उत्तराखण्ड की रामनगर विधानसभा सीट पर वर्ष 2022 के विधानसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी के उम्मीदवार दीवान सिंह बिष्ट ने जीत दर्ज की थी। इस चुनाव में उन्हें कुल 31,094 मत प्राप्त हुए जबकि उनके निकटतम प्रतिद्वंदी कांग्रेस के महेंद्र सिंह पाल को 26,349 मत मिले। यह जीत उनके राजनीतिक प्रभाव और रामनगर क्षेत्र में भाजपा की जमीनी पकड़ को साबित करती है। दीवान सिंह बिष्ट इस सीट से कुल तीन बार विधायक रह चुके हैं। उन्होंने पहली बार वर्ष 2007 में विजय हासिल की थी, 2012 का चुनाव कांग्रेस उम्मीदवार अमृता रावत ने जीता था। इसके बाद 2017 और 2022 में वे लगातार दूसरी बार जनता का समर्थन पाने में सफल रहे। लेकिन जनता उनसे खासी निराश है। उनके क्षेत्र में विकास की बातें तो बहुत हुई हैं मगर धरातल पर हुआ नजर नहीं आता है। हां विकास हुआ है तो नफरत का, अल्पसंख्यकों को धर्म के आधार पर टारगेट करने का और शहर की फिजा को खराब करने का। हमारी इस विधानसभा की विकास यात्रा का नतीजा विधायक दीवान सिंह बिष्ट को फेल घोषित करती है और आमजन की विधायक से नाराजगी भाजपा के लिए आने वाले चुनाव में खतरे की घंटी समान है
रामनगर विधानसभा क्षेत्र जो कभी विकास की मिसाल बनने का दावा करता था, आज बुनियादी सुविधाओं के लिए तरस रहा है। सड़क, स्वास्थ्य, शिक्षा, रोजगार और सुरक्षा जैसे बुनियादी सवाल आज भी यहां की जनता के सामने खड़े हैं। रामनगर विधानसभा क्षेत्र की ग्राउंड रिपोर्टिंग करने पर जनप्रतिनिधि के वायदों का सच सामने आया। रामनगर आज भी दो हिस्सों में बंटा है, एक तरफ चमकता कार्बेट, दूसरी ओर अंधेरे में डूबे गांव जहां वनग्रामों में लोग अब भी विस्थापन की लड़ाई लड़ रहे हैं, एनएच-309 मौत का मार्ग बना हुआ है, अस्पताल रेफर सेंटर में बदल चुका है, बढ़ते नशे ने युवाओं को खत्म कर दिया है, शहर तक में बिजली सुविधा पूरी तरह अव्यवस्थित है, शिक्षा स्तर जस का तस, बेरोजगारी भरपूर, भू-माफिया तंत्र जनता पर हावी और धुव्रीकरण की राजनीति जोर-शोर पर है। इस सबके बीच विधायक दीवान सिंह बिष्ट जवाबदेही से दूर चैन की नींद में सोए हुए हैं।
रामनगर के वन ग्राम सुंदरखाल के स्थानीय चंदन राम आर्या, जो वहां के ग्राम प्रधान भी हैं, बताते हैं कि ‘‘हमारे क्षेत्र में 500 परिवार और करीब 1800 वोटर हैं, लेकिन सरकार ने विकास के नाम पर एक ईंट तक नहीं लगाई। हमें केवल चुनावों में याद किया जाता है। हमें पंचायती अधिकार तक नहीं दिए गए। जैसे डिस्पोजेबल गिलास होता है, यूज एंड थ्रो, यूज एंड थ्रो करने का काम सरकार ने किया, चाहे वो कांग्रेस हो या बीजेपी, किसी ने भी हमारा भला नहीं किया। दीवान सिंह बिष्ट विधायक के लम्बे-लम्बे वादे थे जो पूरे नहीं हुए, इनके द्वारा कहा गया था कि हमें राजस्व गांव घोषित कराएंगे, बिजली देंगे, लेकिन कुछ नहीं हुआ, इतना ही नहीं हमें 2018 में अतिक्रमण के नाम पर यहां से हटाने के लिए नोटिस तक जारी करवा दिए गए थे। इस गांव में सब अनुसूचित जाति के लोग बसे हुए हैं। जब से बीजेपी सरकार आई है तब से हमें और ज्यादा दिक्कतें आ रही हैं। हमें गांव खाली करने को कहा गया। अभी हमारा यह गांव 2018 से कोर्ट स्टे पर है। कोसी नदी और आदमखोर जानवरों से खतरा है। न बिजली, न स्वास्थ्य, न स्कूल। गांव में आठवीं तक का एक ही विद्यालय है, जहां दो संविदा शिक्षक और बच्चों की भीड़ है।’’
