कांग्रेस के पुराने कार्यकर्ता आज भी मानते हैं कि अगर कोई व्यक्ति संगठन को एकजुट कर सकता है तो वह हरीश रावत ही हैं, लेकिन वे यह भी कहते हैं कि अब उन्हें खुद को ‘विवाद का कारण’ नहीं, बल्कि ‘समाधान का माध्यम’ बनना होगा क्योंकि जनता के सामने सवाल यह नहीं है कि हरीश रावत का अगला कदम क्या होगा बल्कि यह है कि कांग्रेस अब आगे कैसे बढ़ेगी? भाजपा की मजबूत जड़ें, संगठनात्मक अनुशासन और लगातार प्रचार के बीच कांग्रेस के लिए सबसे बड़ी चुनौती अपने ही भीतर विश्वास बहाल करने की है। हरीश रावत ने भले ही नया विमर्श छेड़ दिया हो लेकिन इससे संगठन की दिशा और धुंधली हो गई है। राजनीतिक पर्यवेक्षक मानते हैं कि अगर कांग्रेस को 2027 में कोई सम्भावना तलाशनी है तो उसे हरीश रावत, करण माहरा, रंजीत रावत, प्रीतम सिंह और गणेश गोदियाल इन सभी को एक मंच पर लाना ही होगा लेकिन मौजूदा हालात यह बताते हैं कि ऐसा फिलहाल असम्भव दिखता है। कांग्रेस इस समय ऐसे चैराहे पर खड़ी है जहां हर राह किसी न किसी गुट की ओर जाती है, लेकिन कोई भी राह जनता की तरफ नहीं मुड़ती। यही उसकी असली विडम्बना है
उत्तराखंड की राजनीति में इस बार दीपावली सिर्फ रोशनी नहीं, बल्कि गहरी सियासी सरगर्मी लेकर आई। कांग्रेस जो पहले ही भीतर से टूटन और गुटबाजी की गिरफ्त में है, अब अपने वरिष्ठतम नेता और पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत की एक फेसबुक पोस्ट से और गहरी राजनीतिक उलझन में फंसती नजर आ रही है। यह वही पार्टी है जिसकी राज्य गठन के बाद से पहली निर्वाचित सरकार बनी थी और 2012 में एक बार फिर से उसे सरकार बनाने का मौका जनता ने दिया था लेकिन आज स्थिति यह है कि संगठन के भीतर हर बड़ा नेता अलग दिशा में काम कर रहा है और एक-दूसरे पर संदेह की रेखाएं खींची हुई हैं।
मुझे लगता है कि इसे कांग्रेस का एक परम्परागत राजनीतिक एरोगेंस कहें या वह किसी बड़ी भूल की स्थिति में है कि उसके कुछ बड़े नेता एक रणनीति के तहत यह सब कर रहे हैं। जो दल उत्तराखण्ड में सीधे परम्परागत रूप से भाजपा का प्रतिद्वंदी दल भी है, उस दल के नेता इस तरह का आचरण करते आ रहे हैं। 2014 की बात से ही समझिए उस वक्त तो काग्रेस की ही सरकार थी।
पाॅलिटिक्स का मतलब है कि आप अपने कितने लोगों को लड़ा पा रहे हो और कितने लोगों को जीता के ला पा रहे हो और जो कल को मुख्यमंत्री की रेस में आपका प्रतिद्वंदी हो सकता है, उसे कितने लोग हरवा रहे हों। हो सकता है कि प्रीतम सिंह को अभी तक कुछ मिला नहीं है तो वो चुनाव अभियान समिति के अध्यक्ष के रूप में मान जाएं। उत्तराखण्ड राज्य के 25 वर्ष पूरे होने पर भाजपा मैसेज देती है कि प्रधानमंत्री उत्तराखण्ड आने वाले हैं, गृहमंत्री उत्तराखण्ड आने वाले हैं। विधानसभा के दो दिवसीय सत्र में राष्ट्रपति उत्तराखण्ड आईं और जब बीजेपी का कोई ना कोई बड़ा चेहरा चाहे मंत्री हो, चाहे प्रधानमंत्री हो, चाहे उनके पार्टी के बाद पदाधिकारी हों, उत्तराखण्ड में आते हैं। यह बताता है कि उत्तराखण्ड एक छोटा राज्य होने के बावजूद बीजेपी के लिए मैसेजिंग के लिए कितनी बड़ी टेरिटरी है। लगातार भाजपा का केंद्रीय नेतृत्व आता