लुटियंस दिल्ली के सत्ता गलियारों में इस समय सबसे बड़ी चर्चा यह है कि केंद्र सरकार और भारतीय जनता पार्टी उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ से बेहद खिन्न हो चुकी थी और उनके खिलाफ कोई बड़ा कदम उठाने की तैयारी कर रही थी। माना जा रहा है कि जस्टिस वर्मा के मामले में विपक्ष द्वारा लाए गए महाभियोग प्रस्ताव को राज्यसभा में स्वीकार करने के उपरांत सरकार की रणनीति ध्वस्त हो गई जिससे सत्ता पक्ष नाराज हो गया। बिजनेस एडवाइजरी कमेटी की बैठक में वरिष्ठ मंत्रियों की अनुपस्थिति और एनडीए के भीतर पनपती बेचैनी के बीच खबरें आईं कि धनखड़ के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव की रूपरेखा बनाई जा रही थी। इससे पहले कि यह विवाद सार्वजनिक होता, धनखड़ ने स्वयं त्यागपत्र देकर सत्ता को चैंका दिया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उनके इस्तीफे पर सिर्फ एक औपचारिक ट्वीट कर उन्हें शुभकामनाएं दी हैं, जबकि भाजपा की ओर से अब तक कोई आधिकारिक बयान नहीं आया है जो इस पूरे घटनाक्रम को और रहस्यमय बना देता है
भारत के उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ का अचानक इस्तीफा मानसून सत्र के पहले दिन भारतीय राजनीति में एक अप्रत्याशित मोड़ बन सामने आया है। 21 जुलाई की शाम उन्होंने राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को लिखे पत्र में अपने पद से तत्काल प्रभाव से त्यागपत्र देते हुए स्वास्थ्य कारणों का हवाला दिया। उन्होंने लिखा, ‘‘स्वास्थ्य देखभाल को प्राथमिकता देने और चिकित्सकीय सलाह का पालन करने के लिए, मैं संविधान के अनुच्छेद 67(क) के अनुसार भारत के उपराष्ट्रपति के रूप में तत्काल प्रभाव से इस्तीफा देता हूं।’’ लेकिन यह त्यागपत्र सिर्फ औपचारिकता बनकर नहीं रह गया। संसद, सत्ता और संवैधानिक संस्थाओं के गलियारों में इसके मायने बेहद गहरे और दूरगामी हो गए हैं।
धनखड़ का इस्तीफा केवल स्वास्थ्य की वजह से नहीं, बल्कि उनके पूरे राजनीतिक और संवैधानिक सफर का निचोड़ बनकर देखा जा रहा है। बतौर पश्चिम बंगाल के राज्यपाल (2019-22), उन्होंने ममता बनर्जी सरकार के साथ निरंतर टकराव की नीति अपनाई और केंद्र की राजनीति में अपनी तेज छवि स्थापित की। दिल्ली बुलाकर उन्हें उपराष्ट्रपति बनाया गया पर दिल्ली की गद्दी पर पहुंचकर भी उनके तेवर कम नहीं हुए। संसद में उन्होंने बार-बार न्यायपालिका के अधिकार क्षेत्र, संविधान की व्याख्या और विधायिका की सर्वोच्चता पर सख्त टिप्पणियां कीं। उनका यह रुख सत्ता पक्ष के भीतर भी कई बार असहजता का कारण बना।
नेशनल जुडिशियल अप्वाइंटमेंट्स कमीशन (एनजेएसी) एक्ट पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले को उन्होंने स्पष्ट रूप से ‘‘संसदीय सम्प्रभुता का उल्लंघन’’ कहा था। दिल्ली विश्वविद्यालय के एक कार्यक्रम में उन्होंने यहां तक कह दिया था कि संविधान में कहीं नहीं लिखा कि संसद से ऊपर कोई और संस्था होगी। उनका मानना था कि लोकतंत्र में चुने हुए प्रतिनिधियों को ही अंतिम निर्णय का अधिकार है और न्यायपालिका को भी जनादेश का सम्मान करना चाहिए। यह वक्तव्य सत्ता और न्यायपालिका के बीच संतुलन की पुरानी बहस को फिर हवा देने वाला था।