ग्रामीण बताते हैं कि ‘‘उन्होंने अपनी क्षमता के अनुसार सौर ऊर्जा लगाकर बिजली की आपूर्ति की है। चुनावों के समय बराबर यहां सब आते हैं लेकिन गांव में जब घटना घटित हाती है तब मुश्किल से उन्हें यहां लाना पड़ता है, चुनावी समय पर सांसद अनिल बलूनी और उनकी पत्नी आए थे और बिजली दिलाने का वादा किया था लेकिन आज तक कुछ नहीं हुआ।’’
मालधन गांव यह रामनगर तहसील के अंतर्गत आता है यह क्षेत्र एशिया का सबसे बड़ा अनुसूचित बाहुल्य क्षेत्र है। मालधन शिवनाथपुर के निवासी गोपाल राम आर्या ने बताया कि ‘‘मैं जन्म से ही यही रहता हूं। यहां की सड़कों की हालात तब से जस के तस है, सड़कों पर हर जगह गड्ढे हैं, लोग चोटिल होते हैं, गिरते हैं और स्कूल के बच्चों को बड़ी दिक्कत होती है, बरसात में पानी आ जाता है, पानी भरने से और स्थिति खराब हो जाती है। बच्चे स्कूल नहीं जा पाते। इस बारे में हमने विधायक को करीबन 3 साल पहले पत्र लिखकर अवगत कराया गया लेकिन तब से लेकर अब तक कोई कार्यवाही नहीं हुई। हमें आश्वासन दिया गया है कि ‘‘पीडब्ल्यूडी द्वारा सड़क बनाई जाएगी लेकिन बनने और बन जाएगी में बहुत फर्क होता है। इसी के साथ-साथ यहां से डेढ़ किलोमीटर की दूरी पर पुरानी बस्ती क्षेत्र है जहां जल निगम वालों ने पाइप लाइन डालने के लिए कई साल पहले साइड से गड्ढे किए थे लेकिन अभी तक उन गड्ढों को भरा नहीं गया है, जिसके कारण कई लोग चोटिल होते रहते हैं। यहां रास्तों में बिजली नहीं है, शिक्षा का स्तर निम्न है, रोजगार नहीं है, स्वास्थ्य सुविधाएं पूरी नहीं हैं।’’
2009 से लेकर 2025 तक यह नाले कई जिंदगियां निगल चुके हैं। स्थानीय लोग इसे अब ‘डेथ पाॅइंट’ कहने लगे हैं। बजट और मंजूरी समय पर मिल जाने पर भी पुल निर्माण में देरी हुई। रामनगर से मोहान और रानीखेत जाने वाला यह मार्ग उत्तराखण्ड की अर्थव्यवस्था के लिए भी जरूरी है। यह मार्ग कुमाऊं और गढ़वाल को जोड़ने वाली जीवनरेखा है। जब यह मार्ग बंद होता है तो पूरे इलाके की रफ्तार थम जाती है, इसी मार्ग पर एक ढाबा संचालक कहते हैं कि ‘‘यहां मूलभूत सुविधाएं नहीं हैं, बिजली नहीं है, नदी से बचाव के लिए तटबंध नहीं, जंगल से मिलता क्षेत्र है और गाड़ियों का, पर्यटकों का आना-जाना रहता है, ऐसे में जंगली जानवरों का खतरा बना रहता है। बरसात में धनगढ़ी और पनोद नालों की वजह से हमें बहुत परेशानी होती है। एक्सीडेंट आए दिन होते रहते हैं जिसकी वजह से गाड़ियों का आना-जाना बंद, पर्यटक का आना बंद जिससे हमारी रोजी-रोटी की एक मात्र व्यवस्था ठप्प पड़ जाती है।’’
समाजसेवी व आरटीआई कार्यकर्ता अजीम खान का कहना है कि ‘‘धनगढ़ी और पनोद नाले के पुल का काम 15 साल से अटका है। हर साल एक्सीडेंट होते हैं, लोग मरते हैं। 2020 में 14 करोड़ का बजट मिलने के बावजूद पुल निर्माण में इतनी देरी। सरकार कहती है कि ‘‘हमारा इलाका नहीं, नेशनल हाइवे अथाॅरिटी पीडब्ल्यूडी कार्बेट पार्क का प्रशासन, सब एक-दूसरे पर टालते हैं। यह पुल गढ़वाल और कुमाऊं को जोड़ता है, लेकिन भ्रष्टाचार ने इसे भी रोक दिया।’’ उनका कहना है कि सड़क हादसों के पीछे सिर्फ तकनीकी देरी नहीं, बल्कि ‘भ्रष्टाचार और विभागीय टकराव’ मुख्य कारण हैं।
