बिहार चुनाव जीत के बाद अब बीजेपी के निशाने पर पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव है। उसने इसकी तैयारी भी तेज कर दी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी साफ संकेत दे दिया है कि बीजेपी का अगला बड़ा राजनीतिक फोकस पश्चिम बंगाल होगा। उन्होंने कहा कि बिहार से बहने वाली गंगा बंगाल में महत्वाकांक्षा को भी बढ़ाती है। उनका यह बयान इस राजनीतिक तथ्य को रेखांकित करता है कि बीजेपी के लिए चुनाव कभी खत्म नहीं होते। यह तरीका भले ही थकाने वाला हो, लेकिन पार्टी में उत्साह और हलचल लगातार बनी रहती है।
दूसरी तरफ देशभर में चल रहे विशेष गहन मतदाता सूची पुनरीक्षण (एसएआर) को लेकर सियासी घमासन छिड़ा हुआ है। 4 नवम्बर से गणना चरण शुरू होने के बाद से बीएलओ के बीमार पड़ने और मौतों की घटनाओं के बीच यह तनाव बढ़ा है। तृणमूल कांग्रेस ने केंद्रीय चुनाव आयोग के अधिकारियों से मुलाकात भी की जिसका कोई परिणाम नहीं निकला तो वहीं एसआईआर प्रक्रिया में लगे बीएलओ ने भी कार्यालय के बाहर प्रदर्शन किया और अधिक काम के दबाव और असहनीय कार्यभार की शिकायत की। भाजपा नेता अनिर्बान गांगुली ने ममता बनर्जी द्वारा लिखे गए पत्र पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि टीएमसी संवैधानिक प्रक्रिया का सियासी विरोध कर रही है। उन्होंने आरोप लगाया कि टीएमसी के नियुक्त लोग डाटा में हेर-फेर कर रहे हैं। इस बीच कोलकाता स्थित मुख्य निर्वाचन आयुक्त के कार्यालय के बाहर टीएमसी और भाजपा कार्यकर्ताओं के बीच झड़प हुई।
प्रदर्शनकारियों में कई शिक्षक भी शामिल थे, जिन्होंने बीएलओ के समर्थन और एसआईआर प्रक्रिया में हस्तक्षेप की मांग की लेकिन चुनाव आयोग ने स्पष्ट कर दिया है कि यह प्रक्रिया संवैधानिक और कानूनी अधिकारों के तहत संचालित हो रही है। यही नहीं चुनाव आयोग ने चैंकाने वाला दावा किया है कि बंगाल में 26 लाख ऐसे वोटर हैं जिनके नाम 2002 की मतदाता सूची से मेल नहीं खाते। यह आंकड़ा 2026 के चुनाव में दोनों पक्षों की रणनीति और समीकरणों को गम्भीर रूप से प्रभावित कर सकता है। सुप्रीम कोर्ट ने भी एसएआर को रोकने से इंकार कर दिया है। कोर्ट ने कहा कि चुनाव आयोग के अधिकारों को चुनौती नहीं दी जा सकती है। चुनाव आयोग एक संवैधानिक संस्था है और उसके पास ऐसा करने का पूरा संवैधानिक और कानूनी अधिकार है। अगर इसमें कोई अनियमितता सामने आई तो वह तुरंत सुधार के आदेश देगा। चीफ जस्टिस सूर्याकांत और जस्टिस जोयमाल्या बागची की बेंच ने राजद सांसद मनोज झा की याचिका पर सुनवाई करते हुए कहा कि एफआईआर की जरूरत पर सवाल उठाने वाले तर्कों में दम नहीं हैं। सीजेआई ने याद दिलाया कि पिछले निर्देश पर चुनाव आयोग ने प्रक्रिया में सुधार किया था और उसके बाद एक भी औपचारिक आपत्ति दर्ज नहीं हुई है। इसलिए इसे रोकने का कोई आधार नहीं बनता। कोर्ट ने यह भी भरोसा दिलाया कि कोई भी पात्र मतदाता इस प्रक्रिया की वजह से अपने अधिकार से वंचित न हो, इसके लिए वह चैकस रहेगा। ऐसे में एक ओर जहां ममता बनर्जी और अन्य विपक्षी दल इसका कड़ा विरोध कर रहे हैं वहीं बड़ा सवाल यह है कि क्या मोदी नेतृत्व वाली बीजेपी लगातार तीन बार जीत चुकी ममता बनर्जी की टीएमसी को 2026 में पटखनी दे पाएगी? क्या अब बंगाल की बारी है जैसे तमाम सवाल सियासी गलियों में तैर रहे हैं।
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि ममता बनर्जी भारतीय राजनीति में उन नेताओं में शामिल हैं जिनके समर्थक और आलोचक दोनों समान संख्या में मिलते हैं। उनका व्यक्तित्व एक कड़े, तेज-तर्रार और जमीनी लड़ाकू नेता का है। 2011 में उन्होंने अकेले दम पर 34 साल पुराने लेफ्ट शासन को उखाड़ फेंका था। उनका ‘मां, माटी, मानुष’ मंत्र आज भी एक लोकप्रिय भावनात्मक जुड़ाव है। लेकिन अब जैसे-जैसे चुनाव नजदीक आते जा रहे हैं ममता को ऐसी जनता का सामना करना पड़ रहा है जो अधूरे वादों, घोटालों और लगातार हो रही राजनीतिक हिंसा से नाराज दिखती है। बीजेपी इसे बंगाल का ‘जंगल राज’ बताती है। अब सफलता के लिए सही टाइमिंग, मजबूत नैरेटिव और सशक्त संगठन तीनों ही निर्णायक बन गए हैं। जहां तक भाजपा की बात है पार्टी का यह निरंतर चुनावी मोड उसकी महत्वाकांक्षा और मुकाबले के नियमों को लगातार नए सिरे से गढ़ने की उसकी क्षमता को दर्शाता है। कुल मिलाकर बंगाल में 2026 की लड़ाई केवल राजनीतिक मुकाबला नहीं, बल्कि नैरेटिव, संगठनात्मक शक्ति और जनविश्वास की निर्णायक परीक्षा बनने जा रही है।

