मैं इस समय एक महत्वपूर्ण पक्ष द्वारा ऐसे घटनाक्रम के दौरान ब्यूरोक्रेसी क्या कर रही थी, किस तरीके का उनका व्यवहार था, किस तरीके से उनकी सोच और समझ थी? उस पर भी अपनी समझ को आपसे बाटूंगा। मैं नाम केवल उन्हीं ब्यूरोक्रेट्स के लूंगा जो आज की सत्ता व्यवस्था से उपकृत होने की लाइन में नहीं हैं। जैसे उस कालखंड के कानून सचिव श्री राम सिंह, क्योंकि वही पहले व्यक्ति थे जिनको इस आकस्मिक चुनौती आने के बाद मैंने सर्वप्रथम परामर्श के लिए बुलाया। उन्होंने मुझे और संसदीय कार्य मंत्री जी को बहुत सटीक और बहुत विधि व संविधान सम्मत राय दी और निभीज़्कता से दी। हम किस सीमा तक अपने अधिकार का उपयोग कर सकते हैं उस पर भी उन्होंने दो टूक अपना परामर्श दिया। उस समय के शीर्ष ब्यूरोक्रेट्स में से अधिकांश ने राज्य के प्रति अपने कर्तव्य को निष्ठा के साथ पूरा किया। उन्होंने राजनीति को अलग रखा और राज्य के प्रति अपने कर्तव्य को अलग रखा। जिस बात पर उनको राय देनी चाहिए उन्होंने हमको राय दी और जिस पक्ष पर उन्होंने कहा कि और राजनीतिक पक्ष है उस पर उन्होंने राय देने से इनकार कर दिया। मैं उनके व्यवहार की कद्र करता हूं। एक ऐसे शीर्ष ब्यूरोक्रेट्स को हमारी सरकार ने राज्य को जल शक्ति के रूप में खड़ा करने हेतु एक स्वतंत्र आयोग का गठन कर उसका अध्यक्ष पद सौंपा, उन्हें अपने निभीर्क व निष्पक्ष राय देने का खामियाजा भुगतना पड़ा। केंद्र के दबाव में राज्यपाल महोदय ने उनकी नियुक्ति की फाइल को अपने पास दबा दिया। एक और शीर्ष ब्यूरोक्रेट्स जिनके विषय में प्रारंभ से ही जब मैं मुख्यमंत्री बनकर के आया था तो उनके विषय में ढेर सारा सुना था। लेकिन मैं एक अत्यधिक संकटपूर्ण कालखंड में उत्तराखण्ड का मुख्यमंत्री बना था और मेरी प्राथमिकताएं उस समय ऐसे लोगों को जुटाना था जिनकी छवि काम करने की क्षमता रखने वालों की है और मैंने ऐसे लोगों का एक समूह तैयार किया। उस समूह के शीर्ष में वह व्यक्ति थे और मैं संकटकाल में उनके व्यवहार को यदि अलग रखूं तो जिस समय हम राजनीतिक दृष्टिकोण से निष्कंटक भाव से काम कर रहे थे उस समय 24 घंटे ब्यूरोक्रेट्स के रूप में मेरे हर वाक्य को क्रियान्वित करने के लिए वह व्यक्ति तैयार रहते थे। मगर जैसे ही संकटकाल आया, उन्होंने अपना रूप बदलना प्रारंभ कर दिया। जब प्रारंभिक संकटकाल आया तो उस समय वह अस्वस्थ हो गए, उनका अस्वस्थ होना मेरी समझ में बहुत बाद में आया

  • हरीश रावत
    पूर्व मुख्यमंत्री, उत्तराखण्ड

वर्ष 2016 में विधानसभा में हुए तथाकथित दल-बदल से पहले की स्थिति मैंने अपने पूर्ववर्ती  लेखों में आपके सामने रखी है। मैं अब जो कुछ कहने और बताने जा रहा हूं उससे एक बात स्पष्ट हो जाती है कि दल-बदल के तथा कथित तीनों विशेषज्ञ, भाजपा के राष्ट्रीय महामंत्री गण, भाजपा का प्रदेश नेतृत्व व दल बदलुओं के नेता, ‘उज्याड़ू बल्दों’ के नेता, संसदीय प्रक्रियाओं विशेष तौर पर बजट पारण की प्रक्रियाओं के विभिन्न चरणों के नियमों से बिल्कुल अवगत नहीं थे। विभागों को बजट के पारण के बाद सरकार सदन से उसके द्वारा पारित बजट के विनियोग के लिए अनुमति लेती है और उस हेतु विनियोग विधेयक सदन के सम्मुख रखा जाता है। इस विधेयक के पारण की विधि और प्रक्रिया वही है जो वित्त विधेयकों की है, इसके पारण से पहले चर्चा होनी आवश्यक नहीं है क्योंकि यह उन्हीं सभी ग्रांट्स के विनियोग की सरकार को अनुमति देता है जिनका पहले ही सदन पारण कर चुका है। इनमें विधानसभा का खर्च, राज्य भवन का खर्च आदि सभी महत्वपूर्ण खर्चे सम्मिलित होते हैं। इसलिए परंपरा है कि इस विधेयक को स्पीकर महोदय सीधे पारण के लिए सदन के समक्ष रखते हैं और सदन की अनुमति लेते हैं। सदन में यह सामान्य नियम है।

