दिसम्बर 1992 में नरसिम्हा राव ने मध्य प्रदेश, राजस्थान और हिमाचल प्रदेश की भाजपा नेतृत्व वाली राज्य सरकारों को भंग कर दिया था। भंग किए जाने के पीछे इन राज्यों के मुख्यमंत्रियों का राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ का सदस्य होना था। बाबरी मस्जिद तोड़े जाने के बाद संघ को प्रतिबंधित भी कर दिया गया था। राव सरकार के इस निर्णय को उच्चतम न्यायालय में चुनौती दी गई। उच्चतम न्यायालय पहले से ही संविधान के अनुच्छेद 356 की वैधता पर सुनवाई कर रहा था। अनुच्छेद 356 किसी भी राज्य में राष्ट्रीय शासन लगाए जाने का अधिकार केंद्र सरकार को देता है। आजादी बाद से ही इस अनुच्छेद का कई बार दुरुप्रयोग कर केंद्र की सरकारों ने विपक्षी दलों की सरकार को भंग किया था। संविधान सभा की बैठक में डाॅ. भीमराव अम्बेडकर ने अनुच्छेद 356 की बाबत यह उम्मीद जाहिर की थी कि यह अनुच्छेद कभी भी उपयोग में नहीं लाया जाएगा और यदि इसका इस्तेमाल किया भी गया तो राष्ट्रपति इसका दुरुपयोग नहीं होने देंगे- ‘मैं अपनी इस भावना को साझा करना चाहता हूं कि मेरे अनुसार ऐसे अनुच्छेदों को कभी भी अमल में नहीं लाया जाएगा और वे मृतप्राय बने रहेंगे। यदि कभी इनको अमल में लाया भी जाता है तो राष्ट्रपति, जिनके पास इन्हें लागू करने का अधिकार है, इनका इस्तेमाल करने में पूरी सावधानी बरतेंगे। राज्य सरकारों को बर्खास्त करने से पहले वे ऐसी सरकार को चेतावनी जारी करेंगे कि उनके अनुसार राज्य में संविधान सम्मत शासन नहीं चल रहा है, यदि यह चेतावनी बेअसर रहती है तो राष्ट्रपति सम्बंधित राज्य में नए चुनाव कराए जाने का निर्णय लेंगे ताकि राज्य की जनता स्वयं फैसला ले सके। इन दोनों उपायों की विफलता के बाद ही राष्ट्रपति को इस अनुच्छेद (राष्ट्रपति शासन) का सहारा लेना चाहिए।’
डाॅ. अम्बेडकर लेकिन गलत साबित हुए। आजादी के मात्र 7 बरस बाद ही केंद्र सरकार ने 1954 में इस अनुच्छेद के जरिए पंजाब प्रांत की सरकार को बर्खास्त कर दिया था। इसके बाद कई बार केंद्र की सरकारों ने विपक्षी दलों की राज्य सरकारों को इस अनुच्छेद के जरिए अपदस्थ करने का काम किया। 1989 में कर्नाटक के सत्तारूढ़ दल जनता दल में टूट हो गई थी। राज्य में तब एसआर बोम्मई की सरकार थी। राज्यपाल ने इस टूट को आधार बनाते हुए राज्य में राष्ट्रपति शासन लगाए जाने का फैसला ले लिया। इस फैसले के विरोध में एसआर बोम्मई ने कर्नाटक उच्च न्यायालय में याचिका दायर की जिसे न्यायालय ने खारिज कर दिया। बोम्मई अब उच्चतम न्यायालय की शरण में जा पहुंचे। अगस्त 1988 में नागालैंड की सरकार को भी अनुच्छेद 356 के जरिए बर्खास्त किया जा चुका था। अक्टूबर 1991 में मेघालय की सरकार भी इसी अनुच्छेद के सहारे हटा दी गई। दिसम्बर 1992 में बाबरी मस्जिद तोड़े जाने बाद नरसिम्हा राव ने भाजपा शासित मध्य प्रदेश, हिमाचल प्रदेश और राजस्थान की सरकारों को अपदस्थ कर डाला। इन सभी मामलों की सुनवाई एसआर बोम्मई की याचिका के साथ जोड़ कर उच्चतम न्यायालय में की गई। 