वे डरते हैं
किस चीज से डरते हैं वे
तमाम धन-दौलत
गोला-बारूद, पुलिस-फौज के
बावजूद?
वे डरते हैं
कि एक दिन
निहत्थे और गरीब लोग
उनसे डरना बंद कर देंगे।
-गोरख पांडेय
प्रयागराज (जिसे मैं आज भी इलाहाबाद के नाम से ही याद रखने का प्रयास करता हूं और करता रहूंगा) में चल रहे पवित्र कुम्भ मेले में एक वर्ग विशेष के लिए उपलब्ध सुविधाओं का भंडार और आमजन संग भेंड़-बकरियों सा बर्ताव, एक तरफ कई किलोमीटर लम्बा जाम और दूसरी तरफ कथित अति विशिष्ट व्यक्तियों की आलीशान गाड़ियों के आगे पुलिस की सायरन बजाती गाड़ियां, महामंडलेश्वर के वाहन तले कुचला जाता आम आदमी, भगदड़ में जान गंवा चुका आम आदमी, अपने परिजनों की तलाश में अस्पतालों और मुर्दाघरों में धक्के खाते-दुत्कारा जाता आम आदमी। आजादी बाद कहां तो यह तय हुआ था कि कतार में खड़े अंतिम व्यक्ति तक को आगे लाने का काम किया जाएगा और देखिए कहां हम जा पहुंचे हैं? गैर-बराबरी अब सामाजिक और
राजनीतिक व्यवस्था का हिस्सा बन चुकी है। आम और खास के मध्य की खाई पाटना अब न तो सरकारों की प्राथमिकता में है, न ही ऐसा कर पाना सम्भव नजर आता है। बीरेंद्र डंगवाल के शब्दों में कहूं तो- ‘किसने आखिर ऐसा समाज रच डाला है, जिसमें बस वही दमकता है जो काला है, वह कत्ल हो रहा सरेआम चौराहे पर, निर्दोष और सज्जन जो भोला-भाला है।’ धूमिल की कविता और स्वयं धूमिल इसी गैर-बराबरी वाली सामाजिक व्यवस्था चलते मुझे याद हो आए। उत्तर प्रदेश के पिछड़े इलाके देवरिया के मुड़ेरवा गांव में जन्में धूमिल किसान आंदोलनों से जुड़े रहे थे। उनकी कविताओं में गैर-बराबरी के खिलाफ गहरा आक्रोश झलकता है। उनका मानना था कि एक न एक दिन वर्ग संघर्ष की आग जरूर भड़केगी और जब भड़केगी तो बुझाए नहीं बुझेगी। उन्होंने लिखा-
हजार साल पुराना है उनका गुस्सा
हजार साल पुरानी है उनकी नफरत
मैं तो सिर्फ
उनके बिखरे हुए शब्दों को
लय और तुक के साथ
लौटा रहा हूं
मगर तुम्हें डर है कि
आग भड़का रहा हूं।
कुम्भ के बरअक्स समझिए, कम से कम समझने का प्रयास तो करिए कि इन बीते 77 बरसों में हम कहां पहुंचने के लिए चले थे और कहां आ पहुंचे हैं? कुम्भ मेला क्षेत्र में पूंजीपतियों और अतिविशिष्ट व्यक्तियों के लिए पांच स्थानों पर विशेष सर्किट हाउस बनाए गए जिनमें आधुनिक सुविधाओं युक्त 250 टेंटों की व्यवस्था है। इसके अलावा 2,200 काॅटेज भी इस वर्ग के लिए तैयार किए गए और इन ‘खास’ को ‘कैटल क्लास’ से दूर रखने के लिए गंगा, यमुना और सरस्वती के संगम स्थल पर निजी स्नान सुविधा भी उपलब्ध कराई गई। वीआईपी स्नान को यादगार बनाने के लिए आईआईटी खड़गपुर द्वारा विकसित स्वचलित जेटी में आरामदायक बैठने की जगह, चेंजिंग रूम, विशेष और प्राइवेट स्नान क्षेत्र उपलब्ध कराया गया। पांच सितारा सुविधाओं से युक्त आलीशान टेंट भी यहां बनाए गए जिनमें बाथटब, रेन शाॅवर इत्यादि सुविधाएं पूंजीपतियों को प्रदान की गईं। दूसरी तरफ आम श्रद्धालु को नाना प्रकार की असुविधाओं से जूझने