रामनगर से गुजरने वाला एनएच-309, जो कुमाऊं-गढ़वाल केंद्र को जोड़ने वाला जीवन मार्ग है, आज लोगों की मौत का रास्ता बन चुका है। ऑटो चालक मुनिराम कहते हैं कि एनएच-309 की स्थिति बहुत दयनीय है, जिस प्रकार से यहां पर गड्ढे हैं, हर बार यहां पर केवल पैचिंग कार्य कर छोड़ दिया जाता है। पैचिंग कुछ समय बाद टूट जाती है और फिर वहीं गड्ढे हो जाते हैं। एनएच के नाम पर रामनगर काशीपुर मार्ग एक धब्बा है, आए दिन यहां पर लोगों की जान जाती है, इसी रास्ते एम्बुलेशन गुजरती है मरीज के लिए खतरा होता है, सरकार हमसे नई गाड़ी पर टैक्स लेती है, पेट्रोल पर टैक्स लेती है, डीजल पर टैक्स लेती है, आरटीओ टैक्स लेते हैं, रोड टैक्स लेते हैं, टाॅल टैक्स लेते हैं, सारे तरीके के टैक्स भरने के बावजूद हमें सरकार गड्ढों से भरपूर सड़कें देती है। जवाबदेही के लिए कोई नहीं, कोई जनप्रतिनिधि नहीं, कोई सांसद नहीं, कोई विधायक नहीं, कोई अधिकारी नहीं, कोई भी अपनी जिम्मेदारी के प्रति जागरुक नहीं है।
अधिवक्ता एवं पत्रकार मयंक मैनाली का कहना है कि ‘‘ये नेशनल हाइवे सड़क दिल्ली से लेकर नई टिहरी तक को जोड़ती है। पूरे कुमाऊं और गढ़वाल का यातायात यहां से होकर गुजरता है। कई लोग मेडिकल इमर्जेंसी में यहां से गुजरते हैं, इसके बावजूद इस पूरी सड़क की स्थिति बहुत खराब है, हर जगह बड़े-बड़े गड्ढे हैं, हर बार महीनों में यहां सड़क पैचिंग होती है लेकिन एक दो महीने बाद सड़क का वही हाल हो जाता है। ये सिर्फ एनएच का मामला नहीं है, ये दो विधानसभा रामनगर और काशीपुर का मामला है और इसके अलावा दो संसदीय क्षेत्र, पौड़ी गढ़वाल लोकसभा सीट और नैनीताल लोकसभा सीट के सांसदों की भी ये जवाबदेही बनती है। पूरे उत्तराखण्ड के सांसद और विधायक सब इस रास्ते से गुजरते हैं, सभी इस सड़क की हालत से अवगत हैं लेकिन इसके बावजूद भी उनकी अनदेखी जारी है।
रामनगर में स्वास्थ्य सुविधाओं की स्थिति बेहद खराब है। गम्भीर मरीजों को हल्द्वानी या नैनीताल रेफर करना पड़ता है। वर्तमान विधायक का तीसरा कार्यकाल है लेकिन अस्पताल जस का तस है जबकि केंद्र और राज्य, दोनों जगह ही भाजपा की सरकार है।
सामाजिक कार्यकर्ता श्वेता माशीवाल कहती हैं कि ‘‘रामनगर अस्पताल को पीपीपी मोड से हटाए, पीपीपी मोड में लाए, इसी का खेला चल रहा है जबकि आज भी क्यूबेटर नहीं है, एक्सरे मशीन नहीं होती है, चार दिन पहले ही एक युवक की एक्सिडेंट से मौत हुई। शायद वो बच जाते अगर उनकी इंटरनल ब्लीडिंग का पता चल जाता, अस्पताल में ही समय पर जांच हो जाती। ऐसे कई हादसे हर महीने होते ही हैं, किसी भी प्रकार की इमरजेंसी के लिए यहां का अस्पताल अब तक तैयार नहीं है। अस्पताल मात्र रेफर सेंटर बनकर रह गया है।’’
भाजपा नेता नरेंद्र शर्मा का कहना है कि ‘‘आज आप रामनगर अस्पताल की हालत देखिए, सुविधा नहीं दी जा रही है, तभी तो जनता ने पीपीपी मोड का विरोध किया, लोगों से ये कहा जा रहा है कि वह अपने कर्मों की सजा भोग रहे हैं। सत्ता में बैठे लोग कह रहे हैं इस बात को, सिर्फ एक पीपीपी मोड के ठेकेदार को लाभ पहुंचाने के लिए। मुख्यमंत्री को इसे गम्भीरता से देखना चाहिए।’’
ईको सेंचुरी के नाम पर रामनगर का विकास पूर्ण रूप से रूका हुआ है। यहां नए उद्योग नहीं लगते हैं, रोजगार के अवसर न्यूनतम हैं जो हैं वे सिर्फ पर्यटन के क्षेत्र में हैं। पर्यटन जिस स्तर का यहां बढ़ना चाहिए था, बढ़ा नहीं, शिक्षा का स्तर जस का तस है, घरों में बिजली त्यौहारों पर भी गायब रहती है।