यदि किसी सदस्य को किसी भी विधेयक या किसी भी विषय पर सदन या स्पीकर महोदय का ध्यान आकर्षित  करना है तो इस हेतु उन्हें 10 बजे से पहले लिखित सूचना स्पीकर महोदय के कार्यालय को देनी होती है। 10 बजे के बाद की कोई भी सूचना विधानसभा की नियमावली के अनुसार अमान्य होती है। इस विधेयक के विषय में एक संयुक्त पत्र बीजेपी के नेता प्रतिपक्ष के लेटर हेड में कुछ ‘उज्याड़ू बल्दुओं’ के हस्ताक्षर के साथ दिया गया जो अमान्य था। स्पीकर महोदय ने विधेयक की पारण के जो नियम थे उनका विधि सम्मत तरीके से उच्चारण करते हुए और पालन करते हुए सदन की अनुमति ली। ‘उज्याड़ू बल्दों’ को क्या करना है, उनके तब समझ में आया जब विनियोग विधेयक को स्पीकर महोदय ने पारित घोषित कर दिया और उसे गवर्नर महोदय की स्वीकृति के लिए भेजने के निर्देश दिए और सदन को 27 मार्च तक के लिए स्थगित कर दिया। हकबकाए हुए लॉबी में बैठे विशेषज्ञों की चिल्लाहट के बीच उपकृत कुछ बलशाली ‘उज्याड़ू बल्दों’ (दल-बदलू विधायक) चिल्लाते हुए विधानसभा की बेल में आए। कालांतर में जो दल बदलुओं के साथ सम्मिलित हुए, ऐसे दो विधायकों को अपने साथ बलपूर्वक घसीटने का प्रयास किया। एक प्रयास का श्री मंत्री प्रसाद नैथानी जी ने विरोध किया और उनसे ‘उज्याड़ू बिंदुओं’ के नेता की तीखी झड़प हुई और उन्होंने जिस सदस्य को घसीटने का प्रयास किया, उसके लिए अभद्र भाषा का उपयोग भी किया। स्पीकर महोदय, चैम्बर छोड़ चुके थे। हमने भी चैम्बर छोडऩा उचित समझा। दल-बदलू विधायकों ने फिर से उत्तेजना में एक पत्र संयुक्त हस्ताक्षर युक्त गवनज़्र महोदय के पास भेजा और उनसे अनुरोध किया कि बजट को पारित न माना जाए। एक तरफ भाजपा दल-बदल को कांग्रेस का आंतरिक मामला बता रही थी और दूसरी तरफ दल-बदलू विधायक भाजपा के विधानमंडल दल के नेता के लेटर हेड में संयुक्त पत्र को हस्ताक्षरित कर रहे थे, बहुत समय बाद थककर यह लोग नारे लगाते हुए विधानसभा से बाहर आए। जहां भाजपा की एक बस इनको लेकर एयरपोटज़् गई, वहां चार्टर्ड प्लेन लिए एक केंद्रीय मंत्री उपस्थित थे और उनके साथ एक ही प्लेन में दल-बदलू विधायकों और भाजपा के विधायकों ने दिल्ली को प्रस्थान किया। दिल्ली में भी लीला होटल में भाजपा प्रायोजित हॉस्पिटैलिटी का इन्होंने आनंद लिया। हमने तत्काल यह निर्णय लिया कि संसदीय कार्य मंत्री जी दल बदलुओं को एक नोटिस दल बदल अधिनियम के तहत जारी करें और उनसे 7 दिन के अंदर जवाब देने की अपेक्षा करें। हमने तत्काल ऐसे सब आवश्यक कदम उठाकर दल बदलू विधायकों की विधानसभा सदस्यता रद्द करने का अनुरोध किया। संसद ने यह अधिकार विधानसभा अध्यक्षों को दिया है। विधानसभा अध्यक्ष महोदय ने भी कानून के अनुरूप जो वांछित कार्यवाही थी उसे प्रारंभ किया। सत्र का सत्रावसान नहीं हुआ था, हमारी कार्रवाई से घबराई हुई भाजपा ने गवनज़्र महोदय के ऊपर दबाव बनाया कि वह विधायकों की अपने सामने परेड करवाएं।

