धर्म वही है जो मानवता की रक्षा करे।
जो नफरत और हिंसा फैलाए, वह अधर्म है
-स्वामी विवेकानंद (शिकागो भाषण)
निशिकांत दुबे वर्तमान लोकसभा के सदस्य हैं। झारखंड की गोड्डा लोकसभा सीट से वे लगातार चार बार चुनाव जीत संसद सदस्य बने हुए हैं। वे भारतीय जनता पार्टी से हैं। खुद को व्यापारी, कृषक तथा राजनेता बताते हैं। उनका दावा है कि झारखंड के संथाल परगना मंडल के द्विधर में उनके प्रयासों से केंद्र सरकार ने ‘एम्स’ की स्थापना की। वे चिकित्सा से जुड़े संस्थानों में विशेष रुचि रखते हैं। इतनी रुचि कि मार्च, 2024 में एक निजी मेडिकल काॅलेज को जालसाजी के जरिए हड़पने का आरोप उन पर लगा और एफआईआर भी उन पर दर्ज की गई। कहा जा सकता है कि वे विवादित छवि के राजनेता हैं। गत् सप्ताह अपने बायोडाटा में एक नया विवाद जोड़ दुबे जी देशभर में छा गए। यह दीगर बात है कि उनका सुर्खियों में छाना उनकी पार्टी भाजपा के लिए मुसीबत का कारण बन उभरा है। इतना बड़ा कारण कि स्वयं पार्टी अध्यक्ष जगत प्रकाश नड्डा को हस्तक्षेप करना पड़ा और अपने इस बड़बोले सांसद के बयान से किनारा करना पड़ा। मुझे शंका है कि दुबेजी ने यह बयान बगैर सोचे-समझे दिया होगा। मुझे लगता है कि उनका बयान भारतीय जनता पार्टी की उस नाराजगी का सार्वजनिक प्रदर्शन मात्र है जो न्यायपालिका के प्रति लम्बे अर्से से पार्टी भीतर पनप रही है। दुबे जी ने या तो पार्टी नेतृत्व की रजामंदी अथवा ज्यादा स्वामी भक्ति चलते यह बयान दिया लगता मुझे प्रतीत होता है। दुबेजी और उनके बाद उ.प्र. के पूर्व उपमुख्यमंत्री दिनेश शर्मा जी का न्यायपालिका पर बरसना तात्कालिक तौर पर वक्फ कानून को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट में चल रही सुनवाई के चलते हैं लेकिन इसकी बुनियाद बीते 11 सालों के दौरान कई मर्तबा सुप्रीम कोर्ट द्वारा केंद्र सरकार के ऐसे फैसले पर प्रतिकूल निर्णय देना रहा है जिनसे भाजपा का कोर एजेंडा प्रभावित होता है। भारतीय लोकतंत्र की, कह सकते हैं हरेक लोकतांत्रिक देश में लोकतंत्र की सबसे बड़ी विशेषता संवैधानिक संस्थाओं के मध्य शक्ति संतुलन का होना है। भारतीय लोकतंत्र में केंद्र में मजबूत बहुमत वाली सरकार होने के बावजूद न्यायपालिका ने कई मर्तबा यह संदेश देने का काम किया है कि वह केवल एक संवैधानिक संस्था नहीं, बल्कि लोकतंत्र की आत्मा की संरक्षक भी है। इन वर्षों में न्यायपालिका ने कई ऐसे निर्णय दिए जो या तो प्रत्यक्ष रूप से सरकार को प्रभावित करते हैं या परोक्ष रूप से सरकार की राजनीतिक छवि को चुनौती देते हैं। ऐसे निर्णयों में राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग कानून को असंवैधानिक करार देना, चुनावी बाॅन्ड योजना पर सुप्रीम कोर्ट की रोक, आधार एक्ट की सीमित वैधता जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने आधार को कल्याणकारी योजनाओं के लिए तो अनिवार्य तो माना लेकिन बैंकों, मोबाइल कम्पनियों और निजी संस्थानों के लिए अनिवार्यता रद्द कर दी इत्यादि शामिल हैं। आधार की अनिवार्यता पर कोर्ट के फैसले से सरकार की ‘डिजिटल इंडिया’ मुहिम को झटका लगा और यह निर्णय निजता के अधिकार पर एक ऐतिहासिक निर्णय भी बना। 2019 में केंद्र सरकार ने तत्कालीन सीबीआई निदेशक आलोक वर्मा को आधी रात को हटा दिया था। सुप्रीम कोर्ट ने इस पर आपत्ति जताते हुए वर्मा की बहाली के आदेश दिए जिस चलते सरकार की कार्यशैली पर सवाल उठे थे। 