बिहार में विधानसभा चुनाव से पहले वोटर लिस्ट रिवीजन को लेकर उठा विवाद भारतीय लोकतंत्र में चुनाव आयोग की निष्पक्षता और पत्रकारिता की भूमिका पर बड़ा सवाल खड़ा करता है। वरिष्ठ पत्रकार अजीत अंजुम ने अपनी ग्राउंड रिपोर्टिंग के जरिए मतदाता सूची में गड़बड़ियों और अल्पसंख्यक समुदाय के नाम हटाए जाने की ओर ध्यान आकर्षित करने का जैसे ही प्रयास किया उनके खिलाफ मुकदमा दर्ज कर दिया गया। लेकिन रिपोर्टिंग के असर से दो बूथ लेवल ऑफिसर्स (बीएलओएस) को सस्पेंड भी किया गया, जिससे स्पष्ट होता है कि आरोपों में सच्चाई है। यह विवाद बिहार से आगे बढ़कर अब पूरे देश में लोकतंत्र की पारदर्शिता, प्रेस की स्वतंत्रता और सत्ता की जवाबदेही की परख बनता जा रहा है
बिहार में विधानसभा चुनावों से पहले जो तूफान उठा है, उसने भारतीय लोकतंत्र के दो सबसे बड़े स्तम्भों, चुनाव आयोग और प्रेस की स्वतंत्रता को कठघरे में खड़ा कर दिया है। वरिष्ठ पत्रकार अजीत अंजुम की ग्राउंड रिपोर्टिंग ने मतदाता सूची रिवीजन में सामने आ रही गड़बड़ियों को उजागर क्या किया कि इसके तुरंत बाद उनके ही खिलाफ एफआईआर दर्ज कर दी गई। लेकिन रिपोर्टिंग का असर इतना तेज था कि बिहार सरकार को दो बूथ लेवल ऑफिसर्स (बीएलओ) को सस्पेंड करना पड़ा जिससे यह साफ होता है कि अजीत के आरोप बेबुनियाद नहीं थे।
12 जुलाई 2025 को बलिया, बिहार में अजीत अंजुम मतदान केंद्रों पर चल रही वोटर लिस्ट रिवीजन प्रक्रिया को कवर कर रहे थे। उनकी रिपोर्टिंग में दिखाया गया कि मतदाता सूची में भारी अनियमितताएं हैं, कहीं फाॅर्म पर फोटो नहीं, कहीं हस्ताक्षर अधूरे, कहीं नामों में गलतियां।
विशेष चिंता की बात यह थी कि अल्पसंख्यक समुदाय के मतदाताओं के नामों को बड़ी संख्या में हटाया जा रहा था, जिससे लोकतांत्रिक प्रक्रिया की निष्पक्षता पर सवाल उठने लगे।
अजीत अंजुम का कहना है कि ‘‘ये सिर्फ लापरवाही नहीं, सुनियोजित प्रयास लगते हैं, ताकि एक वर्ग विशेष के वोटरों को हटाया जाए।’’ रिपोर्टिंग के तुरंत बाद बीएलओ मोहम्मद अंसारुल हक ने पुलिस में शिकायत दर्ज कराई, जिसमें आरोप लगाया गया कि अजीत ने सरकारी काम में बाधा डाली और साम्प्रदायिक तनाव फैलाने की कोशिश की। उनके खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धाराओं और जनप्रतिनिधित्व काूनन, 1951 के तहत मुकदमा दर्ज कर लिया गया। मामला लेकिन यहीं नहीं थमा। अजीत की रिपोर्ट के वायरल होने के बाद गया में बीएलओ गौरी शंकर का वीडियो सामने आया, जिसमें वह वोटर लिस्ट में नाम जोड़ने के लिए चाय-पानी के नाम पर पैसे ले रहे थे। बेगूसराय में एक और बीएलओ पर फर्जी दस्तावेजों के जरिए नाम जोड़ने का आरोप लगा। इन दोनों मामलों में बिहार प्रशासन को तुरंत कार्रवाई करते हुए इन दोनों को सस्पेंड करना पड़ा है। इससे यह स्पष्ट होता है कि अजीत अंजुम की रिपोर्टिंग सिर्फ मीडिया स्टंट नहीं थी, बल्कि व्यवस्था की असली खामियां सामने ला रही थी। भारतीय संविधान का अनुच्छेद 324 चुनाव आयोग को स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव कराने का दायित्व देता है, लेकिन नागरिकता तय करने का अधिकार उसके पास नहीं है। यह गृह मंत्रालय के अधीन आता है। संविधान का अनुच्छेद 19(1)(ए) हर नागरिक को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार देता है जो पत्रकारों के लिए भी लागू है। पत्रकारों का काम सिर्फ सूचना देना नहीं, बल्कि व्यवस्था का आईना बनना भी है।
