प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लगभग हर बड़े भाषण में प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और नेहरू- गांधी परिवार का जिक्र एक स्थायी राजनीतिक हथियार बन चुका है। कभी कश्मीर की ‘ऐतिहासिक भूल’, कभी वंदे मातरम् के ‘टुकड़े’, कभी संविधान से ‘खिलवाड़’ और कभी ‘परिवारवाद’ के आरोप के जरिए नेहरू-गांधी परिवार पर सीधा निशाना साधा जाता है। गत् सप्ताह लोकसभा में वंदे मातरम् पर हुई बहस के दौरान प्रियंका गांधी का यह तंज कि ‘नेहरू पर एक पूरा सत्र ही रख लीजिए, सारी शिकायतें एक बार में गिना दीजिए ताकि फिर देश के असली मुद्दों पर बात हो सके’, ने पूरे मामले को सत्ता बनाम इतिहास की सबसे तीखी राजनीतिक बहस बनाने का काम कर दिखाया है
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 2014 में केंद्र की सत्ता आसीन हुए और तभी से भारतीय राजनीति के केंद्र में एक स्थायी बहस जड़ पकड़ चुकी है, देश की मौजूदा समस्याओं की मूल वजह क्या है और उसकी ऐतिहासिक जिम्मेदारी किस पर जाती है। मोदी के भाषणों में यह उत्तर लगभग तय रहता है, ‘पिछले 70 साल’ और खास तौर पर पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू का दौर। संसद हो या सार्वजनिक मंच, राष्ट्रीय पर्व हों या चुनावी सभाएं, मोदी की राजनीतिक भाषा में नेहरू और नेहरू-गांधी परिवार बार-बार लौटकर आते हैं। यह केवल एक-दो उदाहरणों का नहीं बल्कि एक स्थाई राजनीतिक नैरेटिव बन चुका है।
मोदी बार-बार यह तर्क देते हैं कि देश को जिन गम्भीर समस्याओं का सामना आज करना पड़ रहा है, चाहे वह कश्मीर हो, चीन से सीमा विवाद हो, आर्थिक असंतुलन हो, संस्थाओं में गिरता विश्वास हो या विदेशी नीति के जटिल समीकरण, उन सबकी नींव आजादी के बाद के शुरुआती वर्षों में रखी गई थी और उन शुरुआती वर्षों का चेहरा, राजनीति में, जवाहरलाल नेहरू थे। यही कारण है कि उनका नाम मोदी के भाषणों में केवल एक ऐतिहासिक व्यक्तित्व के रूप में नहीं बल्कि एक ऐसे राजनीतिक प्रतीक के रूप में उपस्थित रहता है जिस पर मौजूदा संकटों की नैतिक जिम्मेदारी डाली जा सके।
फरवरी 2023 में राज्यसभा में राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव का जवाब देते हुए प्रधानमंत्री मोदी ने नेहरू-गांधी परिवार पर जो सीधा तंज कसा, उसने इस प्रवृत्ति को और स्पष्ट कर दिया। मोदी ने कहा था कि जब किसी कार्यक्रम में नेहरू का नाम नहीं लिया जाता तो कांग्रेस वालों के बाल खड़े हो जाते हैं। लेकिन अगर नेहरू इतने महान हैं तो उनके परिवार के लोग नेहरू उपनाम क्यों नहीं रखते?’ यह कथन केवल एक व्यंग्य नहीं था बल्कि नेहरू-गांधी परिवार पर यह आरोप था कि वे प्रतीकात्मक रूप से नेहरू की विरासत का राजनीतिक उपयोग करते हैं लेकिन व्यक्तिगत रूप से उससे दूरी बनाए रखते हैं। इसके साथ मोदी ने यह भी जोड़ा कि सैकड़ों सरकारी परियोजनाएं, भवन और योजनाएं एक ही परिवार के नाम पर रखी गईं जिससे यह संकेत जाता हैै कि देश की सार्वजनिक स्मृति पर एक परिवार का अवांछित आधिपत्य बना रहे।
