प्रदेश कांग्रेस में नई ताजपोशी ने शक्ति संतुलन की नई पटकथा लिख दी है। दिल्ली में बैठकों का केंद्र प्रीतम, हरक और यशपाल, लेकिन सबसे बड़े जनाधार वाले हरीश रावत का ‘अनुपस्थित रहकर भी मौजूद’ रहना बताता है कि खेल अभी खत्म नहीं हुआ है बल्कि एक नए दौर में प्रवेश कर रहा है
उत्तराखण्ड में प्रदेश कांग्रेस की नई कार्यकारिणी का गठन होते ही पार्टी के भीतर सत्ता संतुलन की एक नई बहस शुरू हो गई है। नए प्रदेश अध्यक्ष गणेश गोदियाल की ताजपोशी के बाद जिस तरह से दिल्ली में रणनीतिक बैठकों का दौर तेज हुआ है, उसने यह स्पष्ट कर दिया है कि 2027 की तैयारी कांग्रेस अभी से शुरू कर चुकी है। लेकिन इन बैठकों में प्रदेश के सबसे बड़े जनाधार वाले और लम्बे समय तक पार्टी के चेहरे रहे हरीश रावत की अनुपस्थिति ने सवालों को जन्म दिया है। उत्तराखण्ड की राजनीति को करीब से समझने वाले राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि रावत किसी भी दृश्य से गायब हों, इसका अर्थ यह बिल्कुल नहीं होता कि वह राजनीतिक रूप से निष्क्रिय हो गए हैं। उलटे, अक्सर ऐसा होता है कि उनकी चुप्पी आने वाले किसी बड़े कदम की भूमिका होती है।
दिल्ली में लगातार हो रही बैठकों में प्रीतम सिंह, हरक सिंह रावत, नेता प्रतिपक्ष यशपाल आर्य और पूर्व अध्यक्ष करण माहरा जैसे नाम सक्रिय रूप से मौजूद हैं। ये वे चेहरे हैं जो वर्तमान कार्यकारिणी में या तो निर्णायक जिम्मेदारियों पर हैं या फिर संगठनात्मक संरचना में अपना मजबूत स्थान बनाए हुए हैं। प्रीतम सिंह को संगठनात्मक रणनीति का अनुभवी नेता माना जाता है, हरक सिंह रावत को 2022 के बाद से कांग्रेस में ‘मुख्य संसाधन’ की तरह देखा जाता है जबकि यशपाल आर्य की भूमिका विधायकों के बीच अनुशासन व विपक्ष की धुरी बनाने में महत्वपूर्ण मानी जाती है। ऐसे में इन सभी का दिल्ली में मौजूद होना और केंद्रीय नेतृत्व के साथ लगातार संवाद में रहना यह संकेत देता है कि कांग्रेस इस बार चुनावी राजनीति को एक नए माॅडल संगठन संसदीय नेतृत्व चेहरे के त्रिकोण पर आगे बढ़ाना चाहती है।
इस पूरी व्यस्तता के बीच वह चेहरा गायब दिखाई देता है जिसने 2012 से 2017 और फिर 2022 तक कांग्रेस की राजनीति को उत्तराखण्ड में कई बार निर्णायक बनाया और वह चेहरा हैं हरीश रावत। एक धारणा यह बनाई जा रही है कि हाईकमान ने रावत को ‘हाशिए’ में डाल दिया है। यह भी प्रचारित किया जा रहा है कि नई कार्यकारिणी में रावत की पकड़ कमजोर कर दी गई है और पार्टी अब नए नेतृत्व को आगे बढ़ाना चाहती है। परंतु राजनीति में ‘अनुपस्थिति’ को सीधा ‘हाशिए’ का पर्याय मान लेने की भूल अक्सर विश्लेषण को सतही बना देती है। रावत की राजनीति का इतिहास यह बताता है कि वे जहां दिखते नहीं, वहां भी उनकी पकड़ रहती है। चाहे 2016 में विधायकों के टूटे मोर्चे को पलटना हो या 2022 में अंतिम समय तक कांग्रेस के लिए मैदान सम्भालना, रावत का राजनीतिक व्यवहार हमेशा दिखने और न दिखने की दोहरी रणनीति पर रहा है।
