कुमाऊं का विश्व प्रसिद्ध हिल स्टेशन और सामरिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण रानीखेत केवल अपने प्राकृतिक सौंदर्य के लिए ही नहीं बल्कि अपनी समृद्ध राजनीतिक विरासत के लिए भी जाना जाता रहा है। इस विधानसभा ने देश की राजनीति को ऐसे नेता दिए जिन्होंने प्रदेश स्तर पर महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उत्तर प्रदेश के तीन बार मुख्यमंत्री रहे चंद्रभानु गुप्ता भी रानीखेत से विधायक चुने गए थे। इसके अलावा स्वतंत्रता संग्राम सेनानी और क्षेत्र के प्रथम विधायक मदन मोहन उपाध्याय जिन्हें ‘कुमाऊं का सुभाष’ कहा जाता था, ने भी इस क्षेत्र का प्रतिनिधित्व किया। कुमाऊं की राजनीति में प्रभाव रखने वाले नेता गोविंद सिंह माहरा का नाम भी रानीखेत की राजनीतिक यात्रा में सम्मान के साथ लिया जाता है। इतिहास में इतने प्रभावशाली नेताओं को चुनने वाली यह विधानसभा आज विकास के कई बुनियादी मोर्चों पर संघर्ष करती दिखाई देती है। पर्यटन नगरी होने के बावजूद रानीखेत पलायन, रोजगार के अभाव, कमजोर स्वास्थ्य सेवाओं, उच्च व तकनीकी शिक्षा की कमी और जर्जर सड़कों जैसी समस्याओं से जूझ रहा है। युवाओं के लिए रोजगारपरक कोर्स और अवसर सीमित होने के कारण बड़ी संख्या में युवा पढ़ाई और नौकरी के लिए शहरों की ओर पलायन कर रहे हैं। अस्पतालों की स्थिति ऐसी है कि अधिकांश मामलों में मरीजों को हल्द्वानी या अन्य शहरों के लिए रेफर करना पड़ता है। कई क्षेत्रों में पेयजल संकट बना रहता है जबकि खेल सुविधाओं और प्रस्तावित स्टेडियम जैसे विकास कार्य वर्षों से लम्बित पड़े हैं। वर्तमान में इस विधानसभा का प्रतिनिधित्व प्रमोद नैनवाल कर रहे हैं। स्थानीय नागरिकों और सामाजिक प्रतिनिधियों का कहना है कि पिछले कुछ वर्षों में क्षेत्र की मूल समस्याओं, पलायन, रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य और बुनियादी ढांचे के स्थायी समाधान की दिशा में अपेक्षित प्रगति नहीं हो सकी है। कभी प्रदेश की राजनीति में महत्वपूर्ण पहचान रखने वाली रानीखेत विधानसभा आज इस उम्मीद के साथ भविष्य की ओर देख रही है कि यहां की ऐतिहासिक पहचान के अनुरूप विकास की नई दिशा और ठोस पहल दिखाई दे
सबसे बड़ी त्रासदी – पलायन और अर्थव्यवस्था
रानीखेत विधानसभा की सबसे गम्भीर समस्या लगातार हो रहा पलायन है। स्थानीय लोगों के अनुसार रोजगार, उच्च शिक्षा और बेहतर स्वास्थ्य सुविधाओं के अभाव में युवा बाहर जाने को मजबूर हैं। पढ़ाई या नौकरी के लिए बाहर गए अधिकांश युवा वापस नहीं लौटते जिसके चलते पिछले 20-25 वर्षों में रानीखेत की जनसंख्या बढ़ने के बजाय लगातार घटती जा रही है। पलायन का सीधा असर स्थानीय व्यापार, बाजार और सामाजिक ढांचे पर पड़ा है। कई इलाकों में घर खाली हो चुके हैं और आर्थिक गतिविधियां कमजोर होती जा रही हैं।
स्कूल हैं, भविष्य नहीं
रानीखेत में केंद्रीय विद्यालय, आर्मी स्कूल और कुछ निजी स्कूल मौजूद हैं लेकिन उच्च और तकनीकी शिक्षा का भारी अभाव, बीबीए, बीसीए, बीटेक, एमबीए जैसे रोजगारपरक कोर्स उपलब्ध नहीं होना एक गम्भीर मुद्दा है। रानीखेत महाविद्यालय में भी तकनीकी शिक्षा की कोई ठोस व्यवस्था नहीं है। इसके चलते छात्रों को मजबूरी में हल्द्वानी, देहरादून या अन्य शहरों का रुख करना पड़ता है। स्थानीय लोगों का कहना है कि शिक्षा के अभाव में ही पलायन सबसे तेजी से बढ़ रहा है जो सबसे बड़ा चिंता का विषय है।
खेल और युवाओं के लिए सुविधाओं का अभाव
छात्र संघ पूर्व संयुक्त सचिव नीरज रावत कहते हैं कि ‘‘रानीखेत विधानसभा में सबसे बड़ी समस्या पलायन है। इसकी मुख्य वजह शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार की कमी है। यहां न तो रोजगारपरक प्रोफेशनल कोर्सेज मौजूद हैं और न ही कोई बड़ा या अच्छा मेडिकल काॅलेज। इसी कारण स्थानीय युवाओं को पढ़ाई के लिए बाहर जाना पड़ता है और वे वापस नहीं लौटते। यदि रानीखेत में अच्छे काॅलेज और कोर्स उपलब्ध होते तो न केवल यहां के छात्र यहीं पढ़ाई करते बल्कि बाहर से भी विद्यार्थी आते, जिससे स्थानीय अर्थव्यवस्था और व्यवसाय को बढ़ावा मिलता। चिलियानौला का आईटीआई सेंटर बंद होना युवाओं के लिए नुकसानदायक साबित हुआ है। विधायक के कार्यों को लेकर मेरी यह राय है कि पिछले पांच वर्षों में रानीखेत विधानसभा में ऐसे विकास कार्य दिखाई नहीं देते, जिनसे आम जनता को यह महसूस हो कि उनकी मूल समस्याओं का स्थायी समाधान हुआ है।
स्वच्छ भारत की हकीकत : गंदगी के ढेर, शौचालयों का अभाव
