Uttarakhand

परिसीमन के बहाने पहाड़ की राजनीतिक परीक्षा

उत्तराखण्ड विधानसभा की 70 सीटों में इस समय 34 सीटें पहाड़ी क्षेत्रों और 36 सीटें मैदानी इलाकों में हैं। जनसंख्या आधारित परिसीमन होने की स्थिति में यह संतुलन मैदानों के पक्ष में निर्णायक रूप से झुक सकता है। पूर्वोत्तर राज्यों में कम जनसंख्या के बावजूद अधिक विधानसभा सीटों की व्यवस्था यह सवाल खड़ा करती है कि क्या उत्तराखण्ड के पहाड़ी क्षेत्रों के लिए भी वैसी ही विशेष संवैधानिक व्यवस्था अपनाई जानी चाहिए या फिर एक नय जनआंदोलन इसको पाने का एक मात्र विकल्प है?


उत्तराखण्ड में परिसीमन का मुद्दा आने वाले समय में राज्य की राजनीति का सबसे निर्णायक प्रश्न बनने जा रहा है। यह केवल निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं के पुनर्निर्धारण की प्रक्रिया नहीं है बल्कि यह तय करेगा कि भविष्य में उत्तराखण्ड की सत्ता, नीति-निर्माण और विकास की दिशा किस ओर झुकेगी। सवाल यह नहीं है कि परिसीमन होगा या नहीं बल्कि यह है कि किस आधार पर होगा और उसका भार किसे उठाना पड़ेगा।

वर्तमान स्थिति पर नजर डालें तो उत्तराखण्ड विधानसभा की कुल 70 सीटों में से 34 सीटें पर्वतीय क्षेत्रों से आती हैं जबकि 36 सीटें मैदानी इलाकों में स्थित हैं। यह लगभग बराबरी का संतुलन ही अब तक इस बात की गारंटी रहा है कि पहाड़ की राजनीतिक आवाज पूरी तरह दब न जाए लेकिन यही संतुलन भविष्य के परिसीमन में सबसे अधिक खतरे में है क्योंकि परिसीमन का मूल आधार जनसंख्या माना जाता है।

संविधान के अनुच्छेद 170 के तहत विधानसभा सीटों का निर्धारण जनसंख्या के आधार पर किया जाता है, ताकि प्रत्येक विधायक लगभग समान संख्या में नागरिकों का प्रतिनिधित्व करे। लोकतांत्रिक सिद्धांत के रूप में यह तर्कसंगत लगता है लेकिन उत्तराखण्ड जैसे राज्य में यह सिद्धांत जमीनी हकीकत से टकराता है। यहां जनसंख्या का वितरण समान नहीं है और इसके पीछे केवल प्राकृतिक कारण नहीं बल्कि दशकों से चला आ रहा सामाजिक और आर्थिक असंतुलन भी है।

2001 की जनगणना में उत्तराखण्ड की जनसंख्या लगभग 84 लाख थी जो 2011 में बढ़कर करीब 1.01 करोड़ हो गई। लेकिन इस वृद्धि का लाभ पूरे राज्य को समान रूप से नहीं मिला। हरिद्वार, ऊधमसिंह नगर और देहरादून के मैदानी हिस्सों में जनसंख्या में तेज वृद्धि हुई जबकि पौड़ी, अल्मोड़ा, चमोली, पिथौरागढ़, बागेश्वर और उत्तरकाशी जैसे पहाड़ी जिलों में कई क्षेत्रों में जनसंख्या स्थिर रही या घट गई। 2001 से 2011 के बीच कुछ पर्वतीय जिलों में 5 से 6 प्रतिशत तक की जनसंख्या गिरावट दर्ज की गई।

