भारत का लोकतंत्र अपनी जटिलताओं, बहसों और संघर्षों से ही जीवंत है। यहां प्रश्न पूछना अपराध नहीं बल्कि लोकतांत्रिक विरासत है। लेकिन 18 नवम्बर 2025 को प्रकाशित एक खुला पत्र, जिसे 272 प्रतिष्ठित पूर्व नौकरशाहों, पूर्व जजों और पूर्व सैन्य अधिकारियों ने राहुल गांधी के खिलाफ जारी किया, इस लोकतांत्रिक परम्परा पर ही प्रश्नचिह्न बनकर उभर आया। इस पत्र का शीर्षक था “Assault on National Constitutional
Authorities” और इसकी भाषा ने पहली ही पंक्ति से एक गम्भीर नैरेटिव स्थापित किया कि राहुल गांधी और व्यापक रूप से विपक्ष, भारत की संवैधानिक संस्थाओं पर ‘जहरीले हमले’ कर रहे हैं। चिट्ठी की शुरुआत इस वाक्य से होती है “India’s democracy is under assault, not by force but by a rising tide of
venomous rhetoric directed toward its foundational institutions.” इस एक वाक्य से पत्र की शुरुआत स्पष्ट कर देती है कि इसका उद्देश्य राहुल गांधी को एक ऐसे राजनीतिक चरित्र के रूप में प्रस्तुत करना है जो संस्थाओं पर हमला कर रहा है, लोकतंत्र को कमजोर कर रहा है और चुनाव आयोग के खिलाफ असत्य फैला रहा है। लेकिन यह पत्र उस समय आया जब देशभर में एसआईआर (Special Intensive Revision), वोटर डिलीशन, बूथ-स्तरीय सत्यापन और मतदाता सूची की पारदर्शिता जैसे महत्वपूर्ण मुद्दों पर व्यापक सवाल उठ रहे थे। राहुल गांधी ने इन्हीं प्रक्रियाओं पर सवाल खड़े किए थे और कहा था कि ‘‘वोट चोरी व्यवस्थित ढंग से हुई है।’’
चुनाव आयोग ने इन आरोपों को सिरे से खारिज कर डाला, बगैर कोई तर्क दिए। 272 हस्ताक्षरकर्ताओं की चिट्ठी इन मुद्दों को नजरअंदाज कर देती है और राहुल गांधी की भाषा को पूरे विवाद का केंद्र बना देती है। पत्र यह कहता है “The Leader of Opposition has repeatedly attacked the Election Commission… claiming he has 100% proof of vote theft… what he has found is an atom-bomb.” राहुल गांधी के शब्दों का जिक्र लेकिन उनके आरोपों पर खामोशी जो स्पष्ट करती है कि पत्र का उद्देश्य सत्ता के पक्ष में नैरेटिव गढ़ना भर है। लोकतंत्र में किसी संवैधानिक संस्था पर सवाल उठाना असहमति का हिस्सा है, हमला नहीं। पर चिट्ठी संस्थागत आलोचना को ‘जहरीला उवाच’ (venomous rhetoric) बताकर एक नैतिक द्वंद्व खड़ा करती है कि सवाल पूछने वाला लोकतंत्र का विरोधी है। यही नैरेटिव इस पत्र को एक राजनीतिक उपकरण बना देता है।
चिट्ठी में एक और महत्वपूर्ण दलील दी गई है कि ‘चुनाव आयोग ने सार्वजनिक पटल पर एसआईआर प्रक्रिया को सामने रखा है।’ यह दावा सतही रूप से मजबूत लगता है, लेकिन यह उल्लेख नहीं करता कि देशभर में एसआईआर प्रक्रिया पर गम्भीर सवाल उठे। लाखों वैध मतदाताओं के नाम हटाए गए, कई जगह डाटा त्रुटिपूर्ण पाया गया, बूथ-स्तर पर सत्यापन अधूरा था और दर्जनों रिट विभिन्न उच्च न्यायालयों में दाखिल हुए। वास्तविक सवाल यह है कि यदि आरोप इतने व्यापक हैं तो क्या चुनाव आयोग ने स्वयं जांच नहीं करनी चाहिए थी? इसके बाद चिट्ठी राहुल गांधी के ‘मनोविज्ञान’ की व्याख्या करती है कि ‘‘यह तरीका ‘नपुंसकगुस्से…’ जो लगातार मिल रही हार के कारण है।’’ (This pattern reflects impotent rage… born of repeated electoral