इन मुद्दों पर सामाजिक कार्यकर्ता श्वेता माशीवाल तंज कसते हुए कहती हैं ‘‘रामनगर दो भागों में बंटा हुआ है, एक अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त जिम काॅर्बेट नेशनल पार्क का एरिया, जो जंगल का एरिया है उसको स्पोर्ट करते हैं यहां के रिसाॅर्ट जो अंतरराष्ट्रीय मानकों पर खरे उतरे हैं, जहां विदेशी पर्यटक भी आते हैं। रामनगर शहर की व्यवस्थाएं जो लड़खड़ाए हुई है उसका एक भी रिफ्लेक्शन वहां पर नहीं दिखता है और दूसरा हमारा रामनगर विधानसभा क्षेत्र जिसमें नगर पालिका भी आती है, ग्रामीण भी आते हैं, जहां बिजली नहीं है, वैकल्पिक ऊर्जा से हम अपना काम चलाते हैं, यहां शिक्षा का आलम सबको पता है कि क्या है, सड़कें खस्ताहाल है, बेरोजगारी चरम पर है, जब बाहर से पर्यटक यहां आता है उनका भी यही कहना होता है कि सिवाय जंगल सफारी के यहां क्या है? आम शहरवासी के लिए कोई सुविधां नहीं, कुछ इंप्लाॅयमेंट नहीं। रामनगर हमारे कुमाऊं का प्रवेश द्वार हुआ करता था, सबसे बड़ी हाट होती थी, हजारों-करोड़ों के व्यवसायी यहां बैठे हैं, पूरे उत्तराखण्ड को यहां से चीजें सप्लाई होती हैं, लेकिन आज आप मार्केट की स्थिति देखिए, कड़वा सत्य यही है, जितने भी यहां रिसाॅर्ट आॅपरेट हो रहे हैं, जितनी भी प्राइवेट लिमिटेड हैं सब दिल्ली से आॅपरेटेड है। अभी-अभी अधमास चला है, सावन बीत गया, गणपति बीत गया, नवरात्रि बीत गई, यहां घरों में त्यौहार मनाने के लिए बिजली तक की व्यवस्था नहीं है। सनातन का नारा देने वाले विधायक जन अपेक्षाओं में शून्य नजर आते हैं।’’
समाजसेवी और आरटीआई कार्यकर्ता आजीम खान का कहना है कि ‘‘यहां पिछले 15 सालों से कोई ऐसा काम नहीं किया गया जिससे हमें लगता कि हमारे शहर का विकास हुआ, चाहे वो स्वास्थ्य व्यवस्था हो, चाहे सड़कों के मामले हो, चाहे सौंदर्यीकरण के मामले हो, 15 साल बहुत होते हैं, इसमें काफी विकास होना चाहिए था, सड़कों का हाल सही होना चाहिए था, बेरोजगारी की यहां काफी समस्या है, कोई नए काॅलेज नहीं खोले गए बच्चों के भविष्य के लिए, जिस तरीके का विकास होना चाहिए था वैसा कुछ नहीं हुआ है।’’
पूर्व भाजपा नेता नरेंद्र शर्मा कहते हैं कि ‘‘लोगों के रोजगार बढ़ाने के लिए क्या व्यवसाय है यहां? कुछ नहीं। लघु व्यवसाय है जो शहर के अंदर, जो रोज ठेला लगाते हैं, रोज अपना पैसा लगाते हंै मेहनत करते हैं धूप में उनके लिए एक वेंडर जोन तक नहीं बना आज तक, जहां वे एक जगह पर व्यवस्थित कर ठेला लगा सकें। रामनगर पर्यटक क्षेत्र है पार्किंग की क्या सुव्यवस्था है यहां? पार्किंग शुल्क के नाम पर लाखों रुपए अंदर करती है नगर पालिका। शिक्षा के लिए क्या योजनाएं आई हैं इतने सालों से कुछ नहीं? रामनगर में बच्चों के खेलने तक के लिए पार्क की कमी है, कभी आप बाजार में रात को निकलेंगे तो एक पोल से दूसरे पोल तक जाने के लिए बिजली तक नहीं होती, सिर्फ नाम के पोल लगे हैं, फोकस लाइट नहीं है उनमें, जिस वजह से न जाने कितने एक्सीडेंट होते रहते हैं शहर में।’’
