उन्नीस नवम्बर को विदा हुए सच्चिदानंद सिन्हा भारतीय समाजवादी परम्परा की वह अनसुनी आवाज थे जिसने जाति और वर्ग के जटिल गठजोड़ को सबसे पहले वैज्ञानिक स्पष्टता से समझा। वे न लोहिया की शैली के आंदोलनकारी समाजवादी थे, न मार्क्सवाद की नकल करने वाले बल्कि वे एक मौलिक भारतीय समाजवादी थे जिन्हें उनके ही समय के विचार, अभिजात ने न पढ़ा, न समझा। आज जब भारत सामाजिक न्याय और लोकतांत्रिक संकट से जूझ रहा है, सिन्हा और लोहिया, दोनों की परम्परा को नए सिरे से पढ़ना अनिवार्य हो जाता है
समाजवाद बबुआ, धीरे-धीरे आई
समाजवाद उनके धीरे-धीरे आई
हाथी से आई, घोड़ा से आई
अंग्रेजी बाजा बजाई, समाजवाद…
नोटवा से आई, बोटवा से आई
बिड़ला के घर में समाई, समाजवाद…
गांधी से आई, आंधी से आई
टुटही मड़इयो उड़ाई, समाजवाद…
कांग्रेस से आई, जनता से आई
झंडा से बदली हो आई, समाजवाद…
– सुदामा पाण्डेय
उन्नीस नवम्बर को सच्चिदानंद सिन्हा का निधन हुआ हो गया। शांत, लगभग अनदेखी रह गई विदाई उनकी। जिस विचारक ने भारतीय समाजवाद की नींव को सबसे गहराई से समझा, जिसकी वैचारिक चमक किसी भी बड़े समाजवादी नेता से कम नहीं थी, वह अपने ही समय में एक ‘अकेला चिंतक’ बनकर रह गया। उनका मरना सुर्खी नहीं बना लेकिन विचार की दुनिया किसी की लोकप्रियता से नहीं चलती, वह उसकी गहराई से चलती है। यदि भारतीय समाजवाद की किसी शाखा ने सच्ची मौलिकता, वैज्ञानिक विश्लेषण और भारतीय समाज की वास्तविक समझ को जन्म दिया है तो उसके केंद्र में सच्चिदानंद सिन्हा हैं, वे भले प्रसिद्ध न हुए हों लेकिन मौलिक अवश्य थे।
डाॅ. राममनोहर लोहिया ने भारत में जाति विरोधी समाजवाद को एक आंदोलनात्मक भाषा दी थी। उन्होंने ‘पिछड़े पांवे सौ में साठ’ जैसे नारे देकर सामाजिक न्याय की राजनीति को जनांदोलन में बदला। लोहिया की भाषा भावप्रवण थी, शैली उग्र थी और उद्देश्य तत्कालीन सत्ता समीकरणों पर चोट करना था। उनके समाजवाद का एक बड़ा भाग नारे, संघटन और राजनीतिक व्यूह-रचना में खप गया। लोहिया के पास जनता को जगाने की क्षमता थी लेकिन उस जनता की सामाजिक-आर्थिक संरचना की वैज्ञानिक व्याख्या उतनी नहीं थी जितनी संगठनात्मक ऊर्जा। इसके बरअक्स पर सच्चिदानंद सिन्हा भारतीय समाजवाद की दूसरी रोशनी के रूप में उभरते हैं। उन्होंने वही बात कही जो लोहिया कह रहे थे, लेकिन कहीं अधिक गहराई, धैर्य और विश्लेषण के साथ। सिन्हा ने जाति को केवल सामाजिक अन्याय का प्रतीक नहीं माना, उन्होंने उसे आर्थिक सत्ता का केंद्र बताया। लोहिया कहते थे कि जाति तोड़ो ताकि राजनीति बदल सके। सिन्हा कहते थे कि जाति तोड़ो क्योंकि वह आर्थिक शोषण की संरचना है। दोनों बातें सुनने में समान लग सकती हैं, लेकिन वैचारिक दृष्टि से दोनों अलग हैं। लोहिया जाति को राजनीतिक अवरोध मानते थे जबकि सिन्हा जाति को आर्थिक संरचना का आधारभूत स्तम्भ समझते थे। इसी से दोनों की भाषा, रणनीति और विचार कार्य-प्रणाली अलग-अलग हो जाती है।