failure.) यह भाषा किसी स्वतंत्र नागरिक-समूह के औपचारिक पत्र की नहीं लगती। यह भाषा राजनीतिक है, भावनात्मक है और राहुल गांधी के चरित्र पर सवाल खड़े करती है, उनके तर्कों पर नहीं। चिट्ठी यहां भी तथ्य से हटकर व्यक्ति पर जाए-बने हुए हमला करते हुए दिखती है। एक अन्य दलील यह देती है कि “When electoral outcomes are favourable, criticism disappears; when unfavourable, the ECI becomes villain.” लेकिन यह तर्क भी वास्तविकता से कमजोर है। विपक्ष ने उन राज्यों में भी चुनाव आयोग की प्रक्रियाओं पर सवाल उठाए जहां वे जीते थे। जैसे वीवीपैट गिनती, बूथ स्टाफिंग और मतदाता सूची में सुधार की प्रक्रिया। इसलिए यह तर्क अर्धसत्य है। किसी भी प्रक्रिया की आलोचना का अस्तित्व परिणामों पर निर्भर नहीं करता, प्रक्रिया की पारदर्शिता पर निर्भर करता है।
चिट्ठी विदेशी उदाहरण भी देती है जैसे अमेरिका, फ्रांस, ब्रिटेन, जहां अवैध प्रवासियों को सख्ती से हटाया जाता है। लेकिन राहुल गांधी का आरोप यह नहीं था कि अवैध प्रवासी वोट डाल रहे हैं। उनका आरोप यह है कि वैध भारतीय नागरिकों के नाम गलत तरीके से हटाए गए। इसलिए विदेशी उदाहरण देना मुद्दे को मोड़ने जैसा है। इस पूरे विवाद का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है चिट्ठी लिखने वाले लोग। यह चिट्ठी केवल कुछ ‘सेवानिवृत्त’ लोगों की आवाज नहीं है। यह उन व्यक्तियों के समूह की आवाज है जिनमें से कई की सार्वजनिक पृष्ठभूमि राजनीतिक झुकाव, सरकारी लाभ, विवादित नियुक्तियों या सत्ता पक्ष से निकटता से भरी हुई है। सबसे ऊपर दर्ज नाम जस्टिस आदर्श कुमार गोयल का है। उनका करियर विवादों से भरा रहा है। मई 2001 में पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट में उनकी नियुक्ति के पहले ‘आईबी’ ने उनकी ईमानदारी और राजनीतिक सम्बद्धता पर गम्भीर आपत्तियां दर्ज की थीं। इतना ही नहीं, तत्कालीन राष्ट्रपति के.आर. नारायणन ने उनकी नियुक्ति की फाइल वापस भेज दी थी। इसके बाद कानून मंत्री अरुण जेटली ने विस्तृत ‘गोपनीय नोट’ लिखकर ‘आईबी’ की रिपोर्ट को नकारा और गोयल की नियुक्ति का बचाव किया। तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने फाइल पर पुनः हस्ताक्षर किए और नियुक्ति आगे बढ़ाई गई, राष्ट्रपति की अनिच्छा के बावजूद। जब गोयल सुप्रीम कोर्ट से रिटायर हुए तो अगले ही दिन मोदी सरकार ने उन्हें राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण का चेयरमैन नियुक्त कर दिया जो एक बेहद असामान्य तेजी से हुई नियुक्ति थी और इस पर न्यायिक जगत में भी सवाल उठे थे।
इसी तरह, संजीव त्रिपाठी, पूर्व ‘राॅ’ प्रमुख, 2014 में भाजपा में शामिल हुए थे। एक खुफिया एजेंसी के प्रमुख का किसी राजनीतिक दल में प्रवेश अपने भीतर एक पूरी कहानी कहता है। पूर्व राजनयिक लक्ष्मी पुरी जो केंद्रीय मंत्री हरदीप सिंह पुरी की पत्नी हैं, इस पत्र की तटस्थता को और भी संदिग्ध बनाती हैं। पूर्व पुलिस महानिदेशक निर्मल कौर 2024 में भाजपा में शामिल हो चुकी हैं। वाई.सी. मोदी, ‘एनआईए’ के पूर्व प्रमुख, गुजरात दंगों की एसआईटी में शामिल रहे और फिर केंद्र सरकार में उन्हें महत्वपूर्ण पद दिया गया। उनकी नियुक्तियां हमेशा राजनीतिक बहसों के केंद्र में रहीं। दिल्ली हाईकोर्ट के पूर्व जज एस.एन. ढींगरा राॅबर्ट वाड्रा भूमि सौदे मामले में भाजपा सरकार द्वारा गठित आयोग के प्रमुख थे और उन पर पक्षपात के आरोप लम्बे समय से लगते रहे ।