एक ओर केंद्र सरकार ‘स्वच्छ भारत मिशन’ के तहत देश को स्वच्छ बनाने का दावा कर रही है वहीं दूसरी तरफ रानीखेत विधानसभा क्षेत्र में जमीनी हकीकत इन दावों की पोल खोलती नजर आ रही है।
विधानसभा के अधिकांश क्षेत्रों में गंदगी, खुले में कूड़ा और सार्वजनिक शौचालयों की भारी कमी ने प्रशासन और जनप्रतिनिधियों की कार्यप्रणाली पर गम्भीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
विशेष रूप से खनिया क्षेत्र के रास्तों और किलघर वाले पूरे मार्ग में जगह-जगह कूड़े के ढेर दिखाई देते हैं। यह स्थिति न केवल स्थानीय लोगों के लिए परेशानी का कारण बन रही है बल्कि पर्यटक नगरी रानीखेत की छवि को भी धूमिल कर रही है। गौरतलब है कि रानीखेत कैंट एरिया में स्थित है जहां स्वच्छता के कड़े मानक होने चाहिए लेकिन यहां भी सफाई व्यवस्था बदहाल है। महिलाओं के लिए शौचालयों का न होना सबसे बड़ी समस्या है।
नशे का बढ़ता जाल
रानीखेत विधानसभा क्षेत्र में नशे का प्रभाव तेजी से बढ़ा है। मानकों के विपरीत कई स्थानों पर शराब की दुकानें खोली गई हैं, इनमें से कई अस्पतालों और संवेदनशील क्षेत्रों के पास हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि नशे के कारण युवा शारीरिक और मानसिक रूप से कमजोर हो रहे हैं और सेना जैसी सेवाओं के लिए अयोग्य बनते जा रहे हैं। जिससे पहाड़ी समाज का भविष्य खतरे में पड़ता जा रहा है। यह मुद्दा केवल स्थानीय नहीं बल्कि राज्य सरकार की नीति से जुड़ा प्रश्न है। नशे के बढ़ते कारोबार ने पहाड़ी समाज को गम्भीर नुकसान पहुंचाया है।
सर्दियों में भी पानी की किल्लत
रानीखेत और आस-पास के क्षेत्रों में पेयजल संकट लगातार गहराता जा रहा है। यहां तक कि शीतकाल में भी पानी की समस्या बनी रहती है। गनियादियोली क्षेत्र में तो पानी की इतनी किल्लत हो गई है कि वहां घरों में पानी टैंकर से मांग रहे हैं। रामगंगा पेयजल योजना आज भी अधर में लटकी हुई है। जबकि इसमें 90 प्रतिशत धनराशि केंद्र सरकार की है।
‘दि संडे पोस्ट’ ने कपीना जामड़ गांव की स्थिति का गहन अध्ययन किया। आज भी बुनियादी सुविधाओं से वंचित है। गांव निवासी चंदन किशोर बताते हैं कि ‘‘बचपन से लेकर आज तक गांव की स्थिति में कोई ठोस सुधार नहीं हो पाया।’’ ग्रामीणों के अनुसार, पूर्व विधायक करण सिंह महरा द्वारा सड़क निर्माण की पहल की गई थी लेकिन वर्षों से देखरेख के अभाव में वह सड़क अब खंडहर में तब्दील हो चुकी है। वर्तमान में हालत यह है कि गांव तक पहुंचना बेहद कठिन हो गया है। बुजुर्गों, महिलाओं और बीमार लोगों को भारी परेशानियों का सामना करना पड़ता है। गांव में सड़क के साथ-साथ जंगली जानवरों का आतंक भी गम्भीर समस्या बन चुका है। ग्रामीणों के अनुसार, जंगल में जंगली जानवरों की संख्या बढ़ गई है जो अब गांव की बाग-बगीचों और आबादी की ओर आने लगे हैं। कई बार जंगली जानवरों द्वारा मवेशियों को मारने की घटनाएं सामने आ चुकी हैं और लोगों पर हमले का भी डर बना रहता है।
शासन प्रशासन का अपराधियों को संरक्षण
भिकियासैंण के व्यापारी ख्यालीराम शर्मा कहते हैं कि ‘‘जमीनी स्तर पर हालात संतोषजनक नहीं हैं। सरकारी योजनाओं और कार्यों की बात तो बहुत होती है, उनका असर कहीं भी दिखाई नहीं देता। कागजों में योजनाएं चल रही हैं लेकिन धरातल पर उनका कोई प्रमाण नजर नहीं आता। जो लोग समाज के लिए ईमानदारी से काम करने की कोशिश करते हैं उन्हें भी उल्टा फंसाया जा रहा है। कोई गलत काम की ओर इशारा करता है तो उसके खिलाफ रिपोर्ट दर्ज कर दी जाती है। इस कारण समाज में डर का माहौल बना हुआ है और कोई खुलकर बोलने को तैयार नहीं है।’’
स्वास्थ्य सेवाओं पर चिंता जताते हुए शर्मा कहते हैं कि ‘‘अस्पताल की स्थिति बेहद खराब है। बार-बार आंदोलन होते हैं, फिर समझौते हो जाते हैं लेकिन हालात जस-के-तस बने रहते हैं। अस्पताल केवल रेफर सेंटर बनकर रह गया है।’’
आशियाना पार्क और शहरी अव्यवस्था
शहर के मुख्य बाजार से सटे बच्चों के लिए बने आशियाना पार्क की दीवार पिछले छह वर्षों से टूटी हुई है। न तो दीवार का निर्माण हुआ और न ही पार्क का सौंदर्यीकरण। स्थानीय लोगों का कहना है कि पार्क और आस-पास का क्षेत्र असुरक्षित होता जा रहा है। विश्व प्रसिद्ध पर्यटन नगरी होने के बावजूद रानीखेत में शहरी सौंदर्यीकरण और रखरखाव की कोई ठोस योजना नजर नहीं आती।
विकास कार्य जो नहीं हो पाए
रानीखेत में प्रस्तावित स्टेडियम आज भी लम्बित है। अस्पताल का उच्चीकरण लम्बित है तो नर्सिंग व मेडिकल ट्रेनिंग संस्थान नहीं खुल पाए हैं। आईटीआई, पॉलिटेक्निक और अन्य तकनीकी संस्थान या तो बंद हो गए या कमजोर हो गए। कई सरकारी विभाग और कार्यालय रानीखेत से स्थानांतरित कर दिए गए जिससे स्थानीय अर्थव्यवस्था को नुकसान हुआ। कई गांव आज भी सड़क से नहीं जुड़े हैं।