11 मार्च 1994 को उच्चतम न्यायालय ने एसआर बोम्मई बनाम भारत गणराज्य मुकद्दमें में अपना ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए अनुच्छेद 356 के अंधाधुंध दुरुपयोग करने की प्रवृत्ति को रोकने सम्बंधी दिशा निर्देश जारी कर दिए। यह केंद्र और राज्यों के मध्य सम्बंधों के दृष्टिगत बेहद महत्वपूर्ण फैसला माना जाता है। उच्चतम न्यायालय ने अपने आदेश में स्पष्ट निर्देश दिए कि बहुमत का फैसला राजभवन में नहीं किया जा सकता है, केवल राज्य विधानसभा में ही शक्ति परीक्षण के जरिए इसका फैसला वैधानिक होगा। न्यायालय ने यह भी स्पष्ट निर्देश दिए कि अनुच्छेद 356 को तभी इस्तेमाल में लाया जा सकता है जबकि राज्य में संवैधानिक तंत्र के समाप्त होने का संकट पैदा हो जाए। उच्चतम न्यायालय के इस निर्णय पश्चात अनुच्छेद 356 के दुरुपयोग पर काफी हद तक रोक लगी है लेकिन जिन राज्यों की सरकारों की बर्खास्तगी को चुनौती देते हुए यह मुकदमा सुना गया था, उनकी सत्ता में वापसी नहीं हो पाई क्योंकि निर्णय आने में लम्बा समय लगा था और तब तक इन राज्यों में नए चुनाव कराए जा चुके थे।
बाबरी मस्जिद विध्वंस ने नरसिम्हा राव के समक्ष विश्वसनीयता का भारी संकट जरूर पैदा किया लेकिन इससे उनके आर्थिक सुधारों की गति नहीं रूकी थी। 1993 में देश में पहली बार निजी क्षेत्र के सहयोग से टाॅल रोड का निर्माण किया गया। राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण ने ‘बोट’ (बिल्ड आपरेट ट्रांस्फर) नीति के जरिए निजी क्षेत्र को राष्ट्रीय राजमार्गों के निर्माण, उनका संचालन एवं जब टाॅल टैक्स के जरिए सड़क निर्माण की लागत निकल जाए तो उसे सरकार को सौंप देने की महत्वपूर्ण पहल शुरू की जो आधारभूत ढांचे में गुणवत्ता एवं विस्तार का कारण बनी। राव सरकार ने बिजली उत्पादन को बढ़ाने की नीयत से कोयला खदानों को बिली, स्टील तथा सीमेंट उत्पादन करने वाली निजी कम्पनियों को देने की शुरुआत की थी। यह राष्ट्रीय सम्पदा को सरकारी नियंत्रण में रखने वाली नेहरूकालीन नीति से ठीक उलट कदम था जिसके लिए राव-सिंह जोड़ी को विपक्षी दलों के साथ-साथ कांग्रेस भीतर भी भारी आलोचना का शिकार होना पड़ा। विपक्षी दल राव सरकार की आर्थिक नीतियों को ‘घोर पूंजीवाद’ कह पुकारने लगे थे और सरकार पर इस उदारीकरण की आड़ में आर्थिक भ्रष्टाचार में लिप्त होने के आरोप भी खुलकर लगाने लगे थे। निजी क्षेत्र की कम्पनियों को ऊर्जा के क्षेत्र में पूंजी निवेश करने की नियत में भ्रष्टाचार के आरोपों को तब खास बल मिला जब एक अमेरिकी ऊर्जा कम्पनी ‘एनराॅन’ को महाराष्ट्र में गैस आधारित ऊर्जा सयंत्र लगाए जाने की इजाजत दी गई। इसे ‘एनराॅन ऊर्जा घोटाला’ कहा जाता है।
कहानी एनराॅन की वर्ष 1992 में अमेरिका की कम्पनी एनराॅन ने महाराष्ट्र सरकार के समक्ष 2,184 मेगावाट क्षमता का एक गैस आधारित बिजली उत्पादन संयंत्र स्थापित करने का प्रस्ताव रखा था। तब राज्य में कांग्रेस की सरकार थी और शरद पवार राज्य के मुख्यमंत्री थे। एनराॅन के इस प्रस्ताव में महाराष्ट्र के रत्नागिरि जिले के शहर दाभोल में परियोजना को स्थापित करने की बात कही गई थी। इस परियोजना के जरिए उत्पादित बिजली को 20 वर्ष तक महाराष्ट्र सरकार द्वारा खरीदे जाने तथा इस सहमति पत्र को भारत सरकार द्वारा सम्प्रभु गारंटी दिए जाने का प्रावधान था। महाराष्ट्र के विपक्षी दल विशेषकर शिवसेना इस परियोजना को राष्ट्रीय हितों के साथ खिलवाड़ कह विरोध में उतर आए थे। भाजपा और शिवसेना उन दिनों विदेशी पूंजी निवेश की घोर विरोधी हुआ करती थी। उनके उकसावे पर