महाराष्ट्र की राजनीति में रिश्ते जितनी तेजी से बनते हैं, उतनी ही तेजी से बिगड़ भी जाते हैं। एकनाथ शिंदे और राज ठाकरे की हालिया ‘डिनर डिप्लोमेसी’ ने राजनीतिक विश्लेषकों को फिर से 2006 की याद दिला दी – जब एमएनएस का गठन हुआ था और ठाकरे परिवार दो खेमों में बंट गया था। एक समय था जब राज ठाकरे बाल ठाकरे के राजनीतिक उत्तराधिकारी माने जाते थे, लेकिन बाद में अलग होकर उन्होंने नया मोर्चा खोला। आज जब शिंदे ठाकरे शिवसेना से अलग होकर सत्ता में हैं और राज ठाकरे की पार्टी संघर्षरत है तो यह समीकरण दोनों को लाभकारी लग सकता है। बीएमसी चुनाव सिर पर हैं और दोनों पार्टियों के लिए एक-दूसरे का साथ, मराठी वोट बैंक को फिर से साधने का हथियार बन सकता है। सवाल ये है – क्या जनता इस ‘दोबारा जोड़ी गई जोड़ी’ पर फिर से भरोसा करेगी?
महाराष्ट्र में गठबंधनों की नई बिसात

