Uttarakhand

परवान चढ़ती ध्रुवीकरण की सियासत

हल्द्वानी में हो रही राजनीतिक और प्रशासनिक घटनाएं स्थानीय सामाजिक ताने-बाने के लिए गम्भीर चिंताओं को जन्म देती हैं। जब सत्ता में बैठे लोग विकास कार्यों और प्रशासनिक निर्णयों में धार्मिक आधार पर भेदभावपूर्ण नीति अपनाते हैं, तो यह न केवल समाज में असंतोष को बढ़ाता है, बल्कि नागरिकों के संवैधानिक अधिकारों का भी हनन करता है। नवनिर्वाचित मेयर गजराज सिंह बिष्ट द्वारा रेहड़ी और ठेले वालों के नाम-पते दर्ज करने और मांसाहार बेचने वालों पर समय-सीमा तय करने जैसे फरमान ध्रुवीकरण की राजनीति को दर्शाते हैं। इससे साफ है कि प्रशासनिक फैसले धार्मिक आधार पर लिए जा रहे हैं, जो संविधान की भावना के विरुद्ध हंै। रेहड़ी-पटरी व्यापारियों से नाम-पते लिखवाने का आदेश सुप्रीम कोर्ट की भावना का उल्लंघन भी है। गत वर्ष, सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा जारी इसी प्रकार के आदेश पर अंतरिम रोक लगाई थी

हल्द्वानी नगर निगम उत्तराखण्ड का दूसरा बड़ा नगर निगम है। 2011 में नगर निगम का दर्जा मिलने के बाद से ही यहां की मेयर सीट पर भाजपा का कब्जा रहा है। 2013 में नगर निगम के लिए हुए पहले चुनाव में भाजपा के डाॅ. जोगेंद्र पाल सिंह रौतेला पहले मेयर चुने गए। 2018 में नगर निगम का चुनाव में फिर से रौतेला की जीत हुई। 2024 के नगर निगम के चुनाव में काफी जद्दोजहद के बाद पार्टी ने गजराज बिष्ट को अपना प्रत्याशी बनाया और उन्हें अपने राजनीतिक जीवन में पहली बार चुनावी राजनीति के जरिए अपनी क्षमता सिद्ध करने का अवसर दिया। गजराज सिंह बिष्ट ने पार्टी भीतर अंतर्विरोधों का सामना करते हुए मेयर की सीट पर जीत हासिल की। कभी एक छोटा-सा कस्बा रहा हल्द्वानी आज महानगर का रूप ले चुका। वर्ष 1834 में कमिश्नर जी डब्ल्यू ट्रेल द्वारा स्थापित हल्द्वानी को 1860 में कमिश्नरी हेनरी रैमजे ने तहसील का दर्जा दिया था। 1881 तक हल्द्वानी में व्यापारी वर्ग की बहुतायत थी। 1885 में टाउनशिप अधिनियम लागू होने के बाद 1887 में यहां नगर पालिका कमेटी गठित की गई। 1942 में हल्द्वानी नगर पालिका का गठन कर इसे तृतीय श्रेणी की नगर पालिका का दर्जा दिया गया। 1956 में इसे द्वितीय श्रेणी की नगर पालिका और 1966 में प्रथम श्रेणी की नगर पालिका का दर्जा मिला। 1887 में नगर ढपालिका कमेटी से 2011 में नगर निगम का दर्जा पाने तक हल्द्वानी शहर का स्वरूप काफी हद तक बदला। शहर का विस्तार तो हुआ लेकिन एक निश्चित नियोजन की कमी के चलते जो विकास का स्वरूप सामने आया उसने हल्द्वानी की तस्वीर वैसी नहीं उभरने दी जैसा उसे होनी चाहिए थी। पहाड़ी जिलों से हुए पलायन का सबसे बड़ा दबाव हल्द्वानी ने ही झेला। हल्द्वानी और उसके चारों तरफ होते शहरीकरण के चलते हल्द्वानी का स्वरूप बदलता गया। बढ़ती आबादी का बोझ सहने के लिए सरकारें वो मूलभूत ढांचा उपलब्ध नहीं करा पाईं जिसकी दरकार हलद्वानी को थी। शायद हल्द्वानी पर बढ़ते बोझ को समझते हुए डाॅ. इंदिरा हृदयेश ने वृहदतर हल्द्वानी-गौलापार की कल्पना की थी। लेकिन उनकी मृत्यु के बाद उस पर अमल करने की किसी ने प्रयास नहीं किया। गौलापार में अंतरराज्यीय बस अड्डा और अंतरराष्ट्रीय स्टेडियम उसी परिकल्पना का हिस्सा थे जिससे हल्द्वानी शहर पर बोझ कम कर गौलापार क्षेत्र को शहरीकरण के लिए प्रोत्साहित किया जाए। ये सब अतीत की बातें हैं और विकास की व्यापक सोच हर राजनेता में नहीं होती।