क्षेत्र पंचायत सदस्य दीपक करगेती बताते हैं ‘‘उत्तराखण्ड की सबसे पिछड़ी विधानसभा रानीखेत है, सड़कों में गड्ढे हों, स्वास्थ्य सेवाओं के बुरे हाल हों, घर-घर तक शराब पहुंचानी हो रानीखेत विधानसभा अव्वल है। यहां उद्यान निदेशालय है वहां निदेशक से लेकर बड़े अधिकारी कोई जिम्मेदारी से बैठकर अपना कार्य नहीं करते हैं। विधानसभा में भू-माफियों का दबदबा बढ़ता जा रहा है। सिनोडा के पास भिकियासैंण तक सड़क और पूरी जमीन पूर्ण रूप से तीन किलोमीटर तक धंसती जा रही है जिससे सिनोडा, पंतगांव , गैरगांव, धारड़ आदि गांवों में घरों में दरारें आ चुकी हैं।
विधायक ने जनता से वादा किया था कि वो क्षेत्र को शराब मुक्त करेंगे और पलायन रोकेंगे लेकिन चार साल से अधिक का समय हो गया। उन्होंने ने एक बार भी सदन में शराब बंदी की बात नहीं की। जिस ग्रामसभा दनपो में विधायक का नाम दर्ज है वहां के युवा भी पलायन की मार झेल रहे हैं। उनकी जन्मस्थली च्यूनी में तो 80 प्रतिशत पलायन हो गया। विधायक का कार्यकाल पूर्ण रूप से निराशाजनक और दिशाहीन रहा है।’’
कैंटोनमेंट बना विकास में बाधा
रानीखेत कैंट और सिविल क्षेत्र में बंटा हुआ है। कैंट क्षेत्र में म्यूटेशन न हो पाना, निर्माण कार्यों पर रोक और विकास सम्बंधी पाबंदियां लम्बे समय से लोगों की परेशानी बनी हुई हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि कैंट बोर्ड क्षेत्र के विकास में सबसे बड़ी बाधा है। कैंटोनमेंट क्षेत्र से जुड़ी पाबंदियों के कारण विकास कार्य ठप हैं, जिससे क्षेत्र का समग्र विकास प्रभावित हुआ है। जहां कैंट क्षेत्र में व्यवस्थाएं अपेक्षाकृत बेहतर हैं, वहीं सिविल क्षेत्र बुनियादी सुविधाओं के लिए जूझ रहा है। स्थानीय लोगों की मांग है कि रानीखेत को पूर्ण नगर पालिका का दर्जा दिया जाए, ताकि विकास को गति मिल सके।
रानीखेत विधानसभा में शौचालयों का अभाव
ग्राउंड रिपोर्टिंग में जनता ने साफ कहा कि सरकारें बदलीं लेकिन सड़क, स्वास्थ्य, शिक्षा और रोजगार जैसी मूल समस्याएं आज भी बनी हुई हैं। लोगों की अपेक्षा है कि रानीखेत को केवल पर्यटन स्थल नहीं बल्कि रहने और रोजगार योग्य शहर के रूप में विकसित किया जाए ताकि पलायन रूके और क्षेत्र का भविष्य सुरक्षित हो। रानीखेत को अब केवल आश्वासन नहीं, ठोस और दूरदर्शी विकास योजनाओं की जरूरत है। यदि शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और बुनियादी सुविधाओं पर गम्भीरता से काम नहीं हुआ तो पलायन और तेज होगा और यह ऐतिहासिक शहर धीरे-धीरे खाली होता जाएगा। क्षेत्र में न तो पर्याप्त उच्च शिक्षा संस्थान हैं और न ही कोई अच्छा मेडिकल या प्रोफेशनल काॅलेज। युवाओं के रोजगारपरक कोर्स उपलब्ध नहीं हैं। खेल एवं युवाओं के विकास के लिए भी रानीखेत में कोई समुचित स्टेडियम या ग्राउंड नहीं है। बच्चों और युवाओं के पास अपनी प्रतिभा निखारने के अवसर नहीं हैं, जिससे उनमें निराशा बढ़ रही है।
स्वास्थ्य सेवाओं की स्थिति भी भयावह है। रानीखेत का अस्पताल हो चाहे या भिकियासैंण का अस्पताल, व्यावहारिक रूप से केवल एक रेफर सेंटर बनकर रह गए हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि बाहरी लोग यहां जमीन खरीदकर रह रहे हैं जबकि मूल निवासी रोजगार और शिक्षा के अभाव में अपनी जमीन बेचने को मजबूर हैं। यदि स्थानीय स्तर पर अच्छे काॅलेज, रोजगार और व्यवसाय के अवसर होते तो लोग अपना क्षेत्र छोड़ने को विवश नहीं होते। पानी की समस्या, जंगली जानवरों और आवारा पशुओं के कारण सड़क दुर्घटनाएं, आईटीआई सेंटर (चिलियानौला) का बंद होना, ये सभी मुद्दे लम्बे समय से जनता को प्रभावित कर रहे हैं, लेकिन इनके समाधान के लिए ठोस कदम उठते नहीं दिखे।
वरिष्ठ पत्रकार और समाजसेवी डाॅ. रघुबीर पंत कहते हैं ‘‘उत्तराखण्ड में बीजेपी ने अच्छे बहुमत के साथ सत्ता सम्भाली थी लेकिन वह सफलता पूरी नहीं पा सकी। धामी सरकार की आलोचना हो रही है और इसका असर रानीखेत विधानसभा में भी दिखता है।’’
डाॅ. पंत के अनुसार रानीखेत विधानसभा में स्वास्थ्य, शिक्षा और सड़क जैसी बुनियादी सुविधाओं की कमी सबसे बड़ी समस्या है। स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी के लिए सरकार जिम्मेदार है। चैखुटिया में लोग डाॅक्टर की मांग कर रहे हैं, रानीखेत भिकियासैंण में स्पेशलिस्ट नहीं हैं। हाल ही में एक महिला पर पत्थर गिर गया, उसे फस्र्ट ऐड न मिलने की वजह से काशीपुर जाना पड़ा, वहां देरी होने के कारण मौत हो गई। सड़कें टूटी हैं, गड्ढे हैं, दुर्घटनाएं हो रही हैं। रोड सुधार प्राथमिकता से किया जाना चाहिए। विधायक अपने स्तर से विकास निधि से काम कर रहे हैं। बड़े काम जो राज्य या केंद्र से होने हैं, उनमें विलम्ब है।
