इलेक्ट्राॅनिक्स और प्रिंट मीडिया शीर्ष व नामचीन संवाददाताओं ने इस सुनवाई को और माननीय कोर्ट के समय-समय पर दिए गए ऑब्जरवेशन को अपने समाचार पत्रों, मैगजीनों व चैनलों तथा बहसों में पर्याप्त स्थान दिया। इस दौरान माननीय राज्यपाल महोदय निरंतर ऐसे फैसलों को ले रहे थे जिसे लेने या बदलने का अधिकार केवल निर्वाचित सरकार को ही होना चाहिए। केंद्र सरकार की प्रबल दिलचस्पी और माननीय राज्यपाल महोदय की सक्रियता के सम्मुख राज्य की ब्यूरोक्रेसी बड़े असमंजस के दौर से गुजर रही थी। मैं राज्य के विकास व जनकल्याण की योजनाओं के क्रियान्वयन को लेकर बहुत चिंतित था। नैनीताल हाईकोर्ट में लम्बी और कई दिनों तक चली सुनवाई के दौरान दोनों पक्षों के वरिष्ठतम अधिवक्ताओं ने घंटों अपने तर्क और नजीरें विद्वान मुख्य न्यायाधीश व उनके सहयोगी हाईकोर्ट के वरिष्ठतम न्यायाधीश महोदय के सम्मुख रखी! माननीय कोर्ट ने बहस के दौरान कुछ ऐसे महत्वपूर्ण ऑब्जर्वेशन/ टिप्पणियां की जिन्हें सभी महत्वपूर्ण दैनिक पत्रों और चैनलों ने महत्वपूर्ण समाचारों के रूप में देश के सामने रखा। हमारे पक्ष की ओर से जहां सर्व श्री कपिल सिब्बल जी, सर्व श्री मनु सिंघवी जी, श्री राजीव धवन, श्री देवदत्त कामत जी, श्री के सी कौशिक जी, श्री जावेद उर रहमान, श्री रविंद्र सिंह बिष्ट आदि-आदि तथा केंद्र सरकार की ओर से सर्व श्री मुकुल रोहतगी जी, श्री तुषार मेहता जी, श्री हरीश साल्वे जी, श्री मनिंदर सिंह, श्री नलिन जी, श्री राकेश थपलियाल, श्री दिनेश द्विवेदी आदि माननीय मुख्य न्यायाधीश की बेंच के सम्मुख उपस्थित हुए। मेरा मन अपनी लीगल टीम की मेहनत और यत्नशीलता के प्रति आज भी उपकृत है, रात के 4-5 बजे तक मैंने उन्हें दूसरे दिन होने वाली कोर्ट की सुनवाई की तैयारी करते देखा है। दर्जनों ही नहीं बल्कि कई-कई दर्जनों न्यायिक पुस्तकों और जजमेंटों पर चर्चा करते उन्हें देखा है।
माननीय न्यायालय के इतिहास में ऐसे कुछ ही अवसर आए होंगे जब इस स्तर पर इतनी लम्बी-लम्बी बहसों के साथ कोर्ट की करवाई चली हो, मुझे बताया गया कि कई महत्वपूर्ण एडवोकेट्स समय निकालकर इन बहसों को सुनने के लिए माननीय मुख्य न्यायाधीश की खंडपीठ के कक्ष में आते थे। इन बहसों में उठे सवाल-जवाब और कोर्ट की टिप्पणियों के समाचार हमारे पक्ष में उत्साह का संचार कर रहे थे। मैं भी राष्ट्रपति शासन की मर्मांतक चोट को भूलकर अपने कनिष्ठ वकीलों व ऐसे साथियों जो सहयोग वस उस समय कोर्ट परिसर में होते थे, उनसे जानकारी लेते रहता था।
राष्ट्रपति शासन लगने के बाद अचानक मेरे पास बहुत समय उपलब्ध हो गया था, मैं उसका सदुपयोग इसी तरीके की जानकारियों को एकत्र करने में करता था। मुझे इस बात का दढ़ विश्वास था कि न्याय हमारे पक्ष में है और मैं उस न्याय को प्राप्त करने के लिए अपने वरिष्ठ वकीलों द्वारा की जा रही मेहनत से भी उत्साहित था। यदि दोनों पक्षों के तर्कों और प्रस्तुत किए गए दस्तावेजों, कानूनी उद्धरणों को संकलित किया जाए तो एक विशाल न्यायिक ग्रंथ तैयार किया जा सकता है। अंततः दिनांक-18,19 एवं 20 अप्रैल, 2016 को देर रात तक चली बहसों के बाद 21 अप्रैल 2016 को निर्णय सुनाने की तिथि निर्धारित कर दी गई। ज्ञातव्य है कि इस दौरान 20 अप्रैल को महावीर जयंती का राष्ट्रीय अवकाश होते हुए भी माननीय न्यायाधीशों ने दोनों पक्षों के वरिष्ठ अधिवक्ताओं की राय लेकर छुट्टी के दिन भी कोर्ट संचालित करने का निर्णय लिया।
