हमारे मुल्क में पिछले एक दशक में प्रेस स्वतंत्रता के हालात लगातार गिर रहे हैं। देश के मीडिया पर राजनीतिक और कॉरपोरेट दबाव, पुलिस और एजेंसियों द्वारा पत्रकारों पर मुकदमे, फर्जी यूएपीए तथा देशद्रोह के मामलों का दायरा, स्वतंत्र डिजिटल मीडिया को आर्थिक और कानूनी हमलों का सामना करना इत्यादि अब किसी अपवाद की तरह नहीं बल्कि एक सामान्य घटनाक्रम बन चुका है। ‘रिपोट्र्स विदाउट बाॅर्डर्स’ का नवीनतम विश्व प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक बताता है कि भारत 180 देशों की सूची में 151वें स्थान पर है। यह स्थिति न केवल एशिया प्रशांत क्षेत्र में भारत को सबसे नीचे धकेलती है बल्कि यह भी दिखाती है कि दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र का
चैथा स्तम्भ कितने दबाव में काम कर रहा है।
‘रिपोर्टर्स विदाउट बाॅर्डर्स’, जिसे फ्रेंच में ‘रिपोर्टर्स सैन्स फ्रंटियर्स (आरएसएफ)’ कहा जाता है, दुनिया का सबसे प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय संगठन है जो प्रेस स्वतंत्रता की मॉनिटरिंग करता है। 1985 में स्थापित हुआ यह संगठन 130 से अधिक देशों के पत्रकारों, रिपोर्टरों, मीडिया कार्यकर्ताओं की स्वतंत्रता और सुरक्षा पर नजर रखता है। पत्रकारों पर हमले, मीडिया संस्थानों पर प्रतिबंध, इंटरनेट ब्लैकआउट, सेंसरशिप, डिजिटल निगरानी, सरकार या कॉरपोरेट द्वारा दबाव आरएसएफ इन सभी मुद्दों को विस्तार से डॉक्यूमेंट करता है और हर साल विश्व प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक (डब्ल्यूपीएफआई) जारी करता है। यही वह संस्था है जो समय-समय पर ‘प्रेस फ्रीडम प्रीडेटर्स’ यानी प्रेस की आजादी को संगठित रूप से नुकसान पहुंचाने वाले व्यक्तियों, संस्थाओं, सरकारों और कम्पनियों की सूची भी प्रकाशित करती है। इस संस्था का आधार बहुत विस्तृत अंतरराष्ट्रीय डाटा, पत्रकार संघों की रिपोर्ट, जमीनी खतरे, कानूनी ढांचा, मीडिया पर राज्य और कॉरपोरेट नियंत्रण और डिजिटल दमन के ट्रेंड पर आधारित होता है। दुनिया भर की संसदें, मानवाधिकार संगठन, विश्वविद्यालय, संयुक्त राष्ट्र एजेंसियां और अदालतें ‘रिपोर्टर्स विदाउट बाॅर्डर्स’ की रिपोर्टों को संदर्भ के रूप में उपयोग करती हैं।
मोदी सरकार के आलोचकों का मानना है कि भारत में सेंसरशिप अब केवल सरकारी प्रतिबंध या सूचना रोकने का नाम नहीं रह गई है। सेंसरशिप अब एक बड़ा, संगठित और बहुस्तरीय ढांचा बन चुका है। कानूनी मुकदमों का इस्तेमाल, आर्थिक दबाव, विज्ञापनों की रोक, डिजिटल ट्रोलिंग, मीडिया संस्थानों की खरीद-फरोख्त, आलोचनात्मक पत्रकारों की ऑनलाइन निगरानी, फर्जी नैरेटिव बनाकर उनको देशद्रोही या ‘एंटी-नेशनल’ साबित करना, सेंसरशिप के आधुनिक रूप हैं। इसका सबसे बड़ा असर यह है कि कई पत्रकार आत्म-सेंसरशिप की ओर धकेल दिए जाते हैं क्योंकि हर आलोचना पर मुकदमे या ट्रोलिंग का खतरा रहता है। मीडिया संस्थानों का काॅरपोरेट अधिग्रहण भी भारत में सेंसरशिप का अहम हथियार बन चुका है, जहां बड़े पैमाने पर काॅरपोरेट समूह टीवी चैनलों और डिजिटल मीडिया पर नियंत्रण स्थापित कर रहे हैं, जिससे सम्पादकीय स्वतंत्रता गहरी चोट खा रही है।
