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नीतीश का अवसानकाल समाजवाद से भगवा तक

नीतीश का अवसानकाल समाजवाद से भगवा तक
भारतीय राजनीति में शायद ही कोई ऐसा नेता रहा हो जिसने विचारधारा की इतनी परतें उतारी और इतनी सहजता से पहनी हों, जितनी बार बिहार के मुख्यमंत्री नीतिश कुमार ने। लोकनायक जयप्रकाश नारायण के विचारों से प्रेरित हो उनके अनुयायी बने नीतीश ने सुशासन बाबू के रूप में प्रशंसा पाई और फिर समाजवादी चोला त्याग भगवा राजनीति की गोद में जा बैठे। अब जब इंडिया गठबंधन ने तेजस्वी यादव को मुख्यमंत्री पद का चेहरा घोषित कर दिया है और एनडीए ने अब तक नीतिश को अपने आधिकारिक उम्मीदवार के रूप में पेश नहीं किया है तो राजनीतिक गलियारों में यह सवाल गूंज रहा है कि क्या यह नीतीश के अवसान काल की शुरुआत है? निश्चित तौर पर तेजस्वी यादव को मुख्यमंत्री चेहरा घोषित किए जाने के बाद अब दबाव एनडीए पर है कि वह अपना चेहरा स्पष्ट करे। लेकिन भाजपा नेतृत्व अभी तक नीतिश कुमार का नाम सार्वजनिक रूप से नहीं ले रहा। कहा जा रहा है कि भाजपा के शीर्ष स्तर पर यह राय बन चुकी है कि अब नीतीश को केवल ‘ट्रांजिशनल’ चेहरा बनाया जाए यानी चुनाव तक के लिए सहारा, उसके बाद नया चेहरा। यानी वही नेता जो कभी बिहार में एनडीए के लिए सबसे जरूरी था अब ‘बोझ’ बन चुका है। यह राजनीति के उस चक्र का प्रतीक है जहां सत्ता में बने रहने की निरंतर लालसा, अंततः अपमान और उपेक्षा लेकर आती है

नीतीश कुमार जो कभी जयप्रकाश आंदोलन के आदर्शों के प्रतीक माने जाते थे आज सत्ता में हर कीमत बने रहने की लालसा चलते पूरी तरह भगवामय हो चुके हैं। यह बदलाव एक धर्मनिरपेक्ष और समाजवादी व्यक्ति की विचारधारात्मक यात्रा का अंत है जहां समाजवाद के बीज से उपजे एक नेता ने धीरे-धीरे भगवा राजनीति के रंग में खुद को रंग लिया।

1970 के दशक में जब जयप्रकाश नारायण ने ‘सम्पूर्ण क्रांति’ का नारा दिया तब नीतीश कुमार उन छात्रों में शामिल थे जो भ्रष्टाचार और सत्तावाद के खिलाफ सड़कों पर उतरे। समाजवाद, नैतिकता और समानता यही उनके जीवन के तीन सूत्र बने। उसी दौर में लालू प्रसाद यादव, सुशील मोदी और रविशंकर प्रसाद जैसे कई नाम भी राजनीति में आए। जेपी आंदोलन ने नीतीश को दिशा दी लेकिन आने वाले दशकों में सत्ता लोलुपता ने उन्हें दिशा बदलने पर मजबूर किया। कर्पूरी ठाकुर और लोहिया के विचारों से प्रेरित वह समाजवादी नेता धीरे-धीरे सत्ता की मशीनरी का हिस्सा बनता चला गया।
 