रहता है लेकिन कांग्रेस नेता राहुल गांधी उत्तराखण्ड से पीठ फेर रहे। प्रियंका गांधी भी गिनी चुनी जगह पर आईं। इसके चलते भी जो नेताओं की अंदरूनी गुटबाजी ज्यादा बढ़ती है, जब नेताओं को लगता है कि राष्ट्रीय नेतृत्व का ध्यान नहीं है तो अपने पाॅइंट बढ़ाने और गोल सेट करने में लगे रहते हैं। उत्तराखण्ड में कांग्रेस की कमजोरी की वजह यह भी है कि कांग्रेस की जो दिल्ली है उसको उत्तराखण्ड की उतनी चिंता नहीं है पाॅलिटिकली।
पवन लालचन्द, वरिष्ठ पत्रकार, राजनीतिक विश्लेषक
इस बार संगठनात्मक स्तर पर पार्टी ‘यदि’ शब्द के साथ नहीं चलेगी बल्कि एक निश्चित निर्णय के साथ आगे बढ़ेगी। नए साल बल्कि नए साल से पहले ही आप देखेंगे कि पार्टी के शीर्ष नेतृत्व ने अपने प्रत्येक स्तर पर संगठनात्मक कील कांटे दुरस्त कर लिए हैं। उसमें हर स्तर पर नियुक्तियां हो जाएंगी। उसमें यह रहेगा कि अनिश्चित या जो संशस है, का संगठन के प्रत्येक स्तर पर निराकरण हो जाएगा। जो मैं लीडरशिप के मूड से आकलन कर पाया मैं वो बता रहा हूं आपको। हमलोग जो भी अपने को नेता समझते हैं या कहते हैं, उनसे कह दिया जाएगा कि “either you follow the party line or you are out”. निर्णय जो भी है, आपका काम कर्म करना है। यह स्पष्ट कर दिया जाएगा कि उसका जो फल है, मैनडेट तो जनता देगी, लेकिन उस फल के बाद क्या निर्णय करना है वह पार्टी लीडरशिप तय करेगी। उसमें आप न रहिए या न पड़िए। A We can pick anyone, anybody from rank and file. यह हम तय करेंगे, केंद्रीय नेतृत्व द्वारा ये स्पष्ट कह दिया जाएगा। यह दो बातें तो निश्चित मानकर चलिए। मैं यह समझता हूं कि मेरा अपना मत है कि हमारे जितने क्षमतावान नेता हैं, उन्हें अपने आप को अपने जिले में, अपने क्षेत्र में, अपनी विधानसभा में और राज्य में तीनों जगह प्रूफ करना है। उसके लिए संगठित तौर पर चलना पड़ेगा। जहां एकांगी हो, वहां एकांगी करो, जहां सब मिल-जुलकर कर सकते हो मिल-जुलकर करो। सबको मिल-जुलकर चलने की जरूरत है। जो ओकेजन मिलजुल कर खड़े होने का है, वहां पर मिल- जुलकर खड़े रहो और जहां पर एकांगी होने की जरूरत है, अब वह एकांगी होकर करो। ऐसे ओकेजन निकालने पड़ेंगे। क्योंकि हर जगह हर समय हर कोई नेता उपस्थित नहीं रह सकता। यह काम करना पड़ेगा प्रदेश अध्यक्ष को और जो विधायक दल के नेता हैं उनको। मैं भी उसमें एक भूमिका अदा कर सकता हूं। हम ऐसे बिंदु निकालेंगे की जिनमें हम सब मिलजुल कर चल सकें ताकि ये जो भाजपा और मीडिया के एक हिस्से का फैलाया झूठा भ्रम है कि हम सब हम एक नहीं हैं, हम लड़ते हैं। यह हमारे ऊपर है और इससे हमारे नेतृत्व की भी परीक्षा होगी। 2027 के बाद कांग्रेस के राज्य के शीर्ष में वही नेता सरवाइव करेगा, जो नेता अपनी पूरी क्षमता का उपयोग करते हुए सामूहिकता की भावना को आगे बढ़ाएगा। जो चीज मेरे हाथ में है नहीं, मैं उसके विषय में सोचता नहीं। इसलिए केंद्रीय नेतृत्व ने उत्तराखण्ड कांग्रेस के संगठन की संरचना के संदर्भ में क्या सोचा है, मैं टिप्पणी नहीं कर सकता।
हरीश रावत, पूर्व मुख्यमंत्री, उत्तराखण्ड