भाजपा नेता और पूर्व ब्लाॅक प्रमुख ताड़ीखेत धन सिंह रावत का कहना है कि ‘‘वर्तमान में रानीखेत विधानसभा की स्थिति काफी चिंताजनक है। यदि विधानसभा स्तर पर देखा जाए तो अन्य विधानसभाओं की तुलना में यहां विकास कार्य काफी कम हुए हैं। जल जीवन मिशन के अंतर्गत रानीखेत ग्रामीण पम्पिंग योजना, बेड़ी पम्पिंग योजना, बासोट पम्पिंग योजना, नाली शेर पम्पिंग योजना और कोशी शेर पम्पिंग योजना जैसी योजनाएं पहले ही स्वीकृत थीं और इन पर ही कार्य जारी है। यहां की मूलभूत समस्याएं जस की तस बनी हुई हैं। मैं भी भारतीय जनता पार्टी का एक कार्यकर्ता हूं और हमारी केंद्र सरकार, प्रदेश की सरकार बहुत अच्छा काम कर रही है। हमारे विधायक लेकिन काम नहीं कर रहे हैं। उनका विकास कार्यों की ओर ध्यान नहीं है। जैसे हमारे रानीखेत में ताड़ीखेत अस्पताल है। अस्पताल की स्थिति बहुत खराब है।
शिक्षा और स्वास्थ्य क्षेत्र में पर्याप्त सुधार नहीं हुए हैं जिससे जनता को लगातार परेशानी हो रही है। रानीखेत में पलायन की समस्या गम्भीर है। युवाओं के लिए रोजगार के अवसर न्यूनतम हैं। यहां का पर्यटन क्षेत्र और मानस माला में चल रहे विकास कार्य भी निष्क्रिय स्थानीय नेतृत्व के कारण पूर्ण नहीं हो पाए, अगर प्रतिनिधि क्षेत्र की वास्तविक समस्याओं से अवगत और सक्रिय होता तो विकास की स्थिति बेहतर होती। आज हमारे रानीखेत का व्यापार बिल्कुल खत्म हो चुका है, समाप्ति की ओर है तो जिला बहुत महत्वपूर्ण है। पूर्व विधायक अजय भट्ट ने यहां कई स्कूल, इंटर काॅलेज और अस्पतालों का निर्माण कर क्षेत्रीय विकास में योगदान दिया। दुर्भाग्य से उसके बाद कोई ऐसा विधायक नहीं मिला जिसने रानीखेत का प्रतिनिधित्व और विकास सुनिश्चित किया। जो वर्तमान विधायक हैं, इन्होंने ‘पलायन रोको, पहाड़ बचाओ’ नारा दिया था और इनके विधायक बनने के बाद सबसे ज्यादा शराब की दुकानें आज हमारे रानीखेत विधानसभा में हैं। मैं मानता हूं कि अगर क्षेत्र को वास्तविक अनुभव और ज्ञान रखने वाले सक्रिय विधायक का प्रतिनिधित्व मिलता तो रानीखेत विधानसभा का विकास अधिक सुनिश्चित होता। वर्तमान स्थिति रानीखेत के लिए चिंताजनक है।’’
वरिष्ठ भाजपा नेता और धामी सरकार में दर्जा प्राप्त मंत्री कैलाश पंत का कहना है कि ‘‘पूरे प्रदेश में जितनी विधानसभाएं हैं, सब में भारतीय जनता पार्टी की स्थिति बहुत अच्छी है। निश्चित तौर पर 2027 में भारतीय जनता पार्टी यहां जीतेगी। कुछ हाॅस्पिटल में थोड़ी कमी के कारण अव्यवस्था चल रही है किंतु हमारी सरकार बड़ी गम्भीर है। निश्चित तौर पर जहां कमी है, उन्हें पूरा किया जाएगा। हमारी सरकार ने, हमारे प्रधानमंत्री जी ने संकल्प लिया कि ‘हर घर जल, हर घर नल’। हम इस पर काम कर रहे हैं। नई-नई चीजें सोच रहे हैं कि जल स्रोत बढ़ाएं, अधिक जल को दूसरी जगह भेजें। हमारी सरकार का विजन स्पष्ट है।’’
स्वतंत्रता संग्राम सेनानी स्वर्गीय मदन मोहन उपाध्याय के पुत्र हिमांशु उपाध्याय दुखी मन से कहते हैं कि ‘‘मेरे पिता एक स्वतंत्रता संग्राम सेनानी थे जिन्हें ‘कुमाऊं का सुभाष’ कहा जाता था। वे उत्तराखण्ड से गिरफ्तार होने वाले पहले स्वतंत्रता सेनानियों में शामिल थे और अंग्रेजी शासन के दौरान उन्हें कालापानी की सजा दी गई थी।
जेल से रिहा होने के बाद उन्होंने प्रजा सोशलिस्ट पार्टी के टिकट पर चुनाव लड़ा और कांग्रेस प्रत्याशी को पराजित कर इस क्षेत्र के प्रथम विधायक बने। वर्तमान समय में रानीखेत विधानसभा की स्थिति संतोषजनक नहीं है। इस विधानसभा को हमेशा द्वितीय या तृतीय श्रेणी की सीट के रूप में देखा गया जबकि यहां से सी.बी. गुप्ता, गोविंद सिंह माहरा और हरिशंकर जैसे बड़े नेताओं ने चुनाव लड़ा और उच्च पदों पर कार्य किया। इसके बावजूद रानीखेत के विकास पर कभी गम्भीर ध्यान नहीं दिया गया जो क्षेत्र के लिए दुर्भाग्यपूर्ण है। मैं 1991 से 1996 के बीच कैंटोनमेंट बोर्ड का सदस्य रहा हूं। उस समय रानीखेत की जनसंख्या लगभग 18 हजार थी जो अब घटकर लगभग 15 हजार रह गई है। यह जनसंख्या में गिरावट क्षेत्र में बढ़ते पलायन और विकास की कमी का स्पष्ट संकेत है। पिछले चार वर्षों से विधायक, राज्य सरकार और केंद्र सरकार तीनों ही एक ही राजनीतिक दल की हैं, इसके बावजूद क्षेत्र की जनता को बुनियादी सुविधाओं का लाभ नहीं मिल पा रहा है। ‘नशा हटाओ, रोजगार बढ़ाओ’ जैसे नारों के बावजूद क्षेत्र में शराब की दुकानों की संख्या बढ़ी है। ठेकों को लेकर दबाव, गुंडागर्दी और जमीन कब्जे जैसे आरोप समय-समय पर सामने आते रहे हैं।
