बसपा का राजनीतिक सफर एक क्रांति से शुरू हुआ था, लेकिन आज यह हाशिये पर पहुंच चुकी है। मायावती की सख्त नेतृत्व शैली, गठबंधन न करने की नीति और दलित वोट बैंक में भाजपा की सेंध ने पार्टी को कमजोर किया है। 2012 के बाद से बसपा का राजनीतिक आधार लगातार कमजोर होता गया। 2014 और 2019 के लोकसभा चुनावों में पार्टी का प्रदर्शन बेहद खराब रहा। 2022 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में बसपा सिर्फ 1 सीट जीत सकी, जबकि 2007 में उसने 206 सीटें जीती थीं। 2024 के लोकसभा चुनाव में भी बसपा का प्रदर्शन निराशाजनक रहा और पार्टी ने कोई सीट नहीं जीती। मायावती की व्यक्तिगत नेतृत्व शैली और संगठन में आंतरिक गुटबाजी भी बसपा के पतन के प्रमुख कारणों में से एक रही है। आज बसपा के सामने सबसे बड़ी चुनौती अपनी खोई हुई जमीन वापस पाना और युवा नेतृत्व को आगे बढ़ाना है। यदि पार्टी अपने मूल एजेंडे के साथ नई रणनीति नहीं अपनाती तो इसका भविष्य संकट में पड़ सकता है
गत् सप्ताह बसपा प्रमुख मायावती ने अपने भतीजे आकाश आनंद को पार्टी के सभी पदों से हटा दिया। उन्होंने इस कार्रवाई के लिए आकाश के ससुर अशोक सिद्धार्थ को जिम्मेदार ठहराया, जिन्हें पहले ही पार्टी विरोधी गतिविधियों और गुटबाजी के आरोप में निष्कासित किया जा चुका था। मायावती ने कहा कि ‘अशोक सिद्धार्थ ने पार्टी को नुकसान पहुंचाया और आकाश के राजनीतिक करियर को भी प्रभावित किया।’ आकाश आनंद को हटाने के बाद, मायावती ने अपने भाई आनंद कुमार और राज्यसभा सांसद रामजी गौतम को पार्टी का राष्ट्रीय समन्वयक नियुक्त किया। बकौल मायावती यह कदम पार्टी संगठन को मजबूत करने के उद्देश्य से उठाया गया है। बसपा वर्तमान में आंतरिक संघर्ष और जनाधार में कमी जैसी गम्भीर चुनौतियों का सामना कर रही है। मायावती द्वारा उठाए गए हालिया कदम पार्टी को पुनर्गठित करने और उसकी खोई हुई साख वापस पाने के प्रयास हैं। आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि बसपा इन चुनौतियों से कैसे निपटती है और अपने राजनीतिक भविष्य को कैसे संवारती?
गौरतलब है कि पिछले कुछ वर्षों में बसपा का जनाधार कमजोर हुआ है। 2024 के लोकसभा चुनाव में पार्टी ने 488 सीटों पर उम्मीदवार उतारे थे, लेकिन एक भी सीट जीतने में असफल रही। उत्तर प्रदेश में बसपा का वोट शेयर 9.39 प्रतिशत से घटकर 2.04 प्रतिशत रह गया। 2022 के विधानसभा चुनाव में भी पार्टी केवल एक सीट जीत सकी और वोट शेयर 12.88 प्रतिशत रहा, जो 2017 में 22.23 प्रतिशत था।
पहले भी आकाश पर गिरी थी गाज
28 अप्रैल 2024 को उत्तर प्रदेश के सीतापुर में एक चुनावी रैली के दौरान आकाश आनंद ने भाजपा सरकार की तुलना तालिबान से की थी और उसे ‘आतंकवादियों की सरकार’ तक कह डाला था। उन्होंने आरोप लगाया था कि यह सरकार जनता को गुलाम बनाकर रख रही है और राज्य में कानून-व्यवस्था की स्थिति चिंताजनक है। उन्होंने तब कहा था कि ‘जो सरकार युवाओं को भूखा रखे, जो सरकार बड़े-बुजुर्गों को गुलाम बना कर रखे, ऐसी सरकार आतंकवादियों की सरकार होती है। ऐसी सरकार तालिबान-अफगानिस्तान में चलती है।’ आकाश आनंद के इस बयान पर भाजपा प्रवक्ता राकेश त्रिपाठी ने कड़ी प्रतिक्रिया देते हुए कहा था कि ‘आकाश आनंद की यह टिप्पणी उन्हें महंगी पड़ेगी और इसे जनता की अदालत में खामियाजा भुगतना पड़ेगा।’ इसी दौरान सीतापुर पुलिस ने आचार संहिता के उल्लंघन और भड़काऊ बयान देने के आरोप में आकाश आनंद समेत पांच बसपा नेताओं के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज की थी। इन घटनाओं के बाद बसपा प्रमुख मायावती ने आकाश आनंद को पार्टी के नेशनल कोआॅर्डिनेटर और उत्तराधिकारी पद से हटा दिया था। उन्होंने तब कहा था कि ‘आकाश अभी अपरिपक्व हैं और उन्हें जिम्मेदारियों से मुक्त किया जा रहा है।’