2011 के बाद हालात और भी गम्भीर हुए। भले ही 2021 की जनगणना के आंकड़े अब तक सार्वजनिक नहीं हुए हों लेकिन सरकारी रिपोर्टों, पलायन आयोग और स्थानीय प्रशासनिक आंकड़ों से यह संकेत लगातार मिलता रहा है कि पहाड़ी क्षेत्रों से पलायन तेज हुआ है। 2011 से 2025 के बीच कई पर्वतीय इलाकों में प्रभावी जनसंख्या में 8 से 10 प्रतिशत तक और कमी आने का अनुमान लगाया जाता है। इसके उलट, मैदानी क्षेत्रों में शहरीकरण और बाहरी प्रवास के कारण जनसंख्या लगातार बढ़ती रही है।

यदि परिसीमन 2026 के बाद की जनगणना के आधार पर किया गया तो इसका सीधा असर विधानसभा सीटों के पुनर्वितरण पर पड़ेगा। मौजूदा 34 पहाड़ी सीटें घट सकती हैं और 36 मैदानी सीटें बढ़ सकती हैं। इसका अर्थ यह होगा कि सत्ता का केंद्र स्थायी रूप से मैदानों में सिमट जाएगा और पहाड़ की भूमिका नीति-निर्माण में कमजोर होती चली जाएगी।

यहीं से उत्तराखण्ड राज्य निर्माण के उद्देश्य पर मूल सवाल खड़ा होता है। उत्तराखण्ड का गठन इसलिए हुआ था क्योंकि अविभाजित उत्तर प्रदेश में पहाड़ी क्षेत्रों की समस्याएं लगातार उपेक्षित थीं। नीतियां लखनऊ से बनती थीं जहां मैदानी भूगोल, शहरी जरूरतों और जनसंख्या बहुल इलाकों की प्राथमिकताएं हावी रहती थीं। पहाड़ की दुर्गमता, सीमित कृषि, वन-आधारित जीवन, मौसमी पलायन और सीमांत सुरक्षा जैसे मुद्दे नीति-निर्माण के केंद्र में कभी नहीं आ पाए। सड़क, स्वास्थ्य, शिक्षा और रोजगार की योजनाएं मैदानी माॅडल पर आधारित होती थीं जो पहाड़ी समाज की वास्तविक आवश्यकताओं से मेल नहीं खाती थीं।

यदि परिसीमन के जरिए वही स्थिति दोबारा पैदा होती है कि संख्या के आधार पर पहाड़ की राजनीतिक शक्ति लगातार घटती जाए तो यह राज्य निर्माण की अवधारणा के साथ सीधा टकराव होगा। तब यह प्रश्न स्वाभाविक रूप से उठेगा कि अगर पहाड़ की आवाज को कमजोर ही होना था तो अलग राज्य का औचित्य क्या था।
इस संदर्भ में पूर्वोत्तर राज्यों का माॅडल विशेष महत्व रखता है। भारत के पूर्वोत्तर राज्यों में परिसीमन को केवल जनसंख्या के गणित तक सीमित नहीं रखा गया। 2011 की जनगणना के अनुसार अरुणाचल प्रदेश की कुल जनसंख्या लगभग 13.8 लाख है, इसके बावजूद वहां 60 सदस्यीय विधानसभा है। इसी तरह नागालैंड की जनसंख्या लगभग 19.8 लाख के आसपास है लेकिन वहां भी विधानसभा की कुल सीटें 60 ही हैं। यदि केवल जनसंख्या को आधार बनाया जाता तो इन राज्यों में विधानसभा सीटों की संख्या कहीं कम होती। लेकिन ऐसा इसलिए नहीं किया गया क्योंकि नीति-निर्माताओं ने यह स्वीकार किया कि इन राज्यों में भौगोलिक विस्तार, अत्यधिक दुर्गमता, सीमांत स्थिति, जनजातीय समाज की संरचना और प्रशासनिक पहुंच की कठिनाइयां जनसंख्या से कहीं अधिक महत्वपूर्ण कारक हैं। कई निर्वाचन क्षेत्रों की जनसंख्या राष्ट्रीय औसत से बहुत कम होने के बावजूद उन्हें बनाए रखा गया ताकि दूर-दराज और छोटे समुदायों की राजनीतिक आवाज दब न जाए। यह व्यवस्था संवैधानिक रूप से स्वीकार्य है और वर्षों से लागू भी है।