पहली सरकार और समझौते की शुरुआत

साल 2000 में जब नीतीश कुमार ने पहली बार मुख्यमंत्री पद की शपथ ली तो वह बिहार के इतिहास में एक बड़ा क्षण था। लालू यादव के लम्बे शासन के बाद जनता ने उन्हें एक विकल्प के रूप में देखा। यह सरकार बहुमत न होने के चलते मात्र सात दिन में गिर गई थी। उसी समय यह भी स्पष्ट हो गया कि नीतीश सत्ता के लिए हर गठजोड़ स्वीकारने को तैयार हैं। बहुमत न होने के बावजूद उन्होंने भाजपा के साथ मिलकर सरकार बनाई और कई ऐसे विधायकों का समर्थन स्वीकार किया जिन पर आपराधिक आरोप थे। यह उनकी राजनीति में ‘नैतिक समझौते’ का पहला सबूत था। मुख्यमंत्री पद का स्वाद चखने के बाद उन्होंने तय कर लिया कि किसी भी कीमत पर राजनीति के केंद्र में बने रहना है।
 
‘सुशासन बाबू’ और सत्ता का शिखर
 
2005 में जब बिहार में एनडीए सत्ता में लौटा तो नीतीश ने खुद को विकास पुरुष और बेहतर प्रशासक के प्रतीक के रूप में स्थापित किया। सड़कों का निर्माण, बिजली, शिक्षा और लड़कियों की साइकिल योजना, इन सबने उन्हें ‘सुशासन बाबू’ बना दिया। उनके नेतृत्व में बिहार ने कानून-व्यवस्था में सुधार देखा और जनता को लगा कि एक नई राजनीति सम्भव है। मगर इसी दौर में नीतीश की एक और पहचान उभरने लगी, सत्ता-संतुलन के माहिर खिलाड़ी की।
 
विचारधारा से दूरी और गठबंधन की राजनीति

नीतीश कुमार का राजनीतिक ग्राफ जितनी तेजी से बढ़ा उतनी ही तेजी से उनकी वैचारिक प्रतिबद्धता कमजोर पड़ी। 2013 में नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार बनने के बाद उन्होंने भाजपा से सम्बंध तोड़ दिए। तब उन्होंने कहा था, ‘‘हम साम्प्रदायिकता के साथ नहीं चल सकते।’’ दो साल बाद 2015 में वे लालू यादव और कांग्रेस के साथ हाथ मिलाकर लौटे और भारी बहुमत से सत्ता में आए। फिर 2017 में उन्होंने यकायक पलटी मार डाली। इस बार भ्रष्टाचार के नाम पर महागठबंधन तोड़ा और फिर भाजपा के साथ चले गए। यहां से नीतिश की राजनीति का असली चेहरा स्पष्ट हो गया कि विचार नहीं, सत्ता ही लक्ष्य है। उन्होंने खुद कहा था, ‘‘मैं राजनीति में स्थायित्व चाहता हूं।’’ मगर यह स्थायित्व विचारों का नहीं, कुर्सी का था।
 
अपराधी राजनीति और वैचारिक गिरावट

2005 में ‘जंगलराज खत्म करने’ का दावा करने वाले नीतीश के शासन में अपराधी तत्वों की मौजूदगी बनी रही। कई ऐसे विधायक और सहयोगी सत्ता में आए जिन पर गम्भीर आरोप थे। जेडीयू ने ऐसे चेहरों को टिकट दिए, और नीतीश ने कभी खुलकर विरोध नहीं किया। यह वही दौर था जब जनता को महसूस हुआ कि ‘सुशासन’ की जगह ‘सत्ता-सुरक्षा’ नीतीश की प्राथमिकता बन चुकी है। उनके करीबी नेताओं का तर्क था कि ‘राजनीति में व्यवहारिकता जरूरी है,’ मगर यही व्यवहारिकता उनके विचारों की मौत साबित हुई।
 
