नरसिम्हा राव विलक्षण प्रतिभा के धनी व्यक्ति थे। उन्हें सीखने और सीखने की अद्भुत ललक थी। 1985 में एक दिन उनकी उपस्थिति में राजीव गांधी ने अपने एक मित्र को शिकायत भरे लहजे में कहा कि वे इलेक्ट्रॉनिक्स और कम्प्यूटर्स को भारत में लाना चाहते हैं लेकिन उनकी पार्टी के पुराने नेता ऐसा करने के इच्छुक नहीं हैं। राव ने राजीव की बात सुन ली। उन्होंने उसी शाम अपने इंजीनियर बेटे प्रभाकर से जानना चाहा कि कम्प्यूटर क्या होता है- ‘तुम हमेशा किसी चीज कम्प्यूटर की बात करते रहते हो। क्या है यह? एक कम्प्यूटर मुझे भेजो।’ अगले दिन ही प्रभाकर ने एक कम्प्यूटर दिल्ली भेज दिया। साथ ही अपने पिता को कम्प्यूटर सिखाने के लिए एक विशेषज्ञ भी नियुक्त कर डाला। तकनीकि के प्रति सदा उत्सुक रहने वाले राव ने स्व अध्ययन शुरू किया और मात्र पंद्रह दिनों के भीतर उन्होंने अपने शिक्षक को कह दिया कि अब उन्हें उसकी आवश्यकता नहीं है। आने वाले कुछ वर्षों में राव दो कम्प्यूटर भाषाओं-‘कोबोल’ और ‘बेसिक’ में पारंगत हो गए। इतना ही नहीं उन्होंने कम्प्यूटर के लिए कोड (कम्प्यूटर प्रोग्राम) तक लिखना शुरू कर दिया। नरसिम्हा राव की जिज्ञासु प्रवृत्ति और राजनीति में बने रहने की उनकी कला अब एक हो उठी थी।
1985 के उतरार्ध में राजीव गांधी ने उन्हें शिक्षा मंत्री बना नई शिक्षा नीति तैयार करने की जिम्मेवारी सौंपी थी। राव की सलाह पर राजीव ने संस्कृति, युवा मामले, खेल तथा महिला एवं बाल विकास मंत्रालयों को शिक्षा मंत्रालय के साथ मिला मानव संसाधन विकास मंत्रालय का गठन किया जिसके पहले मंत्री नरसिम्हा राव बनाए गए थे। 1986 में उनके दिशा निर्देशन में ही नई शिक्षा नीति को लागू की गई थी। राजीव गांधी सरकार के अंतिम वर्ष में उन्हें विदेश मंत्रालय का प्रभार सौंपा गया था।
1989 के आम चुनाव में कांग्रेस की हार के बाद नरसिम्हा राव ने राजनीति से संन्यास लेने का मन बना लिया था। 1984 में इंदिरा गांधी की हत्या बाद हुए सिख विरोधी दंगों के समय राव देश के गृह मंत्री थे। उन पर आरोप लगा था कि उन्होंने इन दंगों को समय पर रोकने के लिए बतौर गृह मंत्री कोई प्रयास नहीं किए। विशेषकर दिल्ली में हजारों सिखों की हत्या, सिख महिलाओं संग बलात्कार और उनकी संपत्तियों को आग के हवाले किए जाने के दौरान राव मूक दर्शक बने रहे थे। उनकी इस निष्क्रिय कार्यप्रणाली के बावजूद राजीव गांधी का उन पर भरोसा बना रहा था। पी.वी. नरसिम्हा राव लेकिन राजीव सरकार की कार्यशैली से नाखुश रहने लगे थे। 