यही तर्क उत्तराखण्ड के पहाड़ी क्षेत्रों पर भी समान रूप से लागू होता है। यहां भी जनसंख्या कम होने के पीछे पलायन, दुर्गमता और संसाधनों की कमी जैसे कारण हैं, न कि राजनीतिक महत्व की कमी। यदि अरुणाचल प्रदेश और नागालैंड जैसे राज्यों में कम जनसंख्या के बावजूद पर्याप्त विधानसभा सीटें लोकतांत्रिक मानी जाती हैं तो उत्तराखण्ड के पहाड़ी क्षेत्रों के लिए भी परिसीमन में इसी माॅडल को अपनाना न तो असंवैधानिक होगा और न ही असामान्य।

संवैधानिक रूप से यह पूरी तरह सम्भव है कि संसद विशेष कानून बनाकर या परिसीमन आयोग को स्पष्ट दिशा-निर्देश देकर यह सुनिश्चित करे कि उत्तराखण्ड के पर्वतीय क्षेत्रों की न्यूनतम विधानसभा सीटें सुरक्षित रहें। यह कोई नई मांग नहीं बल्कि पहले से मौजूद संवैधानिक परंपरा का विस्तार होगा।

यदि ऐसा नहीं हुआ तो इसके परिणाम केवल राजनीतिक नहीं होंगे। नीति-निर्माण, बजट आवंटन और विकास योजनाओं में भी पहाड़ की प्राथमिकताएं लगातार पीछे छूटती जाएंगी। धीरे-धीरे पहाड़ एक बार फिर उसी हाशिए पर पहुंच जाएगा जिससे बाहर निकलने के लिए उत्तराखण्ड आंदोलन खड़ा हुआ था।

यहीं इस बहस को उत्तराखण्ड आंदोलन की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि से जोड़कर देखना अनिवार्य हो जाता है। उत्तराखण्ड राज्य का आंदोलन केवल प्रशासनिक पुनर्गठन की मांग नहीं था बल्कि यह उस लम्बे नीतिगत और राजनीतिक अन्याय के खिलाफ जनसंघर्ष था जिसमें पहाड़ी समाज दशकों से खुद को हाशिए पर महसूस कर रहा था। यह आंदोलन उस विश्वास से पैदा हुआ था कि जब तक पहाड़ के लिए नीतियां पहाड़ की जमीन और संवेदनाओं को समझकर नहीं बनेंगी, तब तक विकास और सम्मान दोनों अधूरे रहेंगे। इस संघर्ष ने निर्णायक मोड़ तब लिया, जब खटीमा और मसूरी जैसी घटनाओं में आंदोलनकारियों ने अपने प्राण गंवाए। इन शहादतों ने यह स्पष्ट कर दिया कि यह संघर्ष केवल भूगोल का नहीं बल्कि अधिकार, सम्मान और राजनीतिक हिस्सेदारी का प्रश्न है। उत्तराखण्ड का निर्माण इन्हीं बलिदानों की परिणति था।

ऐसे में यदि आज परिसीमन के नाम पर पहाड़ी क्षेत्रों की राजनीतिक भागीदारी कमजोर की जाती है तो यह केवल राज्य निर्माण के उद्देश्य से ही नहीं बल्कि उन शहादतों की भावना से भी अन्याय होगा जिन्होंने उत्तराखण्ड को अस्तित्व दिलाया। परिसीमन आने वाले दशकों की राजनीति तय करेगा और उत्तराखण्ड के लिए यह केवल सीटों का सवाल नहीं बल्कि पहाड़ की आवाज को बचाने या खो देने का निर्णय होगा। यदि पूर्वोत्तर राज्यों के लिए विशेष व्यवस्था सम्भव है तो हिमालयी उत्तराखण्ड के लिए भी इसे अपनाना न केवल सम्भव है बल्कि अनिवार्य भी है।