‘दैनिक जागरण’ के पत्रकार प्रकाश भट्ट का कहना है कि ‘‘मेरी उम्र 53 साल है, मैं बचपन से ही यहां रहता हूं। रामनगर में कोई भी चीज अपनी जगह पर सुव्यवस्थित नहीं है, न यहां स्वास्थ्य सुविधा सही है, न सफाई व्यवस्था। जगह-जगह कूड़ा पड़ा मिलेगा। स्ट्रीट लाइट नहीं है बस नाम के पोल खड़े किए गए हैं। सड़कें सही नहीं हैं। जगह-जगह अवैध काॅलोनियां हैं। जनता बहुत परेशान है पर किस से कहें? विधायक दीवान सिंह बिष्ट सुनते हीं नहीं। ऐसा भी नहीं कि वे फील्ड पर आते नहीं हैं लेकिन चाटुकारों से घिरे रहते हैं, सब समस्या से अवगत भी हैं, फिर भी पता नहीं क्यों काम नहीं करते हैं? जबकि उन्हें तीसरी बार मौका मिला है, 15 साल बहुत होते हैं किसी भी क्षेत्र के विकास के लिए वो भी केंद्र सरकार उनकी, राज्य सरकार उनकी, इसके बावजूद शहर में सुविधापूर्ण अस्पताल नहीं, शिक्षा के लिए कोई बड़ा काॅलेज नहीं, एक पाॅलीटेक्निक है लेकिन वहां शिक्षक नहीं हैं, बच्चों के लिए ट्रेड नहीं है, रोजगार नहीं। पूरी तरह फ्लाॅप कार्यकाल है उनका।’’
रामनगर में नशे का खतरा चरम सीमा पर आ पहुंचा है, युवा पूरी तरह से नशे में डूब चुके हैं और पुलिस-प्रशासन सिर्फ मूकदर्शक बनकर रह गया है। जनता का कहना है कि नशे के बारे में पुलिस और प्रशासन को सब कुछ पता है, पुलिस द्वारा छापे तो मारे जाते हैं लेकिन छापों से पहले ही जानकारी नशा तस्करों तक पहुंचा दी जाती है, जिससे कभी कोई पकड़ा नहीं जाता। जनता का यह भी कहना है कि इसमें हमारे सफेदपोश नेताओं का भी पूरी तरह से हाथ है।
इस विधानसभा में ग्राउंड रिपोर्टिंग करते समय महाभ्रष्टाचार और भू-माफियाओं के बढ़ते बोलबाले के मामले सामने आए। आमपोखरा क्षेत्र में 50 वर्षों से रह रहे एक गरीब परिवार के घर (झोपड़ी) पर भू-माफियों ने 11 अक्टूबर 2025 को दोपहर आग लगा दी, परिवार की औरतों के साथ हाथापाई हुई जिसके चलते विकास नामक व्यक्ति को सिर पर चोट भी आई। आग जिन व्यक्तियों ने लगाई उनके नाम चंदन और विकास है, इन पर पहले भी कई एफआईआर दर्ज हैं लेकिन इसके बावजूद वे खुलेआम घूम रहे हैं। पुलिस-प्रशासन मौका-ए-वारदात पर पहुंची थी, पीड़ित परिवार द्वारा सब बताने पर भी न उनका बयान दर्ज किया गया और न ही कोई कार्यवाही की गई।
आजीम खान रामनगर में बढ़ते भू-माफिया और भ्रष्टाचार पर बताते हैं कि ‘‘यहां भू-माफिया, वन-माफिया और बिल्डर माफिया का गठजोड़ है। मैं 2002 से फलपट्टी क्षेत्र की जमीन बचाने के लिए लड़ रहा हूं। अवैध काॅलोनियां खड़ी हो चुकी हैं। जहां पर रोक थी, वहीं पर निर्माण हुआ। यहां एक अजीब सा माहौल पैदा हो गया है जैसे भू-माफिया, वन माफिया या बिल्डर माफिया द्वारा यहां जो भी कार्य किए जाते हैं उन्हें कोई नहीं रोकता। यदि हम कोशिश करते हैं तो हमें सच्चाई की कीमत चुकानी पड़ती है। भू-माफियों से मिलकर जिला विकास प्राधिकरण ने मेरा घर तक सील कर दिया है। मेरे घर पर दो बार हमला हुआ, पुलिस और प्रशासन मूकदर्शक बने रहे हैं।’’
विधायक दीवान सिंह बिष्ट दावा तो प्रधानमंत्री मोदी के विजन पर चलने का करते हैं, लेकिन विकास की एक बूंद भी रामनगर में नहीं गिरी। अस्पताल, शिक्षा, नशा, सड़कों, हर मुद्दे पर वे चुप हैं। ध्रुवीकरण ही अब रामनगर की नई राजनीति बन गई है। श्वेता माशीवाल कहती हैं कि ‘‘हमारे क्षेत्र में साम्प्रदायिकता नया फ्लेवर है। 2014 से ही ये शुरू हुआ है, चाहे पहले रामलीला पाठ की ही बात हो, पहले बहुत शांति से लोग रहते थे, अब छोटी-छोटी चीजों पर भी एक डर का माहौल बना दिया गया है।’’
अजीम खान का कहना है कि ‘‘अस्पताल की व्यवस्था आप जानते ही हैं, राजनीति की जद्दोजहद में वहां कोई कार्य नहीं हुआ, ये स्थिति है शहर की। यहां सब अपनी-अपनी राजनीति चलाते हैं। गुट बटे हुए हैं राजनीति के और यह गुटबाजी से किसी भी शहर का कोई विकास नहीं होता, चाहे वो भारतीय जनता पार्टी के हों, चाहे कांग्रेस के हों।’’