दिल्ली की बैठकों से दूर रहकर भी रावत उत्तराखण्ड में बेहद सक्रिय हैं। उनके सोशल मीडिया संदेश, स्थानीय स्तर पर हो रही गतिविधियों पर उनकी नजर और लगातार अपने समर्थकों के साथ हो रही बैठकें इस बात की गवाही हैं कि वे अभी भी ‘फील्ड पाॅलिटिक्स’ पर पूरी पकड़ बनाए हुए हैं। उनका यह व्यवहार अक्सर उस दौर में देखने को मिलता है जब वे मानते हैं कि संगठनात्मक संरचना में उनकी भूमिका कम कर दी गई है या जब वे किसी नए राजनीतिक संदेश को तैयार कर रहे होते हैं। वर्तमान परिस्थितियों में भी यही प्रतीत होता है कि वे सार्वजनिक बयानबाजी से दूर रहकर स्थिति को परखना चाहते हैं। कांग्रेस हाईकमान के प्रति उनका रुख हमेशा से ‘अनुशासन रणनीति’ पर आधारित रहा है। वे कभी खुलकर असहमति का इशारा नहीं देते लेकिन अपनी स्वतंत्र राजनीतिक शैली को कायम रखते हैं।
गणेश गोदियाल की ताजपोशी कांग्रेस संगठन में एक संतुलनकारी नियुक्ति मानी जा रही है। गोदियाल एक व्यवहारिक नेता हैं जो किसी एक धड़े से न जुड़कर पूरे संगठन को साथ लेकर चलने में विश्वास रखते हैं। ऐसे नेता को हाईकमान द्वारा आगे बढ़ाए जाने का अर्थ है कि पार्टी गुटबाजी कम कर एक सामूहिक नेतृत्व माॅडल पर आगे बढ़ना चाहती है परंतु सामूहिक नेतृत्व तब तक सफल नहीं हो सकता जब तक पार्टी के सबसे बड़े जनाधार वाले चेहरों को इससे जोड़कर नहीं रखा जाता और हरीश रावत का कद उत्तराखण्ड में इस मायने में अकेला और अद्वितीय है।
हाईकमान यह भलीभांति जानता है कि उत्तराखण्ड में कांग्रेस तभी मजबूत होती है जब रावत भी उतने ही संलग्न हों जितने वे चुनाव के समय रहते आए हैं। दिल्ली में जो बैठकें चल रही हैं उनका फोकस संगठन की मजबूती, विधानसभा क्षेत्रों में जल्दी प्रभारियों की नियुक्ति और 2027 को देखते हुए प्रारम्भिक रणनीति तैयार करना है। इन बैठकों में जो नेता अक्सर दिखाई दे रहे हैं, उनमें से हर एक अपनी-अपनी भूमिका को लेकर स्पष्ट है। प्रीतम सिंह संगठन और विधायकों दोनों को जोड़ने की क्षमता रखते हैं, हरक सिंह चुनावी प्रबंधन व सामाजिक समीकरणों में निपुण हैं जबकि यशपाल आर्य विधानमंडल दल का मजबूत चेहरा बनकर भाजपा के सामने प्रभावी विपक्ष की छवि गढ़ने की कोशिश कर रहे हैं। ये तीनों दल्ली में इसलिए भी हैं क्योंकि पार्टी इनसे अगले महीनों में भारी काम लेने वाली है।
इस पूरी रणनीतिक प्रक्रिया में हरीश रावत की अनुपस्थिति को ‘नाराजगी’ या ‘दरकिनार किए जाने’ के रूप में प्रचारित करना राजनीतिक रूप से जल्दबाजी भी है और अपूर्ण भी। रावत बहुत अनुभवी हैं, वे अपने लिए भूमिकाएं खुद तय करते हैं, और जब केंद्र उन्हें कोई संकेत देता है तब भी वे अपनी ‘टाइमिंग’ पर चलते हैं। यदि उन्हें वास्तव में हाशिए पर डाला गया होता तो उत्तराखण्ड में उनकी सक्रियता का यह स्तर दिखाई नहीं देता। वे न केवल लगातार कार्यकर्ताओं से जुड़े हैं बल्कि अपने परम्परागत राजनीतिक क्षेत्रों में अपनी पकड़ बनाए रखने के लिए बेहद सजग दिखाई देते हैं। इसका अर्थ है कि वे जानते हैं कि केंद्र में बैठकर निर्णय लेने वाली राजनीति से ज्यादा महत्वपूर्ण अभी जमीनी राजनीति है।