अतिक्रमण हटाओ अभियान के दौरान हल्द्वानी मेयर गजराज सिंह बिष्ट, सिटी मजिस्टेªट ऋचा सिंह एवं अन्य

नगर निगम का दर्जा मिलने के बाद हल्द्वानी में मेयर भाजपा का ही रहा है। उम्मीद थी ट्रिपल इंजन का दावा करने वाली भाजपा के राज्य में हल्द्वानी की तस्वीर में बड़ा बदलाव आएगा। लेकिन इस ट्रिपल इंजन वाली सरकार के कंट्रोल वाले नगर निगम का कोई भी वार्ड समस्याओं से अछूता नहीं रहा है। गजराज बिष्ट के मेयर बनने के बाद आमजन की समस्याओं का निराकरण करने के बजाय संवेदनशील मामलों को बेवजह तूल दिया जा रहा है। नए निजाम के साथ प्राथमिकताओं के बदलने की तस्दीक नगर निगम की ओर से आ रहे नित नए फरमान करते हैं। रेहड़ी और ठेलों पर नाम व पता, शाम को छह बजे के बाद मांसाहार बेचने वाले ठेलों पर प्रतिबंध नगर निगम की प्राथमिकताओं को दर्शाते हैं। अतिक्रमण पर खास क्षेत्र को फोकस करना स्पष्ट करता है कि उत्तर प्रदेश के योगीराज की तर्ज पर बुलडोजर संस्कृति का नजारा यहां भी देखने को मिल सकता है। ये शायद उस बनभूलपुरा-सनातनपुरा की सोच का नतीजा हो सकता है जिसको हवा मेयर के चुनाव में मिली थी। हल्द्वानी नगर निगम में समस्याओं का अम्बार है। अतिक्रमण उन समस्याओं में से एक समस्या है जिनसे नगर निगम जूझ रहा है। लेकिन मेयर गजराज बिष्ट ने अतिक्रमण हटाने के लिए बनभूलपुरा को चुना जिसके लिए उन्होंने कहा था कि हल्द्वानी को अशांत करने वालों के वोट नहीं चाहिए। अतिक्रमण हटाने के लिए बनभूलपुरा क्षेत्र में गजराज सिंह बिष्ट का स्वयं मौजूद रहना क्या क्षेत्र विशेष के लिए संदेश है या कोई संकेत? इसका बेहतर जवाब मेयर गजराज बिष्ट ही दे सकते हैं। लेकिन हल्द्वानी को सुंदर शहर बनाने की चाह रखने वाले गजराज बिष्ट को सभी समस्याओं के प्रति व्यापक दृष्टि रखनी होगी। खास बात यह है कि इस बार भी बनभूलपुरा क्षेत्र से भाजपा को गिनती के ही वोट मिले थे। तभी ऐन चुनाव से पूर्व गजराज बिष्ट की कोर टीम का फोकस ‘बटोगे तो कटोगे’ जैसे नारो पर था, वनिस्पत अन्य मुद्दों के। नगर निगम आर्थिक रूप से अच्छी स्थिति में नहीं है। निगम को आर्थिक रूप से मजबूत करने के लिए आय के स्रोत खोजने की जरूरत है जिससे वो आर्थिक रूप से स्वावलम्बन बन सके। विकास के लिए अभी भी निगम केंद्र व राज्य सरकार की आर्थिक सहायता पर निर्भर है। कर्मचारियों की तनख्वाह और पेंशन पर भारी राशि निगम खर्च करता है। सबसे बड़ी चुनौती निगम के अंदर शामिल किए गए वो नए 23 वार्ड हैं जिन्हें विकास के सपने दिखाकर नगर निगम में शामिल तो करवा लिया गया लेकिन पानी, सीवर, लाइट, स्ट्रीट और सड़कों की समस्या जस की तस है। नगर निगम के पुराने कई वार्ड भी पेयजल समस्या, स्ट्रीट लाइट और सीवर जैसी सुविधाओं से वंचित हैं।