बात अपनी-अपनी

उत्तराखण्ड में भारतीय जनता पार्टी एक अभियान चला रही है ‘मेरी गणना, मेरा गांव’। हमने उत्तराखण्ड के जितने भी प्रवासी हैं या उत्तराखण्ड के लोग जो अपने गांव से बाहर चले गए हैं, से अपील की है कि वह जनगणना के समय अपने गांव में रहें, ग्राम प्रधान के सम्पर्क में रहें। जब जनगणना करने वाले आएं तो अपना नाम अपने पैतृक स्थान पर दर्ज करवाएं  क्योंकि उनका परिवार रजिस्टर पहाड़ में है, खेत खलिहान उनके नाम पर हैं। जनगणना में अपने गांव में ही शामिल हों। जनगणना और मतदाता में फर्क होता है, मतदाता आप कहीं भी हो सकते हैं। जनगणना में व्यक्ति अपनी भूमि से जुड़ता है, हमने आह्वान किया है और हमें उम्मीद है कि लोग अपने गांव में आकर जनगणना में अपना नाम दर्ज कराएंगे और जो पिछली बार पहाड़ से सीटें कम जनसंख्या के कारण कम हुई थीं वो पुराने स्वरूप में लौटेंगी। जहां तक भौगोलिक आधार पर परिसीमन का सवाल है, जब जनगणना या परिसीमन का विषय आएगा, पार्लियामेंट के अंदर बहस का विषय रहेगा कि किस रूप में उसका आधार बनता है, सदन में जब इसकी चर्चा होगी, निश्चित रूप से हम हिमालयी राज्यों का विषय रखेंगे। हिमालयी राज्यों की भौगोलिक परिस्थितियां अलग हैं, हमने जनसंख्या का नियंत्रण भी किया है। हम इन सब मुद्दों को सदन में उठाएंगे तो यह परिसीमन का भी आधार बनेगा।

 महेंद्र भट्ट, प्रदेश अध्यक्ष, उत्तराखण्ड भाजपा

परिसीमन के दो फॉर्मूले हैं एक तो वही सामान्य है और दूसरा जो जम्मू-कश्मीर में लागू हुआ है। पहले का आधार तो जनसंख्या ही है, दूसरे का आधार वह है जम्मू-कश्मीर में परिसीमन में कश्मीरी क्षेत्र में सीटों को प्रोटेक्ट किया गया जिससे कि वहां सीटें यथावत बनी रहीं और शेष इलाके में परिसीमन हुआ। दो फार्मूले हैं देश के सामने। परिसीमन के लिए केंद्र सरकार क्या फार्मूला तय करती है ये केंद्र सरकार पर निर्भर करता है कि वह क्या नियम अपनाती है। 2008 में जब यूपीए की सरकार थी, उस वक्त हमने प्रधानमंत्री से बातचीत कर एक रास्ता और निकला था। उस रास्ते के आधार पर पर्वतीय अंचल की  की 6-7 विधानसभा सीटें बचा ली थी। इस आधार पर जनसंख्या को इवनली बांट कर रास्ता निकाला था लेकिन अब उस आधार पर लाभ अब नहीं मिल पाएगा। उत्तराखण्ड के निर्माण के वक्त आपने हिमालयी राज्य का दृष्टिकोण रखा तो हर नीतिगत फैसला हिमालय राज्य के दृष्टिकोण से ही होना चाहिए तभी आप राज्य का संतुलित विकास कर पाएंगे और सामाजिक सद्भाव बना रहेगा।

