अमेरिकी नियामक संस्था स्टाॅक एक्सचेंज कमीशन (एसईसी) द्वारा पांचवीं बार अदालत को यह बताना कि भारत में गौतम और सागर अडानी को अब तक समन तामील नहीं हो सका है केवल एक कानूनी देरी नहीं बल्कि एक बड़े राजनीतिक-आर्थिक सवाल की ओर इशारा करता है। अंतरराष्ट्रीय आरोप, जन-विरोध, पर्यावरणीय चेतावनियां और आदिवासी आंदोलनों के बावजूद अडानी समूह की परियोजनाएं लगातार आगे बढ़ रही हैं जिसके चलते न कवेल सरकार और संस्थागत व्यवस्था पर चुप्पी और सहयोग के आरोप लग रहे हैं बल्कि विपक्ष द्वारा स्वयं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर निशाना साधा जा रहा है
अमेरिका की शीर्ष पूंजी बाजार नियामक संस्था यूएस सिक्योरिटीज एंड एक्सचेंज कमीशन (एसईसी) ने दिसम्बर 2025 में न्यूयाॅर्क की ईस्टर्न डिस्ट्रिक्ट कोर्ट को दी गई अपनी ताजा स्टेटस रिपोर्ट में एक बार फिर स्पष्ट किया है कि भारत में उद्योगपति गौतम अडानी और सागर अडानी को अब तक कानूनी समन तामील नहीं कराए जा सके हैं। यह आठ महीनों में पांचवीं ऐसी रिपोर्ट है जिसमें एसईसी को अदालत को बताना पड़ा है कि भारत सरकार के विधि एवं न्याय मंत्रालय से सम्पर्क के बावजूद इस दिशा में कोई ठोस प्रगति नहीं हुई है। यह स्थिति उस पूरे परिदृश्य को उजागर करती है जहां एक ओर अंतरराष्ट्रीय अदालतों में गम्भीर आरोपों पर सुनवाई अटकी हुई है वहीं दूसरी तरफ भारत में अडानी समूह की कारोबारी और परियोजनागत गतिविधियां बिना किसी बड़े व्यवधान के आगे बढ़ती दिख रही हैं।
एसईसी ने गौतम अडानी और सागर अडानी के खिलाफ 20 नवम्बर 2024 को एक विस्तृत सिविल शिकायत दर्ज की थी। चूंकि दोनों प्रतिवादी भारत में रहते हैं, इसलिए अमेरिकी कानून के अनुसार उन्हें समन भेजने के लिए अंतरराष्ट्रीय प्रक्रिया अपनानी आवश्यक थी। इस प्रक्रिया के तहत फरवरी 2025 में अमेरिकी सरकार की संस्था एसईसी ने भारत सरकार से औपचारिक रूप से सम्पर्क किया।
18 फरवरी 2025 को एसईसी ने अमेरिकी अदालत को सूचित किया कि उसने हाग सर्विस कन्वेंशन के अनुच्छेद 5(ए) के तहत भारत के केंद्रीय प्राधिकरण यानी विधि एवं न्याय मंत्रालय से सहायता का अनुरोध कर दिया है। हालांकि इस दावे के कुछ ही दिनों बाद स्थिति उलझ गई। 21 फरवरी 2025 को एक आरटीआई आवेदन के जवाब में भारत सरकार के विधि मामलों के विभाग ने कहा कि उस तारीख तक ऐसा कोई अनुरोध उन्हें प्राप्त नहीं हुआ था। इस बयान ने पूरे मामले को लेकर भ्रम और सवाल खड़े कर दिए।
इस भ्रम पर आंशिक रूप से विराम अप्रैल 2025 में लगा। 25 अप्रैल को दाखिल अपनी अगली स्टेटस रिपोर्ट में एसईसी ने अदालत को बताया कि भारत सरकार ने अब यह पुष्टि कर दी है कि उसे अमेरिकी अनुरोध प्राप्त हो चुका है और सम्बंधित न्यायिक प्राधिकरणों को समन तामील की प्रक्रिया शुरू करने के लिए कहा गया है। यानी आरटीआई के जवाब के बाद आधिकारिक तौर पर भारत सरकार ने अनुरोध मिलने की बात स्वीकार कर ली। लेकिन इसके बावजूद जमीनी हकीकत नहीं बदली। अप्रैल की पुष्टि के बाद भी जून, अगस्त, अक्टूबर और अब दिसम्बर 2025 में दाखिल हर रिपोर्ट में एसईसी को यह कहना पड़ा कि समन अब तक तामील नहीं हो सके हैं। अक्टूबर की रिपोर्ट में तो यह भी बताया गया कि अमेरिकी सरकार में बजट संकट और आंशिक शटडाउन के कारण एजेंसी के कई कर्मचारी अस्थायी रूप से कार्यमुक्त थे जिससे संवाद और धीमा पड़ा। दिसम्बर की रिपोर्ट में साफ कहा गया है कि स्थिति अब अपरिवर्तित है।