रत्नागिरि जिले के किसान राज्य सरकार द्वारा इस परियोजना के लिए अधिग्रहित की जा रही जमीन के विरोध में उतर आए थे। एनराॅन परियोजना को लेकर एक बड़ा आरोप बिजली की दर को लेकर था। महाराष्ट्र सरकार संग हुए करार अनुसार 8 रुपया प्रति किलो वाॅट बिजली खरीदी जानी थी और यदि किसी कारण सरकार बिजली नहीं खरीदती है तो भी उसे इस बिजली संयंत्र की देखरेख के लिए डाभोल पावर कम्पनी को निश्चित धनराशि दिए जाने का प्रावधान था। नरसिम्हा राव सरकार की उदारीकरण नीति एनराॅन परियोजना प्रकरण चलते गहरे विवादों में आ गई थी। बाद के वर्षों में इस परियोजना के विफल होने चलते राव सरकार पर लगे आरोप काफी हद तक प्रमाणित भी हुए। 1995 में महाराष्ट्र में विधान चुनाव बाद कांग्रेस सत्ता से बाहर हो गई और शिवसेना-भाजपा महाराष्ट्र की सत्ता में स्थापित हुई थी। भारतीय राजनीति और राजनीतिक दलों का दोमुंहापन एनराॅन परियोजना के शिवसेना-भाजपा गठबंधन द्वारा भारी विरोध और सत्तारूढ़ होने बाद उसका पैरोकार बनने से समझा जा सकता है। शिवसेना-भाजपा सरकार ने सत्ता सम्भालने के तुरंत बाद अगस्त 1995 में इस परियोजना को रोके जाने का निर्णय लिया लेकिन कुछ ही अर्से के भीतर फरवरी 1996 में एनराॅन के साथ एक नया करार कर इस परियोजना को दोबारा से शुरू कर दिया था। यह परियोजना लेकिन कभी भी पूरी तरह मूर्तरूप नहीं ले पाई। फरवरी 1996 में शिवसेना-भाजपा सरकार ने एनराॅन के साथ कांग्रेेसकाल में हुए अनुबंध में संशोधन कर इसे दोबारा शुरू करने की घोषणा की थी। 1999 में इस परियोजना का पहला चरण शुरू भी हुआ लेकिन तब तक इसकी लागत अपने तय बजट से कहीं अधिक जा पहुंची थी और एनराॅन कंपनी अमेरिका में दिवालिया घोषित होने की कगार पर पहुंचने लगी थी। नतीजा एक बार फिर इस परियोजना का अधर पर लटकना रहा। अक्टूबर 199 में राज्य विधानसभा के लिए हुए चुनाव में सत्तारूढ गठबंधन की हार बाद महाराष्ट्र में कांग्रेस की सरकार का गठन हुआ था। नए मुख्यमंत्री विलासराव देशमुख ने एनराॅन परियोजना में कथित घोटालों की जांच के लिए एक पांच सदस्यीय कमेटी का गठन पूर्व केंद्रीय गृह सचिव माधव गोडबोले की अध्यक्षता में करा था। इस कमेटी ने अप्रैल 2001 में अपनी रिपोर्ट सरकार को सौंपी जिसमें इस परियोजना को पूरी तरह से अपारदर्शी बताते हुए एनराॅन के साथ हुए शुरुआती अनुबंध के लिए तत्कालीन कांग्रेसी मुख्यमंत्री शरद पवार, 1996 में इस अनुबंध को संशोधित करने वाली शिवसेना-भाजपा सरकार के मुख्यमंत्री मनोहर जोशी और 1996 में राज्य सरकार द्वारा संशोधित अनुबंध को अपनी स्वीकृति देने वाली भाजपा सरकार (1996 में पहली बार भाजपा के नेतृत्व में केंद्र में अल्पमत की सरकार बनी थी जिसका नेतृत्व अटल बिहारी वाजपेयी ने किया था। यह सरकार मात्र 13 दिन बाद ही लोकसभा में बहुमत साबित न कर पाने के कारण गिर गई थी।) की कड़ी आलोचना की थी। कमेटी ने अपनी रिपोर्ट में कहा-‘The Committee has prima facie found infirmities in several decisions taken in respect of the Enron project at different points of time by successive governments and agencies in the Centre and State’32 (कमेटी ने प्रथम दृष्टया यह पाया है कि केंद्र एवं राज्य की एजेंसियों ने समय-समय पर कई ऐसे निर्णय लिए जो सही नहीं थे।)
क्रमशः