हरीश रावत, पूर्व मुख्यमंत्री, उत्तराखण्ड

अगर परिसीमन का आधार जनसंख्या होती है और जिस प्रकार तेजी से पलायन हो रहा है तो उसकी वजह से पर्वतीय क्षेत्र में सीटें और घटेंगी।  जनता का पलायन हुआ तो नेता भी पलायन कर मैदानी इलाकों में आ गए तो पहाड़ की जो राजनीतिक शक्ति है उसका क्षरण हो रहा है। जनसंख्या ही परिसीमन आधार रहती है तो पर्वतीय क्षेत्रों में सीटें कम होना तय है। नेता अगर पहाड़ों से पलायन करने लगेंगे तो जनता की पैरोकारी कौन करेगा? राजनीतिक क्षरण के साथ आर्थिक हिस्सेदारी भी कम होगी, विकास का पैसा, विधायक निधि सब कम हो जाएंगे। शिक्षा स्वास्थ्य और कृषि पर भी इसका असर पड़ेगा।  हिमालयी राज्यों में सिर्फ हिमाचल और उत्तराखण्ड ही बचे हैं जिनमें जनसंख्या परिसीमन का आधार है। पूरे हिमालयी राज्यों में एक जैसी व्यवस्था होनी चाहिए। 2012 के चुनाव नई परिसीमन के आधार पर हुए जहां पर्वतीय क्षेत्रों में 6 सीटें घटकर 40 से 34 रह गई। यह सब हमारे कमजोर राजनीतिक नेतृत्व का परिणाम है। दिक्कत यह है कि नेताओं की कमिटमेंट अपनी पार्टी के लिए ज्यादा है, जनता के लिए कम। उस वक्त भाजपा नेता जो उस वक्त अल्मोड़ा से सांसद थे, बची सिंह रावत ने इस सम्बंध में सवाल उठाया था तो उस वक्त 10 प्रतिशत वैरिएशन की छूट मिली थी और 10 प्रतिशत का मैदानी और पर्वतीय क्षेत्र में वेरिएशन रखा गया था लेकिन अब 10 प्रतिशत वैरिएशन से काम चलने वाला नहीं है, इसे कम से कम 30 प्रतिशत का रखा जाएगा तो असंतुलन दूर होगा यानी मैदान में 1 लाख 30 हजार और पहाड़ों में 70 हजार जनसंख्या की एक विधानसभा बने। आप जिन पूर्वोत्तर राज्यों की बात कर रहे हैं वह अनुसूची 6 के अंतर्गत आते हैं। इसलिए या तो भौगोलिक आधार पर भी परिसीमन हो, नहीं तो व्यावहारिक यही है कि वेरिएशन 30 प्रतिशत का रखा जाए।

