पश्चिमी दबाव, यूक्रेन युद्ध, चीन-अमेरिका टकराव और ट्रम्प की सख्त व्यापार नीति के बीच रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की भारत यात्रा केवल एक औपचारिक राजनयिक दौरा नहीं रही बल्कि यह पूरी दुनिया को यह संदेश देने वाली यात्रा बनी कि भारत और रूस की रणनीतिक दोस्ती आज भी उतनी ही मजबूत है जितनी शीत युद्ध के दौर में थी। तेल, रक्षा, परमाणु ऊर्जा, कनेक्टिविटी और ग्लोबल साउथ की राजनीति में इस यात्रा के दूरगामी असर होंगे
चार दिसम्बर की सुबह जब रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन का विमान नई दिल्ली के इंदिरा गांधी अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे पर उतरा तो दिसम्बर की हल्की ठंड के बावजूद भारत-रूस रिश्तों की गर्माहट साफ महसूस हो रही थी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी स्वयं एयरपोर्ट पहुंचे और रेड कॉर्परट पर गले लगाकर पुतिन का स्वागत किया गया। गार्ड ऑफ ऑनर, राष्ट्रपति भवन में औपचारिक स्वागत और लम्बी द्विपक्षीय वार्ता, हर संकेत यह बता रहा था कि यह दौरा सिर्फ शिष्टाचार नहीं, बल्कि रणनीतिक संदेश देने वाला है। यह यात्रा ऐसे समय में हुई जब रूस-यूक्रेन युद्ध को तीन साल से अधिक हो चुके हैं, पश्चिमी देश रूस को अलग- थलग करने की कोशिशों में जुटे हैं, अमेरिका में डोनाल्ड ट्रम्प की सत्ता में वापसी हो चुकी है और पूरी वैश्विक राजनीति फिर से ध्रुवीकरण की ओर बढ़ रही है। ऐसे माहौल में भारत द्वारा पुतिन का भव्य स्वागत और दोनों देशों का संयुक्त बयान, वैश्विक कूटनीति के लिए बड़ा संकेत बन गया।
भारत और रूस के द्विपक्षीय व्यापार ने बीते पांच वर्षों में ऐतिहासिक उछाल दर्ज किया है। जहां पांच साल पहले व्यापार लगभग 8 अरब डाॅलर के आस-पास था, वहीं अब यह आंकड़ा 68 अरब डाॅलर के करीब पहुंच चुका है। पश्चिमी प्रतिबंधों के बावजूद भारत रूस से बड़ी मात्रा में कच्चा तेल खरीद रहा है, जिससे भारत को सस्ते दाम पर ऊर्जा मिल रही है और रूस को स्थिर बाजार। रूस से मिलने वाला कच्चा तेल भारत की ऊर्जा सुरक्षा की रीढ़ बन चुका है। रूस आज भारत के लिए शीर्ष तेल आपूर्तिकर्ताओं में शामिल है। यही नहीं, भारतीय सेना आज भी बड़े स्तर पर रूसी तकनीक और हथियारों पर निर्भर है। सुखोई लड़ाकू विमान, टी-90 टैंक, एस-400 मिसाइल प्रणाली जैसे रक्षा उपकरण इस रिश्ते की गहराई को दर्शाते हैं।
पुतिन की यह यात्रा 30 घंटे से अधिक समय की रही जो अपने आप में एक मजबूत कूटनीतिक संकेत है। यह बताता है कि रिश्तों को केवल औपचारिकता तक सीमित नहीं रखा गया बल्कि हर स्तर पर गहन बातचीत हुई। इस दौरान दोनों नेताओं ने रक्षा सहयोग, परमाणु ऊर्जा, अंतरिक्ष, साइबर सुरक्षा, कनेक्टिविटी और व्यापार संतुलन जैसे विषयों पर विस्तार से चर्चा की। पीएम मोदी ने साफ शब्दों में कहा कि दोनों देश कनेक्टिविटी बढ़ाने को प्राथमिकता दे रहे हैं। इसमें इंटरनेशनल नाॅर्थ-साउथ ट्रांसपोर्ट काॅरिडोर (आईएनएसटीसी) को नई गति देने की बात भी प्रमुख रही जिससे भारत को रूस और यूरोप तक तेज व्यापारिक मार्ग मिल सकेगा।