मैं वर्तमान विधायक के कार्यकाल को सफल नहीं मानता। जब तक जनप्रतिनिधि जनता से सीधा संवाद स्थापित कर उनकी समस्याओं का समाधान नहीं करते, तब तक किसी भी कार्यकाल को सफल नहीं कहा जा सकता।’’
चिलियानौला नगर पालिका अध्यक्ष अरुण रावत के अनुसार ‘‘रानीखेत विधानसभा की सबसे बड़ी समस्या पलायन है जो पूरे उत्तराखण्ड में गम्भीर रूप ले चुकी है। रोजगार के पर्याप्त अवसर न होने के कारण लोग लगातार क्षेत्र छोड़ने को मजबूर हैं। स्वास्थ्य सुविधाएं पूरी तरह विफल साबित हो रही हैं। हाल ही में मुख्यमंत्री द्वारा की गई घोषणाएं केवल कागजों तक सीमित हैं। खेल मैदान के लिए तीन करोड़ रुपए की घोषणा की गई जबकि पहले से ही विभाग में तीन करोड़ रुपए शेष थे, इसके बावजूद आज तक मैदान में कोई कार्य शुरू नहीं हुआ। पूर्व में कांग्रेस सरकार के समय चिलियानौला को नगर पालिका का दर्जा मिला था और उस समय स्वास्थ्य व शिक्षा की स्थिति बेहतर थी। आज स्थिति यह है कि स्वास्थ्य, शिक्षा और रोजगार, तीनों क्षेत्रों में रानीखेत पिछड़ता जा रहा है। ड्रग फैक्ट्री बंद होने की कगार पर है, चौबटिया गार्डन की स्थिति दयनीय है और रोजगार के साधन लगातार समाप्त हो रहे हैं। सरकारी अस्पतालों में डॉक्टरों और संसाधनों की भारी कमी है। अल्ट्रासाउंड जैसी बुनियादी जांच की सुविधा सप्ताह में केवल एक-दो दिन उपलब्ध रहती है, वह भी कई बार महीनों तक बंद रहती है। दूर-दराज से आने वाली गर्भवती महिलाएं सुबह से शाम तक इंतजार कर बिना जांच कराए लौटने को मजबूर होती हैं। जब केंद्र, राज्य, सांसद और विधायक, सभी एक ही पार्टी के हैं, तब भी अगर शिक्षा, स्वास्थ्य और सड़क जैसी बुनियादी सुविधाओं पर काम नहीं हो रहा है तो इसकी पूरी जिम्मेदारी भाजपा सरकार की है।
मैं वर्तमान विधायक के कार्यकाल को सफल नहीं मानता। जब तक जनप्रतिनिधि जनता से सीधा संवाद स्थापित कर उनकी समस्याओं का समाधान नहीं करते, तब तक किसी भी कार्यकाल को सफल नहीं कहा जा सकता।’’
चिलियानौला नगर पालिका अध्यक्ष अरुण रावत के अनुसार ‘‘रानीखेत विधानसभा की सबसे बड़ी समस्या पलायन है जो पूरे उत्तराखण्ड में गम्भीर रूप ले चुकी है। रोजगार के पर्याप्त अवसर न होने के कारण लोग लगातार क्षेत्र छोड़ने को मजबूर हैं। स्वास्थ्य सुविधाएं पूरी तरह विफल साबित हो रही हैं। हाल ही में मुख्यमंत्री द्वारा की गई घोषणाएं केवल कागजों तक सीमित हैं। खेल मैदान के लिए तीन करोड़ रुपए की घोषणा की गई जबकि पहले से ही विभाग में तीन करोड़ रुपए शेष थे, इसके बावजूद आज तक मैदान में कोई कार्य शुरू नहीं हुआ। पूर्व में कांग्रेस सरकार के समय चिलियानौला को नगर पालिका का दर्जा मिला था और उस समय स्वास्थ्य व शिक्षा की स्थिति बेहतर थी। आज स्थिति यह है कि स्वास्थ्य, शिक्षा और रोजगार, तीनों क्षेत्रों में रानीखेत पिछड़ता जा रहा है। ड्रग फैक्ट्री बंद होने की कगार पर है, चौबटिया गार्डन की स्थिति दयनीय है और रोजगार के साधन लगातार समाप्त हो रहे हैं। सरकारी अस्पतालों में डॉक्टरों और संसाधनों की भारी कमी है। अल्ट्रासाउंड जैसी बुनियादी जांच की सुविधा सप्ताह में केवल एक-दो दिन उपलब्ध रहती है, वह भी कई बार महीनों तक बंद रहती है। दूर-दराज से आने वाली गर्भवती महिलाएं सुबह से शाम तक इंतजार कर बिना जांच कराए लौटने को मजबूर होती हैं। जब केंद्र, राज्य, सांसद और विधायक, सभी एक ही पार्टी के हैं, तब भी अगर शिक्षा, स्वास्थ्य और सड़क जैसी बुनियादी सुविधाओं पर काम नहीं हो रहा है तो इसकी पूरी जिम्मेदारी भाजपा सरकार की है।
रानीखेत विधानसभा में नशा, शराब की दुकानें और अवैध गतिविधियां लगातार बढ़ रही हैं जबकि स्कूल, अस्पताल और रोजगार के साधन घटते जा रहे हैं। मुख्यमंत्री का ‘गड्ढा मुक्त सड़क’ का नारा पूरी तरह विफल साबित हुआ है। विधानसभा की अधिकांश सड़कों की हालत खराब है और दुर्घटनाएं इन्हीं गड्ढों के कारण हो रही हैं। खराब सड़कों और जाम की समस्या के कारण पर्यटन भी प्रभावित हो रहा है। रानीखेत विधानसभा के वर्तमान विधायक अपने कार्यकाल में केवल घोषणाएं करते रहे हैं, जमीनी स्तर पर कोई ठोस काम नहीं हुआ।’’
नोट:- विधायक डाॅ. प्रमोद नैनवाल से कई बार सम्पर्क किया गया लेकिन ‘अति व्यस्तता’ के चलते वे ‘दि संडे पोस्ट’ प्रतिनिधि को साक्षात्कार हेतु समय नहीं दे पाए।