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि मायावती द्वारा आकाश को दोबारा निकालले जाने का कदम पार्टी में अनुशासन और एकता बनाए रखने के लिए उठाया गया है। आकाश आनंद के ससुर अशोक सिद्धार्थ पर पार्टी को दो गुटों में बांटने के आरोप लगे थे, जिससे पार्टी की छवि प्रभावित हो रही थी। विश्लेषकों के अनुसार मायावती का यह निर्णय बसपा भीतर गुटबाजी को रोकने और संगठन को मजबूत करने के उद्देश्य से लिया गया है। इसके अलावा मायावती ने अपने भाई आनंद कुमार और राज्यसभा सांसद रामजी गौतम को पार्टी का राष्ट्रीय समन्वयक नियुक्त किया है। यह कदम पार्टी के संगठनात्मक ढांचे को पुनर्गठित करने और आगामी चुनावों के लिए रणनीतिक तैयारी के रूप में देखा जा रहा है।
घटता जनाधार, सिकुड़ती बसपा
2012 के बाद से बसपा का राजनीतिक आधार लगातार कमजोर होता गया। 2014 और 2019 के लोकसभा चुनावों में पार्टी का प्रदर्शन बेहद खराब रहा। 2022 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में बसपा सिर्फ 1 सीट जीत सकी, जबकि 2007 में उसने 206 सीटें जीती थीं। 2024 के लोकसभा चुनाव में भी बसपा का प्रदर्शन निराशाजनक रहा और पार्टी ने कोई सीट नहीं जीती। मायावती की व्यक्तिगत नेतृत्व शैली और संगठन में आंतरिक गुटबाजी भी बसपा के पतन के प्रमुख कारणों में से एक रही है।
कुल मिलाकर बसपा का राजनीतिक सफर एक क्रांति से शुरू हुआ था, लेकिन आज यह हाशिये पर पहुंच चुकी है। मायावती की सख्त नेतृत्व शैली, गठबंधन न करने की नीति और दलित वोट बैंक में भाजपा की सेंध ने पार्टी को कमजोर किया है। आज बसपा के सामने सबसे बड़ी चुनौती अपनी खोई हुई जमीन वापस पाना और युवा नेतृत्व को आगे बढ़ाना है। यदि पार्टी अपने मूल एजेंडे के साथ नई रणनीति नहीं अपनाती तो इसका भविष्य संकट में पड़ सकता है।
बहुजन समाज पार्टी : एक राजनीतिक यात्रा – उदय से संघर्ष तक
बहुजन समाज पार्टी (बसपा) का उदय भारतीय राजनीति में एक ऐतिहासिक घटना रही है, जिसने दलित, पिछड़े और वंचित वर्गों को एक मजबूत राजनीतिक पहचान दी। इस पार्टी की जड़ें कांशीराम द्वारा स्थापित संगठनात्मक आंदोलनों में हैं, जिनका उद्देश्य सामाजिक न्याय और बहुजन वर्ग को सत्ता में भागीदारी दिलाना था। कांशीराम ने 1970 के दशक में दलितों और पिछड़े वर्गों को संगठित करने के लिए सामाजिक आंदोलन शुरू किया। उन्होंने 1978 में ‘बामसेफ’ (बैकवर्ड एंड माइनाॅरिटी कम्युनिटीज एम्प्लाॅयज फेडरेशन) की स्थापना की। यह संगठन मुख्य रूप से सरकारी कर्मचारियों के बीच दलित चेतना जगाने के लिए था। इसके बाद उन्होंने 1981 में ‘डीएस-4’ (दलित शोषित समाज संघर्ष समिति) का गठन किया, जिसने राजनीतिक रूप से हाशिए पर पड़े समुदायों को एक मंच दिया।

बसपा का गठन और राजनीतिक विस्तार
14 अप्रैल 1984 को कांशीराम ने बहुजन समाज पार्टी (बसपा) की स्थापना की, जिसका लक्ष्य दलित, पिछड़े, आदिवासी और अल्पसंख्यकों को एकजुट कर राजनीतिक शक्ति में तब्दील करना था। शुरुआती दौर में बसपा ने उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, पंजाब और महाराष्ट्र जैसे राज्यों में अपनी पैठ बनाई। 1990 के दशक में, बसपा उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक महत्वपूर्ण शक्ति बन गई। 1993 के विधानसभा चुनावों में समाजवादी पार्टी (सपा) के साथ गठबंधन कर बसपा ने भाजपा को सत्ता से बाहर करने में मदद की। हालांकि यह गठबंधन ज्यादा समय तक नहीं चला।
बसपा की सत्ता में एंट्री और मायावती का उदय
2 जून 1995 को मायावती पहली बार उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री बनीं। यह भारतीय राजनीति में ऐतिहासिक क्षण था जब एक दलित महिला राज्य की सबसे ऊंची कुर्सी पर पहुंची। इसके बाद मायावती 2002, 2007 और 2012 में भी मुख्यमंत्री बनीं। 2007 का चुनाव बसपा के लिए सबसे बड़ी जीत साबित हुआ, जब उसने पूर्ण बहुमत के साथ सरकार बनाई। इस चुनाव में मायावती ने ‘सर्वजन हिताय, सर्वजन सुखाय’ की नीति अपनाई और ब्राह्माण-दलित गठजोड़ के सहारे सत्ता में आईं।