1989 में कांग्रेस की हार के बाद उनके द्वारा ‘मेनस्ट्रीम’ पत्रिका में लिखा गया यह आलेख पुष्टि करता है कि राजीव संग उनके रिश्तों में खटास आ चुकी थी। ‘द ग्रेट सुसाइड’ (महान आत्महत्या) शीर्षक से यह लेख अंग्रेजी मासिक ‘मेनस्ट्रीम’ के जनवरी, 1990 अंक में प्रकाशित हुआ था जिसमें बतौर लेखक राव का नाम न होकर लिखा गया था कि यह लेख एक वरिष्ठ कांग्रेसी नेता द्वारा लिखा गया है। हालांकि राव ने सीधे अपना नाम देने से परहेज किया था लेकिन यह सर्वविदित है कि इस लेख को उन्होंने ही लिखा। राव इस लेख में राजीव गांधी की खुलकर आलोचना से नहीं चूके। उन्होंने कठोरतम शब्दों में राजीव और उनके युवा सलाहकारों को खरी-खोटी सुनाने का जो साहस किया उससे स्पष्ट होता है कि वे अब राजनीति को अलविदा कहने का मन बना चुके थे। राव ने लिखा-‘…415 सांसदों वाले एक मजबूत नेता और प्रधानमंत्री के अचानक उभरने से वरिष्ठ कांग्रेसियों और सलाहकारों को भयभीत करने का काम किया। राजीव गांधी को उनकी क्षमताओं की बाबत बढ़ा-चढ़ाकर बताया जाने लगा जिसे उन्होंने स्वीकार भी लिया। उनके सलाहकारों ने भी अपने नेता की बाबत इस धारणा को स्वीकारने में देर नहीं लगाई। इसका नतीजा यह कहा कि जो कुछ राजीव ने सोचा, वही उनके सलाहकारों ने भी सोचना शुरू कर दिया। अपनी असीमित क्षमताओं को राजीव ने महसूसा और उनके सलाहकारों ने भी उसे स्वीकार लिया। यही वह समय था-1984 के चुनाव के तुरंत बाद जब पतन के पहले बीज जमीन पर बो दिए गए थे। प्रणव मुखर्जी के हश्र बाद, हर वह व्यक्ति जो बोल सकता था, खामोश हो गया। अब जो कुछ राजीव गांधी ने कहा या किया, वही सत्य था…अपनी युवा मंडली से जो कुछ राजीव सुनते वह उनकी भरपूर प्रशंसा के सिवा और कुछ नहीं होता था। उन्हें चाटुकारिता की लत लग गई थी। बुजुर्ग कांग्रेसी या तो इस कोरस का हिस्सा बन गए थे या फिर खामोश तमाशबीन बन गए थे।’
नरसिम्हा राव को कांग्रेस नेतृत्व द्वारा स्पष्ट संकेत मिलने लगे थे कि पार्टी उन्हें अगला लोकसभा चुनाव लड़ाने की इच्छुक नहीं है। इसी बीच राव को तमिलनाडु की एक धार्मिक संस्था सिद्देश्वरी पीठ का प्रमुख बनाए जाने की बात भी उठी थी। नरसिम्हा राव इस पीठ के प्रति अगाध श्रद्धा रखते थे। 1990 के पूर्वाध में पीठ अपने नए प्रमुख को तलाश रहा था। उसने नरसिम्हा राव को राजनीति छोड़ पीठाधिपति बनने का प्रस्ताव भेजा। राव ने हालांकि इस प्रस्ताव को तत्काल नहीं स्वीकारा लेकिन उन्होंने स्पष्ट रूप से मना भी नहीं किया। अप्रैल 1991 में राजीव गांधी ने राव को स्पष्ट कर दिया कि इस बार उन्हें पार्टी टिकट नहीं देने जा रही है। राजीव ने उन्हें पार्टी का चुनावी घोषणा पत्र तैयार करने की जिम्मेवारी सौंपी थी। राव के समक्ष अब राजनीति से संन्यास लेने सिवा कोई विकल्प नहीं बचा था। राजीव गांधी ने उन्हें महाराष्ट्र से राज्यसभा सीट दिए जाने की बात भी कही थी। नरसिम्हा राव ने तय किया कि वे अपने गृह प्रदेश की राजधानी हैदराबाद में अपने पुत्र राजेश्वर राव के साथ रहेंगे। साथ ही उन्होंने महाराष्ट्र से राज्यसभा की सम्भावित उम्मीदवारी को ध्यान में रखते हुए एक किराए का फ्लैट बम्बई (अब मुम्बई) में भी ले लिया। इस बीच उन्होंने सिद्देश्वरी पीठ को पत्र लिखकर वहां का दायित्व संभालने के लिए भी अपनी सहमति दे दी थी।