जय सिंह रावत, वरिष्ठ पत्रकार

समस्या उस समय से शुरू हुई जब उत्तराखण्ड राज्य बना, उस समय केंद्र में वाजपेई जी की सरकार थी। भाजपा सत्ता में थी। बीजेपी, कांग्रेस हमेशा उत्तराखण्ड राज्य निर्माण की विरोधी रहे। जब आंदोलन इतना जबरदस्त हो गया कि उनसे सम्भाला नहीं गया तो उनको पृथक राज्य की मांग माननी पड़ी, मजबूरी में। इसमें भी भाजपा ने अपने लिए अवसर निकाल लिया। यूपी की कुछ ऐसी सीटें जहां पर सपा और बीएसपी का प्रभाव था। उन मैदानी इलाकों की कम से कम 7 सीटें ऐसी हैं जो उन्होंने जान- बूझकर उत्तराखण्ड के साथ जोड़ दी। उत्तराखण्ड में तो क्या फर्क पड़ने वाला था लेकिन यूपी में एसपी बीएसपी के प्रभाव क्षेत्र को उन्होंने कम कर दिया अपनी सरकार बनाए रखने के लिए। यह जो मैदानी इलाके हैं उनका उत्तराखण्ड खासकर पर्वतीय संस्कृति से कोई लेना-देना नहीं है। इस निर्णय से उत्तराखण्ड का खासा नुकसान हो गया। पलायन एक मुद्दा जरूर है लेकिन पर्वतीय क्षेत्रों में जनसंख्या का घनत्व वैसे भी कम ही रहा है। लेकिन जो परिसीमन का मामला है यह बीजेपी वाले ही इसको ठीक कर सकते हैं। पूर्वोत्तर में 25 से 30 हजार जनसंख्या पर एक विधानसभा है वह नियम आप उत्तराखण्ड में तो लागू कर ही सकते हैं, उत्तराखण्ड भी तो हिमालयी राज्य ही है। हिमालयी राज्यों के लिए दो नीतियां तो नहीं हो सकती। उत्तराखण्ड में एक विधानसभा एक से डेढ़ लाख मतदाता की है। पर्वतीय क्षेत्र के साथ ये अन्याय है। यह वह पहाड़ी राज्य नहीं है जिसके लिए उत्तराखण्ड राज्य बना। भाजपा-कांग्रेस ने अपनी राजनीति के लिए इसे बिगाड़ दिया लेकिन सुधारने का काम भी इन्हीं को करना चाहिए। जब डबल ट्रिपल इंजन की सरकारों का दावा किया जा रहा है तो यही उस परेशानी को दूर कर सकते हैं। जब पहाड़ में 6 सीटें कम हुई तो सभी राजनीतिक दल चुप रहे।  बहुत गलत हुआ उस समय। अगर इस बार परिसीमन में पहाड़ से सीटें कम हुई तो  व्यापक स्तर पर विरोध होगा। उत्तराखण्ड का दुर्भाग्य है कि इस समय जिन लोगों के हाथ में राज्य का नेतृत्व है, वह लोग राज्य का विरोध करने वाले रहे हैं। परिसीमन के लिए जनता को उठना होगा। परिसीमन अगर पुरानी नीति लागू रही तो पहाड़ी इलाकों से कुछ सीटें और खोने के लिए तैयार रहिए।

प्रभात डबराल, वरिष्ठ पत्रकार

जब उत्तराखण्ड में ऊधमसिंह नगर और हरिद्वार को शामिल किया गया तो पर्वतीय राज्य की अवधारणा तो उसी वक्त खत्म हो गई थी। उत्तराखण्ड राज्य की अवधारणा के पीछे उसकी पहाड़ी संस्कृति और विरासत की पहचान को बनाए रखने की सोच थी लेकिन क्या हरिद्वार और ऊधमसिंह नगर इस अवधारणा की कसौटी पर खरे उतरते हैं? लेकिन अब क्या है कि मैदानी क्षेत्र राजनीतिक रूप से हावी होने की स्थिति में है। अब पलायन का मुद्दा सामने है। उत्तराखण्ड राज्य बनने से पहले हम इंटर स्टेट पलायन की बात करते थे अब इंट्रा स्टेट पलायन की बात कर रहे हैं। ऐसे में पहाड़ों की विधानसभा सीटें कम होगी तो संतुलन बिगड़ेगा ही, पलड़ा मैदानी क्षेत्र की ओर झुकेगा। पहाड़ से विधानसभा सीटें कम होने में राजनीतिक आवाज तो कम होंगी ही विकास की गति भी कम होगी। परिसीमन की बात करें तो 1700 वर्ग किलोमीटर पर पिथौरागढ़ में एक विधानसभा सीट और 2600 वर्ग किलोमीटर में एक सीट उत्तरकाशी में बनती है और जबकि 2600 वर्ग किलोमीटर पर हरिद्वार में लगभग 11 सीटें बनती हैं। यहां औसत 260 वर्ग किलोमीटर पर एक विधानसभा सीट बनती है तो पहाड़ में 2600 वर्ग या 1700 वर्ग किलोमीटर पर एक विधानसभा। क्या 2600 वर्ग किलोमीटर या 1700 वर्ग किलोमीटर की विधानसभा क्षेत्र के विधायक के सामने चुनौतियां नहीं हैं 260 वर्ग किलोमीटर के मुकाबले? कुछ संतुलन तो रखना ही होगा। भौगोलिक आधार पर परिसीमन को न्याय संगत तरीके से किया जाना चाहिए और विधानसभा में पहाड़ी क्षेत्र का प्रतिनिधित्व बढ़ाना चाहिए।

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