देखिए, रानीखेत विधानसभा में बहुत सारी दिक्कतें हैं। सबसे पहले तो कैंटोनमेंट को लेकर लोगों में परेशानी है क्योंकि म्यूटेशन की प्रॉब्लम है। लोग कंस्ट्रक्शन नहीं कर सकते। पाॅपुलेशन पिछले 20-25 साल में बढ़ने के बजाय घट रही है। डेवलपमेंट के सारे काम रुके हुए हैं, यही एक बड़ी प्राॅब्लम है। एजुकेशन का भी मुद्दा है। जो युवा पढ़ाई में अच्छे हैं, वे पढ़ाई पूरी होते ही बाहर चले जाते हैं और मैक्सिमम लोग वापस नहीं आते। इसी वजह से रानीखेत खाली हो रहा है और यही हमारे लिए सबसे बड़ा चिंता का विषय है।
अगर रानीखेत के अस्पतालों की बात करें तो वहां बहुत सारी दिक्कतें हैं। जिन स्पेशलिस्ट डॉक्टरों की जरूरत है, वे पूरे नहीं हैं। ब्लड बैंक में भी समस्याएं हैं। आज पूरे क्षेत्र में शराब का कारोबार बढ़ा है। जल संकट की बात करें तो रानीखेत और आस-पास के क्षेत्रों में पानी की समस्या लगातार रही है। मेरे कार्यकाल में ट्यूबवेल लगाए गए। रानीखेत अस्पताल में भी ट्यूबवेल लगाया गया। मैं पहला विधायक था जिसने गांवों में पंपिंग योजनाएं बनवाईं, कोठिया, डोर, सुकोली जैसे गांवों में। मनरेगा का पैसा लगाया गया। डीएम, ग्राम प्रधान, बीडीसी सदस्यों ने सहयोग किया। आज सवाल यह है कि पिछले चार-पांच सालों में नई सरकार ने कितनी नई योजनाएं बनाई हैं? आईटीआई, पॉलिटेक्निक, नवोदय विद्यालय, कई सरकारी विभाग रानीखेत से चले गए। इससे स्थानीय
रोजगार और अर्थव्यवस्था को नुकसान हुआ। वर्तमान विधायक के कार्यकाल पर मैं कोई टिप्पणी नहीं करूंगा। जनता ने उन्हें चुना है, जनता ही तय करेगी कि क्या सही हुआ और क्या नहीं।
करण माहरा, पूर्व विधायक
रानीखेत विधानसभा क्षेत्र में बीते वर्षों में कुछ विकास कार्य अवश्य हुए हैं लेकिन इन्हें व्यापक या संतोषजनक नहीं कहा जा सकता। यदि पिछले कार्यकालों की तुलना की जाए तो हालिया वर्षों में आंशिक विकास इसलिए भी देखने को मिला क्योंकि वर्ष 2022 के बाद राज्य सरकार, केंद्र सरकार और स्थानीय विधायक, तीनों एक ही दल से जुड़े रहे। इसके बावजूद, क्षेत्र की मूल और ऐतिहासिक समस्याएं आज भी जस की तस बनी हुई हैं। रानीखेत को जिला बनाए जाने की मांग पिछले पांच दशकों से लगातार उठती रही है। वर्ष 2011 में तत्कालीन भाजपा सरकार के दौरान तत्कालीन मुख्यमंत्री द्वारा इसकी घोषणा भी की गई थी। यह जिला अस्तित्व में नहीं आ सका। बीते छह वर्षों में सरकार के पास इसे लागू करने का अच्छा अवसर था लेकिन इस दिशा में कोई ठोस पहल नहीं हुई। जिला मुख्यालय न होने के कारण रानीखेत और आस-पास के क्षेत्रों में प्रशासनिक सुविधाओं, व्यापार और रोजगार पर सीधा असर पड़ा है। व्यापार लगातार गिर रहा है और स्थानीय व्यापारियों के अनुसार बीते छह वर्षों में लगभग 30 प्रतिशत तक व्यापार में गिरावट आई है। रानीखेत छावनी क्षेत्र से जुड़े कठोर भूमि और भवन नियमों के कारण आम नागरिकों के लिए यहां रहना कठिन होता जा रहा है। न तो भवन निर्माण की सहज अनुमति है और न ही भूमि सम्बंधी स्पष्टता। इसका सीधा परिणाम यह है कि लोग पलायन कर रहे हैं और रानीखेत की आबादी लगातार घट रही है। नगर पालिका क्षेत्र में छावनी के नागरिक इलाकों को शामिल किए जाने की मांग भी लम्बे समय से लम्बित है। केंद्र सरकार की ओर से पूर्व में इस पर सहमति के संकेत मिले थे लेकिन बाद में यह मुद्दा ठंडे बस्ते में चला गया। ‘स्मार्ट कैंट’ की अवधारणा आने के बाद नगर पालिका विस्तार की उम्मीदें भी लगभग समाप्त हो गई हैं।
रानीखेत में आज तक एक भी स्वतंत्र सिविल खेल मैदान नहीं है। सभी प्रमुख मैदान सेना के अधीन हैं जिससे स्थानीय खिलाड़ियों और युवाओं को भारी परेशानी का सामना करना पड़ता है। सड़कों की स्थिति चिंताजनक बनी हुई है। कई लिंक मार्ग वर्षों से क्षतिग्रस्त हैं और आपदाओं से टूटे मार्ग आज तक पूरी तरह बहाल नहीं हो पाए हैं। यदि रानीखेत को पर्यटन नगरी कहा जाता है तो पर्यटकों के लिए बुनियादी सुविधाओं और पर्यटन स्थलों का समुचित विकास भी अपेक्षित है जो अब तक नहीं हो पाया। ग्रामीण क्षेत्रों में जंगली जानवरों, गुलदार, बंदर और अब भालू की बढ़ती समस्या के कारण खेती लगभग असम्भव होती जा रही है। किसान खेती छोड़ने को मजबूर हैं और पलायन बढ़ रहा है।
रानीखेत का गोविंद सिंह राजकीय चिकित्सालय उप जिला चिकित्सालय का दर्जा प्राप्त होने के बावजूद आवश्यक सुविधाओं से वंचित है। वर्ष 2009 में ट्रामा सेंटर का शुभारम्भ किया गया था, लेकिन 15 वर्षों से अधिक समय बीतने के बावजूद वह आज तक संचालित नहीं हो पाया। न उपकरण आए और न ही विशेषज्ञ डॉक्टर नियुक्त हुए। सीटी स्कैन और डायलिसिस मशीनों की घोषणाएं भी अब तक धरातल पर नहीं उतर सकीं। विशेषज्ञ डाॅक्टरों की भारी कमी है और ग्रामीण क्षेत्रों में अल्ट्रासाउंड जैसी बुनियादी जांच के लिए लोगों को रानीखेत या निजी केंद्रों पर निर्भर रहना पड़ता है जिससे आर्थिक बोझ बढ़ता है। रानीखेत विधानसभा क्षेत्र में नशा एक गम्भीर सामाजिक समस्या बन चुका है। शराब की दुकानों की संख्या बढ़ी है और अवैध नशे के कारोबार को लेकर भी लगातार शिकायतें सामने आती रही हैं। नशा और अपराध का आपसी सम्बंध क्षेत्र में साफ देखा जा सकता है। चुनाव के दौरान ‘नशा रोको, पलायन रोको’ जैसे नारे लगाए गए लेकिन सत्ता में आने के बाद इस दिशा में ठोस कार्रवाई नहीं दिखी। वर्तमान विधायक का कार्यकाल औसत स्तर का रहा है। घोषणाएं बहुत हुई हैं लेकिन जमीनी स्तर पर कार्य अपेक्षित गति से नहीं हो पाए।