मार्च 2025 में जब जस्टिस यशवंत वर्मा के घर से नकदी बरामद हुई और उनके खिलाफ विपक्ष द्वारा महाभियोग प्रस्ताव लाया गया, तब भी धनखड़ ने न्यायपालिका के ‘अविज्ञेय क्षेत्र’ पर चोट करते हुए कहा था कि ‘‘न्यायिक स्वतंत्रता जांच से बचाव की आड़ नहीं हो सकती।’’ इलाहाबाद उच्च न्यायालय के जस्टिस यशवंत वर्मा के मामले में भी जब विपक्ष ने राज्यसभा में प्रस्ताव दिया तो उपराष्ट्रपति ने उसे नियमों के अनुसार स्वीकार कर लिया। सरकार चाहती थी कि यह पहल लोकसभा से हो ताकि उसे नियंत्रित किया जा सके, लेकिन धनखड़ ने राज्यसभा में ही इसकी प्रक्रिया शुरू कर दी। यह सत्ता पक्ष के लिए अप्रत्याशित और असुविधाजनक था।
यहीं से उनके खिलाफ राजनीतिक दरार की शुरुआत हुई। 22 जुलाई को राज्यसभा की बिजनेस एडवाइजरी कमेटी की बैठक में उपराष्ट्रपति धनखड़ ने दोपहर 1 बजे बैठक बुलाई थी। इस बैठक में विपक्ष के वरिष्ठ नेता तो पहुंचे, लेकिन भाजपा की ओर से नेता सदन जेपी नड्डा, संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू और अन्य प्रमुख मंत्री गैरहाजिर रहे। बताया गया कि यह गैरहाजिरी बिना पूर्व सूचना के थी। यह एक राजनीतिक संकेत था, जिसे धनखड़ ने गंभीरता से लिया। इसी दिन दोपहर बाद 4ः30 बजे उन्होंने राष्ट्रपति को इस्तीफा सौंप दिया। कांग्रेस नेता जयराम रमेश के अनुसार ‘‘एक बजे सब कुछ सामान्य था, लेकिन चार बजे इस्तीफा आ गया, कुछ तो ऐसा हुआ, जो सार्वजनिक नहीं है।’’
समाचार एजेंसियों और राजनीतिक सूत्रों के हवाले से यह भी खबरें आई हैं कि भाजपा नेतृत्व उपराष्ट्रपति के व्यवहार से बेहद नाराज था। ‘एनडीटीवी’ की एक रिपोर्ट में कहा गया कि सरकार की ओर से उपराष्ट्रपति के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाने की तैयारी तक शुरू कर दी गई थी। भाजपा के कुछ सांसदों से हस्ताक्षर भी लिए गए थे और प्रधानमंत्री आवास पर एक बैठक आयोजित की गई थी जिसमें यह निर्णय लिया गया कि अगर धनखड़ विपक्ष की रणनीति के अनुरूप महाभियोग प्रस्तावों को स्वीकार करते रहे, तो पार्टी उनके विरुद्ध संवैधानिक कार्रवाई को भी तैयार रहेगी। ऐसे में यह अटकल भी लगाई गई कि धनखड़ ने खुद को ‘‘सम्मानजनक वापसी’’ देने के लिए स्वास्थ्य कारणों को ढाल बनाया।
इस पूरी स्थिति को और रहस्यमय बना देती है भाजपा की चुप्पी। भारतीय जनता पार्टी की ओर से अब तक उपराष्ट्रपति के इस्तीफे पर कोई आधिकारिक बयान जारी नहीं किया गया है। न ही किसी वरिष्ठ नेता या प्रवक्ता ने प्रेस के समक्ष यह स्पष्ट किया कि पार्टी की स्थिति क्या है। दूसरी ओर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक अत्यंत औपचारिक और संक्षिप्त ट्वीट करते हुए केवल यह कहा है कि वह उपराष्ट्रपति को उनके भविष्य के लिए शुभकामनाएं देते हैं और उनके साथ काम करना सुखद रहा। यह ट्वीट न तो भावनात्मक है, न ही राजनीतिक गरिमा से भरा, बल्कि एक शिष्टाचारात्मक औपचारिकता थी। विश्लेषकों का मानना है कि इस ट्वीट की यही औपचारिकता इस पूरे प्रकरण का सबसे बड़ा राजनीतिक संदेश है। आमतौर पर प्रधानमंत्री मोदी अपने करीबी सहयोगियों के लिए जो आत्मीयता दर्शाते हैं, उसकी तुलना में यह एक शुष्क प्रतिक्रिया थी, जो बताती है कि रिश्ता तनावपूर्ण मोड़ पर समाप्त हुआ।