इस पूरे प्रकरण में एक अहम कानूनी पहलू वह है, जिसे आमतौर पर ‘समन से छूट’ या (Waiver of Service of Summons) कहा जाता है। अमेरिकी कानून के तहत किसी भी सिविल मुकदमे में अदालत तब तक आगे नहीं बढ़ सकती जब तक प्रतिवादी को समन और शिकायत की प्रति विधिवत तरीके से नहीं पहुंचा दी जाती। समन अदालत का आधिकारिक नोटिस होता है, जिसमें प्रतिवादी को यह बताया जाता है कि उसके खिलाफ मुकदमा दर्ज हो चुका है और उसे तय समय में जवाब देना है।
अमेरिकी कानून में यह प्रावधान भी है कि अगर प्रतिवादी स्वयं स्वीकार कर ले कि उसे मुकदमे की जानकारी है, तो वह औपचारिक समन की तामील से छूट दे सकता है। इसे ही ‘समन से हट’ कहा जाता है।
एसईसी ने अडानी मामले में यही रास्ता अपनाने की कोशिश की। अप्रैल 2025 की रिपोर्ट में आयोग ने बताया कि उसने गौतम अडानी का प्रतिनिधित्व करने वाले वकील की पहचान कर ली है और उन्हें नोटिस ऑफ लाॅसूट तथा समन से छूट देने का अनुरोध भेजा गया। लेकिन एसईसी के अनुसार, न तो गौतम अडानी और न ही सागर अडानी ने इस छूट पर सहमति जताई। इसका नतीजा यह हुआ कि आयोग को फिर से पूरी तरह हाग सर्विस कन्वेंशन और भारत सरकार की कूटनीतिक प्रक्रिया पर निर्भर रहना पड़ रहा है। कानूनी रूप से समन से छूट न देना कोई अपराध नहीं है। यह प्रतिवादी का अधिकार है, बाध्यता नहीं। लेकिन इसका व्यावहारिक असर यह होता है कि मुकदमे की शुरुआत महीनों, कभी-कभी वर्षों तक टल जाती है। यही कारण है कि एक साल से अधिक समय बीत जाने के बाद भी अमेरिकी अदालत में अडानी मामले की वास्तविक सुनवाई शुरू नहीं हो सकी है।
एसईसी की 39 पन्नों की शिकायत में आरोप लगाया गया है कि गौतम अडानी, जो अडानी ग्रीन एनर्जी लिमिटेड (एजीईएल) के संस्थापक, चेयरमैन और नियंत्रक शेयरधारक हैं और सागर अडानी ने भारत की सबसे बड़ी सौर ऊर्जा परियोजना से जुड़े ठेके हासिल करने के लिए बड़े स्तर पर रिश्वत दी। आयोग के अनुसार 2021 में अडानी ग्रीन एनर्जी की ओर से किए गए एक निवेश के दौरान अमेरिकी निवेशकों को गलत और भ्रामक जानकारियां दी गईं। इसी दिन एक समानांतर आपराधिक मामले में न्यूयाॅर्क के ईस्टर्न डिस्ट्रिक्ट के अभियोजकों ने गौतम और सागर अडानी सहित आठ लोगों के खिलाफ प्रतिभूति धोखाधड़ी और वायर फ्राॅड की साजिश का अभियोग भी सार्वजनिक किया। अभियोग में लगभग 265 मिलियन अमेरिकी डाॅलर (लगभग 24.5 अरब रुपए) की रिश्वत और आने वाले 20 वर्षों में लगभग 2 बिलियन डाॅलर (1.66 लाख करोड़) के सम्भावित मुनाफे का उल्लेख है। कई आरोपियों के खिलाफ गिरफ्तारी वारंट जारी किए गए हैं लेकिन चूंकि वे अमेरिका में मौजूद नहीं हैं इसलिए अब तक कोई गिरफ्तारी नहीं हो सकी है।