इस यात्रा का एक बड़ा कूटनीतिक संदेश यह भी रहा कि रूस खुद को अंतरराष्ट्रीय मंच पर अलग-थलग नहीं मानता। पश्चिमी देशों के तमाम प्रतिबंधों के बावजूद रूस के राष्ट्रपति भारत जैसे दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में पूरे सम्मान के साथ पहुंचे। इससे यह संकेत भी गया कि ग्लोबल साउथ आज भी रूस के साथ खड़ा है।
भारत के लिए यह यात्रा इसलिए भी अहम रही क्योंकि बीते कुछ महीनों से अमेरिका के साथ उसके सम्बंधों में तनाव के संकेत दिख रहे हैं। ट्रम्प प्रशासन भारत पर व्यापार घाटे, टैरिफ और रूस से तेल खरीद को लेकर लगातार दबाव बना रहा है। अमेरिका चाहता है कि भारत रूस से दूरी बनाए, लेकिन भारत ने साफ कर दिया है कि उसकी विदेश नीति किसी दबाव में नहीं चलती, बल्कि राष्ट्रीय हितों के आधार पर तय होती है। यही रणनीतिक स्वायत्तता भारत की विदेश नीति की सबसे बड़ी पहचान रही है। भारत एक तरफ क्वाड के जरिए अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया के साथ सुरक्षा सहयोग बढ़ा रहा है तो दूसरी ओर रूस के साथ अपने ऐतिहासिक सम्बंधों को भी मजबूती से बनाए हुए है।
पुतिन की यह यात्रा चीन के संदर्भ में भी बेहद अहम मानी जा रही है। हाल के वर्षों में रूस और चीन के सम्बंध अभूतपूर्व स्तर तक पहुंच चुके हैं। ऊर्जा, रक्षा और व्यापार हर क्षेत्र में दोनों देशों का गठजोड़ मजबूत हुआ है। ‘पावर ऑफ साइबेरिया’ जैसी गैस पाइप लाइन परियोजनाएं इस रिश्ते को और ठोस बना रही हैं। हालांकि भारत के लिए चीन अब भी सबसे बड़ी रणनीतिक चुनौती बना हुआ है। लद्दाख से लेकर आर्थिक मोर्चे तक भारत और चीन के बीच तनाव बना रहता है। ऐसे में रूस की भूमिका संतुलनकारी बन सकती है। रूस न तो चाहता है कि वह पूरी तरह चीन के खेमे में जाए और न ही वह भारत को नाराज करना चाहता है। भारत भी इसी संतुलन को साधने की कोशिश कर रहा है।
यूक्रेन युद्ध पर भारत की नीति भी इस यात्रा में एक बार फिर स्पष्ट हुई। भारत अब तक किसी भी मंच पर रूस की खुली आलोचना से बचता रहा है। भारत का रुख रहा है कि बातचीत और कूटनीति से ही समाधान निकले। पश्चिमी देशों ने कई बार भारत के इस रुख पर सवाल उठाए, लेकिन भारत ने अपने ऊर्जा और रणनीतिक हितों को प्राथमिकता दी।
पुतिन की इस यात्रा के दौरान कोई बड़ी रक्षा डील सार्वजनिक रूप से घोषित नहीं की गई लेकिन कूटनीतिक हलकों में यह माना जा रहा है कि कई रणनीतिक समझौते पर्दे के पीछे तय हुए हैं। इतिहास गवाह है कि रूस के साथ कई बड़ी सैन्य डीलें हमेशा चुपचाप हुई हैं, जिनकी घोषणा बाद में होती है।
रूस भारत को उन्नत रक्षा तकनीक देने को हमेशा तैयार रहा है जो पश्चिमी देश अक्सर साझा नहीं करते। यही कारण है कि भारत आज भी रूस को एक भरोसेमंद रणनीतिक साझेदार मानता है।