21 मई, 1991 के दिन घटित एक घटना ने लेकिन सब कुछ बदल डाला। राजीव गांधी की लिट्टे उग्रवादियों द्वारा हत्या ने साधु बनने जा रहे नरसिम्हा राव को न केवल राजनीति में बने रहने, बल्कि प्रधानमंत्री बना भारत के इतिहास में महत्वपूर्ण हस्तक्षेप करने की राह प्रशस्त कर डाली। राव का कांग्रेस अध्यक्ष और चुनाव नतीजों बाद प्रधानमंत्री बनना सोनिया गांधी के समर्थन चलते ही सम्भव हो पाया था। महाराष्ट्र के तत्कालीन मुख्यमंत्री शरद पवार और इंदिरा एवं राजीव सरकार में मंत्री रह चुके उत्तर प्रदेश के कद्दावर नेता नारायण दत्त तिवारी का नाम नए कांग्रेस अध्यक्ष बतौर उभरा था लेकिन सोनिया गांधी इन दोनों नामों पर सहमत नहीं थी। उन्होंने इंदिरा गांधी के विश्वस्त सलाहकार पी.एन. हक्सर से सलाह-मश्विरा किया। हक्सर ने पहला नाम तत्कालीन उपराष्ट्रपति शंकर दयाल शर्मा का सुझाया। शर्मा ने लेकिन अपनी बढ़ती उम्र का हवाला देते हुए कांग्रेस अध्यक्ष पद सम्भालने से इनकार कर दिया। दूसरा नाम हक्सर ने पी.वी. नरसिम्हा राव का सोनिया गांधी के समक्ष रखा- ‘इस बार उन्होंने पामुलापट्टी वैंकट नरसिम्हा राव का नाम सुझाया। हक्सर का कहना था कि राव कई दशकों से पार्टी और सरकार का हिस्सा रह चुके हैं। वे बुद्धिजीवी हैं और उनका कोई शत्रु भी नहीं है। ऐसा व्यक्ति ही पार्टी को एकजुट रख सकता है। बकौल हक्सर अन्य के साथ पार्टी टूटने का खतरा हो सकता है। सोनिया हालांकि ज्यादा कुछ बोली नहीं लेकिन उन्हें राव का नाम जंच गया। राव उनके पति के करीबी तो नहीं थे लेकिन वे अपनी सीमा जानते थे। उन्होंने कभी भी प्रतिरोध नहीं किया था और न ही बगावत का प्रयास किया था। चुनावों के दौरान पार्टी को ऐसे ही नेतृत्व ही जरूरत थी जो सभी को साथ लेकर चल सके। राव के सिवा और किसी में यह क्षमता नहीं थी।’
29 मई, 1991 को अंततः राव कांग्रेस के अध्यक्ष चुन लिए गए। 18 जून को लोकसभा चुनाव के नतीजे घोषित हुए। कांग्रेस को राजीव गांधी की मृत्यु चलते पैदा हुई सहानुभूति लहर का भारी लाभ मिला और वह 232 सीटें जीत दसवीं लोकसभा में सबसे बड़ी पार्टी बन उभरी थी। भारतीय जनता पार्टी का प्रदर्शन हालांकि आडवाणी की अपेक्षा के अनुसार नहीं रहा, वह 120 सीट जीत पाने में सफल रही और 1989 की बनिस्पत उसका वोट शेयर 11 प्रतिशत से बढ़कर 20 प्रतिशत पहुंच गया था। कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी बन उभरी जरूर लेकिन सामान्य बहुमत का आंकड़ा नहीं पा सकी थी। तत्कालीन राष्ट्रपति आर. वेंकटरमन ने अल्पमत की सरकार के गठन की प्रक्रिया शुरू कर दी थी। 