विमल सती, वरिष्ठ पत्रकार
क्र. क्षेत्र मुद्दा/जमीनी स्थिति अंक (10 में)
सड़क व सम्पर्क मार्ग कई ग्रामीण सड़कों की स्थिति खराब, कई गांव आज भी सड़क से नहीं जुड़े, कई मार्गों में गड्ढे और भूस्खलन की समस्या 4/10
स्वास्थ्य सेवाएं रानीखेत व भिकियासैंण अस्पताल व्यावहारिक रूप से रेफर सेंटर, विशेषज्ञ डाॅक्टरों व संसाधनों की कमी 3/10
उच्च व तकनीकी शिक्षा केंद्रीय विद्यालय व कुछ स्कूल मौजूद, पर बीबीए, बीसीए, बी.टेक, एमबीए जैसे रोजगारपरक कोर्स उपलब्ध नहीं 3/10
रोजगार व स्थानीय अर्थव्यवस्था पर्यटन के बावजूद स्थानीय व्यापार कमजोर, उद्योग व रोजगार के अवसर सीमित 3/10
पलायन नियंत्रण शिक्षा, स्वास्थ्य व रोजगार की कमी से युवाओं का पलायन लगातार जारी 2/10
खेल व युवा सुविधाएं प्रस्तावित स्टेडियम लम्बित, युवाओं के लिए पर्याप्त खेल मैदान व प्रशिक्षण सुविधाएं नहीं 3/10
पेयजल व्यवस्था कई क्षेत्रों में सर्दियों में भी पानी की किल्लत, रामगंगा पेयजल योजना अधर में 3/10
स्वच्छता व शहरी प्रबंधन कूड़े के ढेर, सार्वजनिक शौचालयों की कमी, पर्यटक शहर होने के बावजूद सफाई व्यवस्था कमजोर 3/10
नशा व सामाजिक समस्या शराब की दुकानों में बढ़ोतरी और युवाओं में नशे की समस्या को लेकर स्थानीय असंतोष 3/10
जनसम्पर्क व विकास पहल विकास कार्यों को लेकर जनता में असंतोष, कई घोषणाएं और परियोजनाएं लम्बित 3/10
औसत : 3/10 फाइनल ग्रेड : फेल
नोट:- विधायक डाॅ. प्रमोद नैनवाल से कई बार सम्पर्क किया गया लेकिन ‘अति व्यस्तता’ के चलते वे ‘दि संडे पोस्ट’ प्रतिनिधि को साक्षात्कार हेतु समय नहीं दे पाए।
बात अपनी-अपनी
‘पलायन सबसे बड़ी चिंता’
देखिए, रानीखेत विधानसभा में बहुत सारी दिक्कतें हैं। सबसे पहले तो कैंटोनमेंट को लेकर लोगों में परेशानी है क्योंकि म्यूटेशन की प्रॉब्लम है। लोग कंस्ट्रक्शन नहीं कर सकते। पाॅपुलेशन पिछले 20-25 साल में बढ़ने के बजाय घट रही है। डेवलपमेंट के सारे काम रुके हुए हैं, यही एक बड़ी प्राॅब्लम है। एजुकेशन का भी मुद्दा है। जो युवा पढ़ाई में अच्छे हैं, वे पढ़ाई पूरी होते ही बाहर चले जाते हैं और मैक्सिमम लोग वापस नहीं आते। इसी वजह से रानीखेत खाली हो रहा है और यही हमारे लिए सबसे बड़ा चिंता का विषय है।
अगर रानीखेत के अस्पतालों की बात करें तो वहां बहुत सारी दिक्कतें हैं। जिन स्पेशलिस्ट डॉक्टरों की जरूरत है, वे पूरे नहीं हैं। ब्लड बैंक में भी समस्याएं हैं। आज पूरे क्षेत्र में शराब का कारोबार बढ़ा है। जल संकट की बात करें तो रानीखेत और आस-पास के क्षेत्रों में पानी की समस्या लगातार रही है। मेरे कार्यकाल में ट्यूबवेल लगाए गए। रानीखेत अस्पताल में भी ट्यूबवेल लगाया गया। मैं पहला विधायक था जिसने गांवों में पंपिंग योजनाएं बनवाईं, कोठिया, डोर, सुकोली जैसे गांवों में। मनरेगा का पैसा लगाया गया। डीएम, ग्राम प्रधान, बीडीसी सदस्यों ने सहयोग किया। आज सवाल यह है कि पिछले चार-पांच सालों में नई सरकार ने कितनी नई योजनाएं बनाई हैं? आईटीआई, पॉलिटेक्निक, नवोदय विद्यालय, कई सरकारी विभाग रानीखेत से चले गए। इससे स्थानीय
रोजगार और अर्थव्यवस्था को नुकसान हुआ। वर्तमान विधायक के कार्यकाल पर मैं कोई टिप्पणी नहीं करूंगा। जनता ने उन्हें चुना है, जनता ही तय करेगी कि क्या सही हुआ और क्या नहीं।
करण माहरा, पूर्व विधायक
‘औसत स्तर का कार्यकाल’