माननीय उच्चतम न्यायालय पहले ही इस बात को निर्णायित कर चुका था कि किसी भी सरकार के बहुमत का फैसला गवर्नर हाउस में नहीं, बल्कि सदन के पटल पर होगा। सदन सत्राधीन था। गवनज़्र महोदय ने मुझे आदेश दिया कि मैं 27 मार्च को बहुमत सिद्ध करूं। हमने खुशी-खुशी उस आदेश को स्वीकार किया। केंद्र सरकार ने पुन:  गवर्नर   के ऊपर दबाव डाला। उन्होंने पुन: हमसे कहा कि हम तत्काल विधानसभा सत्र बुलाएं। हमने उनको सूचित किया कि हम उनके आदेश अनुरूप 27 मार्च को विधानसभा का सत्र आयोजित करने का अनुरोध माननीय स्पीकर महोदय से कर चुके हैं जिसमें हम बहुमत सिद्ध करना चाहेंगे और माननीय स्पीकर महोदय ने भी हमारे अनुरोध को मानते हुए माननीय विधायकों को पत्र भेज दिए। इस सारी प्रक्रिया जो संविधान सम्वत थी, उससे घबराए हुए भाजपा नेतृत्व ने एक ऐसा कदम कूट रचित किया जिसको शायद वह स्वयं भी याद करना नहीं चाहेंगे, क्योंकि उन्हें इस बात का एहसास हो चुका था कि उनके स्थानीय नेता और दल बदल विशेषज्ञ गण कुछ ऐसी गलती कर चुके हैं जिससे दल बदलू सदस्यों की सदस्यता रद्द होना निश्चित है।

दल-बदलू और भाजपा के विधायक जब दिल्ली के पांच सितारा होटल में पहुंचे और उनको इस बात की जानकारी मिली कि कांग्रेस पार्टी ने उनकी सदस्यता को समाप्त करने के लिए माननीय स्पीकर महोदय के पास अनुरोध पत्र भेज दिया है और माननीय स्पीकर महोदय के कार्यालय से कभी भी उनको इस आशय की सूचना मिल सकती है, जब उनको इस बात का ज्ञान हुआ कि उनके नेता गणों ने उनकी लुटिया डुबो दी है तो वहां व्याप्त भय के वातावरण में भाजपा नेतृत्व ने एक और ऐसा कुकृत्य किया जो लोकतंत्र के साथ आपराधिक बलात्कार था। खैर मैं उस बिंदु पर आपसे फिर से चर्चा करूंगा क्योंकि उसमें कुछ मामले माननीय न्यायालय द्वारा निणिज़्त किए जा चुके हैं और एकाध-दो मामले माननीय न्यायालय में अब भी किसी न किसी रूप में लंबित हैं। मैं पृथक से उस पर लिखूंगा। भाजपा और दल-बदलू बहुत आक्रामक थे और उनकी कोशिश थी कि कुछ और लोगों को भी दबाव में ले रहे थे और प्रलोभन में लाने की कोशिश कर रहे थे। उनके लक्ष्य, हमारे सपोर्ट कर रहे पीडीएफ के साथी भी थे, उनके लक्ष्य कुछ ऐसे साथी भी थे जिनकी दल-बदल करने वाले नेताओं के साथ पहले से कुछ आत्मीयता थी तो हमने अपने कुछ साथियों को यह दायित्व सौंपा कि वह निरंतर हमारे साथियों के साथ जो पूरी शक्ति के साथ सरकार के साथ हैं, उनसे बातचीत करते रहें और दल-बदलू जिनको मैं ‘उज्याड़ू बल्दो’ कहता हूं उनको डिसक्वालीफाई करने के मोर्चे पर हमने इंदिरा हृदयेश जी, नव प्रभात जी सहित दूसरे वरिष्ठ साथियों को लगाया और उन्होंने एक फुल प्रूफ प्लान के साथ स्पीकर कायार्लय में सारे दस्तावेज जमा किए जिसके आधार पर न केवल नोटिस जारी हुआ और वह नोटिस भी उनके आवासों, उनके मूल निवासों और उनके सम्भावित कायार्लय जहां वह किसी न किसी रूप में बैठते हैं, वहां भी सर्व करवाए गए और उनके फोटो आदि भी लिए गए और इस सारी प्रक्रिया की वीडियो ग्राफी भी की गई और माननीय स्पीकर महोदय ने तदनुरूप उन लोगों से जवाब मांगा और जवाब मांगने के साथ-साथ उनको व्यक्तिगत रूप से उनके सम्मुख उपस्थित होने का नोटिस दिया और उसके लिए 25 माचज़् निधाज़्रित की गई। कांग्रेस पार्टी अपना दायित्व पूरा कर चुकी थी और बहुत सुघड़ता से नियमों का पालन करते हुए हमारे साथियों ने इंदिरा हृदयेश जी के नेतृत्व में उन दस्तावेजों को तैयार किया जिसको हमने अपने सुप्रीम कोर्ट  के दो बहुत नामचीन अधिवक्ताओं को दिखाया। उन्होंने भी हमारे दस्तावेजों की सराहना की।

कांग्रेस विधायी पक्ष पर क्या हो रहा था या भाजपा नीत विधायी पक्ष में क्या घटित हो रहा था, उसकी कुछ जानकारियां आपके साथ साझा की हैं, कुछ आगे करूंगा। मैं इन जानकारियों को कल के भविष्य के उन लोगों के लिए भी आप तक पहुंचा रहा हूं और जो लोग हर कालखंड का मूल्यांकन करते हैं और आगे का रास्ता निर्धारित करते हैं। मैं इंस्टीट्यूशन ऑफ स्पीकर सहित न्यायपालिका में किस प्रकार राज्य में घटित घटनाक्रम में मामले आगे बढ़े उस पर तथा राजनीतिक दल के रूप में हमारी भूमिका क्या रही, हमारे सहयोगियों की भूमिका क्या रही और भाजपा के सहयोगियों की क्या भूमिका रही, ‘उज्याड़ू बल्दों’ और दल-बदलुओं की क्या भूमिका रही उस सब आपके साथ जानकारी को बाटूंगा।

मैं इस समय एक महत्वपूर्ण पक्ष द्वारा ऐसे घटनाक्रम के दौरान ब्यूरोक्रेसी क्या कर रही थी, किस तरीके का उनका व्यवहार था, किस तरीके से उनकी सोच और समझ थी? उस पर भी अपनी समझ को आपसे बाटूंगा। मैं नाम केवल उन्हीं ब्यूरोक्रेट्स के लूंगा जो आज की सत्ता व्यवस्था से उपकृत होने की लाइन में नहीं हैं। जैसे उस कालखंड के कानून सचिव श्री राम सिंह, क्योंकि वही पहले व्यक्ति थे जिनको इस आकस्मिक चुनौती आने के बाद मैंने सर्वप्रथम परामर्श के लिए बुलाया। उन्होंने मुझे और संसदीय कार्य मंत्री जी को बहुत सटीक और बहुत विधि व संविधान सम्मत राय दी और निभीज़्कता से दी। हम किस सीमा तक अपने अधिकार का उपयोग कर सकते हैं उस पर भी उन्होंने दो टूक अपना परामशज़् दिया। उस समय के शीर्ष ब्यूरोक्रेट्स में से अधिकांश ने राज्य के प्रति अपने कर्तव्य को निष्ठा के साथ पूरा किया। उन्होंने राजनीति को अलग रखा और राज्य के प्रति अपने कर्तव्य को अलग रखा। जिस बात पर उनको राय देनी चाहिए उन्होंने हमको राय दी और जिस पक्ष पर उन्होंने कहा कि राजनीतिक पक्ष है उस पर उन्होंने राय देने से इनकार कर दिया। मैं उनके व्यवहार की कद्र करता हूं। एक ऐसे शीषज़् ब्यूरोक्रेट्स को हमारी सरकार ने राज्य को जल शक्ति के रूप में खड़ा करने हेतु एक स्वतंत्र आयोग का गठन कर उसका अध्यक्ष पद सौंपा, उन्हें अपने निभीर्क व निष्पक्ष राय देने का खामियाजा भुगतना पड़ा। केंद्र के दबाव में राज्यपाल महोदय ने उनकी नियुक्ति की फाइल को अपने पास दबा दिया। एक और शीर्ष ब्यूरोक्रेट्स जिनके विषय में प्रारंभ से ही जब मैं मुख्यमंत्री बनकर के आया था तो उनके विषय में ढेर सारा सुना था। लेकिन मैं एक अत्यधिक संकटपूर्ण कालखंड में उत्तराखण्ड का मुख्यमंत्री बना था और मेरी प्राथमिकताएं उस समय ऐसे लोगों को जुटाना था जिनकी छवि काम करने की क्षमता रखने वालों की है और मैंने ऐसे लोगों का एक समूह तैयार किया। उस समूह के शीर्ष में वह व्यक्ति थे और मैं संकटकाल में उनके व्यवहार को यदि अलग रखूं तो जिस समय हम राजनीतिक दृष्टिकोण से निष्कंटक भाव से काम कर रहे थे उस समय 24 घंटे ब्यूरोक्रेट्स के रूप में मेरे हर वाक्य को क्रियान्वित करने के लिए वह व्यक्ति तैयार रहते थे। मगर जैसे ही संकटकाल आया, उन्होंने अपना रूप बदलना प्रारंभ कर दिया। जब प्रारम्भिक संकटकाल आया तो उस समय वह अस्वस्थ हो गए, उनका अस्वस्थ होना मेरी समझ में बहुत बाद में आया।

क्रमश:

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