बांग्लादेश इन दिनों गहरी राजनीतिक और सामाजिक अशांति से गुजर रहा है। युवा नेता शरीफ उस्मान की हत्या के बाद सड़कों पर फूटा जनाक्रोश धीरे-धीरे साम्प्रदायिक हिंसा और भारत-विरोधी भावनाओं में तब्दील होता दिख रहा है। सत्ता संघषज्, युवाओं की निराशा, कट्टरपंथी ताकतों की सक्रियता और राज्य की कमजोर पकड़ ने ऐसा माहौल बना दिया है जहां असंतोष की आग में सबसे पहले अल्पसंख्यक हिंदू झुलस रहे हैं
दक्षिण एशिया का संवेदनशील देश बांग्लादेश एक बार फिर ऐसे मोड़ पर खड़ा है जहां राजनीतिक अस्थिरता, सामाजिक विभाजन और क्षेत्रीय तनाव एक-दूसरे में घुलते दिखाई दे रहे हैं। युवा नेता शरीफ उस्मान की हत्या ने उस असंतोष को सतह पर ला दिया है जो लम्बे समय से भीतर ही भीतर सुलग रहा था। शुरुआत में यह गुस्सा न्याय की मांग के रूप में सामने आया लेकिन बहुत जल्द इसकी दिशा बदल दी गई। प्रदर्शन हिंसक हुए, अफवाहें फैलीं और हालात ऐसे बने कि असली सवाल कि हत्या किसने और क्यों की? पीछे छूटता चला गया।
शरीफ उस्मान कोई साधारण राजनीतिक कार्यकर्त्ता नहीं थे। वे उस पीढ़ी की आवाज थे जो बेरोजगारी, भ्रष्टाचार, बढ़ती महंगाई और लोकतांत्रिक स्पेस के सिमटने से खिन्न है। उनकी लोकप्रियता और मुखरता सत्ता और स्थानीय प्रभावशाली गुटों के लिए असहज थी। ऐसे में उनकी हत्या को केवल एक आपराधिक वारदात के रूप में देखना अधूरा सच होगा। यह हत्या एक संदेश भी थी कि जो तय दायरे से बाहर बोलेगा, उसका हश्र क्या हो सकता है। यही कारण है कि हत्या के बाद जांच की रफ्तार और सरकारी प्रतिक्रिया को लेकर सवाल उठने लगे।
बांग्लादेश में लम्बे समय से एक ऐसा नैरेटिव पनपाया जाता रहा है जिसमें हर आंतरिक समस्या के लिए भारत को जिम्मेदार ठहराना आसान रास्ता बन गया है। नदी जल विवाद, व्यापार असंतुलन या क्षेत्रीय राजनीति, इन वास्तविक मुद्दों पर गम्भीर संवाद के बजाय भावनात्मक और राष्ट्रवादी नारों को हवा दी जाती है। जब-जब देश के भीतर संकट गहराता है, तब-तब भारत विरोधी भावना को उभारकर जनता का ध्यान असली सवालों से हटाया जाता है। इसी क्रम में हिंदू अल्पसंख्यकों को श्भारत समथज्क्य या श्बाहरी्य ठहराने की कोशिश की जाती है।
यह विडम्बना है कि जिस देश के जन्म में भारत की निणाज्यक भूमिका रही उसी देश में आज भारत-विरोधी भावनाएं राजनीतिक हथियार बन चुकी हैं। इतिहास को या तो भुला दिया गया है या सुविधानुसार तोड़-मरोड़ कर पेश किया जा रहा है। इस प्रक्रिया में अल्पसंख्यक हिंदू समाज दोहरी मार झेलता है एक ओर राजनीतिक हिंसा, दूसरी तरफ पहचान के आधार पर संदेह और नफरत।
राज्य की भूमिका इस पूरे घटनाक्रम में सबसे कमजोर कड़ी के रूप में उभरती है। शरीफ उस्मान की हत्या के बाद यदि त्वरित, पारदर्शी और सख्त कारज्वाई होती, तो शायद हालात इतने नहीं बिगड़ते। लेकिन कानून- व्यवस्था की ढीली पकड़ ने कट्टरपंथी और उकसावेबाज ताकतों को खुला मैदान दे दिया। सोशल मीडिया पर फैली अफवाहों और भड़काऊ संदेशों ने आग को और तेज कर दिया। परिणाम यह हुआ कि हिंसा नियंत्रित होने के बजाय फैलती चली गई।
इस अस्थिरता के पीछे आर्थिक दबाव भी कम जिम्मेदार नहीं हैं। युवाओं में बेरोजगारी और भविष्य को लेकर गहरी अनिश्चितता है। शरीफ उस्मान इसी हताशा की आवाज थे। उनकी हत्या ने युवाओं को यह संदेश दिया कि व्यवस्था उनकी बात सुनने के बजाय उन्हें कुचलने को तैयार है। ऐसे माहौल में गुस्सा भड़काना आसान हो जाता है और उसे साम्प्रदायिक दिशा देना सत्ता संघर्ष में शामिल कुछ समूहों के लिए फायदेमंद साबित होता है।