इसी पृष्ठभूमि में ‘रिपोर्टर्स विदाउट बाॅर्डर्स’ ने 1 दिसम्बर 2025 को अपनी ताजा ‘प्रेस फ्रीडम प्रीडेटर्स’ सूची जारी की, जिसमें दुनिया के कई सत्तावादी नेताओं और शक्तिशाली संस्थाओं के साथ भारत की दो संस्थाएं, ‘अडानी समूह’ और ‘ऑपइंडिया’ को शामिल किया गया है। इस सूची में चीन की कम्युनिस्ट पार्टी, रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन, सऊदी अरब के युवराज मोहम्मद बिन सलमान, बेलारूस के राष्ट्रपति लुकाशेंको, म्यांमार की मिलिट्री, इजरायल की सेना (जिस पर 220 से अधिक पत्रकारों की मौत के आरोप हैं) और अरबपति एलन मस्क जैसे नाम भी शामिल हैं। इन सभी को इस रिपोर्ट ने ऐसे संस्थान बताया है जो सूचना पर नियंत्रण, पत्रकारों के दमन, सेंसरशिप, प्रोपेगेंडा और डिजिटल उत्पीड़न के जरिए लोकतांत्रिक ढांचे को कमजोर करते हैं।
रिपोर्ट ने अडानी समूह को ‘प्रेस स्वतंत्रता का शिकारी’ बताने के पीछे कई ठोस तथ्य दिए हैं। संगठन के अनुसार भारत के सबसे शक्तिशाली काॅरपोरेट समूहों में शामिल अडानी समूह ने पिछले वर्षों में पत्रकारों और मीडिया संस्थानों को चुप कराने का संगठित अभियान चलाया है। रिपोर्ट के मुताबिक 2017 से अब तक अडानी समूह ने कम से कम 15 से अधिक पत्रकारों और मीडिया संस्थानों के खिलाफ 10 बड़े केस दर्ज किए जिनमें सिविल और क्रिमिनल मानहानि, कंटेंट हटाने के आदेश, भारी आर्थिक हर्जाने की मांग और गैग-सूट शामिल हैं। रिपोर्ट के मुताबिक वर्ष 2025 में अडानी समूह की ‘हिटलिस्ट’ में आठ पत्रकार और तीन बड़े मीडिया संस्थान शामिल थे जिन पर दो मुकदमे ऐसे लगे जिनकी सुनवाई में अदालत ने अडानी समूह को यह अधिकार दे दिया कि वह स्वयं निर्णय ले सकता है कि कौन-सी सामग्री ‘मानहानिकारक’ है। यह व्यवस्था लोकतांत्रिक सिद्धांतों के विरुद्ध और सेंसरशिप को संस्थागत रूप देने वाली मानी गई।
रिपोर्ट में यह भी दर्ज है कि अदालतों द्वारा दिए गए इन फैसलों में तीसरे पक्षों तक सेंसरशिप का दायरा फैल गया। इसका नतीजा यह निकला कि ‘द वायर’, ‘न्यूजलाॅन्ड्री’, ‘एच डब्ल्यू न्यूज’ और स्वतंत्र पत्रकार रवीश कुमार जैसे नामों को अपने कंटेंट हटाने पड़े भले ही वह सामग्री तथ्यों पर आधारित थी। रिपोर्ट ने इसे ‘असीमित सेंसरशिप की सम्भावना’ वाला आदेश बताया। संगठन का कहना है कि गैग-सूट अडानी समूह का ‘सबसे खतरनाक हथियार’ बन चुका है क्योंकि इससे पत्रकारिता को कानूनी लड़ाई में उलझाकर उसके आर्थिक और संस्थागत ढांचे को कमजोर किया जाता है।