इस यात्रा का एक और अहम पहलू परमाणु ऊर्जा सहयोग रहा। रूस पहले से ही कुडनकुलम न्यूक्लियर प्लांट में भारत का हिस्सा है और आने वाले समय में छोटे परमाणु संयंत्रों (स्माॅल माॅड्यूलर रिएक्टर) पर भी साझा काम हो सकता है। यह भारत की स्वच्छ ऊर्जा नीति के लिए बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
व्यापार संतुलन भी दोनों देशों के बीच बड़ी चुनौती बना हुआ है। अभी भारत और रूस का व्यापार रूस के पक्ष में ज्यादा झुका हुआ है। भारत चाहता है कि वह रूस को अपना निर्यात बढ़ाए, खासकर कृषि, दवा, आईटी और डेयरी उत्पादों में। रूस के विशाल भूभाग और कम आबादी को देखते हुए वहां भारतीय निवेश की बड़ी सम्भावनाएं हैं।
रूस के साइबेरिया और सुदूर पूर्व क्षेत्रों में खेती, डेयरी, फूड प्रोसेसिंग और खनन में भारत के लिए बड़े अवसर मौजूद हैं। चीन इन क्षेत्रों में पहले ही अपनी मौजूदगी मजबूत कर चुका है और भारत अब उन अवसरों को फिर से पकड़ने की कोशिश में लगा है। इस यात्रा के जरिए रूस ने यह भी संकेत दिया कि वह अब केवल यूरोप पर निर्भर नहीं रहना चाहता, बल्कि एशिया, अफ्रीका और पश्चिम एशिया को अपनी नई रणनीतिक धुरी बना रहा है। सऊदी अरब, ईरान, तुर्की और भारत के साथ उसकी बढ़ती सक्रियता इसी नीति का हिस्सा मानी जा रही है।
पुतिन व्यक्तिगत रिश्तों की राजनीति में भी विश्वास रखते हैं। यही कारण है कि मोदी और पुतिन के बीच व्यक्तिगत केमिस्ट्री कूटनीति को और मजबूत करती है। दोनों नेता कई अंतरराष्ट्रीय मंचों पर एक-दूसरे के प्रति खुले तौर पर सम्मान दिखाते रहे हैं। भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौती अमेरिका और रूस के बीच संतुलन बनाए रखने की है। एक तरफ अमेरिका भारत का बड़ा व्यापारिक साझेदार है तो दूसरी ओर रूस उसका पुराना और भरोसेमंद रणनीतिक मित्र। अमेरिका चाहता है कि भारत अपने कृषि बाजार को उसके लिए खोले लेकिन इससे भारतीय किसानों के हितों पर असर पड़ सकता है। यही कारण है कि व्यापार वार्ताओं में कई बार गतिरोध भी दिखता है।
इस पूरे घटनाक्रम में एक बात साफ है कि भारत अब किसी एक गुट का हिस्सा बनने के बजाय मल्टी-अलाइनमेंट की नीति पर चल रहा है। भारत अमेरिका, रूस, यूरोप, मध्य एशिया, अफ्रीका और इंडो-पैसिफिक, सभी के साथ अपने हितों के अनुसार रिश्ते बना रहा है। पुतिन की इस यात्रा का सबसे बड़ा हासिल यही माना जा रहा है कि रूस और भारत दोनों ने दुनिया को यह साफ संदेश दे दिया है कि उनकी दोस्ती किसी तीसरे देश के इशारों पर नहीं चलेगी। यह रिश्ता इतिहास, भरोसे, रणनीति और साझा हितों पर टिका हुआ है। आने वाले वर्षों में जब वैश्विक व्यवस्था और भी अस्थिर होगी तब भारत-रूस सम्बंधों की यह मजबूती भारत के लिए एक बड़ी कूटनीतिक पूंजी साबित हो सकती है। ऊर्जा सुरक्षा से लेकर रक्षा तकनीक और वैश्विक राजनीति में संतुलन बनाने तक, इस रिश्ते का महत्व और बढ़ने वाला है। पुतिन का यह दौरा केवल एक राजनयिक यात्रा नहीं बल्कि बदलती विश्व व्यवस्था में भारत की स्वतंत्र विदेश नीति का एक मजबूत घोषणापत्र बनकर उभरा है।