नरेंद्र शर्मा का कहना है कि ‘‘जब से उत्तराखण्ड राज्य बना, तब से अब तक रामनगर का विकास किसी स्तर पर पहुंचा ही नहीं है। इसके लिए अगर मैं आज तक जितने जनप्रतिनिधि यहां आए उनको दोषी मानता हूं। ये तो रामनगर की जनता भी अच्छे से जानती है कि रामनगर के विधायक और यहां के नगर पालिका अध्यक्ष आपस में मित्रता का मैच खेलते रहते हैं और एक-दूसरे से सांठ-गांठ करते हैं। यही वजह है कि रामनगर में न तो विधायक बदल रहे हैं न ही चेयरमैन।
नोट: इस सम्बंध में स्थानीय विधायक दीवान सिंह बिष्ट से बातचीत करनी चाही लेकिन बार-बार सम्पर्क करने पर भी वे उपलब्ध नहीं हुए।
रामनगर में सब बढ़िया चल रहा है। जो नया क्षेत्र जुड़ा था उसमें भी बहुत काम कर दिए है बिजली सब पूरी कर दी, सड़कों का काम सब चल रहा है, विधायक हमारे बहुत बढ़िया है, काम कराते है और सब बढ़िया चल रहा है। अमन चैन है शहर में विधायक का कार्यकाल सफल है।
हाजी अकरम, अध्यक्ष नगर पालिका, रामनगर
रामनगर विधानसभा की जमीनी स्थिति की पड़ताल करने पर साफ दिखता है कि विकास के दावों और जनता की वास्तविक परिस्थितियों के बीच गहरी खाई है। वनग्राम, सड़कें, एनएच-309, स्वास्थ्य, रोजगार, बिजली, शिक्षा, नशा, भू-माफिया, हर मोर्चे पर व्यापक असंतोष है। लोग साफ कहते हैं ‘‘15 साल बहुत होते हैं, पर विकास कहीं नहीं दिखता।’’
क्र. क्षेत्र जमीनी स्थिति अंक (10 में) टिप्पणी
1. वनग्राम/राजस्व गांव का दर्जा 24 में से 21 वनग्राम अभी भी लटके, सुंदरखाल 2018 से कोर्ट-स्टे, कोई समाधान नहीं 1/10 शासन-प्रशासन की पूरी विफलता
2. सड़कें/धनगढ़ी-पनोद नाला पुल 15 साल से अधूरा पुल, हर साल मौतें, एनएच-पीडब्ल्यूडी-कार्बेट टकराव जारी 0.5/10 सबसे निचला प्रदर्शन
3. एनएच-309 (रामनगर-काशीपुर) ‘डेथ रोड’, बड़े गड्ढे, हर महीने एक्सीडेंट, कोई स्थायी समाधान नहीं 1/10 जनता के लिए सबसे खतरनाक मुद्दा
4. स्वास्थ्य व्यवस्था अस्पताल ‘रेफर सेंटर’, क्यूबेटर नहीं, एक्स-रे नहीं, 15 साल में कोई सुधार नहीं 1.5/10 गम्भीर लापरवाही
5. बिजली/बुनियादी सुविधाएं त्यौहारों पर भी बिजली नहीं, पोल हैं पर लाइट नहीं, जल निगम के गड्ढे सालों से खुले 2/10 बुनियादी काम भी नहीं
6. रोजगार/युवाओं की हालत उद्योग नहीं, पर्यटन का लाभ बाहरी कम्पनियों को, युवा बेरोजगार, नशे की चपेट 1.5/10 भविष्य सबसे जोखिम में
7. शिक्षा काॅलेज नहीं, पाॅलीटेक्निक में शिक्षक नहीं, स्कूलों में सुधार नगण्य 2/10 15 साल में अपेक्षित शून्य
8. नशे पर नियंत्रण रामनगर नशे का हाॅट स्पाॅट, पुलिस-प्रशासन मूकदर्शक 0.5/10 सुरक्षा-सामाजिक विफलता
9. भू-माफिया/भ्रष्टाचार भू-माफिया, वन-माफिया, बिल्डर माफिया सक्रिय, गरीबों पर अत्याचार 1/10 शासन-प्रशासन में सड़ांध
10. जनसम्पर्क/जवाबदेही जनता कहती है ‘विधायक सुनते नहीं, चैतरफा अनदेखी’ 2/10 जनता का भरोसा टूट चुका
कुल औसत: 1.2/10 फाइनल ग्रेड: फेल
- गौरव मंदोलिया
- दशकों बाद भी नहीं लग सके उद्योग, वीरान पड़ी औद्यौगिक घाटी।
- तकरीबन हजार हेक्टेयर से अधिक भूमि पडी वीरान।