अब वंदे मातरम् के 150 वर्ष पूरे होने पर लोकसभा में हुई विशेष चर्चा ने इस पूरे विवाद को नए स्तर पर पहुंचा दिया है। इस बहस में प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि वंदे मातरम् पर जो विवाद स्वतंत्रता आंदोलन के अंतिम दौर में खड़ा हुआ, उसकी जड़ नेहरू-युग की राजनीतिक कमजोरियों में थी। मोदी ने आरोप लगाया कि मुस्लिम लीग और जिन्ना के दबाव में कांग्रेस नेतृत्व ने राष्ट्रगीत के साथ समझौता किया और ‘जिन्ना के आगे झुककर वंदे मातरम् के टुकड़े कर दिए गए।’ इसके बाद उन्होंने आपातकाल का संदर्भ दिया और कहा कि वंदे मातरम् के 100 वर्ष पूरे होने का समय उसी दौर से टकराया जब लोकतंत्र को कुचला गया। इस एक भाषण में मोदी ने नेहरू और इंदिरा गांधी, दोनों को राष्ट्रगीत, लोकतंत्र और संविधान के संकट से जोड़ दिया।
इसी बहस के दौरान प्रियंका गांधी लोकसभा में खड़ी हुईं और उन्होंने मोदी के पूरे भाषण पर तीखा पलटवार कर डाला। उन्होंने कहा कि यदि प्रधानमंत्री के मन में नेहरू को लेकर इतनी शिकायतें हैं, तो एक पूरा सत्र सिर्फ इसी विषय पर रख लिया जाए, जिसमें प्रधानमंत्री जितना कहना चाहें, एक बार में कह लें, ताकि बाद में संसद देश के असली मुद्दों जैसे बेरोजगारी, महंगाई, किसानों की हालत, शिक्षा और स्वास्थ्य के संकट इत्यादि पर गम्भीरता से चर्चा कर सके। प्रियंका का यह बयान सत्ता बनाम इतिहास की बहस को सीधे टकराव की शक्ल दे देता है। यह केवल एक तंज नहीं, बल्कि इस आरोप का सीधा राजनीतिक रूप था कि मोदी इतिहास में उलझकर वर्तमान की जवाबदेही से बच रहे हैं।
स्मरण रहे दिसम्बर 2024 में संविधान दिवस के अवसर पर प्रधानमंत्री मोदी ने कहा था कि ‘नेहरू से लेकर इंदिरा तक एक ही परिवार ने संविधान को सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचाया है।’ उन्होंने आरोप लगाया कि संविधान संशोधन की गलत परम्परा नेहरू के समय शुरू हुई और आपातकाल के दौरान इंदिरा गांधी ने इसे चरम पर पहुंचा दिया। इस कथन के जरिए मोदी ने संविधान से जुड़े हर विवाद और संस्थागत संकट की ऐतिहासिक जिम्मेदारी भी नेहरू-गांधी परिवार पर डाल दी।
कश्मीर के मुद्दे पर मोदी का रवैया और भी तीखा रहा है। वे कई मंचों से यह कहते रहे हैं कि सरदार पटेल ने भारत की अधिकांश रियासतों का शांतिपूर्ण विलय करा लिया था लेकिन कश्मीर को नेहरू के भरोसे छोड़ने की ऐतिहासिक भूल की गई, जिसके परिणाम आज तक देश भुगत रहा है। अनुच्छेद 370 को हटाने के बाद भी मोदी ने यह बात कई बार दोहराई कि उनकी सरकार ने ‘इतिहास की सबसे बड़ी गलती’ को सुधारने का काम किया है। यहां भी एक स्पष्ट राजनीतिक नैरेटिव दिखता है कि नेहरू को समस्या का मूल कारण और मोदी को समाधान का प्रतीक बनाना।
संसद के बाहर चुनावी मंचों पर मोदी का स्वर और भी आक्रामक हो जाता है। 2018 और उसके बाद के कई चुनावों में उन्होंने ‘कामदार बनाम नामदार’ का नारा दिया। इस नारे के जरिए उन्होंने खुद को मेहनत और संघर्ष से आगे बढ़े नेता के रूप में और राहुल गांधी को वंशवादी राजनीति के प्रतीक ‘नामदार’ के रूप में पेश किया। यह हमला केवल राहुल गांधी पर नहीं बल्कि पूरे नेहरू-गांधी परिवार पर था।
2024 में रायबरेली में एम्स के उद्घाटन के दौरान प्रधानमंत्री मोदी ने ‘कांग्रेस के शाही परिवार’ पर सीधा हमला करते हुए कहा कि दशकों तक इस क्षेत्र का इस्तेमाल केवल राजनीति के लिए किया गया, विकास के लिए नहीं। उन्होंने यह भी कहा कि अब पहली बार रायबरेली को एक ऐसी सुविधा मिली है जो पहले केवल परिवार की राजनीति के कारण टलती रही। यहां भी नेहरू-गांधी परिवार को विकास विरोधी और आत्मकेंद्रित राजनीति का प्रतीक बनाकर पेश किया गया।