इसी सूची में शामिल दूसरी भारतीय संस्था है ‘ऑपइंडिया’। ‘रिपोर्टर्स विदाउट बाॅर्डर्स’ के अनुसार यह ‘काॅन्सपिरेसी थ्योरी’ फैलाने वाली संस्था है जो भारत में प्रेस स्वतंत्रता पर डिजिटल हमलों का सबसे ताजा और खतरनाक उदाहरण है। संगठन के अनुसार ‘ऑपइंडिया’ लगातार उन पत्रकारों और मीडिया संस्थानों पर हमले करता है जो सत्ता की आलोचना करते हैं। यह वेबसाइट स्वयं को ‘लिबरल मीडिया कार्टेल के खिलाफ लड़ाई’ का हिस्सा बताती है और ट्रोल नेटवर्क की मदद से ऐसा डिजिटल माहौल बनाती है जिसमें आलोचनात्मक पत्रकारों को ‘एंटी-इंडियन’, ‘सोरोस गैंग’, ‘नैरेटिव वाॅरियर्स’ या ‘शहरी नक्सल’ कहा जाता है। रिपोर्ट कहती है कि 2025 में ‘ऑपइंडिया’ द्वारा प्रकाशित 96 लेख ऐसे थे जिनका उद्देश्य सीधे पत्रकारों और मीडिया संस्थानों को निशाना बनाना था। इनमें एक 200 पन्नों की तथाकथित ‘रिपोर्ट’ भी थी जो एक तरह की काॅन्सपिरेसी थ्योरी पर आधारित थी और जिसमें आरोप लगाया गया था कि भारतीय पत्रकारों का एक नेटवर्क ‘मोदी सरकार के खिलाफ नैरेटिव वाॅर’ चला रहा है और ‘भारत में सत्ता परिवर्तन की अंतरराष्ट्रीय साजिश’ का हिस्सा है। रिपोर्ट कहती है कि ‘ऑपइंडिया’ के लेख सामने आते ही सम्बंधित पत्रकारों के खिलाफ ऑनलाइन ट्रोलिंग, उत्पीड़न और बदनाम करने का अभियान शुरू होता है, जिससे न केवल उनकी व्यक्तिगत सुरक्षा पर खतरा बढ़ता है बल्कि पत्रकारिता का माहौल और भी खतरनाक हो जाता है। यह डिजिटल हिंसा मीडिया को चुप कराने का तेज और प्रभावी हथियार बन चुका है।
‘ऑपइंडिया’ पर लगातार यह आरोप लगता रहा है कि इसकी रिपोर्टिंग वैचारिक रूप से झुकी हुई है और इसमें विशेष राजनीतिक धारा के अनुरूप नैरेटिव को बढ़ावा देने की प्रवृत्ति दिखती है। वेबसाइट कई बार उन पत्रकारों, एक्टिविस्टों और मीडिया संस्थानों पर आक्रामक ढंग से लिखती है जो सरकार या दक्षिणपंथी राजनीति की आलोचना करते हैं। इसका परिणाम यह हुआ कि समय के साथ इसकी छवि एक स्वतंत्र समाचार मंच के बजाय एक ऐसे प्लेटफाॅर्म की बनी, जहां पत्रकारों को बदनाम करने, विशिष्ट समुदायों के खिलाफ नकारात्मक भावनाएं उभारने और डिजिटल ट्रोल नेटवर्क के साथ मिलकर समन्वित हमले करने की कई घटनाएं सामने आईं। कई स्वतंत्र फैक्ट चेक संगठनों ने इसकी रिपोर्टों की जांच में पाया कि उनमें पूर्वाग्रह, गलत व्याख्याएं और कई बार तथ्यों से अलग दावे शामिल थे। इसी वजह से 2019 में जब ‘ऑनपइंडिया’ ने इंटरनेशनल फैक्ट-चेकिंग नेटवर्क (आईएफसीएन) से प्रमाणन पाने का प्रयास किया तो इसे यह कहकर खारिज कर दिया गया कि इसकी पारदर्शिता और सम्पादकीय स्वतंत्रता संदिग्ध है और इसकी सामग्री राजनीतिक रूप से अत्यधिक पक्षपातपूर्ण पाई गई। इस संस्था से जुड़ी नूपुर जे. शर्मा का नाम कई बड़े विवादों से जुड़ा रहा है और इन्हीं विवादों ने उन्हें भारतीय डिजिटल मीडिया परिदृश्य में एक अत्यंत विवादित व्यक्तित्व बना दिया। सबसे बड़ी घटना 2022 की टीवी बहस के दौरान हुई, जब उन्होंने पैगम्बर मोहम्मद के प्रति टिप्पणी की और यह विवाद देखते ही देखते अंतरराष्ट्रीय स्तर तक फैल गया। उनकी टिप्पणी पर न केवल भारत में विरोध-प्रदर्शन हुए बल्कि खाड़ी देशों सहित कई मुस्लिम देशों ने आधिकारिक रूप से भारत से विरोध जताया। इस घटना ने भारत की विदेश नीति और कूटनीति पर सीधा दबाव डाला और परिणामस्वरूप भाजपा ने नूपुर शर्मा को पार्टी से निलम्बित कर दिया। यह प्रकरण आज भी उनकी पहचान के सबसे विवादित हिस्सों में से एक है। इसके बाद भी विवादों का सिलसिला रूका नहीं। 