माननीय खंडपीठ द्वारा 21 अप्रैल को एक ऐसा ऐतिहासिक निर्णय लिया गया जिसके निष्कर्ष माननीय उच्चतम न्यायालय में चली लम्बी कानूनी प्रक्रिया के बावजूद यथावत कायम रहे। माननीय हाइकोर्ट के खंडपीठ ने 21 अप्रैल, 2016 को अपना फैसला सुनाया और केंद्र सरकार द्वारा अधिसूचित अधिसूचना जिसके द्वारा उत्तराखण्ड में राष्ट्रपति शासन लगाया गया था उसे निरस्त कर दिया गया और दल-बदलुओं (उज्याड़ू बल्दों) की शेष अवधि की सदस्यता को दल-बदल कानून के तहत रद्द कर दिया गया। माननीय हाइकोर्ट के निर्णय से पस्त केंद्र सरकार के वरिष्ठ अधिवक्ताओं ने खंडपीठ से कहा कि वह उनके निर्णय को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देना चाहते हैं। अतः सुप्रीम कोर्ट का निष्कर्ष आने तक माननीय खंडपीठ अपने निर्णय को स्थगित (केप्ट इन एडवांस) रखे। माननीय खंडपीठ ने उनके उस अनुरोध को भी रद्द कर दिया, तदनुरूप माननीय हाईकोर्ट के आदेशानुसार राज्य में राष्ट्रपति शासन समाप्त हो गया और विधिक परिणाम स्वरूप निर्वाचित सरकार मुख्यमंत्री और मंत्रिमंडल सहित बहाल हो गई।
मार्च का महीना आते ही मेरा मन, मस्तिष्क बहुत उद्वेलित हो जाता है। मैं अपने आपको बहुत समझाने का प्रयास करता हूं। इस मार्च के महीने में ऐसा क्या है? 2016 में उत्तराखण्ड की विधानसभा में कुछ ऐसा राजनीतिक घटनाक्रम घटित हुआ जिसके चलते मुख्यमंत्री के तौर पर मेरी सारी योजनाएं और राज्य के लिए बनाया गया विकास व जनकल्याण का रोड मैप गड़बड़ा गया। विधानसभा के बजट सत्र में हुआ दल-बदल, साधारण दल-बदल नहीं था। केंद्र सरकार ने समूची शक्ति लगा दी और अकूत साधन लगाकर दल-बदल करवाया। आप दल-बदल करने वालों के चेहरों पर नजर डालिए तो आपको दल-बदल की गम्भीरता स्पष्ट हो जाएगी। जिन लोगों को कांग्रेस ने उनकी सेवा से कई गुना ज्यादा दिया, उन्हीं लोगों ने पार्टी और पार्टी कार्यकर्ताओं के विश्वास पर चोट पहुंचाई। इस पर भी उन्हें सफलता नहीं मिली तो एक प्रायोजित स्टिंग का सहारा लेकर सरकार को बर्खास्त कर दिया। अनन्तोगत्वा न्याय जीता, न्याय हमारे पक्ष में हुआ पर अन्याय की शक्ति ने हमारा बजट गड़बड़ा दिया गया। 4 महीने, विधानसभा द्वारा पारित विनियोग विधेयक को मैं कभी राज्यपाल भवन में खोजता था तो कभी राष्ट्रपति भवन में, कभी गृह मंत्रालय में खोजता था तो कभी विधि मंत्रालय में। अनंतोगत्वा विधानसभा को दूसरा एक नया इतिहास बनाना पड़ा। फिर से बजट और विनियोग विधेयक पारित करना पड़ा। कभी मैं सोचता हूं कि उस स्टिंग में ऐसा क्या नया है? जिस स्टिंग के बलबूते पर भाजपा के प्रचार तंत्र ने ऐसा कोहराम खड़ा कर दिया, जैसे मैंने कोई ऐसा महापाप कर डाला है जो अभी तक नहीं हुआ है या नहीं हो रहा है। मेरी लगभग 48 वर्ष की उत्तराखण्ड की राजनीतिक और सामाजिक सेवा को लोगों ने भूल कर एक कुख्यात स्टिंग बाज व भाजपा नित प्रचार तंत्र में भरोसा कर लिया और ऐसे समय में हमारे हाथ से अवसर छीन लिया, जब हम गैरसैंण को 2022 तक राज्य की राजधानी बनाने के लिए प्रतिबद्ध थे। इस दिशा में चरणबद्ध तरीके से काम कर रहे थे। जब हम 