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बेखौफ दरिंदे, असहाय कानून, विकृत समाज

वर्ष 2012, दिसंबर 16 की रात दिल्ली की सड़कों पर दौड़ती एक प्राइवेट बस में ऐसा जघन्य सामूहिक रेप कांड हुआ था जिसने भारत ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया को हिलाकर रख दिया था। यही वो घटना थी जिसके बाद से देश की राजधानी दिल्ली को रेप कैपिटल कहा जाने लगा। सदी के सबसे बर्बर और वीभत्स रेप कांड के बाद देश में बहुत कुछ बदला गया था। जस्टिस जेएस वर्मा कमेटी की सिफारिशें लागू की गईं, हर जिले में रेप पीड़िताओं के लिए वन स्टाॅप सेंटर बनाए गए, हेल्पलाइन शुरू की गई, निर्भया फंड जारी किया गया, निर्भया स्क्वाड, निर्भया एप, निर्भया का फास्ट ट्रैक कोर्ट में मुकदमा लड़ा गया। निर्भया कांड के बाद इतना सब होने पर लग रहा था कि देश में जरूर दुष्कर्म या सामूहिक दुष्कर्म के मामलों में कमी आएगी। निर्भया के दोषियों का हश्र देखकर जरूर अपराधियों की रूह कांप गई होगी। लेकिन गत् 9 अगस्त को कोलकाता में एक प्रशिक्षु डाॅक्टर संग बलात्कार और फिर उसकी हत्या ने साफ कर दिया है कि निर्भया कांड के बाद महिला सुरक्षा को लेकर किए गए सभी दावे, प्रयास और वायदे कागजों तक ही सिमट गए हैं। कानून का इक वहशी दरिंदों को रोक नहीं पा रहा है और समाज में विकृतियां विस्तार पा रही हैं

कोलकाता में एक प्रशिशु डाॅक्टर संग बलात्कार और फिर उसकी हत्या बाद देश में महिलाओं की सुरक्षा को लेकर सड़क से संसद तक माहौल गरमाया हुआ है। हर राजनीतिक पार्टी के नुमाइंदे अपने-अपने हिसाब से महिलाओं की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए सुझाव दे रहे हैं। कठोर कानून भी बने हैं, लेकिन इसमें देखने वाली अहम बात यह है कि महिलाओं पर अत्याचार रुकने के बजाय दिन-प्रतिदिन बढ़ते ही जा रहे हैं। सोचने का गंभीर विषय यह है कि हैवानियत को अंजाम देने वालों में कठोर कानून का खौफ क्यों नहीं है?
गत् 9 अगस्त को कोलकाता के आरजी कर मेडिकल काॅलेज में ट्रेनी चिकित्सक के साथ पहले बलात्कार और फिर हत्या ने ‘यत्र नारयस्तू पूज्यंते तत्र रमयंते देवता’ वाली संस्कृति के पोषक देश में महिलाओं की सुरक्षा को एक बार फिर से सवालों के घेरे में ला खड़ा किया है। इस कांड के बाद देशभर में डाॅक्टर्स हड़ताल पर हैं। जिससे मरीजों को परेशानी हो रही है। प्रदर्शनकारियों की मांग है कि सीबीआई दोषियों को पकड़े और अदालत उन्हें अट्टिाकतम सजा दे। इस मामले का सुप्रीम कोर्ट ने भी स्वतः संज्ञान लिया और देशभर में डाॅक्टरों की सुरक्षा को लेकर नेशनल टास्क फोर्स का गठन किया है। यह टास्क फोर्स डाॅक्टरों की सुरक्षा को लेकर सुझाव देगी। कोर्ट ने टास्क फोर्स को तीन सप्ताह में अंतरिम रिपोर्ट देने के लिए कहा है। साथ ही दो महीने में फाइनल रिपोर्ट सौंपने के लिए कहा है।

वहीं दूसरी तरफ कोलकत्ता के आरजी कर मेडिकल काॅलेज में ट्रेनी चिकित्सक मामले की आग अभी ठंडी भी नहीं हुई कि 11 अगस्त को बिहार के मुजफ्फरपुर में एक नाबालिग लड़की जिसकी उम्र 14 साल बताई जा रही है के घर पांच दबंग रात में आते हैं मां बाप से पूछते है कि तुम्हारी बेटी कहां है? उसका रेप करेंगे। कह लड़की को घर से उठाकर ले जाते हैं। इसके बाद उन दरिंदो ने जो कहा वो किया। स्थानीय लोगों व पीड़िता के परिजनों के मुताबिक नाबालिग बेटी के प्राइवेट पार्ट में सैकड़ों बार चाकू गोदा गया। उसके स्तन को काट लिया गया। ये बात तब पता चली जब तालाब किनारे लोगों ने उसका शव देखा। हालांकि मुजफ्फरपुर पुलिस प्राइवेट पार्ट और स्तन काटने की बात से इनकार कर रही है।