राजस्थान के पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने कहा, ‘‘धनखड़ पर दबाव था। आरएसएस और भाजपा को सच पता है लेकिन वे चुप हैं।’’ पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने भी इस पर सवाल उठाते हुए कहा, ‘‘धनखड़ पूरी तरह स्वस्थ व्यक्ति हैं, ये इस्तीफा सिर्फ एक परदा है।’’ झारखंड के सत्तारूढ़ गठबंधन ने भी राष्ट्रपति से स्पष्टिकरण की मांग की है कि इस इस्तीफे के पीछे की वास्तविक वजह क्या है।
इन घटनाओं ने भारतीय लोकतंत्र में संवैधानिक पदों की स्वतंत्रता पर एक नया सवाल खड़ा कर दिया है। अगर देश के दूसरे सर्वोच्च संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति को इस कदर दबाव और असहमति का सामना करना पड़े कि उसे कार्यकाल पूरा होने से दो वर्ष पहले ही पद छोड़ना पड़े तो यह न केवल लोकतंत्र के स्वास्थ्य के लिए खतरे की घंटी है, बल्कि सत्ता के केंद्रीकरण की ओर बढ़ती प्रवृत्ति का भी संकेत है।
अब, संविधान के अनुच्छेद 67(क) के अनुसार राष्ट्रपति को इस्तीफा स्वीकार करना होगा और इसके बाद चुनाव आयोग उपराष्ट्रपति के चुनाव की घोषणा करेगा। लोकसभा और राज्यसभा के सांसद संयुक्त निर्वाचन मंडल बनाकर गुप्त मतदान से नया उपराष्ट्रपति चुनेंगे। तब तक राज्यसभा के डिप्टी चेयरमैन हरिवंश नारायण सिंह सभापति की भूमिका निभाएंगे। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि भाजपा अब एक ऐसा चेहरा उपराष्ट्रपति पद पर लाना चाहेगी जो पूरी तरह पार्टी लाइन पर चले और किसी भी संवैधानिक स्वतंत्रता को लेकर ‘‘लक्ष्मण रेखा’’ पार न करे।
विपक्ष के लिए यह इस्तीफा एक नैतिक हथियार बन सकता है। कांग्रेस, सपा, टीएमसी जैसे दल इसे ‘‘संवैधानिक पदों की स्वतंत्रता की जीत’’ के रूप में प्रचारित कर सकते हैं। जयराम रमेश, मल्लिकार्जुन खड़गे और कपिल सिब्बल जैसे वरिष्ठ नेताओं ने साफ शब्दों में कहा है कि यह एक संवैधानिक चेतावनी है कि अगर उपराष्ट्रपति की भी नहीं सुनी जाती तो देश के अन्य संस्थान किसके अधीन हैं?
धनखड़ का जाना भारतीय लोकतंत्र के लिए केवल एक संवैधानिक खाली जगह नहीं छोड़ता, बल्कि यह एक संदेश भी देता है कि आज सत्ता, न्यायपालिका और विधायिका के बीच संतुलन बनाना कितना चुनौतीपूर्ण हो गया है। उनके इस्तीफे ने संविधान की मूल संरचना, संसद की सर्वोच्चता, न्यायपालिका की स्वतंत्रता और कार्यपालिका की जवाबदेही जैसे बड़े सवालों को फिर से राष्ट्रीय विमर्श के केंद्र में ला दिया है। आने वाले दिनों में उपराष्ट्रपति चुनाव, मानसून सत्र की बहसें और विपक्ष व सरकार की रणनीतियां, सब इस राजनीतिक भूचाल के प्रभाव में रहेंगी। यह साफ है कि जगदीप धनखड़ का यह कदम भारतीय राजनीति में लम्बे समय तक चर्चा में रहेगा और सत्ता के गलियारों में उसकी गूंज सुनाई देती रहेगी।