रानीखेत विधानसभा क्षेत्र में बीते वर्षों में कुछ विकास कार्य अवश्य हुए हैं लेकिन इन्हें व्यापक या संतोषजनक नहीं कहा जा सकता। यदि पिछले कार्यकालों की तुलना की जाए तो हालिया वर्षों में आंशिक विकास इसलिए भी देखने को मिला क्योंकि वर्ष 2022 के बाद राज्य सरकार, केंद्र सरकार और स्थानीय विधायक, तीनों एक ही दल से जुड़े रहे। इसके बावजूद, क्षेत्र की मूल और ऐतिहासिक समस्याएं आज भी जस की तस बनी हुई हैं। रानीखेत को जिला बनाए जाने की मांग पिछले पांच दशकों से लगातार उठती रही है। वर्ष 2011 में तत्कालीन भाजपा सरकार के दौरान तत्कालीन मुख्यमंत्री द्वारा इसकी घोषणा भी की गई थी। यह जिला अस्तित्व में नहीं आ सका। बीते छह वर्षों में सरकार के पास इसे लागू करने का अच्छा अवसर था लेकिन इस दिशा में कोई ठोस पहल नहीं हुई। जिला मुख्यालय न होने के कारण रानीखेत और आस-पास के क्षेत्रों में प्रशासनिक सुविधाओं, व्यापार और रोजगार पर सीधा असर पड़ा है। व्यापार लगातार गिर रहा है और स्थानीय व्यापारियों के अनुसार बीते छह वर्षों में लगभग 30 प्रतिशत तक व्यापार में गिरावट आई है। रानीखेत छावनी क्षेत्र से जुड़े कठोर भूमि और भवन नियमों के कारण आम नागरिकों के लिए यहां रहना कठिन होता जा रहा है। न तो भवन निर्माण की सहज अनुमति है और न ही भूमि सम्बंधी स्पष्टता। इसका सीधा परिणाम यह है कि लोग पलायन कर रहे हैं और रानीखेत की आबादी लगातार घट रही है। नगर पालिका क्षेत्र में छावनी के नागरिक इलाकों को शामिल किए जाने की मांग भी लम्बे समय से लम्बित है। केंद्र सरकार की ओर से पूर्व में इस पर सहमति के संकेत मिले थे लेकिन बाद में यह मुद्दा ठंडे बस्ते में चला गया। ‘स्मार्ट कैंट’ की अवधारणा आने के बाद नगर पालिका विस्तार की उम्मीदें भी लगभग समाप्त हो गई हैं।
रानीखेत में आज तक एक भी स्वतंत्र सिविल खेल मैदान नहीं है। सभी प्रमुख मैदान सेना के अधीन हैं जिससे स्थानीय खिलाड़ियों और युवाओं को भारी परेशानी का सामना करना पड़ता है। सड़कों की स्थिति चिंताजनक बनी हुई है। कई लिंक मार्ग वर्षों से क्षतिग्रस्त हैं और आपदाओं से टूटे मार्ग आज तक पूरी तरह बहाल नहीं हो पाए हैं। यदि रानीखेत को पर्यटन नगरी कहा जाता है तो पर्यटकों के लिए बुनियादी सुविधाओं और पर्यटन स्थलों का समुचित विकास भी अपेक्षित है जो अब तक नहीं हो पाया। ग्रामीण क्षेत्रों में जंगली जानवरों, गुलदार, बंदर और अब भालू की बढ़ती समस्या के कारण खेती लगभग असम्भव होती जा रही है। किसान खेती छोड़ने को मजबूर हैं और पलायन बढ़ रहा है।
रानीखेत का गोविंद सिंह राजकीय चिकित्सालय उप जिला चिकित्सालय का दर्जा प्राप्त होने के बावजूद आवश्यक सुविधाओं से वंचित है। वर्ष 2009 में ट्रामा सेंटर का शुभारम्भ किया गया था, लेकिन 15 वर्षों से अधिक समय बीतने के बावजूद वह आज तक संचालित नहीं हो पाया। न उपकरण आए और न ही विशेषज्ञ डॉक्टर नियुक्त हुए। सीटी स्कैन और डायलिसिस मशीनों की घोषणाएं भी अब तक धरातल पर नहीं उतर सकीं। विशेषज्ञ डाॅक्टरों की भारी कमी है और ग्रामीण क्षेत्रों में अल्ट्रासाउंड जैसी बुनियादी जांच के लिए लोगों को रानीखेत या निजी केंद्रों पर निर्भर रहना पड़ता है जिससे आर्थिक बोझ बढ़ता है। रानीखेत विधानसभा क्षेत्र में नशा एक गम्भीर सामाजिक समस्या बन चुका है। शराब की दुकानों की संख्या बढ़ी है और अवैध नशे के कारोबार को लेकर भी लगातार शिकायतें सामने आती रही हैं। नशा और अपराध का आपसी सम्बंध क्षेत्र में साफ देखा जा सकता है। चुनाव के दौरान ‘नशा रोको, पलायन रोको’ जैसे नारे लगाए गए लेकिन सत्ता में आने के बाद इस दिशा में ठोस कार्रवाई नहीं दिखी। वर्तमान विधायक का कार्यकाल औसत स्तर का रहा है। घोषणाएं बहुत हुई हैं लेकिन जमीनी स्तर पर कार्य अपेक्षित गति से नहीं हो पाए।
विमल सती, वरिष्ठ पत्रकार
रानीखेत विधानसभा 2026 – विधायक रिपोर्ट कार्ड
विधायक : डाॅ. प्रमोद नैनवाल (अवधि : 4 वर्ष)
सड़क व सम्पर्क मार्ग कई ग्रामीण सड़कों की स्थिति खराब, कई गांव आज भी सड़क से नहीं जुड़े, कई मार्गों में गड्ढे और भूस्खलन की समस्या 4/10
स्वास्थ्य सेवाएं रानीखेत व भिकियासैंण अस्पताल व्यावहारिक रूप से रेफर सेंटर, विशेषज्ञ डाॅक्टरों व संसाधनों की कमी 3/10
उच्च व तकनीकी शिक्षा केंद्रीय विद्यालय व कुछ स्कूल मौजूद, पर बीबीए, बीसीए, बी.टेक, एमबीए जैसे रोजगारपरक कोर्स उपलब्ध नहीं 3/10
रोजगार व स्थानीय अर्थव्यवस्था पर्यटन के बावजूद स्थानीय व्यापार कमजोर, उद्योग व रोजगार के अवसर सीमित 3/10
पलायन नियंत्रण शिक्षा, स्वास्थ्य व रोजगार की कमी से युवाओं का पलायन लगातार जारी 2/10
खेल व युवा सुविधाएं प्रस्तावित स्टेडियम लम्बित, युवाओं के लिए पर्याप्त खेल मैदान व प्रशिक्षण सुविधाएं नहीं 3/10
पेयजल व्यवस्था कई क्षेत्रों में सर्दियों में भी पानी की किल्लत, रामगंगा पेयजल योजना अधर में 3/10
स्वच्छता व शहरी प्रबंधन कूड़े के ढेर, सार्वजनिक शौचालयों की कमी, पर्यटक शहर होने के बावजूद सफाई व्यवस्था कमजोर 3/10
नशा व सामाजिक समस्या शराब की दुकानों में बढ़ोतरी और युवाओं में नशे की समस्या को लेकर स्थानीय असंतोष 3/10
जनसम्पर्क व विकास पहल विकास कार्यों को लेकर जनता में असंतोष, कई घोषणाएं और परियोजनाएं लम्बित 3/10
औसत : 3/10 फाइनल ग्रेड : फेल