ऐसा ही मामला उत्तराखण्ड के देहरादून आईएसबीटी में पंजाब की एक किशोरी से बस में सामूहिक दुष्कर्म का मामला सामने आया है। चाइल्ड वेलफेयर कमेटी की टीम ने जब आईएसबीटी से किशोरी को रेस्क्यू किया तो घटना का खुलासा हुआ। बताया जा रहा है कि नाबालिग लड़की पंजाब की रहने वाली है। पुलिस ने इस घटना में 5 आरोपियों को हिरासत में लिया है। 13 अगस्त को उत्तराखण्ड रोडवेज के दो कर्मचारी नाबालिग को दिल्ली कश्मीरी गेट से देहरादून लेकर आए थे। उन्होंने लड़की को बहला फुसलाकर देहरादून में दुष्कर्म की घटना को अंजाम दिया। इससे पहले उत्तराखण्ड के ही उधमसिंह नगर में 30 जुलाई को गायब हुई युवती की लाश 8 अगस्त को यूपी के बिलासपुर जिले के पास झाड़ियों में मिली थी। पोस्टमाॅर्टम रिपोर्ट में रेप के बाद महिला का गला दबाकर हत्या का खुलासा हुआ था। नर्स रुद्रपुर के निजी हाॅस्पिटल में नौकरी करती थी।

इन घटनाओं से स्पष्ट है कि हैवानों को कानून का कोई डर नहीं है। साथ ही महिला सुरक्षा के इंतजाम एकदम लचर हैं। पिछले कुछ साल के दौरान देशभर में रेप की कई ऐसी घटनाएं भी हुईं जिनसे भारत को दुनिया भर में शर्मिंदगी झेलनी पड़ी। जम्मू-कश्मीर के कठुआ रेप केस के बाद तो अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष की तत्कालीन अध्यक्ष क्रिस्टिन लैगार्डे को कहना पड़ा था कि भारत सरकार दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई करे।

खौफनाक यह भी है कि गैंगरेप के बाद दरिंदे पीड़िता को जलाकर मार देने जैसी घिनौनी ज्यादतियों से बाज नहीं आ रहे हैं। बिहार, यूपी, दक्षिण भारत समेत अन्य कई राज्यों से भी ऐसी खबरें आती रही हैं जिनमें पीड़िताओं के साथ ज्यादती की हद की गई और सबूत मिटाने की कोशिश के तहत उनकी नृशंस हत्याएं की गई हैं।

ऐसे में सवाल है कि आखिर महिलाओं के खिलाफ ऐसे बर्बर मामलों पर अंकुश क्यों नहीं लग पा रहा है? सामाजिक विज्ञानियों का कहना है कि इस सवाल पर सरकारों और समाज शास्त्रियों के नजरिए में अंतर है। मुश्किल यह है कि सरकारें या पुलिस प्रशासन ऐसे मामलों में कभी अपनी खामी कबूल नहीं करते। इसके अलावा इन घटनाओं के बाद होने वाली राजनीति और लीपापोती की कोशिशों से भी समस्या की मूल वजह हाशिए पर चली जाती है। यही वजह है कि कुछ दिनों बाद सब कुछ जस का तस हो जाता है। वर्ष 2018 में हुए थाॅम्पसन राॅयटर्स फाउंडेशन के सर्वेक्षण के मुताबिक, लैंगिक हिंसा के भारी खतरे की वजह से भारत पूरे विश्व में महिलाओं के लिए सबसे खतरनाक देशों के मामले में पहले स्थान पर था।

नेशनल क्राइम रिकार्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के आंकड़ों के मुताबिक 2012 के निर्भया कांड के समय देश में हर दिन 69 बलात्कार होते थे। हाल में जारी एनसीआरबी के ताजा आंकड़ों के अनुसार हर दिन भारत में औसतन 87 बलात्कार की घटनाएं दर्ज की जाती हैं। वास्तविक आंकड़ा इससे कहीं अट्टिाक होने की संभावना है क्योंकि प्रतिशोट्टा के भय, पीड़ितों के प्रति व्याप्त कलंक तथा पुलिस जांच में विश्वास की कमी के कारण ऐसे कई अपराट्टा दर्ज नहीं कराए जाते हैं।

