बात उन दिनों की है जब मैं मुम्बई में रहती थी और वहां निरंतर अपने भीतर बसे हिमालय को खोजती रहती थी। शायद पढ़ने में आपको ये बात अजीब लग सकती है लेकिन जिस किसी ने भी अपना बचपन पहाड़ी धूप सेकते हुए प्रकृति की गोद में बिताया हो उसके लिए बड़े मैदानी शहरों में एक अजीब अवसाद की स्थिति पैदा हो सकती है। तब अब किसी पहाड़ी धुन को सुनते हुए अपने मन को वहां जरूर थोड़ी देर रमने के लिए ले चलते हैं और बहल कर सकते हैं।
बात 2017 की है उत्तराखण्ड में गढ़वाल भ्रातृ मंडल के तत्वाधान में होने वाले उत्तराखण्ड उत्सव में मैं अपनी सेवा दे रही थी। यहां मुझे सौभाग्य मिला था गढ़वाल की सबसे सुरीली और मजबूत आवाज से रूबरू होने का। गढ़ रत्न नरेंद्र सिंह नेगी जी ने तब अपनी प्रस्तुति देकर सबका मन मोह लिया था और मेरे अनुरोध पर मेरा पसंदीदा भजन भी सुनाया था। भजन त्रिजुगीनारायण मंदिर पर था। इस भजन को मैं अक्सर मुम्बई में सुनती थी। इस भजन को सुनकर मुझे ऐसा लगता था रानीखेत के शिव मंदिर प्रांगण में वापस पहुंच गई हूं जहां नानी मुझे बचपन में हर सोमवार साथ ले जाती थी। राख से मजे हुए धवल लोटे से शिव जी को जब वो जल अर्पण करती हुई ‘शिव ज्यु – शिव ज्यु’ करती जाती थी तब ऐसा एहसास होता था उनका शिव जी से कोई बहुत ही आत्मिक नाता है। बहुत बाद में मुझे एहसास हुआ हो भी क्यों ना हम हिम वासियों को ये सौभाग्य भी प्राप्त है कि हम शिव ज्यु के सौरासी भी हुए। मुम्बई के ही नाला सुपारा में एक बहुत पहुंचे हुए संत विहार करते हैं और उनसे जब मैं पहली दफा मिली और मैंने उन्हें बताया कि मैं उत्तराखण्ड से हूं तब उन्होंने बड़े सहज भाव से कहा था अरे तो आप हमारे बाबा के ससुराल से हैं।
बस यूं ही इसलिए आज लगा उत्तराखण्ड एक आध्यात्मिक खोज में आज का पड़ाव वो दिव्य स्थल हो जहां शिव शक्ति परिणय सूत्र में बंधे थे और उनके साथ हम उत्तराखण्ड वासियों के साथ एक अनूठा रिश्ता बंधा था। ये दिव्य स्थल है त्रिजुगीनारायण मंदिर।
स्थल के बारे में विस्तार से बताने से पहरुद्रप्रयाग जनपद स्थित त्रियुगीनारायण मंदिर और गीतकार नरेंद्र सिंह नेगी संग लेखिका (दाएं)
ले मैं नरेंद्र नेगी जी द्वारा रचित उस भजन की पंक्तियां भी लिख देती हूं। इसे सुनकर ही इस स्थान के बारे में बहुत कुछ पता लग जाता है। नरेंद्र नेगी जी ने इसे बहुत ही सहज भाव से अपने ठेठ पहाड़ी स्वर में गाया है और अगर अपने भीतर शिव जागृत कर लिए हैं तो ये भजन आपको बहुत मोहेगा।
हिम वन्त देश होला त्रिजुगी ना
देवता में देव ठुला त्रिजुगी नारैन
पार्वती को मैत यख
शिवजी को सौरास
तीन जुग बटी धुनि जागी चा
पूजा बारा मास
हिमालय का राजा करदा
कन्या को दान
पार्वती संग फेरा फेरदा
शंकर भगवान
एकादशी को मेला लगद
भादो को मास
दीन दुखियों की सारो छैई
औतो की आस
पूरब दिशा मा रौंदा बिर खेत्र पाल
दिन रात पूजा लांदा
सभी बाल गोपाल
हिंवंत देश होला
त्रिजुगी नारायण