हर कीमत पर सत्ता में बने रहने की कला

नीतीश कुमार की राजनीति का सबसे स्थायी सिद्धांत रहा है ‘सत्ता से दूरी नहीं।’ भले ही इसके लिए उन्हें बार-बार गठबंधन बदलने पड़े, मगर उन्होंने कभी विपक्ष की कुर्सी को अपने लिए स्वीकार नहीं किया। वे भाजपा से अलग हुए, फिर लालू के साथ आए, फिर भाजपा के साथ लौटे। 2022 में इंडिया गठबंधन में शामिल हुए, और 2024 में एक बार फिर भाजपा की गोद में लौट आए। उनके इस निरंतर पाला-बदल ने जनता में यह विश्वास खत्म कर दिया कि वे किसी विचार के प्रति ईमानदार हैं। उनकी पार्टी जेडीयू का आकार सिकुड़ा और सहयोगी दलों में उनके प्रति असहजता बढ़ने लगी। आज भाजपा नीतिश कुमार को ‘सहयोगी’ मानती जरूर है, पर ‘नेता’ नहीं। एनडीए ने अब तक उन्हें मुख्यमंत्री चेहरा घोषित नहीं किया है। अंदरखाने यह चर्चा है कि भाजपा अब बिहार में नया चेहरा तलाश रही है। परंतु इस समीकरण की एक जटिलता है केंद्र की सरकार जनता दल (यू) पर लम्बे समय से निर्भर रही है। भले ही आने वाले चुनाव में नतीजे एनडीए के पक्ष में जाएं, नीतीश को हटाना भाजपा के लिए आसान नहीं होगा। यह तभी सम्मव होगा जब भाजपा जनता दल (यू) में तोड़-फोड़ कर अपनी नई बहुमत रचना करे। यह वही बिंदु है जहां नीतीश की ‘कमजोरी’ ही उनकी ‘मजबूती’ बन जाती है, भाजपा के लिए उन्हें हटाना राजनीतिक रूप से जोखिम भरा है और बनाए रखना प्रशासनिक दृष्टि से भारी।
 
नैतिक पतन की पराकाष्ठा

बहरहाल नीतीश कुमार की यात्रा समाजवाद से भगवा तक की ऐसी यात्रा है जो सत्ता लोलुपता की पराकाष्ठा कही जा सकती है। कभी जो नेता संघ और भाजपा की विचारधारा का विरोध करता था, आज वही उनके साथ मंच साझा करता है। कभी जो कहता था कि ‘‘हम साम्प्रदायिकता से नहीं समझौता करेंगे’’, वही अब भाजपा के सबसे पुराने सहयोगियों में एक है।

यह सिर्फ एक व्यक्ति का परिवर्तन नहीं, बल्कि भारतीय राजनीति की प्रवृत्ति का आईना भी है जहां विचारधारा धीरे-धीरे सत्ता के आगे झुक जाती है। बिहार में नीतीश अब निर्णायक नहीं, बल्कि समीकरण का हिस्सा मात्र हैं। उनकी विश्वसनीयता घट चुकी है, जेडीयू कमजोर है और भाजपा उन्हें सहन कर रही है क्योंकि वह फिलहाल अपरिहार्य हैं। विपक्ष उन्हें भरोसेमंद नहीं मानता, और एनडीए उन्हें स्थायी नहीं देखता। यह वही स्थिति है जिसे राजनीति में ‘अवसान काल’ कहा जाता है। जब व्यक्ति सत्ता में तो है, पर नियंत्रण उसके हाथ में नहीं। नीतीश कुमार का राजनीतिक सफर यह दिखाता है कि विचारधारा के बिना सत्ता कितनी खोखली होती है। उन्होंने बिहार को प्रशासनिक सुधार दिए लेकिन वैचारिक दिशा खो दी। वह समाजवादी आंदोलन की उपज थे पर अब उसी आंदोलन की विरासत के विपरीत खड़े हैं। बिहार की राजनीति में आज जो नारा गूंजता है, वह उनकी दशकों की यात्रा का सार है कि ‘नीतीश कुमार अब किसी दल के नहीं, बल्कि परिस्थितियों के मुख्यमंत्री हैं’ और जब परिस्थितियां बदलती हैं तो इतिहास नए नायक गढ़ लेता है।

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