अवैध अतिक्रमण हटाती जेसीबी मशीन
रामनगर के ग्राम पूछड़ी में वन भूमि से अवैध अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई के तहत वर्षों पुराने पक्के मकान, धार्मिक ढांचे और बस्तियां ध्वस्त की जा रही हैं। इसी दौरान यह सामने आया कि अतिक्रमित भूमि पर बने मदरसा, मस्जिद और मंदिरों के निर्माण के लिए पूर्व विधायक अमृता रावत और मौजूदा विधायक दीवान सिंह बिष्ट द्वारा विधायक निधि से लाखों रुपए का सरकारी धन खर्च किया गया। इस बीच बिना नोटिस अतिक्रमण हटाने के मामलों पर सख्त रुख अपनाते हुए नैनीताल हाईकोर्ट ने राज्य सरकार से एक सप्ताह में जवाब तलब किया है और मुख्य सचिव को व्यक्तिगत रूप से पेश होने को कहा है


रा मनगर के ग्राम पूछड़ी क्षेत्र में अवैध अतिक्रमण के खिलाफ चल रही प्रशासनिक कारज़्वाई ने पूरे इलाके को हिला कर रख दिया है। तराई पश्चिमी वन प्रभाग की लगभग 20 हेक्टेयर से अधिक वन भूमि पर वषोज़्ं से बने अवैध निमाणोज़्ं को बुलडोजर की मदद से ध्वस्त किया जा रहा है। इस कारज़्वाई में 1960 या उससे भी पुराने बताए जा रहे पक्के मकान, चाहरदीवारियां, टीन शेड और झोपडिय़ां गिराई गईं, जिससे सैकड़ों परिवार बेघर हो गए। वन विभाग के अनुसार पहले चरण में 170 अतिक्रमण चिन्हित किए गए थे, जिनमें से करीब 40 लोगों ने अदालत से स्थगन आदेश प्राप्त कर रखा है जबकि ट्रेंचिंग ग्राउंड और बिहारी टप्पल क्षेत्र से 52 अतिक्रमण हटाए जा चुके हैं।

पूछड़ी की जिस भूमि को आज अतिक्रमण मुक्त कराया जा रहा है, उसका एक बड़ा हिस्सा कभी रामनगर नगर पालिका को कूड़ा निस्तारण के लिए ट्रेंचिंग ग्राउंड के रूप में दिया गया था। इसके एवज में नगर पालिका ने वन विभाग को लगभग एक करोड़ रुपए का भुगतान भी किया था। लेकिन वर्षों बीत जाने के बावजूद ट्रेंचिंग ग्राउंड का निर्माण नहीं हो सका और खाली पड़ी भूमि पर भूमाफियाओं की नजर पड़ गई। आरोप है कि इस भूमि को फर्जी दस्तावेजों और स्टाम्प के सहारे बेचा गया और गरीब व जरूरतमंद लोगों को सस्ते दामों पर प्लॉट बताकर यहां बसाया गया।

अतिक्रमण हटाओ अभियान के दौरान प्रशासन के सामने सबसे चौंकाने वाला तथ्य यह आया कि सरकारी भूमि पर बने कई धार्मिक ढांचों के निर्माण में स्वयं जनप्रतिनिधियों द्वारा विधायक निधि से सरकारी धन दिया गया था। स्थानीय लोगों और बस्ती के प्रतिनिधियों के अनुसार वर्ष 2016-17 में तत्कालीन रामनगर विधायक अमृता रावत ने पूछड़ी क्षेत्र में बने मदरसा व मस्जिद के निर्माण के लिए तीन लाख रुपए तथा मंदिर निर्माण के लिए पांच लाख रुपए विधायक निधि से दिए थे। इसके अलावा मौजूदा विधायक दीवान सिंह बिष्ट द्वारा भी उसी अतिक्रमित क्षेत्र में स्थित रामलीला ग्राउंड में टीन शेड निर्माण के लिए पांच लाख रुपए की विधायक निधि स्वीकृत किए जाने की बात सामने आई है। इन तथ्यों के सामने आने के बाद यह सवाल उठने लगे हैं कि जिन निर्माणों को आज अवैध बताया जा रहा है, वे वर्षों तक प्रशासन और सरकार की नजरों में कैसे वैध बने रहे।