ठेलों पर नाम लगवाना सही हो सकता है लेकिन ठेले पर नाम देखकर कि व्यक्ति किस धर्म का है, देखकर उपद्रव न मचाए कोई, शहर में शांति बनी रहे तो ठीक है। जहां तक बनभूलपुरा से अतिक्रमण हटाने की बात है तो उसे स्थानीय लोगों की शिकायत पर ही हटाया गया था इसमें राजनीति ठीक नहीं है। शाम 6 बजे बाद खाने के ठेलों पर प्रतिबंध उचित नहीं है। गरीब लोगों की रोजी-रोटी का सवाल है। ये सही है कि ठेलों पर कहीं लोग शराब पीते हैं। शराब पीने वालों पर पुलिस कारवाई करे, ये काम पुलिस का है लेकिन जो साफ-सुथरा काम कर रहे हैं वो प्रभावित नहीं होने चाहिए।
सुमित हृदयेश, विधायक, हलद्वानी

जहां तक अतिक्रमण हटाने का सवाल है वो राजनीतिक ज्यादा और व्यवहारिक दृष्टि से कम तवज्जों पाता है। नगर निगम के चुनाव में गजराज बिष्ट की जीत के बाद अतिक्रमण पर जेसीबी गरजने लगी है। 2022 में भी विधानसभा चुनाव की पराजय के बाद तत्कालीन मेयर और भाजपा के विधानसभा प्रत्याशी डाॅ. जोगेंद्र रौतेला की जेसीबी अतिक्रमण के नाम पर गरजी थी जिसे विशुद्ध राजनीतिक विद्वेष कहा गया था। हल्द्वानी एक बड़े अतिक्रमण का शिकार है इसमें कोई दो राय नहीं है। लेकिन इसे सिर्फ राजनीतिक दृष्टि से हटकर समग्र दृष्टि से देखने की सोच विकसित करके देखने की क्षमता लानी होगी। अगर ईमानदारी से निष्पक्ष होकर कार्रवाई हो तो हल्द्वानी शहर की तस्वीर जरूर बदलेगी लेकिन इसमें ‘तेरा वोटर, मेरा वोटर’ की भावना से बाहर आकर देखना होगा। शहर में निगम, सिंचाई विभाग, लोक निर्माण विभाग सहित कई अन्य विभागों की सम्पत्तियां अतिक्रमण की शिकार हैं। हल्द्वानी शहर नजूल भूमि पर बसा है। कई सम्पत्तियां ऐसी हैं जो नजूल की हैं जिनकी लीज की अवधि समाप्त हो चुकी हैं। कायदे अनुसार उन पर निगम ने कब्जा ले लेना चाहिए था। लेकिन नगर निगम उस ओर ध्यान नहीं दे रहा है। अतिक्रमण और उसके प्र्रति सरकारी रवैये का प्रत्यक्ष उदाहरण है बाजार क्षेत्र का इलाका जहां दुकानदारों ने बीस फीट चैड़ी सड़कों पर अतिक्रमण कर उन्हें तीन फीट की गलियों में तब्दील कर दिया है। दिन के समय इन सड़कों पर चलना दुभर हो जाता है। मीरा मार्ग, सदर बाजार, कारखाना बाजार की सड़कें व्यापारियों के चलते संकरी हो गई हैं। अपनी दुकानों पर तो व्यापारी व्यापार कर रहे हैं दुकान के आगे का हिस्सा फड़ वालों को बैठकार अच्छा-खासा किराया वसूल कर रहे हैं लेकिन व्यापारियों के विरोध के चलते नगर निगम सख्त रवैया अपनाने से डरता है। इसी प्रकार तिकोनिया से रेलवे स्टेशन हल्द्वानी को जोड़ने वाला मार्ग व्यस्तम मार्ग है। ट्रांसपोर्ट नगर की परिकल्पना इसलिए की गई थी कि वहां ट्रांसपोर्ट से सम्बंधित सभी कार्य एक जगह पर होंगे। लेकिन इस सड़क पर गाड़ियों की मरम्मत के चलते हमेशा जाम की स्थिति बनी रहती है। इसी प्रकार नगर के हीरानगर के क्षेत्र में पर्वतीय सांस्कृतिक उत्थान मंच और फाॅरेस्ट काॅलोनी के बीच आईटीआई रोड को जोड़ने वाली सड़क अतिक्रमण का शिकार है यहां पर दो बाउंड्री वाॅल स्पष्ट रूप से देखी जा सकती है। यहां पर निवासियों ने सड़क का अच्छा-खासा क्षेत्र घेर कर रोड को संकरा कर दिया है। जबकि ये सुशीला तिवारी अस्पताल को जोड़ने वाला व्यस्त वैकल्पिक मार्ग है। अगर प्रशासन सख्ती अपनाए तो कई रसूखदार अतिक्रमण की चपेट में यहां दिखाई देंगे। इसी प्रकार डहरिया क्षेत्र में प्रशासन लाल निशान लगाकर आगे की कार्रवाई करना भूल गया। सड़कों, फुटपाथों पर अतिक्रमण विरोधी अभियान चलाकर वाहवाही लूट लेना आसान है। लेकिन वहां पर भी दूसरे दिन अतिक्रमणकारी फिर वापस बैठ जाते हैं। मलिक का बगीचा बनभूलपुरा में अतिक्रमण हटाओ अभियान कुछ अफसरों की मूर्खता और अपने राजनीतिक आकाओं को खुश करने की कुनीयत चलते उपद्रव की भेंट चढ़ गया था। सवाल है कि अन्य इलाकों में प्रशासन ने नजूल भूमि को चिन्हित क्यों नहीं किया? अगर चिन्हित किया है तो प्रशासन ने कोई कार्यवाही की भी है या नहीं? इसी प्रकार मटर गली से गुजरने वाली सिंचाई विभाग की गूल को पाट कर पूरी बाजार ही बसा दी गई लेकिन प्रशासन आंखें मूंदे बैठा है। अगर सूत्रों की मानें तो कांग्रेस और भाजपा के कार्यालय भी कहीं न कहीं अतिक्रमण कर बनाए गए हैं। भाजपा के सम्भाग कार्यालय हल्द्वानी में सिंचाई विभाग की एक गूल भाजपा कार्यालय के नीचे समाकर गायब हो गई।