इसमें जहां तक मेरी जानकारी है इस तरह की बात मेरे नाॅलेज में नहीं है कि किसी बदलाव की कोई बात हुई है। यह अधिकार पार्टी आलाकमान का है। ये आलाकमान का विशेषधिकार है कि वह किसको किस जिम्मेदारी पर लगाएगा और मैं तो पार्टी का ईमानदार कार्यकर्ता हूं, सिपाही हूं, मुझसे जैसा कहा जाएगा मैं उस निर्देश का पालन करूंगा। जहां मेरी ड्यूटी लगेगी, मैं वहां काम करूंगा। लेकिन मुझे बदलाव की जानकारी नहीं है न ही ऐसे कोई संकेत ऊपर से मिले हैं।
करणा माहरा, प्रदेश अध्यक्ष, उत्तराखण्ड कांग्रेस
कांग्रेस सम्भावनाओं और संगठनात्मक दोनों स्तर में मजबूत स्थिति में है। 2027 का विधानसभा चुनाव भारतीय जनता पार्टी के 10 साल के कुशासन से लोग परेशान होकर इससे मुक्ति चाहेंगे और अतीत में कांग्रेस ने जो विकास के कार्य किए हैं खासकर रोजगार के क्षेत्र में कांग्रेस की सरकारों ने काम किया, उसकी संभावनाओं को फिर दोबारा देखते हुए लोग कांग्रेस को वापस लाएंगे। 2022 में जो यह नैरेटिव फैलाया गया कि कांग्रेस बटी हुई है, ऐसा नहीं था। यह जरूर है कि हम चुनाव हारे। हारने के कई कारण होते हैं। उसमें से सबसे बड़ा कारण जो था वह यह था कि प्रधानमंत्री जी ने श्रीनगर, देहरादून, हल्द्वानी आकर जो झूठ बोला कि कांग्रेस धर्म विशेष के लिए एक अलग यूनिवर्सिटी बनाने जा रही है, उस झूठ का मीडिया के एक वर्ग ने चिल्ला-चिल्ला कर प्रचार किया। इससे लोग भम का शिकार हुए और गलतफहमी में लोगों ने एक आती हुई कांग्रेस की सरकार रोक दी। जहां तक आपने गुटबाजी का प्रश्न किया, 2022 में भी ऐसी कोई गुटबाजी नहीं थी और अब तो है भी नहीं। लेकिन सवाल यह है कि इस बात को भी भारतीय जनता पार्टी का जो गोदी मीडिया है, वह उसको प्रचारित करते रहता है। प्रचारित करने के बाद वह कांग्रेस की संभावनाओं को कमजोर करने की कोशिश करते हैं। इस प्रश्न को निश्चित तौर पर सभी लोग पूछते हैं। लेकिन उन्हें भारतीय जनता पार्टी का अंतर्द्वंद नहीं दिखाई देता। अभी त्रिवेंद्र सिंह रावत जी और मुख्यमंत्री जी के बीच कैसे सम्बंध हैं? उत्तराखण्ड के सांसदों की बात लें तो उत्तराखण्ड सरकार और उसके सांसदों, अजय भट्ट मुख्यमंत्री जी के, अनिल बलूनी जी और मुख्यमंत्री जी के सम्बंध कैसे हैं, यह जग जाहिर है, लेकिन मीडिया का एक वर्ग इसे नहीं दिखाता। भाजपा के अंदर क्या यह गुटबाजी नहीं है? देखिए प्रतिस्पर्धा की राजनीति हर जगह होती है। हमारे दल में भी है और भाजपा में भी है। लेकिन इसको इस रूप में कहना कि कांग्रेस बटी हुई है, एक साजिश है। जहां तक नेतृत्व परिवर्तन का सवाल है, यह हमारे हाईकमान का निर्णय होता है और उसके विवेक पर निर्भर करता है। सभी पार्टियां, चाहे वह भारतीय जनता पार्टी हो, कांग्रेस हो राज्य की अपनी यूनिट के सम्भावनाओं और क्षमताओं के आधार पर आकलन करते हैं। हमारे यहां भी अगर इस प्रकार का कोई आकलन कोई कर रहा हो तो वह हो सकता है। लेकिन मैं इस बारे में नहीं जानता कि क्या चल रहा है। जहां तक चर्चा की बात है तो चर्चा कांग्रेस की भी चल रही है तो भारतीय जनता पार्टी के अंदर भी चल रही है। कांग्रेस के अध्यक्ष के बारे में भी चर्चा हो सकती है। मुख्यमंत्री बदलने की भी चर्चा हो सकती है। मेरा जहां तक प्रश्न है