खास बात यह है कि निर्भया कांड के बाद कठोर कानून बनने बावजूद समाज में बलात्कार की घटनाएं बढ़ने से साफ है कि कानून बन जाना ही पर्याप्त नहीं है, इस पर अमल करने की कोई ठोस प्रक्रिया नहीं है और न ही कोई दृढ राजनीतिक इच्छा शक्ति, नतीजतन बलात्कार की घटनाओं की पुनरावृत्ति जारी है। हैवान बेखौफ अपनी हरकतों को अंजाम दे रहे हैं।

निर्भया कांड से कितना बदला देश

वर्ष 2012 दिसंबर 16 की रात को दिल्ली की सड़कों पर दौड़ती एक प्राइवेट बस में ऐसा जघन्य सामूहिक रेप कांड हुआ था जिसने भारत ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया को हिलाकर रख दिया था। यही वो घटना थी जिसके बाद से देश की राजट्टाानी दिल्ली को रेप कैपिटल कहा जाने लगा। लोगों को दुष्कर्म की दरिंदगी और क्रूरता का अहसास हुआ और रेप की अन्य गुमनाम पीड़िताओं का दर्द भी समझ आया था। यही वो समय था जब दिसंबर की कड़कडाती ठंड में देशभर की लड़कियां पैरामेडिकल की छात्रा निर्भया को इंसाफ दिलाने और देश की सरकार से सुरक्षा की गुहार लगाते हुए दिल्ली की सड़कों पर उतर आईं थीं।

सदी के सबसे बर्बर और वीभत्स रेप कांड के बाद देश में बहुत कुछ बदला गया था। जस्टिस जेएस वर्मा कमेटी की सिफारिशें लागू की गईं, हर जिले में रेप पीड़िताओं के लिए वन स्टाॅप सेंटर बनाए गए, हेल्पलाइन शुरू की गई, निर्भया फंड जारी किया गया, निर्भया स्क्वाड, निर्भया एप, निर्भया का फास्ट ट्रैक कोर्ट में मुकदमा लड़ा गया। इतना ही नहीं करीब 8 साल तक चले निर्भया के चार दोषियों मुकेश, पवन, अक्षय और विनय को साल 2020 में तिहाड़ जेल दिल्ली में फांसी दी गई।

निर्भया कांड के बाद इतना सब होने पर लग रहा था कि देश में जरूर दुष्कर्म या सामूहिक दुष्कर्म के मामलों में कमी आएगी। निर्भया के दोषियों का हश्र देखकर जरूर अपराट्टिायों की रूह कांप गई होगी। लेकिन देश में महिलाओं की सुरक्षा और रेप के मामलों को लेकर एनसीआरबी के आंकड़े कुछ और ही बयां कर रहे हैं।

नेशनल क्राइम रिकाॅड्र्स ब्यूरो की ओर से हाल ही में जारी की गई साल 2022 की रिपोर्ट के अनुसार पिछले साल देश में रेप के कुल 31 हजार 516 मामले रजिस्टर किए गए हैं। यानी हर एक दिन में करीब 87 और हर एक घंटे में 3-4 युवतियां रेप की शिकार हो रही हैं। रिपोर्ट के अनुसार भारत में हर 22-23 मिनट में एक महिला या युवती के साथ दुष्कर्म हो रहा है। अगर निर्भया कांड के साल की बात करें तो एनसीआरबी के डेटा के अनुसार उस साल रेप के 24 हजार 923 केस दर्ज हुए थे, जो कि साल 2022 के मामलों से काफी कम थे। साल 2012 में हर घंटे में 2-3 महिलाओं के साथ रेप हो रहा था लेकिन निर्भया कांड के बाद देखा गया कि 2016 तक लगातार दुष्कर्म की घटनाओं में तेजी से बढ़ोतरी हुई और केस एक साल में ही 38 हजार से ऊपर पहुंच गए।

निर्भया कांड के बाद हर साल के मामले

साल रेप केस
2022 31516
2021 31677
2020 28046
2019 32032
2018 33356
2017 32559
2016 38947
2015 34651
2014 36735
201 33707
2012 24923

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