1989 में भी उन्होंने सबसे ज्यादा सीटें जीतने वाली कांग्रेस को सरकार बनाने का निमंत्रण दिया था जिसे संख्या बल न होने के नाते राजीव गांधी ने नहीं स्वीकारा था। कांग्रेस की न के बाद ही वेंकटरमन ने वी.पी. सिंह के नेतृत्व वाले नेशनल फ्रंट को सरकार बनाने का आमंत्रण दिया था। इस बार भी इसी प्रक्रिया को अपनाते हुए उन्होंने कांग्रेस को सरकार गठन के लिए आमंत्रित किया। उनके इस आमंत्रण से पहले कांग्रेस भीतर प्रधानमंत्री पद को लेकर भारी खींचतान का माहौल था। मराठा नेता शरद पवार और मध्य प्रदेश के दिग्गज कांग्रेसी नेता अर्जुन सिंह ने खुद के लिए खासी जोर आजमाइश की लेकिन सोनिया गांधी के समर्थन चलते लाटरी पी.वी. नरसिम्हा राव की ही लगी और वे प्रधानमंत्री बन पाने में सफल रहे। नरसिम्हा राव ने अपने मंत्रिमंडल में बतौर वित्त मंत्री ख्याति प्राप्त अर्थशास्त्री डॉ. मनमोहन सिंह को नियुक्त कर पहला लक्ष्य गंभीर आर्थिक संकट से उबरने का रखा। राव के लिए यह आसान नहीं, खासा जोखिम भरा लक्ष्य था क्योंकि इस संकट से बाहर निकलने का मार्ग नेहरू की साम्यवादी नीतियों से पूरी तरह हटकर पूंजीवाद के रास्ते होकर निकलता था जिसके लिए कांग्रेस भीतर तक राव को समर्थन जुटा पाना खासा चुनौती भरा साबित होने वाला था। राव और मनमोहन सिंह की जोड़ी ने लेकिन यह कर दिखाया। बकौल मनमोहन सिंह- ‘जो नकारा होते हैं उन्हें प्रतियोगिता से तकलीफ होती है। इसलिए खुली अर्थव्यवस्था के कारण, घरेलू प्रतिस्पर्धा और विदेशों से प्रतिस्पर्धा के चलते कुछ व्यक्तियों और उद्योगों को नुकसान होता है।’
नरसिम्हा राव और उनके वित्त मंत्री मनमोहन सिंह के लिए न केवल अल्पमत की सरकार होने चलते बड़े आर्थिक सुधारों को लागू करना बेहद कठिन था, बल्कि बड़े जमीनदारों, ट्रेड यूनियनों, बड़े औद्योगिक समूहों के साथ-साथ कांग्रेस में मौजूद उन ताकतवर राजनेताओं का विरोध भी खासी दिक्कतें पैदा करने वाला था जिनके हित राव सरकार की नीतियों से प्रभावित हो सकते थे। राव सरकार ने आर्थिक सुधारों की शुरुआत भारतीय रुपए के अवमूल्यन से की। यह राजनीतिक दृष्टि से खासा जोखिम भरा कदम था। आजादी बाद से ही भारतीय रुपया अमेरिकी डाॅलर की तुलना में कृत्रिम तरीके से मुल्यांकित किया जाता रहा था। सरल भाषा में इसे यूं समझा जा सकता है कि भारतीय मुद्रा की क्रय शक्ति अमेरिकी डाॅलर की तुलना में कम थी लेकिन इसे भारत नहीं स्वीकारता था। भारत से निर्यात की जाने वाली वस्तुओं पर आयात करने वाले देश को अधिक कीमत चुकानी पड़ती