पार्टी ने मुझे 2022 में अध्यक्ष के लिए काम सौंपा। यह सही बात है कि मुझे बहुत कम समय मिला। अभी हमारी जो भी मीटिंग होती है, उसमें मानना है कि पार्टी जो भी निर्णय करे, समय पर करे। ऐसा नहीं है कि प्रदेश कांग्रेस में बदलाव ही एकमात्र रास्ता है। वर्तमान स्थितियों में भी हम अगर चुनाव में जाते हैं तो भी हमारी संभावनाएं अच्छी हैं। यह निर्णय पार्टी को करना है। जो निर्णय पार्टी का होगा, मैं उसको स्वीकार करूंगा और दूसरी बात ये कि मेरा कर्तव्य है कि मुझे अगर कोई काम मिला है तो पूरा निष्ठा लगन से उसको करूं और करता भी हूं और जो भी पार्टी में निर्णय समय पर हो।
गणेश गोदियाल, पूर्व प्रदेश अध्यक्ष, उत्तराखण्ड कांग्रेस
धामी सरकार भले ही 4 साल में पूरी तरह फेल हुई हो, 47 विधायक होने के बावजूद भी अपने मंत्रिमंडल का पूरा गठन नहीं कर पाए हों, विभागों के बंटवारे से लेकर वहां हर जगह झगड़ा है लेकिन पुष्कर सिंह धामी कांग्रेस को खरीदने में कामयाब रहे हैं। कांग्रेस की फूट से पुष्कर सिंह धामी की खरीद ज्यादा बड़ी है। हरीश रावत, यशपाल आर्य, करण माहरा और प्रीतम सिंह, कांग्रेस के जो यह चार टाॅप लीडर हैं, वह उन्होंने अपनी जेब में रखे हुए हैं। अभी आपने पूर्व मुख्यमंत्री भगत सिंह कोश्यारी का एक वीडियो सुना होगा, जिसमें वह कह रहे हैं कि हरीश रावत तक पुष्कर सिंह धामी की भरपूर प्रशंसा कर रहे हैं। निश्चित रूप से आप इसको पुष्कर सिंह धामी का एक स्किल मान सकते हैं, यह जो कांग्रेस मुक्त भारत चल रहा है, उसके लिए जो लोग सुबह कह रहे हैं कि ‘पेपर चोर, गद्दी छोड़’, वही लोग शाम को कह रहे हैं कि धामी जी बहुत बढ़िया आदमी हैं। उनके अपने वाइड इंटरेस्ट हैं। हरीश रावत अपनी लड़की के, अपने बेटे के चुनाव क्षेत्र के लिए काम मांग रहे हैं। प्रीतम सिंह भी उसी काम में लगे हुए हैं, यशपाल आर्य नेता प्रतिपक्ष होने के बावजूद पुष्कर सिंह धामी का नाम लेने में परहेज करते हैं। आजतक यशपाल आर्य ने अपने मुंह से पुष्कर सिंह धामी नाम तक नहीं बोला। यही हाल करण माहरा का है। करण के पास एक बहुत बड़ी टीम होनी चाहिए थी लड़ने के लिए, उन्होंने अपनी कार्यकारिणी तक नहीं बनाई जबकि उनका कार्यकाल खत्म भी हो गया। सत्ता तानाशाह हो सकती है, होती ही है, ये उसका चरित्र है लेकिन लोकतंत्र के लिए सबसे घातक है विपक्ष का सत्ता के आगे नतमस्तक हो जाना।
गजेंद्र रावत, वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक
कांग्रेस की ऐसी हालत आज से नहीं पहले से ही है। कांग्रेसी आपस में लड़ते रहे यह पहली बार नहीं हो रहा है। लेकिन इस दौरान जो बीजेपी का उदय हो रहा है। सम्प्रदायिककरण जो हुआ है उसका नुकसान कांग्रेस को हुआ क्योंकि अपनी नीतियों के प्रति कांग्रेस का उतना कमिटमेंट नहीं है जितना कि भाजपा का है। भारतीय जनता पार्टी एक कैडर बेस्ड पार्टी है, आईडियोलाॅजी के प्रति वह बहुत मजबूत है और कुछ कांग्रेसी जो सत्ता का सुख भोगने के लिए ही बने थे, भारतीय जनता पार्टी की बढ़ती ताकत देखकर उन्हें लगा कि सत्ता का झुकाव भाजपा की ओर है तो वह भी भारतीय जनता पार्टी की ओर चले गए। कांग्रेसी आपसी झगड़ों को तो कभी सम्भाल