के लिए छोड़ दिया गया। क्या ऐसी गैर-बराबरी, इतनी गहरी आर्थिक विषमता के लिए दशकों तक अंग्रेज सत्ता संग हमारे पूर्वज लड़े थे? बात होती है ‘सब का साथ – सबका विकास – सबका विश्वास’ की लेकिन विकास केवल उस एक छोटे से तबके का निरंतर होता जा रहा है जो देश की सम्पत्ति और संसाधनों पर एकाधिकार जमाए बैठा है। एक तरफ अंबानी-अडानी सरीखे धन्ना सेठ हैं तो दूसरी तरफ देश की बड़ी आबादी जो बुनियादी आवश्यकताओं के लिए संघर्षरत रहने को मजबूर है। 2023 में अमेरिकी रिसर्च संस्था ‘ऑक्सफैम’ की एक रिपोर्ट आई थी जिसके अनुसार भारत के शीर्ष 1 प्रतिशत लोगों के पास देश की कुल सम्पत्ति का 40 प्रतिशत से अधिक हिस्सा है। हालात देखिए कितने विकट हैं कितने और विकट होते जा रहे हैं। निजी शिक्षण संस्थाओं में शिक्षा की बढ़ती लागत निम्न और मध्यम वर्ग के छात्रों के लिए उच्च शिक्षा को दुस्वप्न बना रही है। सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं का हाल-बदहाल है। कोविड महामारी के दौरान स्वास्थ इन्फ्रास्ट्रचर के लम्बे-चैड़े दावों का सच हम सभी ने देखा। सम्पन्न वर्ग के लिए पंच सितारा अस्पताल बन रहे हैं तो आमजन के लिए बुनियादी सुविधाओं का टोटा बना हुआ है। सरकारी नौकरियां कम होती जा रही हैं, श्रमिक अधिकारों को भी लगातार कमजोर किया जा रहा है। असंगठित क्षेत्र में मजदूरों का शोषण उफान पर है। केंद्र सरकार की नीतियां 1991 में नरसिम्हा राव के शासनकाल के दौरान उदारीकरण के प्रभाव में कॉरपोरेट के पक्ष में बननी शुरू हुई थी। वर्तमान में तो सरकार और काॅरपोरेट के मध्य फर्क तलाशना मुश्किल हो चला है। यह सब बेहद भयावह है और भारत में वर्ग संघर्ष की आशंका को गहराने का काम कर रहा है। 1922 में हमारे देश के शीर्ष 1 प्रतिशत अमीरों की कुल आय में हिस्सेदारी 13 प्रतिशत थी जो 1940 में बढ़कर 20 प्रतिशत जा पहुंची। 2022-23 में यह हिस्सेदारी 22.6 प्रतिशत तक तक पहुंच गई है जो ब्रिटिश औपनिवेशिक काल से भी अधिक है। अमेरिका के गैर लाभकारी रिसर्च संस्था ‘प्यू रिसर्च सेंटर’ के एक सर्वेक्षण अनुसार 81 प्रतिशत भारतीय आर्थिक असमानता से परेशान और 71 प्रतिशत लोग धार्मिक और जातिगत भेदभाव को एक बड़ी समस्या मानते हैं। इतना ही नहीं स्वास्थ्य में सार्वजनिक व्यय सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का लगभग 1.3 प्रतिशत है जो राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति के 2025 तक 2.5 प्रतिशत के लक्ष्य से काफी कम है। स्पष्ट है कि बीते 77 बरसों में भाजपा में आर्थिक असमानता लगातार बेलगाम बढ़ रही है जिससे समाज में असंतोष तेज होने लगा है।
अब अंधेरा जीत लेंगे लोग मेरे गांव के
कह रही है झोपड़ी और पूछते हैं खेत भी
कब तलक लूटते रहेंगे लोग मेरे गांव के
बिन लड़े कुछ भी यहां मिलता नहीं ये जानकर,
अब लड़ाई लड़ रहे हैं लोग मेरे गांव के
कफन बांधे हैं सिरों पर हाथ में तलवार है
ढूंढने निकले हैं दुश्मन लोग मेरे गांव के।