केदारनाथ यात्रा में जाने वाले श्रद्धालु इस मंदिर के दर्शन के लिए अवश्य जाते हैं। रुद्रप्रयाग जनपद में मंडल चैपटा की सुरम्य वादियों में ये मंदिर स्थित है। जब आप यहां पहुंचते हैं तो सच में भान होता है कि किसी और ही युग में पहुंच गए हंै। एक प्राचीन सुंदर मंदिर जिसमें अंदर सच में मंडप जैसे ही मंदिर सजा हुआ है। जब आपको पुरोहित आपको बताते हैं ये वही स्थान है जहां शिव पार्वती का विवाह हुआ था तब कुछ क्षण के लिए रौंगटे खड़े हो जाते हैं। दो दशक पहले जब मैं पहली बार इस मंदिर गई थी तब शिव पार्वती का स्मरण करने पर टीवी पर आने वाले शिव पार्वती ही मन में आते थे और उनकी विराटता को समझने की समझ विकसित नहीं हुई थी। फिर भी मैं वहां से कुछ राख घर ले आई थी जो आज भी थोड़ी-सी हमारे घर के मंदिर में रखी हुई है।
पौराणिक कथाओं के अनुसार सबसे पहले दक्षपुत्री माता सती का विवाह भगवान शिव से हुआ था और जब वो अग्नि में समा गई थीं, उसके बाद शिव जी उनके पार्थिव शरीर को लेकर हिमालय गए और जहां-जहां उनके अंग गिरे वहां-वहां पहाड़ों में शक्ति पीठ स्थापित हैं। इसके बाद भगवान शिव एक गहरे ध्यान में चले गए। हजारों वर्षों के पश्चात सती का पुनर्जन्म पार्वती के रूप में हुआ, जो हिमवत और मैनावती की बेटी थीं और एक राजकुमारी थीं। हिमालय क्षेत्र में वो शिव को पाने के लिए गौरीकुंड में तपस्या करती हैं। नवरात्रि के क्रम में हम माता के इन रूपों का विस्तार होते देखते हैं। खैर आज विषय मैं त्रिजुगीनारायण के संदर्भ में ही अपनी बात रखूंगी। एक कठोर तप के पश्चात अंततः पार्वती के अभीष्ट भगवान शिव विवाह के लिए राजी होते हैं और माता पार्वती के माता-पिता भी अपनी स्वीकृति दे देते हैं। जो स्थान विवाह के लिए निश्चित हुआ, वही स्थान हमारी यात्रा का आज का पड़ाव है।
कहते हैं कि माता पार्वती और शिव के इस विवाह में भगवान ब्रह्मा और विष्णु भगवान ने अहम कार्य किया था। जहां भगवान विष्णु ने माता पार्वती के भाई के दायित्व निर्वहन किए वहीं भगवान ब्रह्मा ने इस विवाह को स्वयं संपन्न करवाया। विवाह से पूर्व उन्होंने जिन स्थानों पर स्नान किया वो आज भी इस मंदिर में ब्रह्मा और विष्णु कुंड के रूप में स्थापित है। एक ओर कुंड है रुद्र कुंड जहां सभी देवी देवताओं ने स्नान किया था। इसी कुंड में एक पतली से डंडी बंधी हुई है। मान्यता अनुसार विवाह वेदी पर भगवान शिव को एक गाय मिली थी वो इसी डंडी से बांधी गई थी।
इसके अलावा यहां नारद कुंड और सरस्वती कुंड भी है। सरस्वती गंगा नामक जलधारा इस प्रांगण में उत्पन्न होती है। इसकी उत्पत्ति विष्णु जी की नाभि से हुई थी। रुद्र कुंड स्नान के लिए, विष्णु सफाई के लिए, ब्रह्मा घूंट पीने के लिए और सरस्वती अघ्र्य देने के लिए है। यहां तीन युगों से धूनी प्रज्वलित है। आज भी भारत वर्ष में जितने बड़े महायज्ञ होते हैं उसमें साधक यहां से धूनी ले जाते हैं। पहाड़ में कहते हैं यदि आप कभी संकट में हो तो धूनी की विभूति लगाने से आपके भीतर के डर का क्षय हो जाता है। ये घर-घर में आजमाई हुई बात है। छोटे बच्चों के रोने से लेकर किसी के बीमार होने पर बड़े बुजुर्ग धूनी यज्ञ आदि की धूनी लाकर लगा देते हैं और साहस बंध जाता है।