गौरतलब है कि वर्ष 1973-74 में केंद्र सरकार द्वारा रामनगर के अल्मोड़ा जिले से लगती सीमा पर मोहान में सरकार ने लगभग 86 एकड़ भूमि पर उद्योगों को स्वीकृति प्रदान की थी। जिसमें केंद्र सरकार की आईएमपीसीएल दवा फैक्ट्री सहित तकरीबन 150 के लगभग छोटे-बडे़ उद्योगों को विकसित करने की योजना बनाई गई थी। लेकिन यहां उद्योग लगाने वाले उद्यमी बताते हैं कि सागौन के वृक्षों से घिरे इस इलाके में पेड़ काटने की अनुमति नहीं मिल पाने से अधिकांश उद्योग पलायन कर गए, वहीं उद्यमियों को वायदे के अनुरूप कोई सुविधाएं भी प्रदान नहीं की गई। अब यहां स्थापित केंद्र सरकार की राज्य की सबसे बड़ी दवा फैक्ट्री आईएमपीसीएल को भी निजी हाथों में सौंपने की तैयारी कर ली गई है। मोहान की तरह ही रामनगर-हल्द्वानी मार्ग पर रामनगर से तकरीबन चार किलोमीटर दूर छोई में स्थित लगभग 80 हेक्टेयर भूमि पर सरकार ने उद्योग विकसित करने की योजना बनाई थी। जिसका प्रस्ताव भी भेजा गया था। लेकिन राजनीतिक उठापठक के बीच इस स्थान पर बाद में शहतूत का फाॅर्म विकसित करने की योजना बनाई गई। अंततः यह भूमि उद्यान विभाग को हस्तांतरित कर दी गई। सूबे की पर्यटन मंत्री और रामनगर विधायक रहीं अमृता रावत ने ट्यूलिप गार्डन विकसित करने की बात कही जिसके बाद उद्योगों का प्रस्ताव ही ठंडे बस्ते में चला गया। रामनगर में उद्योगों को स्थापित करने को लेकर सरकारी काहिली की कहानी यहीं समाप्त नहीं होती। इसकी बानगी रामनगर के कानिया स्थित इंडस्ट्रियल एरिया बयां करता नजर आता है।
अविभाजित उत्तर प्रदेश का हिस्सा रहते रामनगर में पर्वतीय विकास योजना के तहत यहां वर्ष 1989-90 में कानिया गांव में पांच एकड़ के लगभग खाली भूमि पर तत्कालीन मुख्यमंत्री एनडी तिवारी ने इंडस्ट्रियल एरिया स्थापित करने की घोषणा की। जिसे वर्ष 1990 में पूरी तरह तैयार कर लिया गया। तिवारी सरकार ने इसमें उद्योगों को 20 ब्लाॅक में स्थापित करने की योजना तैयार की थी। सरकार इसे मिनी इंडस्ट्रियल योजना के तहत विकसित करना चाहती थी। इसके पीछे मंशा कानिया में भारत सरकार के श्रम और लघु उद्योग द्वारा संचालित संस्थान ईएसटीसी के छात्रों को प्रशिक्षण, रोजगार और स्थानीय कामगारों के समक्ष रोजगार के साधन मुहैया करवाना था। यहां उद्योग स्थापित करने के लिए दिल्ली से भी उद्यमियों को आमंत्रित किया गया। प्रारम्भिक तौर पर इसमें कुल चार उद्योग लगे, जिनमें सीआरटी, पैंगव्यू, फाइनट्रैक्स, विबग्योर प्रिंटर्स प्रमुख थे। तत्कालीन सरकारों के प्रयासों से कानिया के इस इंडस्ट्रियल एरिया मेें कुछ प्लाईबोर्ड और इलेक्ट्रिकल से जुड़ी कम्पनियों ने भी रूख किया। इस बीच सरकार ने यहां उद्योग स्थापित करने वाले उद्यमियों को बिजली, पानी, सड़क जैसी मूलभूत सुविधाओं के साथ ही सब्सिडी और 90 साल की लीज देने की बात कहते हुए बाद में उद्योगों की भूमि उद्यमियों को ही उपलब्ध करवाने की बात भी कही। लेकिन सरकार के वायदे महज सरकारी घोषणाओं और फाइलों में ही सिमट गए। इसी तरह सरकार ने अविभाजित उत्तर प्रदेश का हिस्सा रहते दशकों पूर्व रामनगर के चिल्किया और हल्दुआ में भी औद्यौगिक क्षेत्र विकसित करने का प्रस्ताव बनाया था। लेकिन इन क्षेत्रों में भी एक दो लघु उद्योगों प्लाईबोर्ड और इलेक्ट्रोनिक क्षेत्र की लघु कम्पनियों के लगने के अलावा विकास की गति उद्योग नहीं पकड़ सके। इतने औद्यौगिक क्षेत्रों की असफलता के बाद भी सरकार ने रामनगर-काशीपुर मार्ग पर हेमपुर डिपों के निकट वर्ष 1987 में उत्तर प्रदेश के समय में हेमपुर डिपो में 803 एकड़ भूमि यूएसआईडीसी को पेपर फैक्ट्री लगाने के लिए दी गई थी। लेकिन इस पर पेपर उद्योग का कारोबार शुरू नहीं हुआ। ‘नेपा’ को दी गई यह भूमि बाद में उत्तराखण्ड के सीएम रहते विजय बहुगुणा ने भारी जनदवाब के बाद केंद्र सरकार से वापस मांगने की गुहार लगाई जिसमें उन्होंने केंद्र सरकार को यह भी लिखा कि यह भूमि राज्य में कृषि भूमि के तौर पर दर्ज है। लेकिन इस भूमि का न तो कोई उपयोग हुआ और न ही इस भूमि का लैंड यूज बदला गया।