2020 तक 9 नए प्रशासनिक जिले और बनाकर प्रशासनिक विकेंद्रीकरण की दिशा में आगे बढ़ने के लिए प्रतिबद्ध थे। विकसित उत्तराखण्ड के नक्शे को सामने रखकर हम वचनबद्ध थे कि 2024 में राज्य में न्यूनतम प्रति व्यक्ति औसत आय को हम साढ़े चार लाख से 5 लाख तक पहुंचाएंगे। जिस समय हम सैकड़ों पहलुओं के साथ राज्य में हो रहे बेबसी के पलायन और बढ़ती बेरोजगारी रोकने के लिए योजनाबद्ध तरीके से काम कर रहे थे। जिस समय हम शिक्षा, तकनीकी शिक्षा, स्वास्थ्य शिक्षा और चिकित्सा सेवाओं के क्षेत्र में कई अभिनव पहलों के साथ विश्वास पूर्वक आगे बढ़ रहे थे। उस समय हमारे हाथ से पहले छीन ली गई। स्टिंग के दुष्प्रचार के बलबूते व जुम्मे की नमाज की छुट्टी के झूठ के सहारे हमें चुनाव में हरा दिया गया। मुझे भरोसा है, आज नहीं तो कल उत्तराखण्ड इस झूठ व दुष्प्रचार की सजा भाजपा को देगा।
यदि सत्तारूढ़ दल सारे मूल्य और मान्यताओं को ताक में रखकर अपने शीर्ष का उपयोग झूठ बोलने के लिए करें और प्रचार तंत्र का नग्न उपयोग कर उस झूठ को लोगों के गले में उतारने के लिए सारी शक्ति और सामथ्र्य लगाकर लोकतांत्रिक मूल्यों की हत्या करें तो परिणाम वही होता है जो उत्तराखण्ड में हम झेल रहे हैं। उत्तराखण्ड में भी 2017 में भाजपा और भाजपा के प्रत्येक स्तर के नेता ने 100 प्रतिशत सफेद झूठ बोला कि हरीश रावत की सरकार ने जुम्मे की नमाज पढ़ने के लिए के लिए छुट्टी कर दी है। कहां किस कार्यालय व किस स्कूल में छुट्टी हुई इसका कोई प्रमाण नहीं है? मगर एक झूठ प्रचार तंत्र के सहारे लोगों के गले नीचे उतारा गया और उत्तर प्रदेश से चली साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण की हवा का फायदा लेकर चुनाव परिणामों का अपहरण कर लिया गया। फिर उसी तरीके का झूठ, साक्षात सफेद झूठ प्रत्येक भाजपा के नेता ने जिसमें मुख्यमंत्री से लेकर भाजपा का शीर्ष स्तर सम्मिलित है, 2022 के विधानसभा चुनाव में बोला, बार-बार बोला और पूरा प्रचार तंत्र लगाकर लोगों से कहा कि मैं तो मुफ्त का गेहूं-चावल दे रहा हूं और हरीश रावत मुस्लिम यूनिवर्सिटी दे रहा है। मेरी चुनौती देने के बावजूद और 10 लाख का इनाम घोषित करने के बावजूद अभी तक भी भाजपा वह अखबार नहीं दिखा पाई या वह मीडिया चैनल या किसी भी मीडिया के माध्यम को साक्ष्य के तौर पर नहीं दिखा पाए हैं जिसमें मैंने यह बयान दिया है कि कांग्रेस सत्ता में आएगी तो मुस्लिम यूनिवर्सिटी बनाएगी। भाजपा के शीर्ष नेताओं व प्रचार तंत्र ने सफेद झूठ बोला, डंके की चोट पर बोला। हां, हम उस झूठ के खिलाफ आक्रामक होकर भाजपा को जवाब देह नहीं बना पा रहे हैं। यह हमारे राजनीतिक कौशल पर निर्भर करता है कि हम यहां से लेकर के आने वाले चुनाव में किस तरीके से भाजपा ने 2017 और 2022 में बोले गए झूठ का हिसाब मांगते हैं। हिसाब हमको भाजपा से 2016 के षड्यंत्र का भी मांगना चाहिए। उत्तराखण्ड एक नवोदित राज्य उसमें दल-बदल करवाना क्या राज्य के प्रति अपराध नहीं है? क्या बीजेपी से इस बात का जवाब नहीं मांगा जाना चाहिए? यदि दल-बदल अपराध है, चुनावी अपराध है, राजनीतिक अपराध है इसका दंड भाजपा को दिया जाना चाहिए।
