई होनी चाहिए। उसको उसके पद से बर्खास्त कर देना चाहिए नहीं तो उत्तराखण्ड का वासी जन आंदोलन के लिए भी तैयार है और वह करेगा।

काजल खत्री, कुमाऊं प्रभारी, सशक्त एकता उद्योग व्यापार मंडल

प्रेमचंद अग्रवाल जो की एक संवैधानिक पद पर आसीन है उनके मुंह से इस तरह की भाषा अशोभनीय है। उन्होंने ऐसे शब्द प्रयोग करके हम पहाड़ियों की अस्मिता पर चोट पहुंचाई है। हम पहाड़ी आपको ताज पहना सकते तो उस ताज को उतारने की भी दम रखते हैं। अतः मुख्यमंत्री जी से अनुरोध है कि जन भावना का सम्मान करते हुए एसे अभद्रभाषी मंत्री को तत्काल प्रभाव से मंत्रीपद से निलम्बित करने का कष्ट करे।

हेमा परगाई, उपाध्यक्ष, रोशनी सोसायटी, हल्द्वानी

 

विधानसभा में संसदीय कार्य मंत्री द्वारा असंसदीय शब्द का प्रयोग कैबिनेट मंत्री और विधानसभा की मर्यादा के अनुरूप नहीं है। किसी भी गरिमापूर्ण और संवैधानिक पद पर आसीन व्यक्ति को क्षेत्रवाद जैसी संकीर्ण भावना से ऊपर उठ कर आचरण करना चाहिए।

मालती हलधर, सामाजिक कार्यकर्ता एवं उत्तराखण्ड की यूनाइटेड नेशन की एडवाइजरी कमेटी सदस्य

देश 21 वीं सदी के विकास की बात कर रहा है। ‘बेटी बचाओ – बेटी पढ़ाओ’ के नारे से दीवारें सजी है। पर क्या वाकई ये तस्वीर सच्ची है? आज भी महिलाएं नुमाइश और गालियों तक सीमित है। जब समाज के प्रतिनिधि ही अपनी जबान पर काबू नहीं रख सकते तो आम आदमी तो छोड़ ही दीजिए। कहते हैं आदमी अपनी जबान से सबको अपना बनाता है और यही जबान से इतिहास बदलता है। आज टीवी के सीरियल से लेकर फिल्म के डायलाॅग्स और नेताओं की जबान तक में गालियां बैठी हुई है। जो महिलाओं के प्रति उनके नजरिए को दिखाती है। बात सिर्फ गाली की नहीं, बल्कि आपकी सोच और भविष्य में आपके विकास के नजरिए को भी उजागर है। महिलाएं आज भी अपने आत्मसम्मान और इज्जत के लिए दहलीज के पिछले पायदान पर है जहां देखने और दिखाने को तो वो मर्दों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर हर क्षेत्र में उनको सहयोग देती है, पर गालियां आज भी उन्हीं के नाम पर लोगों के तकिया कलाम में शामिल है।

विभु कृष्ण, सचिव, दर्पण समिति, अल्मोड़ा

जो लोग पहाड़ की मिट्टी में जन्मे, संघर्षों से तपे और अपनी मेहनत से इतिहास रचते हैं, उन्हें अपमानित करने वाले यह भूल जाते हैं कि जिस धरती पर वे खड़े हैं, वह भी कभी किसी पहाड़ी की ही देन रही होगी। पहाड़ों की ऊंचाई सिर्फ भौगोलिक नहीं होती, यह संस्कारों, वीरता और आत्मसम्मान की भी होती है और इसे कोई घटिया सोच का व्यक्ति अपने शब्दों से कभी गिरा नहीं सकता। जो सत्ता के शिखर पर बैठकर पहाड़ को नीचा दिखाना चाहता है, वह भूल जाता है कि शिखर की ऊंचाई भी उसी पहाड़ की देन होती है। पहाड़ की सहनशीलता को उसकी कमजोरी मत समझो, यहां की चट्टानें इतिहास लिखती हैं और समय आने पर इतिहास बदल भी देती हैं।