एक और महत्वपूर्ण पहलू यह है कि कांग्रेस 2027 की तैयारी दो स्तरों पर कर रही है, संगठनात्मक पुनर्गठन और नेतृत्व पुनर्संतुलन। नेतृत्व पुनर्संतुलन का मतलब यह नहीं कि किसी पुराने नेता को एकदम किनारे कर दिया जाए बल्कि इसका मतलब है कि नए चेहरों को मजबूत किया जाए और पुराने चेहरों की भूमिका को नए तरीके से परिभाषित किया जाए। यह कांग्रेस की पारम्परिक रणनीति रही है, विभिन्न राज्यों में नेतृत्व के माॅडल इसी तरह तैयार किए गए हैं। उत्तराखण्ड में भी यही प्रक्रिया चल रही है। लेकिन हरीश रावत जैसा नेता, जिसे जनता आज भी बड़े कद का नेता मानती है, उसका इस्तेमाल कांग्रेस कभी छोड़ेगी नहीं।
दिल्ली में उपस्थित नेताओं को यदि संगठनात्मक कार्य का चेहरा बनाया जा रहा है तो रावत को जमीनी संदेश के केंद्र में रखा जा रहा है, खासतौर पर उन क्षेत्रों में जहां कांग्रेस ने पिछली बार नुकसान सहा था। रावत की राजनीतिक सोच हमेशा यही रही है कि चुनाव जीतने का काम मैदान में होता है न कि बंद कमरों में। इसलिए दिल्ली की बैठकों से बाहर रहकर भी वे राजनीति की धुरी बने हुए हैं। यही वजह है कि पार्टी के भीतर भी यह सवाल लोग पूछ रहे हैं कि क्या यह वाकई ‘हाशिए पर डाले जाने’ की कहानी है या फिर यह एक सामरिक दूरी है, जिसे दोनों पक्ष समझकर निभा रहे हैं।
पार्टी सूत्रों की मानें तो हाईकमान रावत को लेकर बहुत सतर्क रहता है क्योंकि वे जनाधार वाले नेता हैं और उत्तराखण्ड की राजनीति में उनकी पकड़ अभी भी बहुत गहरी है। इसलिए यह मान लेना कि नई कार्यकारिणी बनते ही रावत की भूमिका कम हो जाएगी, राजनीतिक वास्तविकता के अनुकूल नहीं लगता बल्कि यह कहा जा सकता है कि रावत की भूमिका बदल रही है, वे अब संगठन संचालन की बजाय राजनीतिक संदेश और जनआंदोलन की धुरी बन रहे हैं। यह वह स्थान है जहां रावत बेहद सहज और प्रभावी रहते हैं।
उत्तराखण्ड कांग्रेस में फिलहाल जो तस्वीर दिख रही है वह संतुलन, पुनर्गठन और पुनर्संयोजन की है। दिल्ली में दिखाई देने वाले नेता और उत्तराखण्ड में सक्रिय रावत, दोनों मिलकर यह संकेत देते हैं कि कांग्रेस फिलहाल दो मोर्चों पर काम कर रही है। एक तरफ तत्काल संगठन को व्यवस्थित करना और दूसरी ओर उन स्थानों पर अपनी जड़ें मजबूत करना जहां भाजपा ने पिछली बार बढ़त ली थी। इन दोनों कार्यों के लिए अलग-अलग अनुभव वाले नेता चाहिए, और यही कारण है कि रावत का अलग ट्रैक पर सक्रिय रहना पार्टी के लिए नुकसान के बजाय फायदेमंद भी हो सकता है।
अंततः यह कहना जल्दबाजी होगी कि हरीश रावत को हाशिए पर डाल दिया गया है। राजनीति में हाशिया वही होता है जहां नेता खुद को निष्क्रिय कर ले जबकि रावत सक्रिय हैं, संवाद में हैं और लगातार अपनी राजनीतिक प्रासंगिकता को बनाए हुए हैं। कांग्रेस फिलहाल उन्हें एक ऐसे ‘साइलेंट पावर सेंटर’ के रूप में देख रही है जो सही समय पर पार्टी के लिए निर्णायक भूमिका निभा सकता है। इसलिए दिल्ली की बैठकों से दूर रहना रावत की कमजोरी नहीं, बल्कि उनकी राजनीति की वह शैली है जिसमें वे चुप रहकर भी पूरे समीकरण को प्रभावित करते रहते हैं।