2023 में तमिलनाडु में हिंदी भाषी मजदूरों पर कथित हमले से जुड़ी कई भ्रामक खबरें फैलने लगीं। इन्हीं में से एक प्रमुख स्रोत ‘ऑनपइंडिया’ था, जिसकी सम्पादकीय जिम्मेदारी नूपुर जे. शर्मा के पास थी। बाद में तमिलनाडु पुलिस ने जांच में पाया कि हिंसा की घटनाओं पर आधारित खबरें झूठी और दुष्प्रचार थीं। इसके बाद इनके खिलाफ एफआईआर दर्ज की गई।
पिछले एक दशक में पत्रकारों और आरटीआई कार्यकर्ताओं पर हमलों की संख्या लगातार बढ़ी है। गौरी लंकेश, कश्मीर के पत्रकार शुजात बुखारी, बिहार के कमलेश सिंह, झारखंड के चंदन तिवारी, उत्तर प्रदेश के विक्रम जोशी, असम के पराग भुइयां और मध्य भारत के कई ग्रामीण रिपोर्टर अपनी रिपोर्टिंग की वजह से मारे गए या संदिग्ध परिस्थितियों में मृत पाए गए। खनन, भूमि विवाद, अवैध शराब, पंचायत स्तर के भ्रष्टाचार और पुलिस-प्रशासन पर सवाल उठाने वाले पत्रकार सबसे बड़े निशाने पर रहे हैं। इसी तरह आरटीआई कार्यकर्ताओं पर हिंसा भारत में एक अलग संकट बन चुकी है। सतीश शेट्टी, नरेश कुमार, भूपेंद्र सिंह, अमरनाथ मिश्रा, विश्वजीत सिंह जैसे कई नाम उन कार्यकर्ताओं के हैं जिन्हें भ्रष्टाचार उजागर करने की कीमत अपनी जान देकर चुकानी पड़ी। विभिन्न रिपोर्टों में दर्ज है कि 2005 से अब तक लगभग सौ से अधिक आरटीआई कार्यकर्ताओं की हत्या, मौत या गुमशुदगी के मामले सामने आ चुके हैं जबकि अधिकांश मामलों में न्याय प्रक्रिया आज भी लम्बित है। यह स्थिति बताती है कि भारत में सूचना मांगना और सत्ता के दुरुपयोग पर रिपोर्टिंग करना कई बार जान का जोखिम उठाकर किया जाने वाला काम बन गया है।
‘रिपोर्टर्स विदाउट बाॅर्डर्स’ की 2025 की सूची का संदेश स्पष्ट है कि भारत में प्रेस स्वतंत्रता अब केवल खतरे में नहीं है बल्कि उन शक्तिशाली संरचनाओं के बीच फंस चुकी है जो पत्रकारिता के दायरे, स्वर और स्वतंत्रता को सीमित करना चाहती हैं। इस सूची में ‘अडानी समूह’ और ‘ऑपइंडिया’ का शामिल होना अंतरराष्ट्रीय स्तर पर यह रेखांकित करता है कि भारत में नियंत्रण, दमन, नफरत अभियान और कानूनी हथियारों का इस्तेमाल केवल राजनीतिक ही नहीं बल्कि कॉरपोरेट और डिजिटल स्तर पर भी एक संगठित रणनीति बन चुका है।
लोकतंत्र में पत्रकारिता सिर्फ एक पेशा नहीं बल्कि सत्ता और जनता के बीच संवाद का सेतु है। यदि इस सेतु को कमजोर किया जाता है, उसे डराया जाता है या उसकी आवाज को खत्म किया जाता है तो अंततः नुकसान पूरे लोकतंत्र को होता है। यह रिपोर्ट भारत के लिए एक चेतावनी है कि यदि स्वतंत्र मीडिया की रक्षा नहीं की गई, यदि पत्रकारों की आवाज सुरक्षित नहीं रही, यदि कानूनी और डिजिटल दमन को रोका नहीं गया तो दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र अपने ही भीतर से खोखला हो जाएगा। आधुनिक लोकतंत्रों में प्रेस की स्वतंत्रता वह आखिरी दीवार होती है जो सत्ता की मनमानी को रोकती है, जब वह गिरती है तो बाकी सभी दीवारें आसानी से ढह जाती हैं।