एक विषय ये है कि नवीन बोर्ड बनती है वो अपनी नीतियों का निर्धारण स्वतः करती है। ठेलों और उनकी संख्या को कहीं न कहीं तो नियंत्रित करना जरूरी है। लेकिन इस तथ्य को भी ध्यान रखना होगा कि ठेले के पीछे एक-दो परिवार भी है। उम्मीद है इसको ध्यान में रखते हुए बोर्ड ऐसा फैसला लेगी जिससे आमजन और वेंडर्स को परेशानी न हो।
डाॅ. जोगेंद्रपाल सिंह रौतेला, पूर्व महापौर, हलद्वानी नगर निगम

अगर नगर निगम के फरमान पर अमल हुआ तो ठेलों पर शाम के छह बजे बाद मांसाहारी भोजन नहीं बिकेगा साथ ही ठेले और रेहड़ी वालों को अपनी रेहड़ी-ठेलों पर नाम व पता दर्शाना होगा। नगर निगम के तर्क को मानें तो मांसाहारी भोजन बेचने वाले शाम को शराब परोसते हैं। इसका मतलब है कि पुलिस अवैध शराब की बिक्री पर रोक लगाने में नाकाम रही है। इसी प्रकार ठेले-रेहड़ी पर नाम की तख्ती लगाना निगम की कार्यशैली पर सवाल खड़े करता है।

नोट: हल्द्वानी के मेयर गजराज सिंह बिष्ट से उनका पक्ष जानने के लिए दूरभाष पर सम्पर्क करने का प्रयास किया गया लेकिन सम्पर्क नहीं हो पाया।

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