कुल मिलाकर उत्तराखण्ड कांग्रेस एक ऐसे संक्रमण काल से गुजर रही है जहां नए चेहरे जिम्मेदारियां सम्भाल रहे हैं, पुराने चेहरे नई भूमिका में ढल रहे हैं और हाईकमान एक ऐसे माॅडल को आकार दे रहा है जिसमें संगठन और नेतृत्व दोनों संतुलित दिखाई दें। यह प्रक्रिया जितनी जटिल है, उतनी ही महत्वपूर्ण भी। आने वाले महीनों में यह स्पष्ट होगा कि कांग्रेस इस संतुलन को कितना सफलतापूर्वक निभा पाती है। लेकिन अभी की तस्वीर कहती है कि रावत को हाशिए पर डालने की थ्योरी वास्तविकता से अधिक प्रचार-आधारित है और रावत अभी भी प्रदेश कांग्रेस की राजनीति के केंद्र में हैं, चाहे वे बैठक में न हों, राजनीति में तो हैं ही।
बात अपनी-अपनी
वैसे इस सम्बंध में मेरा कुछ कहना उचित नहीं होगा, लेकिन फिर भी कुछ लोग ऐसा परसेप्शन फैलाने की कोशिश कर रहे हैं तो मैं उन्हें हतोत्साहित नहीं करना चाहता, उनको मेरी शुभकामनाएं हैं।
हरीश रावत, पूर्व मुख्यमंत्री, उत्तराखण्ड
सीधे तौर पर तो यह नहीं कहा जा सकता कि हरीश रावत को साइड लाइन किया जा रहा है। इतनी बड़ी
बैठकों में हरीश रावत जैसे बड़े नेता को न बुलाया जाना या उनका न जाना हम सीधे यह मतलब नहीं निकाल सकते कि उन्हें साइड लाइन किया जा रहा है, लेकिन ऐसा कुछ जरूर है राहुल गांधी या प्रियंका गांधी या मल्लिकार्जुन खड़गे या फिर कहीं कांग्रेस का राष्ट्रीय नेतृत्व आने वाले कल का नेतृत्व तैयार करने की दिशा में शायद आगे बढ़ रहा है। प्रीतम सिंह जो कि प्रदेश अध्यक्ष बनना चाह रहे थे, उनकी अनिच्छा के बावजूद उन्हें कैम्पेन कमिटी का अध्यक्ष बनाकर संतुष्ट करने की कोशिश की गई। हरक सिंह रावत जिन्हें कांग्रेस में कोई सीरियसली नहीं ले रहा था उन्हें प्रबंधन कमेटी का अध्यक्ष बना दिया गया जबकि उनकी हैसियत कांग्रेस आलाकमान के सामने बहुत अच्छी नहीं मानी जा रही थी। हरीश रावत जैसे बड़े कद के नेता को बैठकों में न बुलाया जाना उनको साइड लाइन करने की कोशिश न भी कहें तो भी यह कहीं न कहीं यह इशारा जरूर है कि कांग्रेस आगे बढ़ना चाहती है। हरीश रावत का राजनीतिक इस्तेमाल वह बड़े अवसरों पर जरूर करना चाहेगी और करना भी पड़ेगा, लेकिन चुनाव से सम्बंधित या प्रबंधन से सम्बंधित रोजमर्रा की तैयारी में शायद उनकी भूमिका सीमित रहेगी। प्रीतम सिंह भी इस प्रकार की बैठकों में नहीं दिख रहे हैं। प्रीतम सिंह क्यों नहीं जा रहे हैं यह भी अपने आप में बड़ा सवाल है। जरूर कुछ न कुछ ऐसा है रोज-रोज की चुनावी रणनीति में शायद हरीश रावत का उस तरह से इस्तेमाल नहीं किया जाएगा लेकिन बड़े मौकों पर उन्हें जरूर याद किया जाएगा। 2022 में तो वह चुनाव अभियान समिति के अध्यक्ष थे, इस बार वैसा होता दिखाई नहीं दे रहा है। आने वाले वक्त में हरीश रावत के लिए कांग्रेस में चुनौतियां बहुत हैं। हरीश रावत जैसे नेता की भूमिका गणेश गोदियाल, यशपाल आर्य या प्रीतम सिंह जैसे नेता नहीं तय करेंगे। उनकी भूमिका क्या होगी यह राहुल गांधी तय करेंगे। ऐसा लगता है कि कांग्रेस उनकी सेवाएं लेगी उन जैसे नेता को दरकिनार करने का जोखिम कोंग्रेस नहीं उठाएगी लेकिन 2022 की तरह इस बार हरीश रावत फ्रंट फुट पर होंगे ऐसा दिखाई नहीं देता।