थी तो दूसरी तरफ भारत जिन वस्तुओं को आयात करता था उसका भुगतान वह डाॅलर और रुपए के मध्य तुलानात्मक आधार पर करता था। खुली अर्थव्यवस्था में मुद्रा की साख या उसकी क्रय शक्ति बाजार तय करता है। आजादी बाद पहली बार 19 सितम्बर, 1949 को भारतीय मुद्रा का अवमूल्यन किया गया था। तब 3.30 रुपए एक अमेरिकी डॉलर के बराबर हुआ करते थे जिनका अवमूल्यन कर 4.76 भारतीय रुपए एक अमेरिकी डॉलर के बराबर तय किए गए थे। 1966 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष और अमेरिका के भारी दबाव चलते दूसरी बार भारतीय रुपए का अवमूल्यन किया था। इन दोनों बार रुपए की अमेरिकी डॉलर की बनिस्पत कीमत केंद्र सरकार ने स्वयं तय की थी और बाजार अर्थव्यवस्था का इसमें सीधा हस्तक्षेप नहीं था। 1991 में लेकिन पहली बार वैश्विक बाजार की अर्थनीति को आधार बना राव सरकार के वित्त मंत्री डाॅ. मनमोहन सिंह ने रुपए का अवमूल्यन किए जाने का फैसला लिया। नरसिम्हा राव सरकार अल्पमत की सरकार थी। प्रधानमंत्री और वित्त मंत्री जानते थे कि उनके इस कदम को राष्ट्रीय स्वाभिमान के साथ जोड़ कर देखा जाएगा और विपक्षी दल इसे बड़ा मुद्दा बनाने का प्रयास अवश्य करेंगे। राव सरकार के समक्ष लेकिन दूसरा कोई विकल्प रसातल में पहुंच चुकी अर्थव्यवस्था को बचाने का था नहीं। अंतरराष्ट्रीय मुद्राकोष बड़े आर्थिक सुधारों के लिए दबाव बना रहा था और स्वयं राव के वित्त मंत्री मनमोहन सिंह ऐसे सुधारों के प्रबल पैरोकार थे। नरसिम्हा राव उस पीढ़ी के राजनेता थे जिनकी नजरों में राष्ट्रीय मुद्रा का अवमूल्यन राष्ट्रीय स्वाभिमान संग समझौता समान था। 1966 में इंदिरा गांधी सरकार द्वारा किए गए अवमूल्यन का नतीजा भी राव के लिए बड़ी असमंजसता पैदा कर रहा था। इस अवमूल्यन के बाद भी अमेरिका ने भारत को अपेक्षित सहयोग नहीं दिया था और अमेरिकी नियंत्रण वाले अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थाओं ने भी असहयोगात्मक रुख बरकरार रखा था।
तत्कालीन राष्ट्रपति आर. वेंकटरमण जो स्वयं इंदिरा सरकार में वित्त मंत्री रह चुके थे, भारतीय मुद्रा के अवमूल्यन के पक्षधर नहीं थे। बकौल वेंकटरमण- ‘सरकार अब गंभीर वित्तीय संकट में आ चुकी थी और किसी भी वक्त विदेशी मुद्रा के अपने दायित्वों को पूरा करने में चूक सकती थी। अंतरराष्ट्रीय मुद्राकोष रुपए का अवमूल्यन किए जाने पर अड़ा हुआ था और अतिरिक्त ऋण देने के लिए इसे शर्त बना चुका था। प्रधानमंत्री, वित्त मंत्री और रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया के गवर्नर इस दौरान कई बार मुझसे मिले। मैंने उन्हें स्पष्ट कहा कि आधिकारिक रूप से रुपए का अवमूल्यन किए जाने का भारी विरोध होगा और सरकार संकट में आ जाएगी।’