अडानी समूह ने इन सभी आरोपों को ‘निराधार’ और ‘बेबुनियाद’ बताते हुए सिरे से खारिज किया है। समूह का कहना है कि वह सभी कानूनी प्रक्रियाओं का सामना करेगा और उसे भारतीय न्याय व्यवस्था पर पूरा
भरोसा है।
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चल रहे इन मामलों के समानांतर भारत में अडानी समूह की कारोबारी गतिविधियां तेजी से आगे बढ़ रही हैं। हवाई अड्डों के निजीकरण से लेकर बंदरगाहों, कोयला खनन, बिजली उत्पादन और नवीकरणीय ऊर्जा तक, लगभग हर रणनीतिक क्षेत्र में अडानी समूह की मौजूदगी बढ़ी है।
इन परियोजनाओं के खिलाफ देश के कई हिस्सों में जन-विरोध भी देखने को मिला है। छत्तीसगढ़, झारखंड और उड़ीसा में आदिवासी समुदायों ने खनन और बिजली परियोजनाओं के खिलाफ आंदोलन किए हैं। उनका आरोप है कि इन परियोजनाओं से उनकी जमीन, जंगल और आजीविका छिन रही है। पर्यावरणविदों ने भी बड़े पैमाने पर पेड़ों की कटाई, वन क्षेत्रों में औद्योगिक गतिविधियों और तटीय इलाकों में निर्माण को लेकर गम्भीर चिंताएं जताई हैं। बिहार में सस्ते दर पर ऊर्जा परियोजना के लिए जमीन दिए जाने का भी भारी विरोध हो रहा है।
अंडमान-निकोबार में प्रस्तावित विकास परियोजनाओं को लेकर भी यही सवाल उठ रहे हैं कि क्या नाजुक पारिस्थितिकी और वहां रहने वाले आदिवासी समुदायों की कीमत पर विकास को आगे बढ़ाया जा रहा है? आलोचकों का कहना है कि इन परियोजनाओं में पर्यावरणीय मंजूरियां औपचारिकता बनकर रह गई हैं।
इन तमाम विरोधों और आरोपों के बावजूद केंद्र सरकार का रुख अडानी समूह के प्रति बदला हुआ नहीं दिखता। विपक्षी दलों और सामाजिक संगठनों का आरोप है कि सरकार बड़े काॅरपोरेट समूहों, विशेषकर अडानी समूह, को लेकर असाधारण नरमी बरत रही है। उनका कहना है कि जहां आम नागरिकों और छोटे उद्यमियों पर नियम-कानून सख्ती से लागू होते हैं, वहीं बड़े समूहों के मामले में वही नियम लचीले हो जाते हैं।
सरकार और अडानी समूह के समर्थक इन आरोपों को खारिज करते हैं। उनका तर्क है कि देश को बड़े निवेश, आधारभूत ढांचे और ऊर्जा सुरक्षा की जरूरत है और अडानी समूह इन क्षेत्रों में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। उनके अनुसार अंतरराष्ट्रीय आरोपों का निपटारा अदालतों में होगा लेकिन विकास परियोजनाओं को रोका नहीं जा सकता।
कुल मिलाकर अमेरिकी संस्था एसईसी की पांचवीं स्टेटस रिपोर्ट यह साफ करती है कि अडानी मामले में कानूनी प्रक्रिया अभी शुरुआती चरण में ही अटकी हुई है। समन तामील न होने के कारण अमेरिकी अदालत में सुनवाई आगे नहीं बढ़ पा रही है, वहीं भारत में अडानी समूह की परियोजनाएं, विरोध और राजनीतिक बहसें, सब अपने पूरे वेग के साथ जारी हैं। यही वह विरोधाभास है जो इस पूरे प्रकरण को ‘बंदे में है दम, वंदे मातरम’ के माध्यम से राजनीतिक और सामाजिक विमर्श का हिस्सा बना देता है। सवाल यह नहीं है कि आरोप सिद्ध होंगे या नहीं बल्कि यह है कि जवाबदेही की कसौटी किसके लिए कितनी सख्त है। फिलहाल इन सवालों के जवाब भविष्य के गर्भ में हैं लेकिन इतना तय है कि यह मामला केवल अदालतों तक सीमित नहीं रहेगा यह लोकतंत्र, सत्ता और पूंजी के रिश्ते पर बहस को लम्बे समय तक जीवित रखेगा