किसी नारी का वस्त्र हरण मानवता का सबसे क्रूरतम अपराध है, मगर धृतराष्ट्र की सभा में वह अपराध हुआ और इसलिए श्री कृष्ण ने कहा कि अब वस्त्र चीर हरण करने वाला दुशासन, दुर्योधन और कर्ण ही दोषी नहीं है, बल्कि इस सभा में बैठा हुआ प्रत्येक व्यक्ति दोषी है, काल चक्र उनको दंड देगा। उत्तराखण्ड की विधानसभा में भी लोकतांत्रिक परम्पराओं मूल्य और मान्यताओं का चीर हरण हुआ। यदि हम राज्य की राजनीति के साथ और उन आदर्शों के साथ न्याय की अपेक्षा करते हैं तो हमें विधानसभा में हुए इस चीर हरण करने वाले दुर्योधन व दुशासन को दंडित करना पड़ेगा और यह दंड केवल जनता जनार्दन ही दे सकती है। राज्य अभी तक भ्रमित मुद्दों पर मतदान कर रहा है। यही कारण है कि आज उत्तराखण्ड अपने बुनियादी लक्ष्य से दूर हटा हुआ दिखाई दे रहा है, अभी देर नहीं हुई है। उठो 2027 में लोकतंत्र का चीर हरण करने वालों को दंडित करो।
मार्च का महीना, नई आशा और उमंगों का महीना होता है। मगर 2016 में हमारे चारों तरफ सभी कुछ ध्वस्त किया जा रहा था, मूल्य-मान्यताएं, परंपराएं, शिष्टाचार, संवैधानिक बंधन और सीमाएं सब ध्वस्त हो रही थी। दल-बदल, धन-बल, शक्ति बल और प्रलोभन बल के साथ जहां लोकतांत्रिक मूल्यों को राज्य में नष्ट करने की शुरुआत की गई, वहीं गवर्नर नाम की संवैधानिक संस्था भी गदा लिए हुए अपनी ही सरकार पर प्रहार करने लगी और जो अवशेष बचा हुआ था उसके ध्वस्तीकरण करने में जुट गई। ई.डी., सी.बी.आई. का डर दिखाकर ब्यूरोक्रेसी के एक बड़े हिस्से को अपनी ही सरकार से, जिसके साथ वह संवैधानिक नियम और कानून से बंधे हुए थे उनको होस्टाइल कर उन्हें बाध्य किया जा रहा था कि राज्य की निर्वाचित सरकार के खिलाफ वह साक्ष्य जुटाएं और उसे तोड़-मरोड़ कर पेश करें व प्रचारित करें।
आज भी एक निर्दलीय विधायक जो उस समय मंत्री थे उनसे पूछा जा सकता है कि किस प्रकार से एक वरिष्ठतम ब्यूरोक्रेट्स ने अपनी ही सरकार के खिलाफ बगावत करने के लिए उन्हें उकसाया और उन पर दबाव बनाया। इस सबके बावजूद भी उत्तराखण्ड की ब्यूरोक्रेसी में एक बहुत बड़े हिस्से ने पूरी निष्ठा और शक्ति के साथ अपना कर्तव्य का पालन किया और संकट काल में भी राज्य के विकास को धीमा नहीं पढ़ने दिया। जिस दिन मैं मुख्यमंत्री नहीं रहता था ब्यूरौक्रेट्स मेरी तरफ विनम्रता से पीठ फेर देते थे और जिस दिन मैं फिर मुख्यमंत्री बन जाता था, उस दिन वह पूरे लगाव और समर्पण के साथ मेरे और मेरी सरकार के निर्देशों का पालन करते थे। लगभग 4 महीने ऐसी लुका-छिपी चलती रही, विकास कार्य बाधित होते रहे।
केंद्र सरकार हर हालत में हमारी सरकार के कार्य करने कि गति और लय को खंडित करना चाहती थी। मार्च के षडयंत्र का उद्देश्य स्पष्ट था, तेजी से कार्य करती सरकार को पटरी से उतारना इसीलिए एक लम्बे षड्यंत्र के साथ दल-बदल, सरकार गिराने, राष्ट्रपति शासन, बजट का अपहरण यह सब एक श्रृंखला प्रारम्भ की गई। एक-दो उदाहरणों जैसे उत्तराखण्ड में स्थापित हो रहे उद्योगों में स्थानीय उत्तराखण्डियों को 70 प्रतिशत आरक्षण और गैर उत्तराखण्डियों के भूमि खरीद पर रोक के अलावा राज्य निर्माण के पिछले 14 साल में कोई भी ऐसा बड़ा काम नहीं हुआ था। जिससे यह लगे कि राज्य, राज्य निर्माण की मूल भावना की दिशा की ओर बढ़ रहा है। वस्तुतः नवोदित राज्य शनै-शनै उत्तर प्रदेश की कार्बन काॅपी बनता जा रहा था।