श्रुति तिवारी, चीफ रिपोर्टर, पब्लिक टीवी चैनल

सार्वजनिक जीवन में जो कोई भी व्यक्ति होता है उसको अपनी भाषा और आचरण पर विशेष ध्यान और नियंत्रण रखना होता है क्योंकि उस व्यक्ति से समाज के कई वर्ग कई लोग प्रेरणा भी लेते हैं। उनके आचरण और भाषा को अपने निजी जीवन में अनुकंपित करने का प्रयास करते हैं इसलिए सामाजिक व्यक्ति का समाज के प्रति एक उचित आचरण और एक उचित भाषा का प्रयोग उसका उत्तरदायित्व है। जिस तरह से अगर कोई व्यक्ति मंदिर के अंदर या मस्जिद के अंदर या गिरजाघर अथवा गुरुद्वारे के अंदर अगर अभद्र भाषा का प्रयोग करेगा, गाली-गलौज करेगा तो उसको जो दंड मिलना चाहिए, वही दंड प्रेमचंद अग्रवाल को भी मिलना चाहिए क्योंकि उन्होंने भी लोकतंत्र के मंदिर में बेहद अभद्र भाषा का प्रयोग किया है अतः वह दंड के पात्र हैं। प्रेमचंद अग्रवाल को तत्काल प्रभाव से बगैर शर्त विधानसभा से निलम्बित किया जाना चाहिए और साथ ही क्योंकि स्पीकर की जिम्मेदारी होती है विधानसभा की कार्रवाई में अनुशासन बनाए रखना जिसमें की ऋतु खण्डूड़ी पूरी तरीके से असफल साबित हुई है, की भूमिका की भी समीक्षा की जाए।

स्वाति नेगी, यू ट्यूबर एवं सोशल एक्टिविस्ट

प्रेमचंद अग्रवाल का जो बयान विधानसभा में विवादित हुआ वो अपने आप में तो विवादित है ही लेकिन इसका विवाद इसलिए भी बड़ा हो गया चूंकि उसका एक सम्बंध पहाड़ी अस्मिता से भी है। पहाड़ी अस्मिता पर लम्बे समय से कई तरह के प्रहार हुए और कई बार तो सीधे-सीधे पहाड़ को या पहाड़ियों को लेकर अपशाब्द कह गए। भाजपा के ही एक अन्य पूर्व विधायक कुंवर प्रणव चैम्पियन ने बहुत अश्लील बातें उत्तराखण्ड के बारे में की थी फिर भी पार्टी ने उन्हें वापस ले लिया और उनकी पत्नी को विधानसभा का टिकट तक दे दिया। इस तरह के कई इंसीडेंस पर चिंगारी का काम इस बार प्रेमचंद अग्रवाल के बयान ने किया है। इस बयान के खिलाफ पूरे प्रदेश में जो आक्रोश देखा जा रहा है वो सिर्फ एक आईसोलेटेड बयान का विरोध नहीं है। वो विरोध इसलिए भी बड़ा है क्योंकि इस तरह की कई घटनाएं लम्बे समय से देखी जा रही है। पहाड़ी अस्मिता पर लगातार कई तरह के सवाल है और विशेष तौर से प्रेमचंद अग्रवाल भी पिछले काफी समय से विवादों में रहे हैं चाहे वो अपने बेटे को नौकरी देने का मामला हो चाहे उनके बेटे द्वारा अपने रिसाॅर्ट के लिए पेड़ काटे जाने वाला मामला रहा हो, चाहे उन्हें सड़क पर एक पहाड़ी मूल के व्यक्ति पर हाथापाई करते हुए देखा गया हो। इन सभी के आलोक में इस बयान ने ट्रिगर का काम किया है। इसलिए स्वतः स्फूर्त, पहाड़ में आक्रोश है। उस बयान का आइसोलेशन में नहीं देखा जा सकता। उस बयान के सम्बंध में ये जो सारी चीजें एड आॅन हो रही है उसने इसको ज्याादा स्पार्कल किया है।

राहुल कोटियाल, सम्पादक, बारामासा यू ट्यूब चैनल

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