ये सभी तथ्य यह बताते हैं कि पत्र के कई प्रमुख हस्ताक्षरकर्ता राजनीतिक रूप से तटस्थ नहीं हैं। उनकी भूमिकाएं, नियुक्तियां और विचारधारात्मक झुकाव पहले से ही सार्वजनिक जीवन में दर्ज हैं। ऐसे में यह पत्र एक स्वतंत्र नागरिक आक्रोश नहीं बल्कि एक संगठित राजनीतिक प्रति आख्यान (counter-narrative) लगता है जिसका उद्देश्य राहुल गांधी के आरोपों को वैचारिक हमला बताकर उनकी विश्वसनीयता पर प्रहार करना है।
पत्र में सबसे चिंताजनक हिस्सा वह है जहां राहुल गांधी के राजनीतिक मनोविज्ञान का विश्लेषण करते हुए उन्हें ‘impotent rage’ यानी ‘नपुंसक गुस्से’ से प्रेरित बताया गया है। यह भाषा किसी गम्भीर संस्थागत बहस की नहीं बल्कि राजनीतिक प्रहार की शैली की है। यह आरोपों की जांच नहीं करता बल्कि आरोप लगाने वाले के चरित्र को खण्डित करता है। यह वही तरीका है जिसे दार्शनिक अलबेयर कामू ने ‘विचारधारात्मक बुद्धिवाद’ की बीमारी कहा था। कामू जो 20वीं सदी के सबसे महत्वपूर्ण फ्रांसीसी चिंतकों में से एक थे और जिनकी कृतियां ‘The Stranger’, ‘The Rebel’ और ‘Myth of Sisyphus’ आज भी सत्ता, सत्य और नैतिकता पर सबसे गहरी टिप्पणियां मानी जाती हैं, ने हमेशा इस बात पर जोर दिया कि सत्ता के करीब बैठे बुद्धिजीवी अक्सर विचारधारा के नाम पर सत्य का दमन करते हैं। कामू स्वयं इसी तरह के बुद्धिजीवी वर्ग का लक्ष्य बने थे, जब उन्होंने सोवियत क्रूरता पर सवाल उठाए थे और फ्रांस के वामपंथी बुद्धिजीवियों लेफ्ट इंटेलेक्चुअल कम्युनिटी’ ने उन्हें तुरंत ‘द्रोही’, ‘रिएक्शनरी’ और ‘साम्राज्यवाद का एजेंट’ कहकर बदनाम किया। कामू ने लिखा है कि जब विचारधारा मनुष्य से बड़ी हो जाती है तो बुद्धिवादी दमन का पुजारी बन जाता है। राहुल गांधी पर इस चिट्ठी का हमला इसी कामूवादी परिधि में आता है, जहां तर्क को नहीं, तर्क देने वाले को खतरा बताया जाता है।
अलबेयर कामू ने बुद्धिवादियों (Intelligentsia) को उस वर्ग के रूप में चिन्हित किया था जो सत्ता या विचारधारा के पक्ष में सत्य को छोड़ देता है, स्वतंत्र आवाज को ‘द्रोह’ में बदल देता है और आलोचना को नैतिक अपराध बना देता है। कामू के अनुसार बुद्धिवादी वह होता है जो ‘विचारों’ का नहीं, बल्कि ‘विचारधाराओं’ का सेवक होता है। उनका सबसे प्रसिद्ध कथन है ‘जब विचार मनुष्य से ऊपर खड़ा हो जाए, बुद्धिवादी दमन का पुजारी बन जाता है।’ कामू स्वयं फ्रांस की लेफ्ट वामपंथी बुद्धिवादियों द्वारा इसी तरह टारगेट किए गए थे।
कुल मिलाकर मेरी दृष्टि में 272 हस्ताक्षरकर्ताओं की चिट्ठी राहुल गांधी के तर्कों का विश्लेषण नहीं करती बल्कि उन्हें ‘जहरीला’, ‘आक्रोशित’, ‘संवैधानिक संस्था विरोधी’ घोषित करती है। कामू के अनुसार ‘‘बुद्धिवादी हमेशा उन पर हमला करती है जो सत्य को विचारधारा से ऊपर रख दें।’’ इस अर्थ में, राहुल गांधी पर हमला, कामू के दार्शनिक विश्लेषण में एक नैतिक संघर्ष नहीं बल्कि विचारधारात्मक प्रति आक्रमण है। कामू के विचारों के अनुसार यह पत्र एक स्वतंत्र नैतिक आवाज नहीं बल्कि उसी ‘सत्ता-समर्थित बुद्धिवादियों’ का दस्तावेज है जो संस्थाओं को प्रश्नों से नहीं बल्कि प्रश्न पूछने वालों से बचाने की कोशिश करती है।