भारत के चुनावी इतिहास में चुनाव आयोग कई बार अपनी साख को लेकर चर्चाओं में रहा है। 1990 के दशक में मुख्य चुनाव आयुक्त टीएन शेषन के कार्यकाल में आयोग ने सख्ती दिखाई और देशभर में उसकी साख मजबूत हुई। लेकिन पिछले एक दशक में आयोग की निष्पक्षता पर बार- बार सवाल उठे हैं, चाहे वह ईवीएम विवाद हों, प्रधानमंत्री या शीर्ष नेताओं के भाषणों पर कार्रवाई न करने के आरोप हों या फिर अशोक लवासा जैसे चुनाव आयुक्त का असमय इस्तीफा। बिहार का मौजूदा विवाद भी इसका हिस्सा बन गया है कि चुनाव आयोग निष्पक्ष बना हुआ है या नहीं।
अजीत अंजुम की पहचान सिर्फ एक यू-ट्यूब पत्रकार की नहीं है, बल्कि एक ऐसे निर्भीक रिपोर्टर की है जो दिल्ली दंगे, कोविड संकट, उत्तर प्रदेश चुनाव, मणिपुर हिंसा जैसे संवेदनशील विषयों पर जमीनी हकीकत सामने लाते रहे हैं। उनकी पत्रकारिता का अर्थ सत्ता के प्रवक्ता बनना नहीं, बल्कि जनता का आईना बनना है। उनके वीडियो अक्सर सत्ता प्रतिष्ठान के लिए असहज होते हैं, लेकिन जनता के बीच उन्हें व्यापक सराहना मिलती है। प्रतिष्ठित रामनाथ गोयनका अवार्ड से पुरस्कृत अंजुम ‘न्यूज 24’ चैनल के प्रबंध सम्पादक रह चुके हैं।
भारत में प्रेस की स्वतंत्रता की स्थिति लगातार गिर रही है। रिपोर्टर्स विदाउट बाॅर्डर्स के प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक 2024 में भारत की रैंकिंग 150/180 है जो चिंताजनक है। वरिष्ठ पत्रकार रवीश कुमार कहते हैं, ‘‘डर का सबसे बड़ा असर यह होता है कि लोग सवाल पूछना छोड़ देते हैं।’’ पुण्य प्रसून वाजपेयी का मानना है कि ‘‘जो लोग सच बोलते हैं, उन्हें चुप कराने की कोशिश की जाती है।’’ पत्रकारों पर मुकदमे, ट्रोलिंग और सरकारी दबाव अब आम हो चुके हैं।
सवाल सिर्फ यह नहीं है कि चुनाव आयोग क्या कर रहा है या पत्रकार क्या दिखा रहे हैं, बल्कि यह भी है कि आम नागरिक किस हद तक सच जानना चाहता है और उस पर प्रतिक्रिया देता है। मतदाता सूची की गड़बड़ियां सबसे ज्यादा असर गरीबों, अल्पसंख्यकों, प्रवासी मजदूरों और वंचित तबकों पर डालती हैं। उनके पास अक्सर वे दस्तावेज नहीं होते, जिनकी बीएलओ मांग करते हैं और इसी बहाने उनका नाम हटा दिया जाता है। इस संदर्भ में अंजुम की रिपोर्टिंग जनता की तरफ से उठी वह आवाज है जो यह सवाल करती है, आखिर किसके लिए हो रही है यह प्रक्रिया?
‘‘मुझे अंदाजा नहीं था कि हजारों लोग इस तरह से मेरी हौसला-अफजाई करेंगे। आप सबके दम पर ही एफआईआर के बाद भी मैं ‘सर’ की खामियों और वोटर की परेशानियों पर रिपोर्ट कर रहा हूं। पहले से तय कार्यक्रम के मुताबिक मुझे आज सुबह दिल्ली लौटना था लेकिन अब मैंने तय किया है कुछ दिन और यहीं रहूंगा। अगर मेरी रिपोर्टिंग से चुनाव आयोग और सिस्टम को इतनी परेशानी है तो उनकी थोड़ी परेशानी और बढ़ाऊंगा। चाहे मुझे कुछ और एफआईआर का सामना क्यों न करना पड़े? चुनाव आयोग की नाकामियों और फार्म के नाम पर हो रहे फर्जीवाड़े को तथ्यों के साथ उजागर करना, अगर अपराध है तो ये अपराध कुछ दिन और करूंगा। सपोर्ट के लिए आप सभी का दिल से शुक्रिया।’’
अजीत अंजुम, वरिष्ठ पत्रकार
लोकतंत्र सिर्फ चुनावी प्रक्रिया का नाम नहीं है। यह एक जीवंत संवाद है जिसमें मीडिया, न्यायपालिका और प्रशासन के साथ-साथ जनता का सक्रिय योगदान जरूरी होता है। अगर पत्रकार सत्ता से सवाल नहीं पूछेंगे, नागरिक सवाल पूछना छोड़ देंगे तो लोकतंत्र धीरे-धीरे खाली खोल में बदल जाएगा, जिसकी आत्मा नहीं होगी। अदालतों को यह देखना होगा कि पत्रकारों पर दायर मुकदमे कहीं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का गला घोंटने के लिए तो इस्तेमाल नहीं हो रहे हैं। पत्रकार संगठनों को मिलकर यह सुनिश्चित करना होगा कि कोई पत्रकार अकेला न खड़ा रहे, खासकर तब जब वह जनता की आवाज उठा रहा हो। इस पूरी घटना का सबसे बड़ा संदेश यही है कि सच को दबाया नहीं जा सकता। अजीत अंजुम पर मुकदमा दर्ज होने के बावजूद, उनकी रिपोर्टिंग से दो बीएलओ सस्पेंड हुए हैं, गड़बड़ियों की परतें खुली हैं और लोगों में चर्चा शुरू हुई है। यह इस बात का प्रमाण है कि लोकतंत्र में जब-जब सच की आवाज उठती है, उसका असर होता है, चाहे सत्ता उसे कितना भी दबाने की कोशिश करे।