2018 में सुप्रीम कोर्ट के चार न्यायाधीशों की अप्रत्याशित और ‘भूतो ना भविष्यति’ प्रेस कॉन्फ्रेंस ने संवैधानिक संस्थाओं मध्य गहराते अविश्वास और असंतुलन को सामने रखने का काम किया था। वह ऐसा क्षण था जिसके न सिर्फ न्यायपालिका, बल्कि देश की नागरिक चेतना को भी झकझोर दिया था। हमारे संविधान निर्माताओं ने हमें ऐसा संविधान दिया जिसमें अदालतें केवल विवाद निपटाने का मंच नहीं, बल्कि सत्ता पर नियंत्रण रखने वाली संस्थाएं बन उभरी हैं। जब सत्ताधारी दल के दुबे जी और शर्मा जी सरीखे नेता न्यायाधीशों की निष्पक्षता पर सवाल उठाते हैं तो उनका उद्देश्य केवल और केवल आम जन के मन में न्यायपालिका की वैधता पर संदेह पैदा करने का होता है। निशिकांत दुबे और दिनेश शर्मा के बयान मेरी समझ से स्वस्फूर्त बयान नहीं है। सुप्रीम कोर्ट इन दिनों वक्फ एक्ट पर सुनवाई कर रहा है। 16 अप्रैल को इस मामले में मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति संजीव खन्ना की पीठ ने केंद्र सरकार के महाधिवक्ता तुषार मेहता से जब यह जानना चाहा कि क्या मुसलमानों को केंद्र सरकार हिंदू संस्थाओं का सदस्य बनाने के लिए तैयार है? कोर्ट ने कहा कि वक्फ बोर्ड के सभी सदस्य केवल मुसलमान ही हो सकते हैं। इस पर तुषार मेहता ने सरकारी पक्ष को रखते हुए एक अनावश्यक तर्क दे डाला। उन्होंने कहा ‘If the objection to the presence of non-Muslims in the statutory boards is accepted, then the present bench would also not be able to hear the matter. then your Lordships can not hear this matter, if we go by that logic.’ मेहता के कहने का तात्पर्य था कि चूंकि पीठ में मौजूद न्यायाधीश हिंदू हैं इसलिए यदि गैर मुसलमान वक्फ बोर्ड के सदस्य नहीं हो सकते, के तर्क को माना जाए तो यह पीठ भी इस मुकदमे को नहीं सुन सकती क्योंकि इसमें कोई मुसलमान न्यायाधीश नहीं है। न्यायमूर्ति संजीव खन्ना इस कुतर्क से खासे नाराज हो गए। उन्होंने कहा- ‘No, sorry Mr. Mehta, we are not talking just about adjudication when we sit here, we lose our religion. We are absolutely secular. For us, one side or the either is the same.’ (माफ कीजिए मिस्टर मेहता, हम यहां सिर्फ निर्णय की बात नहीं कर रहे हैं। जब हम यहां बैठते हैं तो अपना धर्म भूल जाते हैं। हम पूरी तरह से धर्मनिरपेक्ष हैं। हमारे लिए एक पक्ष या दूसरा पक्ष एक जैसा है।) इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने अगली सुनवाई तक वक्फ बोर्ड में नई नियुक्तियां करने तथा किसी भी वक्फ सम्पत्ति को गैर वक्फ घोषित किए जाने पर अंतरिम रोक लगा दी। यह केंद्र सरकार और भाजपा के लिए बड़ा आघात है। यही कारण है कि दुबेजी, शर्मा जी और बहुत सारे अन्य ‘जी’ न्यायपालिका के खिलाफ बयान देने लगे हैं।
निशिकांत दुबे ने तो मुख्य न्यायधीश संजीव खन्ना को देश में सभी सभी ‘गृह युद्धों’ के लिए और सुप्रीम कोर्ट को ‘धार्मिक युद्धों के लिए जिम्मेदार ठहरा डाला। हालांकि भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जगत प्रकाश नड्डा ने अपने इन बयानवीर नेताओं के कथन से किनारा कर लिया है लेकिन ऐसे नेताओं पर अभी तक कोई कार्यवाही नहीं की गई है। हैरानी की बात यह है कि उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ भी न्यायपालिका की निंदा करने वालों में शामिल हो गए हैं। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के उस फैसले को निंदनीय करार दिया है जिसमें कोर्ट ने राज्यों के राज्यपालों को एक तय समय सीमा के भीतर लम्बित पड़े विधेयकों को स्वीकृत करने का आदेश दिया है। यह फैसला तमिलनाडु के राज्यपाल आर.एन. रवि द्वारा दस से अधिक विधेयकों को अपनी सहमति नहीं देना है जिसके खिलाफ राज्य सरकार ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। धनखड़ ने अनुच्छेद 142, जो सर्वोच्च न्यायालय को न्याय हित में आवश्यक आदेश पारित करने की शक्ति देता है, को ‘लोकतांत्रिक ताकतों के खिलाफ परमाणु मिसाइल’ करार दिया है।
भाजपा हिंदुत्व की पैरोकार होने का दंभ भरती है लेकिन हिंदुत्व की मूल अवधारणा जो मानवीय सरोकारों की रक्षा करना है, मोहब्बत का विस्तार करना है और हर प्रकार की हिंसा से बचना, उसे रोकना है, इस अवधारणा का पालन करती नजर नहीं आती है। निशिकांत दुबे इसके जीते जागते उदाहरण है, हालांकि ऐसे उदाहरणों की भाजपा में भरमार है। दुबे जी चूंकि चर्चा में है इसलिए उनका एक और ‘मोहब्बत भरा’ कारनामा है पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त एस.वाई. कुरैशी को ‘मुस्लिम चुनाव आयुक्त’ कह पुकारना। उन्होंने ऐसा कुरैशी की ‘एक्स’ सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर की एक पोस्ट के जवाब में कहा। कुरेशी ने अपनी इस पोस्ट में वक्फ (संशोधन) एक्ट की बाबत लिखा था- ‘यह वक्फ अधिनियम निःसंदेह सरकार की मुस्लिम जमीनों पर कब्जा करने की एक बेहद घिनौनी और शातिर योजना है। मुझे पूरा विश्वास है कि सुप्रीम कोर्ट इसे नकारेगा। शरारती प्रोपेगेंडा मशीन ने झूठी जानकारी फैलाकर अपना काम बखूबी कर लिया है।’ इससे खिन्न दुबे जी ने 20 अप्रैल को लिख मारा- ‘आप चुनाव आयुक्त नहीं, मुस्लिम आयुक्त थे। झारखंड के संथाल परगना में बांग्लादेशी घुसपैठियों को वोटर सबसे ज्यादा आपके कार्यकाल में ही बनाया गया। पैगम्बर मोहम्मद साहब का इस्लाम भारत में 712 में आया। उससे पहले तो यह जमीन हिंदुओं की थी या उस आस्था से जुड़े आदिवासी, जैन या बौद्ध धर्मावलम्बी थे। मेरे गांव विक्रमशिला को बख्तियार खिलजी ने 1189 में जलाया। विक्रमशिला विश्वविद्यालय ने दुनिया को पहला कुलपति दिया अतीश दीपांकर के तौर पर। इस देश को जोड़ो, इतिहास, पढ़ो, तोड़ने से पाकिस्तान बना, अब बंटवारा नहीं होगा’। अब जिन ‘ऐतिहासिक तथ्यों’ की बात दुबेजी कर रहे हैं, वह उन्होंने कहां पढ़े, यह कहना कठिन है। ऐसे बेहूदे बयानों पर केवल क्षोभ, गहरा क्षोभ ही व्यक्त किया जा सकता है। यह हिंदुत्व नहीं है, यह घृणा का व्यापार है, राजसत्ता पाने के लिए, उसे बचाए रखने के लिए। अभिनेता आशुतोष राणा की एक कविता याद आ रही है। पढ़िए और थोड़ा चिंतन कीजिए कि क्या ऐसा हिंदुस्तान हमारे स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों ने चाहा था-
बांट दिया इस धरती को
क्या चांद-सितारे का होगा?
उन नदियों के कुछ नाम रखे
बहती धारों का क्या होगा?
शिव की गंगा भी पानी है
आबे ज़मज़म भी पानी है
मुल्ला भी पिए, पंडित भी पिए
पानी का मज़हब क्या होगा?
इन फिरकापरस्तों से यह भी पूछो
क्या सूरज अलग बनाओगे?
एक हवा में सांस है सबकी
क्या हवा भी नई चलाओगे?
नस्लों का करे जो बंटवारा
रहबर वह कौम का ढोंगी है
क्या खुदा ने मंदिर तोड़ा था
या राम ने मस्जिद तोड़ी है?