सरकारी घोषणाओं में हवाई साबित होते रामनगर के औद्योगिक क्षेत्रों में एक नया ‘मील का पत्थर’ उस समय और जुड़ गया जब हरीश रावत सरकार में औद्योगिक सलाहकार रहते रणजीत सिंह रावत ने रामनगर केे मोहान से कुछ ही दूरी पर वर्ष 2015 में मरचूला के कूपी नामक स्थान पर पीतल उद्योग लगाने की घोषणा करते हुए इसका शिलान्यास भी करवा दिया। लेकिन सरकार बदलने के साथ ही यह क्षेत्र अभी तक शिलान्यास से औद्योगिक क्षेत्र में तब्दील होने की राह देख रहा है। रामनगर के कुमाऊं और गढ़वाल का प्रवेश द्वार होने के साथ ही मैदानी क्षेत्रों से जुड़ाव होने के चलते यह एक बड़ा औद्यौगिक क्षेत्र बन सकता था। यह स्थान पर्यटन के साथ ही मसाले, लकड़ियों, अगरबत्ती, तम्बाकू उद्योग, प्लाईबोर्ड, औद्योनिकी, फूड प्रोसेसिंग के कच्चे माल की उपलब्धता से प्रचुर क्षेत्र है। ऐसे में यहां इस तरह के उद्योग विकसित किए जा सकते थे। लेकिन यहां स्थापित जिन औद्योगिक क्षेत्रों में उद्यमी आए भी तो यहां उद्योग लगाने वाले उन कारोबारियों को न तो बिजली, पानी जैसी मूलभूत सुविधा मिल सकी और न ही उत्पादन और विपणन में कोई राहत। नतीजतन यहां उद्योग स्थापित करने वाले उद्यमी पलायन करने लगे। उत्तराखण्ड राज्य गठन के साथ ही एक बार फिर से लगा कि शायद अब अपने राज्य में स्थापित इंडस्ट्रियल एरिया के दिन बहुर जाएंगे। लेकिन नीति नियंताओं की निगाह फिर भी रामनगर के घोषित इंडस्ट्रियल क्षेत्रों पर नहीं पड़ सकी। इस बीच यहां उद्योगों को स्थापित करने वाले अविभाजित यूपी के सीएम तिवारी उत्तराखण्ड के भी सीएम बने। खास बात यह है कि उत्तराखण्ड के सीएम रहते तिवारी रामनगर विधानसभा से ही विधायक भी रहे। लेकिन उनके कार्यकाल में भी रामनगर की इस औद्यौगिक घाटी को कोई संजीवनी नहीं मिल सकी। वर्तमान में यहां इलेक्ट्रिक कम्पोनेंट (उपकरण) बनाने वाली और प्लाईबोर्ड और मसाले जैसे कुटीर उद्योगों से जुड़ी कुछ ही कम्पनी मौजूद हैं जिसकी स्थिति भी बहुत बेहतर नहीं है। कम्पनी संचालकों का कहना है कि सरकारी उपेक्षाओं से खिन्न होकर उन्होंनें अपने प्रयासों से मूलभूत संसाधन यहां स्थापित किए हैं। करोड़ों की बेशकीमती सरकारी जमीन पर कुछ पुराने उद्योगों के लगभग उखड़ने के कगार पर खड़े साइन बोर्ड अब सरकार के इस प्रस्तावित औद्योगिक क्षेत्र को मुंह चिढ़ाते नजर आते हैं।
रामनगर शहर रेल, सड़क सभी मार्गों से जहां राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली से जुड़ा हुआ है, वहीं इसकी कनेक्टिबिटी पर्वतीय क्षेत्रों सहित अन्य मार्गों से भी बेहतर तरीके से जुड़ी हुई है। इसके अतिरिक्त यहां भारत सरकार का प्रशिक्षण संस्थान ईएसटीसी, राज्य सरकार का आईटीआई, पाॅलीटेक्निक आदि संस्थान संचालित हैं जिससे यहां प्रशिक्षित कामगारों की भी कमी नहीं है। बेरोजगारी और काम की तलाश में पलायन का दंश झेलते रामनगर में कामगारों का भी संकट नहीं है, ऐसे में यह क्षेत्र एक बेहतर इंडस्ट्रियल क्षेत्र के तौर पर विकसित हो सकता है।