पौराणिक कथा के अनुसार राजा बलि ने इंद्रासन पाने की इच्छा से सौ यज्ञ करने का निश्चय किया और निन्यानबे यज्ञ होने के पश्चात भगवान विष्णु ने वामन अवतार धारण करके राजा बलि का अंतिम यज्ञ भंग कर दिया, तबसे इस स्थान पर भगवान विष्णु की वामन देवता अवतार में पूजा-अर्चना की जाती है और द्वादशी पर एक मेला भी लगता है जिसमें निसंतान दंपति विशेष पूजन करते हैं। मंदिर में भगवान विष्णु (नारायण) की एक चांदी की 2 फुट की प्रतिमा है, जिसके साथ माता लक्ष्मी और सरस्वती मां भी हैं।
मंदिर के सामने, अखंड ज्योति वाला हवन-कुंड स्थापित है। यही वह वेदी है जो शिव और पार्वती के विवाह की साक्षी है। भक्त ज्वाला में समिधा (लकड़ी की बलि) डालते हैं और आशीर्वाद के रूप में राख एकत्र करते हैं। मंदिर के सामने ब्रह्माा शिला नामक एक पत्थर को दिव्य विवाह का सटीक स्थान माना जाता है। ये प्रथा अभी नई-नई आरम्भ हुई है। अगर मुझे सही याद है तो त्रिवेंद्र सिंह रावत जी ने अपने मुख्य मंत्री कार्यकाल में यहां डेस्टिनेशन वेडिंग को बढ़ावा देने के प्रयास किए थे। हालांकि उनका ये निर्णय आस्था संग खिलवाड़ सरीखा है। ऐसा इसलिए क्योंकि तब
वैवाहिक कार्यक्रम बाद पसरी गंदगी ने न केवल इस पवित्र स्थल की पावनता को छिन्न-भिन्न कर डाला था, बल्कि भारत के बड़े औद्योगिक परिवार को औली की वादियों में डेस्टिनेशन वेडिंग करने की अनुमति दी गई और सभी तरह की मदद भी कराई गई तब इस डेस्टीनेशन इवेंट के बाद चैतरफा पर्यावरण चिंतकों के लिए ये एक बेहद खराब संदेश भी था। 200 करोड़ की इस शाही शादी में हिमालय की बड़ी दुर्दशा हुई थी। इस मामले में हाइकोर्ट में पर्यावरणविद् रक्षित जोशी ने याचिका भी दायर की थी। इस बात का जिक्र इसलिए क्योंकि तत्कालीन मुख्यमंत्री के इस निर्णय बाद उत्तराखण्ड में डेस्टिनेशन वेडिंग के लिए चुने जाने वाले स्थानों के लिए उनकी दूरदर्शिता पर सवाल उठे थे। अचानक सेलिब्रिटीज में त्रिजुगीनारायण में विवाह करने की होड़-सी लग गई थी। अग्नि तो हर स्थान में हम सनातनियों के लिए देव स्वरूप लिए ही होती है और विवाह की वेदी पर तो वर और कन्या को विष्णु और लक्ष्मी ही माना जाता है फिर भी आजकल की माॅडर्न वेडिंग्स में विचारों, कर्म और मन की इस शुचिता पर क्या ध्यान दिया जाता होगा इस विषय पर सोचने का कार्य मैं पाठकों पर छोड़ती हूं।
वापस चलते हैं इस भव्य मंदिर के प्रांगण में जहां मेरी अल्प समझ से त्रिजुगी से तात्पर्य सिर्फ तीन युगों से नहीं है, बल्कि त्रिदेव से भी है। ब्रह्मा, विष्णु, महेश तीनों देवों की एक ही प्रांगण में लीला करने का और कोई स्थान मेरे ज्ञान के दायरे से बाहर है। अब अगर तर्क से देख जाए तो उल्लेख ये मिलता है कि शिव पार्वती का विवाह सम्भवतः सतयुग में हुआ था। वामन अवतार की घटना त्रेता युग की है और दोनों ही अद्भुत संयोगों के लिए त्रिजुगीनारायण मंदिर ही जाना जाता है। अतएव, ये कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि सम्भवतः ये दुनिया का सबसे प्राचीन मंदिर है। अपने भीतर युगों का इतिहास समेटे हुए। इन्हीं वादियों में देव विचर रहे थे। यहीं दिव्य संयोग बन रहे थे। अब हिमालय तो न्यू एज माउंटेन के तौर पर जाना जाता रहा है तो युगों पहले हिमवन्त राजा कौन से हिमालय में राज कर रहे थे? शायद हिमालय पहले भी था और फिर युगांत के साथ शून्य हो गया हो और फिर पुनः प्रकट हुआ हो। ऐसी कई जिज्ञासाएं मेरे भीतर उठती रहती हैं। शक्ति के संयोग का उत्सव होना चाहिए। संयोग से शिवरात्रि भी आ रही है। इस बार शिवरात्रि में भगवान त्रिजुगीनारायण का अवश्य ध्यान लगाएगा और मन में इच्छा कीजिएगा कि इस पवित्र धूनी के दर्शन करने अवश्य जाएं। साथ ही हिमालय के गूढ़ रहस्यों को समझने की शक्ति भी शिव हमें दें।