ही नहीं पाए, फिर चाहे ब्रह्मादत्त वर्सेस गुलाब सिंह हो, नारायण दत्त तिवारी वर्सेज हरीश रावत हो, सतपाल महाराज वर्सेस हरीश रावत हो, इंदिरा हृदयेश वर्सेस हरीश रावत होता था। उसके बावजूद भी कांग्रेस सत्ता में आई। इसका असली कारण है, बीजेपी कितने आगे गई, वो भी धर्म की राजनीति के कारण। जैसे कम्युनिस्ट अपनी विचारधारा के प्रति कट्टर होते थे वैसे ही भारतीय जनता पार्टी भी अपनी विचारधारा के प्रति कट्टर है। लेकिन कांग्रेस मध्यमार्गी पार्टी थी। वही कट्टरता बीजेपी ने अपने समर्थकों में भर दी। अब उदाहरण के तौर पर देखिए कि कोई भाजपा नेता अगर रेप या किसी अन्य मामले में फंसता है तो भाजपा समर्थक उसे बहुत सामान्य तरीके से लेता है। लेकिन दूसरी पार्टियों के प्रति उनका यही नजरिया बदल जाता है। लोगों का आजकल इतना रेडिकलाइजेशन हो गया है उसी का नतीजा है कि भारतीय जनता पार्टी वालों को हर चीज में जिहाद नजर आता है। उन्हें लगता है कि जिहाद-जिहाद बोलेंगे तो हमारी कुर्सी बची रहेगी और हमारा आधार बढ़ेगा। उसका असर भी कांग्रेस पर पड़ा 2022 में ही देखिए, कांग्रेस का तो मुस्लिम यूनिवर्सिटी का कोई एजेंडा नहीं था। हरीश रावत का कोई एक शब्द दिखा दीजिए जिसमें उन्होंने मुस्लिम यूनिवर्सिटी की बात कही हो। लेकिन भाजपा ने ऐसा नैरेटिव गढ़ा कि वह मुद्दा कांग्रेस को चुनाव में भारी पड़ गया। चुनाव से 10 दिन पहले जब मान बैठे थे कि कांग्रेस सत्ता में आ रही है लेकिन एक मुस्लिम यूनिवर्सिटी के मुद्दे ने पूरा नैरेटिव चेंज कर दिया। कांग्रेसी तो हमेशा से ही ऐसे रहे हैं आपस में लड़ते रहे हैं। लचर रहे हैं। लेकिन एक राष्ट्रीय पार्टी है, प्रोग्रेसिव पार्टी है, वहां आपको हर मजहब और जाति के लोग मिल जाएंगे। आज जो स्थिति है तो कांग्रेस अपनी वजह से नहीं जीतेगी। अगर वह जीतेगी भी तो बीजेपी के प्रति बढ़ती एंटी इनकमबेंसी के कारण जीतेगी। अर्थशास्त्र में कहते हैं कि लाॅ आॅफ डेमिशन तो आज भाजपा अपने सैचुरेशन के उच्च स्तर पहुंच चुकी है। वह जितना ऊंचा जा सकते थे, वह जा चुके हैं। मोदी जी का भी वह प्रभाव अब नहीं रहा। एंटीइंकमबेंसी साफ नजर आ रही है और इसका असर पंचायत चुनाव में भी नजर आया। कांग्रेस को अगर कोई जिताएगा तो कांग्रेसी नेता नहीं जिताएंगे, जनता जिताएगी। किसी भी संगठन को अपने कार्यकर्ताओं को एनरजाइज करना पड़ता है। एनरजाइज तब होते हैं जब आपके लगातार कार्यक्रम चलते रहें। जब आप विपक्ष में हो तो विपक्ष की भूमिका अदा करो ना। भू-कानून पर आप आंदोलन कर सकते थे, आपने नहीं किया। आपने लोकायुक्त बनाया भाजपा सरकार ने उसे खत्म करने की तैयारी करी, आप वहां पर भी चुप रहे, कुछ नहीं किया। कांग्रेस के पास सरकार के खिलाफ 50 मुद्दे हैं लेकिन कांग्रेस कुछ नहीं कर पा रही। हरीश रावत हमेशा चर्चा में रहते हैं वो घूम भी रहे हैं, लेकिन उम्र के कारण उनकी भी अपनी सीमाएं हैं, वो कहां-कहां तक जाएंगे। कहां हैं करण माहरा? जबकि वह तो युवा हैं पार्टी में ऊर्जा भर सकते थे। वो अपनी पार्टी के वरिष्ठ नेताओं के साथ ही समन्वय नहीं बना पाए।
जय सिंह रावत, वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक

