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महायुति में बढ़ता बनाव : फडणवीस-शिंदे के बीच शक्ति संतुलन की जंग

महाराष्ट्र की महायुति सरकार में मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस और उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे के बीच तनावपूर्ण सम्बंधों की खबरें सामने आ रही हैं। उपमुख्यमंत्री शिंदे ने मुख्यमंत्री द्वारा बुलाई गई कुछ बैठकों से दूरी बनाई है और अपने स्वतंत्र वाॅर रूम स्थापित किए हैं। इसके अलावा, शिंदे ने हाल ही में बयान दिया है कि उन्हें हल्के में न लिया जाए, जो उनके और फडणवीस के बीच बढ़ते तनाव को दर्शाता है

महाराष्ट्र की महायुति सरकार में शीर्ष नेतृत्व के बीच समन्वय की कमी और आपसी तनाव बढ़ रहा है, जो सरकार की कार्यप्रणाली और स्थिरता पर प्रभाव डाल सकता है। मुख्यमंत्री फडणवीस ने हाल ही में उपमुख्यमंत्री शिंदे के पिछले कार्यकाल में मंजूर की गई कुछ परियोजनाओं की समीक्षा और जांच के आदेश दिए हैं। उदाहरण के लिए, जालना जिले के खारपुडी में 900 करोड़ रुपए की परियोजना की जांच सिडको के प्रबंध निदेशक द्वारा की जा रही है। इसके अलावा एसटी महामंडल के लिए 1310 बसों के काॅन्ट्रैक्ट को भी रद्द कर दिया गया है, जो शिंदे के कार्यकाल में पारित हुआ था। जिलों के संरक्षक मंत्रियों की नियुक्ति को लेकर भी दोनों नेताओं के बीच मतभेद उभरे हैं। रायगढ़ और नासिक जिलों में नियुक्तियों पर असहमति के चलते अब तक इन जिलों में संरक्षक मंत्रियों की नियुक्ति नहीं हो सकी है।

पहले से ही तनावपूर्ण रहे हैं सम्बंध

जब एकनाथ शिंदे महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री थे और देवेंद्र फडणवीस उपमुख्यमंत्री थे, तब उनके बीच कई मुद्दों को लेकर तकरार की खबरें सामने आई थीं। उनके बीच मतभेद मुख्य रूप से प्रशासनिक निर्णयों, शक्ति संतुलन और राजनीतिक फैसलों को लेकर थे। जब शिवसेना (शिंदे गुट) ने भाजपा के साथ मिलकर सरकार बनाई, तो यह तय हुआ था कि शिंदे मुख्यमंत्री रहेंगे, लेकिन कई महत्वपूर्ण विभाग फडणवीस के पास रहेंगे। फडणवीस को गृह, वित्त और जल संसाधन जैसे बड़े विभाग मिले, जबकि शिंदे का समूह अपेक्षाकृत कम प्रभावशाली विभागों के साथ असंतुष्ट था। शिंदे को यह महसूस हुआ कि फडणवीस सरकार पर अधिक नियंत्रण रखते हैं, जिससे उनके बीच खटास बढ़ी। शिंदे सरकार के गठन के बाद लम्बे समय तक मंत्रिमंडल विस्तार नहीं हुआ था, फडणवीस चाहते थे कि भाजपा के अधिक नेता महत्वपूर्ण पदों पर रहें, जबकि शिंदे अपनी पार्टी के विधायकों को भी मजबूत मंत्रालय दिलवाना चाहते थे।

फडणवीस, गृह मंत्री के रूप में, कई नीतिगत फैसलों में शिंदे सरकार को प्रभावित कर रहे थे। कुछ प्रमुख स्थानांतरण और प्रशासनिक नियुक्तियों में फडणवीस की दखलंदाजी बढ़ गई थी, जिससे शिंदे असहज थे। एकनाथ शिंदे ने अपनी शिवसेना के नेताओं और विधायकों को अयोध्या दौरे पर भेजने का फैसला किया था, लेकिन फडणवीस और भाजपा नेतृत्व इसे लेकर असहज थे। भाजपा चाहती थी कि हिंदुत्व का पूरा क्रेडिट उसे मिले, जबकि शिंदे इसे अपने लिए उपयोग करना चाहते थे। लोकसभा चुनाव के दौरान सीट बंटवारे को लेकर दोनों दलों में विवाद रहा। शिंदे गुट को भाजपा ने सीमित सीटें दीं, जिससे उनके विधायक और नेता नाराज हो गए थे।

मराठा आरक्षण को लेकर शिंदे सरकार को कड़े फैसले लेने थे, लेकिन भाजपा भी इस पर अपने हिसाब से कदम उठाना चाहती थी। फडणवीस इस मुद्दे पर अपनी अलग राय रखते थे, जिससे सरकार में अंतर्विरोध बढ़ा। शिंदे और फडणवीस के रिश्ते कभी भी सहज नहीं रहे। हालात यह थे कि शिंदे सरकार के फैसलों पर फडणवीस लगातार अपना प्रभाव बनाए रखना चाहते थे, जिससे शिंदे असहज महसूस करते थे। अब जब सरकार में भूमिकाएं बदली हैं तो यही तनाव एक बार फिर देखने को मिल रहा राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, महाराष्ट्र की राजनीति में एकनाथ शिंदे को केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह का वरदहस्त प्राप्त है। फडणवीस और शिंदे के बीच बढ़ते तनाव को देखते हुए, अमित शाह ने कई बार दखल देकर स्थिति को संभालने की कोशिश की। महाराष्ट्र के हालिया राजनीतिक घटनाक्रम में भी यह कहा जा रहा है कि अमित शाह ने शिंदे को इशारा कर दिया है। कि वह अपनी स्थिति को मजबूत बनाए रखें और भाजपा के साथ गठबंधन जारी रखें। अमित शाह ने महाराष्ट्र में ओबीसी और मराठा वोट बैंक को साधने के लिए शिंदे को भाजपा के साथ बनाए रखने की रणनीति बनाई है। जब 2022 में शिंदे ने शिवसेना में बगावत की और उद्धव ठाकरे सरकार गिराकर भाजपा के साथ मिलकर सरकार बनाई तो उसमें अमित शाह की रणनीति की महत्वपूर्ण भूमिका रही। शिंदे गुट के विधायकों को सुरक्षित रखने और कानूनी लड़ाई में उन्हें मजबूती देने में अमित शाह का समर्थन अहम माना गया।

सुप्रीम कोर्ट और चुनाव आयोग में शिवसेना के नाम और चुनाव चिह्न के मामले में शिंदे गुट को जो फायदा मिला, उसमें भी भाजपा की रणनीतिक भूमिका मानी जाती है। जब शिंदे ने बगावत की तो यह तय माना जा रहा था कि फडणवीस मुख्यमंत्री बनेंगे, लेकिन अमित शाह और नरेंद्र मोदी की सहमति के बाद शिंदे को मुख्यमंत्री बनाया गया और फडणवीस को उपमुख्यमंत्री पद स्वीकार करना पड़ा। इस फैसले से तब एक बात साफ तौर पर उभर कर आई थी कि अमित शाह ने शिंदे को महाराष्ट्र की राजनीति में आगे बढ़ाने का मन बना लिया है। कई मौकों पर यह देखा गया कि जब शिंदे सरकार पर संकट आया, तो अमित शाह ने इसे बचाने के लिए हस्तक्षेप किया। भाजपा नेताओं को शिंदे गुट से असंतोष था, लेकिन अमित शाह ने यह स्पष्ट किया कि महाराष्ट्र में भाजपा-शिंदे गुट का गठबंधन बना रहेगा।

अमित शाह की महाराष्ट्र में भाजपा की दीर्घकालिक रणनीति में एकनाथ शिंदे एक महत्वपूर्ण किरदार बने हुए हैं। हालांकि अब जब फडणवीस फिर से मुख्यमंत्री बने हैं और शिंदे उपमुख्यमंत्री, तो दोनों के बीच शक्ति संतुलन को बनाए रखना शाह के लिए चुनौती बन सकता है। लेकिन अभी भी शिंदे का राजनीतिक भविष्य अमित शाह की नीति और समर्थन पर निर्भर करता है।

भाजपा से बढ़ती नजदीकियां?

हाल के दिनों में, शिवसेना (यूबीटी) के प्रमुख नेता संजय राउत के भाजपा के प्रति रुख में नरमी देखी गई है। जहां पहले वे भाजपा के घोर विरोधी माने जाते थे, अब उनकी भाषा में संतुलन और संयम दिखाई दे रहा है। यह परिवर्तन महाराष्ट्र की राजनीतिक परिस्थितियों में सम्भावित बदलावों की ओर संकेत करता है।

उदाहरण के लिए कुछ समय पहले संजय राउत ने भाजपा नेता और उपमुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस की प्रशंसा की थी, जो उनके बदले हुए रुख का संकेत है। इसके अलावा शिवसेना (यूबीटी) के मुखपत्र ‘सामना’ में भी फडणवीस के कार्यों की सराहना की गई थी। इसके अलावा दिसम्बर 2024 में नागपुर में विधानसभा सत्र के दौरान उद्धव ठाकरे और फडणवीस के बीच मुलाकात भी हुई थी, जिससे दोनों नेताओं के बीच सम्बंधों में सुधार के संकेत मिले हैं। इन घटनाओं से यह अनुमान लगाया जा रहा है कि शिवसेना (यूबीटी) और भाजपा के बीच सम्बंधों में सुधार हो सकता है।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि संजय राउत के तेवरों में यह बदलाव महाराष्ट्र की आगामी राजनीतिक रणनीतियों का हिस्सा हो सकता है। हालांकि इस संदर्भ में कोई आधिकारिक घोषणा नहीं हुई है, लेकिन राजनीतिक गलियारों में इस सम्भावित गठबंधन को लेकर चर्चाएं जारी हैं। यह देखना दिलचस्प होगा कि आने वाले समय में महाराष्ट्र की राजनीति में यह बदलते समीकरण किस दिशा में जाते हैं और इसका राज्य की राजनीतिक स्थिरता पर क्या प्रभाव पड़ता है। इन घटनाओं के बाद, राजनीतिक विश्लेषकों में यह चर्चा तेज हो गई है कि क्या उद्धव ठाकरे की शिवसेना (यूबीटी) भाजपा के साथ फिर से गठबंधन की ओर बढ़ रही है। हालांकि इस संदर्भ में कोई आधिकारिक घोषणा नहीं हुई है, लेकिन राजनीतिक गलियारों में इस सम्भावित गठबंधन को लेकर अटकलें जारी हैं। वहीं, शिवसेना (यूबीटी) महाविकास अघाड़ी (एमवीए) का हिस्सा बनी हुई है और आगामी बजट सत्र में सरकार को घेरने की रणनीति बना रही है। एमवीए ने हाल ही में बैठक कर कानून व्यवस्था, किसानों की कर्जमाफी और अन्य मुद्दों पर सरकार को घेरने की योजना बनाई है। इस प्रकार, वर्तमान में उद्धव ठाकरे की शिवसेना (यूबीटी) विपक्ष में सक्रिय भूमिका निभा रही है, लेकिन भाजपा के साथ सम्भावित गठबंधन की चर्चाएं भी जारी हैं। आने वाले दिनों में महाराष्ट्र की राजनीति में और भी महत्वपूर्ण परिवर्तन देखने को मिल सकते हैं।

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