अब प्रसंग शिवरात्रि का उठा है तो शिव पार्वती की अद्भुत योगिक कथा की तरफ भी चलते हैं। पार्वती हिमालय की राजकुमारी थी और लगभग 3000 वर्ष तक शिव को पाने के लिए तपस्यारत थी। लेकिन काल से परे भी शक्तियां हांे तो भी मां का हृदय उसी तरह कांपेगा जिस तरह हम लौकिक माताओं का। पार्वती की माता मैना ने जब जटाधारी शिव को राख से लिपटे हुए देखा। परमानंद में खोए हुए शिव के साथ उनकी बरात में सब तरह के विक्षिप्त और विकृत जीव चल रहे थे ऐसा नजारा देख कर माता क्लांति में बेहोश हो गई। पार्वती तो शिव के हर स्वरूप से परिचित थी तब वो शिव जी से आग्रह करती है कि माता के लिए थोड़ा मधुर रूप धारण कर लें। कहते हैं जो स्वरूप शिव ने धरा वो आज तक लोक परलोक में किसी ने नहीं देखा था। सुंदरता की साक्षात शिव मूर्ति ने सभी को उस रूप में अत्यधिक मोह लिया था। पता नहीं क्यों इस मंदिर में उसकी एक झलक मुझे देखने को मिली। केदारनाथ की स्थापत्य शैली से ही इस मंदिर की शैली मिलती जुलती है लेकिन अग्र भाग को काष्ठ शिल्प से सजाया हुआ है सफेद और नील आभा लिए हिमालय के मध्य स्थापित इस स्थान पर सहज आभास होता है शिव जी सत्य है और सत्य ही सुंदर भी। ये भी कहा गया है कि हिमवन्त एक राजा थे तो उन्होंने कन्या के पिता होने के नाते वर की वंशावली के बारे में पूछना चाहा तब शिव मौन रहे और नारद ने अंततः अपना इकतारा बजाया और कहा स्वर का नाद ही इनका उद्गम है। इनका कोई कुल नहीं कोई पूर्वज नहीं कोई वंशावली नहीं। ये स्वयं भू हैं स्वनिर्मित काल से परे।
अब इसको आध्यात्मिक दृष्टि से देखिए। आदियोगी के स्वरूप की विशेषता ही है मौलिक रूप शुद्ध चेतना कभी न दोहराए जाने वाले सहज और निरंतर रचनात्मक है। हम स्वयं का अवलोकन करें तो हम यादों की आस्था की विचारों की गठरी यानी एक प्रकार से एक मेमोरी स्टिक लेकर बैठे रहते हैं जो हमने बाहर से एकत्रित की है और एक तरह से मनोवैज्ञानिक तौर से गुलाम बन बैठे हैं। अस्तित्व ने आपके लिए हर चीज खुली रखी है। आत्मज्ञान के मार्ग पर शिव के स्वरूप को समझते हुए आगे बढ़ेंगे तो ये गहरे राज सहज मिलते जाएंगे। प्रकृति में शिव, मुक्त होने में शिव, भस्म में शिव और नाद में शिव। शक्ति का स्वरूप मां पार्वती है। शक्ति यानी प्राण शरीर के इसी साधन की शक्ति की उपयोगिता इसी में है कि जीवन रहते हम आत्म शिव से जुड़ जाएं। इस शिवरात्रि ये सत्संकल्प ले लीजिएगा। संकीर्णताओं से परे विस्तृण में शिव सहज मिल जाएंगे।
एक और विचार सहज उठता है सती माता लौकिक माया में उलझ कर स्वयं शिव के अनुरोध की अवहेलना कर गई थी और परिणाम में हजारों वर्षों की तपस्या के पश्चात ही उन्हें पुनः शिव का सानिध्य मिला। इसलिए लौकिक माया में उलझ कर मन वचन या कर्म से कोई ऐसा कार्य न हो जो शिव से दूर करें। आप सभी को शिव शक्ति संयोग उत्सव
शिवरात्रि की शुभकामनाएंसाम्ब सदाशिव!