अल्पसंख्यक हिंदुओं पर हमले केवल भीड़ की हिंसा नहीं बल्कि एक सुनियोजित सामाजिक संदेश हैं, डर का संदेश। यह डर लोगों को खामोश रहने, पलायन करने या अपने अधिकारों से पीछे हटने पर मजबूर करता है। हर बार यही होता है और हर बार आश्वासन दिए जाते हैं। लेकिन जमीनी सच्चाई यह है कि भरोसा लगातार टूट रहा है।
भारत-बांग्लादेश सम्बंधों के लिहाज से भी यह दौर बेहद नाजुक है। सीमा, व्यापार और सुरक्षा के मुद्दों पर सहयोग तभी टिकाऊ हो सकता है जब दोनों देशों के समाजों के बीच विश्वास हो। जब बांग्लादेश में भारत-विरोधी भावनाएं और अल्पसंख्यक विरोधी हिंसा बढ़ती है, तो उसका असर रिश्तों पर पड़ता ही है। भारत के लिए यह चेतावनी है कि वह केवल सरकारों के बीच संवाद तक सीमित न रहे बल्कि सामाजिक स्तर पर भरोसा बहाली की पहल करे। वहीं बांग्लादेश के लिए यह आत्ममंथन का समय है कि क्या वह अपने नागरिकों की समान सुरक्षा सुनिश्चित किए बिना स्थिर और सम्मानित राष्ट्र बन सकता है।
अंतत : शरीफ उस्मान की हत्या का न्याय केवल एक केस के निपटारे से पूरा नहीं होगा। न्याय तब होगा जब उस हत्या के बाद फैलाई गई नफरत और हिंसा पर भी लगाम लगेगी। बांग्लादेश के सामने आज असली सवाल यही है कि क्या वह असंतोष को सुधार और संवाद की ओर ले जाएगा या हर संकट में अल्पसंख्यकों और पड़ोसी देश के नाम पर अपनी विफलताओं को ढकता रहेगा। इसका जवाब सिफज् बांग्लादेश के भविष्य को नहीं बल्कि पूरे दक्षिण एशिया की स्थिरता को प्रभावित करेगा।
इस बीच, बांग्लादेश में हिंसा का सिलसिला और गम्भीर होता दिखाई दे रहा है। ‘इंक़लाब मंच’ के प्रवक्ता और छात्र नेता शरीफ उस्मान बिन हादी की हत्या से उपजी हिंसा अभी थमी भी नहीं थी कि 22 दिसम्बर को एक और बड़ी राजनीतिक वारदात सामने आ गई। नेशनल सिटीजन पार्टी (एनसीपी) के खुलना डिविजनल प्रमुख और पार्टी के केंद्रीय आयोजक मोतालेब सिकदार को अज्ञात हमलावरों ने सिर में गोली मार दी। गोली लगने के बाद उन्हें गम्भीर हालत में अस्पताल में भर्ती कराया गया है जहां उनका इलाज जारी है।
स्थानीय सूत्रों के अनुसार यह हमला भी उसी अशांत माहौल में हुआ है जो शरीफ उस्मान की हत्या के बाद से देश के कई हिस्सों में बना हुआ है। घटना के बाद खुलना और आस-पास के इलाकों में तनाव और बढ़ गया है। पुलिस ने इलाके में अतिरिक्त बल तैनात किया है लेकिन अब तक हमलावरों की गिरफ्तारी की कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं की गई है। लगातार हो रहे इन हमलों ने आम नागरिकों के साथ-साथ राजनीतिक कार्यकर्ताओं में भी भय का माहौल पैदा कर दिया है।
एक के बाद एक नेताओं पर हो रहे हमलों ने अंतरिम सरकार की कानून-व्यवस्था पर गम्भीर सवाल खड़े कर दिए हैं। विपक्षी दलों और मानवाधिकार संगठनों का कहना है कि यदि समय रहते प्रभावी कारज्वाई नहीं की गई तो हालात और बिगड़ सकते हैं। उनका आरोप है कि राजनीतिक हिंसा के इस दौर में न केवल लोकतांत्रिक आवाजों को निशाना बनाया जा रहा है बल्कि अस्थिर माहौल का खामियाजा अल्पसंख्यक समुदायों और आम नागरिकों को भी भुगतना पड़ रहा है।
फिलहाल देश के कई हिस्सों में तनावपूर्ण शांति बनी हुई है लेकिन शरीफ उस्मान बिन हादी की हत्या के बाद मोतालेब सिकदार पर हुआ यह हमला साफ संकेत देता है कि बांग्लादेश में राजनीतिक संकट अभी थमा नहीं है और हालात किसी भी समय और विस्फोटक रूप ले सकते हैं। तात्कालिक हिंसा से कहीं अधिक चिंतनीय भारत और बांग्लादेश के रिश्तों में बढ़ रहा तनाव है। एक दौर वह भी था जब अपने जन्मदाता के प्रति कृतज्ञ राष्ट्र नवजात शिशुओं के नाम इंदिरा अथवा राजीव रखता था और एक दौर यह है जहां हिंदू होना अपराध सरीखा हो चला है। शेख हसीना को शरण देने के बाद भारत के प्रति आम बांग्लादेशी की नाराजगी खासी बढ़ी है। यह कहना खासा कठिन है कि दोनों देशों के मध्य रिश्ते कम सुधरेंगे और किस हद तक सुधर पाएंगे?