अब यह फैसला जनता को करना है कि वह किस ओर खड़ी है, डर और चुप्पी की तरफ या सवाल-जवाबदेही की तरफ। लोकतंत्र की ताकत चुनाव के दिन मतदाता की उंगली की स्याही में नहीं, बल्कि उस पूरे सफर में है, जिसमें वह सत्ता से अपने हक के सवाल पूछता है। जब तक सवाल पूछने वाले मौजूद हैं, लोकतंत्र जीवित रहेगा। भारत के लोकतांत्रिक इतिहास में पत्रकारिता और सत्ता के बीच का संघर्ष कोई नया नहीं है। इमरजेंसी के दौर में जब प्रेस पर सेंसरशिप लागू हुई थी, तब भी कुछ साहसी पत्रकारों और सम्पादकों ने सत्ता के सामने झुकने से मना कर दिया था। उन दिनों ‘इंडियन एक्सप्रेस’ जैसे अखबारों ने खाली सम्पादकीय छापकर प्रतिरोध दर्ज किया था। आज जब तकनीक ने सूचनाओं को मोबाइल और इंटरनेट पर पहुंचा दिया है, तब भी सत्ता वही है जो असहज सवालों से घबराती है और पत्रकार वही है, जो अपनी आवाज से डरता नहीं। अंजुम की कहानी भी उसी परम्परा की अगली कड़ी है। उनके खिलाफ दर्ज एफआईआर, उनके वीडियो, उनके समर्थकों की आवाज, ये सब मिलकर हमें याद दिलाते हैं कि लोकतंत्र की असली परीक्षा चुनाव के दिन नहीं होती, बल्कि उन दिनों होती है, जब जनता के हक में आवाज उठाने वाला अकेला खड़ा रह जाता है। आज चुनाव आयोग की साख भी जनता के सवालों के घेरे में है। आयोग का काम सिर्फ चुनाव कराना नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करना है कि हर मतदाता को उसका हक मिले और पूरी प्रक्रिया पर भरोसा बना रहे। अगर मतदाता सूची की प्रक्रिया में एक खास समुदाय या वर्ग के लोगों को असमान रूप से निशाना बनाया जा रहा है तो यह सिर्फ प्रशासनिक मुद्दा नहीं, लोकतांत्रिक नैतिकता का सवाल बन जाता है।
भारत की न्यायपालिका, प्रेस और नागरिक समाज, ये तीनों जब साथ खड़े होते हैं तभी सत्ता की जवाबदेही तय हो पाती है। अगर इनमें से कोई भी कमजोर पड़ता है तो लोकतंत्र में दरारें उभरने लगती हैं। इस मामले में अदालतें आगे चलकर यह तय करेंगी कि अजीत अंजुम पर दर्ज एफआईआर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के खिलाफ है या नहीं। लेकिन समाज को अपने स्तर पर यह तय करना होगा कि वह किस ओर खड़ा होना चाहता है। लोकतंत्र का असली सार ‘चुप्पी’ नहीं, ‘संवाद’ है। संवाद का मतलब सिर्फ सत्ता और विपक्ष के बीच की बहस नहीं, बल्कि जनता और सत्ता के बीच की बातचीत भी है, जिसमें पत्रकार सेतु का काम करता है। इस सेतु को तोड़ना दरअसल जनता और सत्ता के बीच की खाई को बढ़ाना है। अजीत अंजुम का मामला किसी एक व्यक्ति या एक राज्य का मामला नहीं है। यह भारत के लोकतांत्रिक ताने-बाने की उस डोर का मामला है, जिस पर सबका भविष्य टिका है। अगर हम चाहते हैं कि हमारे देश में सच्चाई की जगह बनी रहे तो हमें सच्चाई का साथ देने की हिम्मत भी रखनी होगी, भले ही वह हिम्मत किसी अजीत अंजुम में दिखाई दे या किसी गांव-कस्बे के आम नागरिक में।रवीश कुमार के शब्दों में, ‘‘डर का सबसे बड़ा असर यही होता है कि लोग सवाल पूछना छोड़ देते हैं।’’ हमें इस असर को रोकना होगा, क्योंकि सवाल पूछना सिर्फ पत्रकार का अधिकार नहीं, हर नागरिक का अधिकार है और यही अधिकार लोकतंत्र की असली सांस है।