सच्चिदानंद सिन्हा जब भारतीय समाज की संरचना को देखते थे तो उन्हें गांव एक विशिष्ट सत्ता संस्था की तरह दिखता था। गांव उनके लिए कोई रोमांटिक इकाई नहीं था, जैसा गांधीवादी छवि बनाती है। वे गांव को एक ऐसे ढांचे की तरह देखते थे जिसमें जाति के नाम पर श्रम बंटा हुआ है, सम्मान का वितरण जाति से तय होता है, और आर्थिक शोषण की जड़ें जातिगत सम्बंधों में गहरी धंसी होती हैं। इस अर्थ में उनका समाजवाद कहीं अधिक कठोर और वास्तविक था। लोहिया ने भी गांव को लोकतंत्र की इकाई माना, परंतु उन्होंने गांव के भीतर की सत्ता संरचना को उस गहराई से नहीं खोला जिस तरह सिन्हा खोलते थे। इसी कारण सिन्हा का लेखन पढ़ने पर लगता है कि वे भारत का समाजशास्त्र राजनीतिक आंदोलन से काफी आगे समझ चुके थे।
लोहिया ने भारतीय समाजवाद का लक्ष्य ‘चैखम्भा राज्य’ में बताया, चार स्तम्भों वाला विकेंद्रीकृत राज्य, जिसमें पंचायत से लेकर केंद्र तक सत्ता बराबरी से फैली हो। सिन्हा की दृष्टि इससे अलग थी। वे राज्य को सामाजिक न्याय का संरक्षक मानते थे, एक ऐसा संरक्षक जो लोकतंत्र के भीतर रहकर आर्थिक असमानता को तोड़ सके। उन्हें राज्य के विकेंद्रीकरण से अधिक उसकी जवाबदेही की चिंता थी। वे मानते थे कि भारत में वर्ग और जाति की संयुक्त संरचना इतनी कठोर है कि राज्य को हस्तक्षेपकारी भूमिका निभानी ही पड़ेगी। इस अर्थ में सिन्हा लोहिया की तुलना में कहीं अधिक समाज अर्थशास्त्रीय दृष्टि रखते थे। लोहिया सम्पत्ति के अधिकरण की बात करते थे, परंतु सिन्हा कहते थे कि सम्पत्ति केवल जमीन या पूंजी नहीं है बल्कि जाति आधारित सामाजिक शक्ति भी है, जिसे तोड़े बिना किसी क्रांति का अर्थ नहीं बनता।
लोहिया का समाजवाद आंदोलनकारी था, सिन्हा का समाजवाद विश्लेषणकारी। लोहिया जनसंघर्ष खड़ा करने वाले थे, सिन्हा उस संघर्ष की दिशा और संरचना को समझने वाले। लोहिया जनता को उकसाते थे, सिन्हा जनता की संरचना को खोलते थे। दोनों महत्वपूर्ण थे, लेकिन दोनों की भूमिका अलग थी। इसी से यह भी स्पष्ट होता है कि क्यों लोहिया के पास अनुयायी बने, संगठन बना, नारे बने, लेकिन सिन्हा के पास एक मूक सम्मान तो रहा परंतु कोई भीड़ नहीं बनी। भीड़ आंदोलनकारियों के पीछे चलती है, विचारकों के पीछे नहीं।
फिर भी यह कहना गलत होगा कि सिन्हा और लोहिया में विरोध था। दोनों की जड़ एक ही थी, भारत में सामाजिक न्याय। लोहिया इसे राजनीतिक अधिकारों की लड़ाई मानते थे, सिन्हा इसे सामाजिक आर्थिक संरचना की लड़ाई मानते थे। यही बड़ा फर्क था। लोहिया का समाजवाद ‘राजनीतिक कार्यक्रम’ था, सिन्हा का समाजवाद ‘सामाजिक विश्लेषण’। दोनों मिलकर एक सम्पूर्ण भारतीय समाजवाद बन सकते थे, परंतु समय ने दोनों को अलग-अलग दिशाओं में धकेल दिया। लोहिया आंदोलन बन गए, सिन्हा वैचारिक परम्परा। दुर्भाग्य यह कि समाज ने आंदोलन को याद रखा और परम्परा को भुला दिया।
सिन्हा ने अपने लेखों में बार-बार कहा कि कोई भी समाजवादी आंदोलन तब तक सफल नहीं हो सकता जब तक वह समाज के भीतर समानता स्थापित न कर दे। उन्होंने यह भी कहा कि भारत की राजनीति जाति वर्चस्व और धनबल से मुक्त नहीं हो सकती क्योंकि दोनों मिलकर राजनीतिक सत्ता को नियंत्रित करते हैं। यह विश्लेषण आज चुनावी राजनीति को देखकर बिल्कुल सटीक लगता है। वे मानते थे कि लोकतंत्र का असली संकट चुनावों में नहीं, समाज की संरचना में है। यदि समाज बराबरी का नहीं तो चुनाव बराबरी कैसे देंगे?
उनके लेख, जैसे ग्रामीण अर्थशास्त्र पर किए गए विश्लेषण, जातिगत शक्ति संरचना पर उनकी टिप्पणियां, किसानों के ऋण-बंधनों का विश्लेषण, चुनावी लोकतंत्र की सीमाओं पर लिखे निबंध, आज भी वैसा ही महत्व रखते हैं। उनका हर लेख भारतीय समाज के भीतर मौजूद छिपी ताकतों को उजागर करता है। यह मौलिकता ही वह कारण है कि उन्हें पढ़ना आसान नहीं, लेकिन पढ़ लेना आवश्यक है। सिन्हा ने कभी जटिल भाषा का सहारा नहीं लिया, परंतु उन्होंने विचारों को इतना सटीक रखा कि वे किसी भी राजनीतिक सुविधा के अनुकूल नहीं बैठते।
अब इस पूरे संदर्भ में जब हम 19 नवम्बर को हुए उनके निधन को देखते हैं, तो इसका अर्थ केवल एक व्यक्ति की मृत्यु नहीं बल्कि एक गम्भीर बौद्धिक परम्परा के एक प्रमुख स्तंभ का शांत अंत है। भारतीय समाजवाद की मुख्यधारा में अब भी नारे अधिक हैं, विश्लेषण कम, आंदोलन अधिक हैं, आत्मनिरीक्षण कमए संगठन अधिक हैं, वैचारिक कठोरता कम। ऐसे समय में सच्चिदानंद सिन्हा को याद करना लोहिया को भी नए सिरे से याद करना है क्योंकि दोनों मिलकर ही भारतीय समाजवाद की संपूर्ण तस्वीर बनाते हैं।
यदि भारत को एक वैज्ञानिक, न्यायपूर्ण, जाति-विरोधी और आर्थिक समानता पर आधारित समाज बनाना है, तो उसे न केवल लोहिया की आंदोलनात्मक ऊर्जा चाहिए, बल्कि सिन्हा की वैचारिक गहराई भी चाहिए। लोहिया ने भारत को जगाया, सिन्हा ने भारत को समझा। कोई भी राष्ट्र तभी बदलता है जब समझ और संघर्ष एक साथ चलें। सच्चिदानंद सिन्हा का जीवन उसी संतुलन की खोज है एक ऐसी खोज जिसे भारत ने अनसुना कर दिया लेकिन जिसे आज फिर से सुनना अनिवार्य हो गया है।