इन सभी बयानों को एक साथ जोड़कर देखें तो स्पष्ट हो जाता है कि मोदी का नेहरू-विरोध किसी एक घटना या विषय तक सीमित नहीं है। यह एक स्थायी राजनीतिक रणनीति का रूप ले चुका है, जिसमें हर संकट की जड़ अतीत और विशेष रूप से एक परिवार में तलाशी जाती है। कांग्रेस और विपक्ष इसे लोकतंत्र के लिए खतरनाक प्रवृत्ति मानते हैं। उनका तर्क है कि सत्ता में एक दशक से अधिक समय बिताने के बाद भी सरकार यदि महंगाई, बेरोजगारी, शिक्षा, स्वास्थ्य, किसानों और युवाओं के सवालों का सीधा उत्तर नहीं दे पा रही, तो इतिहास को बार-बार कटघरे में खड़ा करना आसान रास्ता बन जाता है।
प्रियंका गांधी का तंज कि ‘नेहरू पर पूरा सत्र रख लीजिए’। दरअसल इसी प्रवृत्ति पर सीधा हमला है। उनका कहना है कि इतिहास पर बहस होनी चाहिए लेकिन हर बहस को इतिहास की गलियों में ले जाकर वर्तमान के कठिन सवालों से भागना लोकतंत्र के मूल भाव के खिलाफ है। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे भी कई बार कह चुके हैं कि प्रधानमंत्री इतिहास को अपनी सुविधा से चुनते हैं, अधूरी घटनाओं को उठाकर उन्हें राजनीतिक हथियार बनाया जा रहा है।
भाजपा का पक्ष यह है कि वह केवल इतिहास का पुनर्मूल्यांकन कर रही है। पार्टी का तर्क है कि दशकों तक एक ही परिवार और एक ही पार्टी सत्ता में रही इसलिए उनकी नीतियों की आलोचना स्वाभाविक है। भाजपा इसे ‘परिवारवाद के खिलाफ लड़ाई’ और ‘नई राजनीतिक संस्कृति’ की स्थापना बताती है। लेकिन आलोचकों का कहना है कि यह लड़ाई अब वैचारिक कम और सुविधाजनक राजनीतिक ढाल अधिक बन चुकी है।
आज स्थिति यह है कि नेहरू भारतीय राजनीति में केवल इतिहास का विषय नहीं रह गए हैं बल्कि वर्तमान सत्ता की सबसे प्रभावी राजनीतिक रणनीति का केंद्र बन गए हैं। मोदी का हर हमला कांग्रेस की विरासत को कमजोर करने का प्रयास है, वहीं विपक्ष का हर जवाब यह सवाल खड़ा करता है कि मौजूदा सरकार अपनी विफलताओं की जिम्मेदारी कब लेगी।
प्रियंका गांधी के शब्दों में, नेहरू पर एक सत्र रखकर बहस समाप्त की जा सकती है लेकिन जनता के सवाल सत्रों से नहीं, नीतियों से शांत होते हैं। बेरोजगारी के आंकड़े, महंगाई की मार, किसानों की आत्महत्याएं, युवाओं की निराशा, शिक्षा और स्वास्थ्य का संकट, इन सब पर इतिहास नहीं, वर्तमान शासन से जवाब मांगा जाता है।
यही कारण है कि ‘नेहरू बनाम मोदी’ की लड़ाई अब केवल दो व्यक्तित्वों की नहीं बल्कि दो तरह की राजनीति की लड़ाई बन चुकी है। एक राजनीति जो अतीत की कथित गलतियों को बार-बार उभारकर वर्तमान को परिभाषित करना चाहती है और दूसरी राजनीति जो कहती है कि अतीत से सीख लेकर आगे बढ़ना चाहिए लेकिन वर्तमान की जवाबदेही से बचा नहीं जा सकता।
कुल मिलाकर नेहरू पर मोदी के लगातार हमले और प्रियंका गांधी की सीधी चुनौती यह स्पष्ट कर देती है कि आने वाले समय में भी भारतीय राजनीति में इतिहास एक हथियार बना रहेगा। फर्क सिर्फ इतना होगा कि एक ओर इतिहास को दोष देने की राजनीति होगी तो दूसरी तरफ इतिहास से आगे बढ़कर वर्तमान की जवाबदेही तय करने की मांग।