कार्रवाई के दौरान जिन परिवारों के घर तोड़े गए, वे रोते-बिलखते नजर आए। पीड़ितों का आरोप है कि उन्होंने यह जमीन स्थानीय पत्रकार सलीम, डॉ. ताहिर सहित कुछ अन्य लोगों से खरीदी थी। लोगों का कहना है कि उन्हें भरोसे में लेकर जमीन बेची गई और बताया गया कि सब कुछ वैध है। सस्ते दामों पर जमीन मिलने के लालच में गरीब परिवार यहां आ बसे, लेकिन अब प्रशासन द्वारा उनके आशियाने तोड़े जाने से पूरा परिवार सड़क पर आ गया है। पीड़ित परिवारों का यह भी कहना है कि वर्षों तक बिजली, पानी और अन्य बुनियादी सुविधाएं मिलने से उन्हें कभी यह आभास ही नहीं हुआ कि वे अवैध भूमि पर रह रहे हैं।

पूरे मामले ने मानवाधिकारों से जुड़े गम्भीर सवाल भी खड़े कर दिए हैं। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन के अधिकार में आवास का अधिकार भी शामिल माना गया है। सुप्रीम कोर्ट और विभिन्न उच्च न्यायालयों के कई फैसलों में यह स्पष्ट किया गया है कि लम्बे समय से बसे लोगों को हटाने से पहले उन्हें पर्याप्त नोटिस देना और पुनर्वास की वैकल्पिक व्यवस्था करना राज्य की जिम्मेदारी है। पूछड़ी में अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई तो तेजी से की गई लेकिन अब तक किसी ठोस पुनर्वास योजना की घोषणा नहीं की गई है, जिसे लेकर प्रशासन की आलोचना हो रही है।

इस बीच बिना नोटिस अतिक्रमण हटाने के मामलों को लेकर नैनीताल हाईकोर्ट ने सख्त रुख अपनाया है। वन भूमि, राजकीय राजमार्ग, राष्ट्रीय राजमार्ग और राजस्व भूमि पर हुए अवैध अतिक्रमण के खिलाफ स्वत: संज्ञान लेते हुए दायर जनहित याचिका पर सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट की खंडपीठ ने राज्य सरकार से एक सप्ताह के भीतर स्थिति स्पष्ट करने को कहा है। मुख्य न्यायाधीश जी. नरेंद्र और न्यायमूर्ति सुभाष उपाध्याय की पीठ ने यह भी निर्देश दिए हैं कि मुख्य सचिव वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से व्यक्तिगत रूप से अदालत में पेश होकर बताएंगे कि सर्वोच्च न्यायालय के आदेशों का पालन किस प्रकार किया जा रहा है।

याचिका में यह भी कहा गया है कि कई जिलों में जिला स्तरीय समितियों के गठन और सुनवाई की प्रक्रिया को दरकिनार कर सीधे ध्वस्तीकरण की कार्रवाई की गई जो कानून और न्यायिक निर्देशों के विपरीत है। विशेष रूप से नैनीताल के पदमपुरी क्षेत्र का उल्लेख करते हुए आरोप लगाया गया है कि वहां वन भूमि और सड़क किनारे अधिकारियों की मिलीभगत से अतिक्रमण हुआ, जिससे आम लोगों को भारी परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है।

पूछड़ी प्रकरण ने यह साफ कर दिया है कि अतिक्रमण केवल गरीबों की मजबूरी का परिणाम नहीं है बल्कि इसमें भूमाफियाओं, प्रशासनिक उदासीनता और राजनीतिक संरक्षण की भी बड़ी भूमिका रही है। अब जब बुलडोजर चल चुके हैं तो सवाल यह है कि क्या कार्रवाई केवल झोपड़ियों और मकानों तक सीमित रहेगी या फिर उन भू-माफियाओं, अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों तक भी पहुंचेगी, जिनकी वजह से यह अवैध बस्ती दशकों तक फलती-फूलती रही। हाईकोटज़् की सख्ती के बाद राज्य सरकार के लिए इन सवालों से बच पाना आसान नहीं होगा।

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