Uttarakhand

विडम्बनाओं के भंवर जाल में कांग्रेस

pritam ganeshh and karan copy
कांग्रेस के पुराने कार्यकर्ता आज भी मानते हैं कि अगर कोई व्यक्ति संगठन को एकजुट कर सकता है तो वह हरीश रावत ही हैं, लेकिन वे यह भी कहते हैं कि अब उन्हें खुद को ‘विवाद का कारण’ नहीं, बल्कि ‘समाधान का माध्यम’ बनना होगा क्योंकि जनता के सामने सवाल यह नहीं है कि हरीश रावत का अगला कदम क्या होगा बल्कि यह है कि कांग्रेस अब आगे कैसे बढ़ेगी? भाजपा की मजबूत जड़ें, संगठनात्मक अनुशासन और लगातार प्रचार के बीच कांग्रेस के लिए सबसे बड़ी चुनौती अपने ही भीतर विश्वास बहाल करने की है। हरीश रावत ने भले ही नया विमर्श छेड़ दिया हो लेकिन इससे संगठन की दिशा और धुंधली हो गई है। राजनीतिक पर्यवेक्षक मानते हैं कि अगर कांग्रेस को 2027 में कोई सम्भावना तलाशनी है तो उसे हरीश रावत, करण माहरा, रंजीत रावत, प्रीतम सिंह और गणेश गोदियाल इन सभी को एक मंच पर लाना ही होगा लेकिन मौजूदा हालात यह बताते हैं कि ऐसा फिलहाल असम्भव दिखता है। कांग्रेस इस समय ऐसे चैराहे पर खड़ी है जहां हर राह किसी न  किसी गुट की ओर जाती है, लेकिन कोई भी राह जनता की तरफ नहीं मुड़ती। यही उसकी असली विडम्बना है

उत्तराखंड की राजनीति में इस बार दीपावली सिर्फ रोशनी नहीं, बल्कि गहरी सियासी सरगर्मी लेकर आई। कांग्रेस जो पहले ही भीतर से टूटन और गुटबाजी की गिरफ्त में है, अब अपने वरिष्ठतम नेता और पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत की एक फेसबुक पोस्ट से और गहरी राजनीतिक उलझन में फंसती नजर आ रही है। यह वही पार्टी है जिसकी राज्य गठन के बाद से पहली निर्वाचित सरकार बनी थी और 2012 में एक बार फिर से उसे सरकार बनाने का मौका जनता ने दिया था लेकिन आज स्थिति यह है कि संगठन के भीतर हर बड़ा नेता अलग दिशा में काम कर रहा है और एक-दूसरे पर संदेह की रेखाएं खींची हुई हैं।

हरीश रावत जो प्रदेश की राजनीति के सबसे प्रभावशाली और लोकप्रिय चेहरों में गिने जाते हैं इन दिनों अपने ही संगठन भीतर घिरे हुए हैं। उनकी लोकप्रियता और राजनीतिक अनुभव अब गुटीय संतुलन में उलझ गए हैं। रावत के ही रिश्ते में साले और वर्तमान प्रदेश अध्यक्ष करण माहरा उनके सबसे बड़े आलोचक बन चुके हैं। कभी रावत के समर्थक रहे करण आज प्रदेश कांग्रेस के संगठन की बागडोर सम्भाले हुए हैं और यह बागडोर रावत के लिए लगातार चुनौती बनती जा रही है।
स्थिति को और पेचीदा बनाता है हरीश रावत के ही पुराने विश्वासपात्र रहे रंजीत रावत का घोर रावत विरोध। रंजीत रावत हरीश रावत के मुख्यमंत्री कार्यकाल के दौरान उनके सबसे करीबी माने जाते थे। सरकार के हर छोटे-बड़े निर्णय में उनकी सलाह का वजन होता था। लेकिन वक्त के साथ समीकरण बदले और आज वही रंजीत रावत हरीश रावत के मुखर आलोचक हैं। दिलचस्प यह है कि अब रंजीत रावत ने खुद को करण माहरा के साथ जोड़ लिया है, यानी रावत विरोध की राजनीति में दोनों का गठबंधन मजबूत हो गया है। राजनीतिक विश्लेषक कहते हैं कि ‘‘यह असामान्य राजनीतिक दोस्ती है क्योंकि दोनों के हित समान हैं, संगठन पर नियंत्रण और हरीश रावत को हाशिए पर डालना।’’
गौरतलब है कि करीब दो दशक से उत्तराखण्ड कांग्रेस हरीश रावत के इर्द-गिर्द घूमती रही है। चाहे संगठनात्मक निर्णय हों या टिकट बंटवारा, उनकी राय निर्णायक मानी जाती रही है। लेकिन अब हालात उलट गए हैं। आज न केवल उनका विरोध करने वाले परिवार के भीतर हैं, बल्कि पार्टी में कई पुराने साथी भी उनसे दूर जा चुके हैं। यशपाल आर्य, प्रीतम सिंह, गणेश गोदियाल जैसे वरिष्ठ नेता भी अब अलग-अलग समूहों में सक्रिय हैं। यह विभाजन पार्टी के लिए बड़ा खतरा बन गया है क्योंकि 2027 के विधानसभा चुनाव तक संगठन को फिर से एकजुट करना लगभग असम्भव कार्य दिखता है।
प्रदेश कांग्रेस की कार्यकारिणी का गठन अब तक नहीं हो पाया है। इसका सीधा अर्थ यह है कि संगठनात्मक दिशा ही स्पष्ट नहीं है। कार्यकर्ता स्तर पर भ्रम, जिलों में निष्क्रिय इकाइयां और ब्लाॅक स्तर पर मतभेद आम बात बन चुकी है। इस बीच करण माहरा को हटाने की अटकलें लगातार चलती रहीं, लेकिन हर बार हरीश रावत के कदम या बयान उन समीकरणों को बदल देते हैं। कुछ सप्ताह पहले तक यह चर्चा थी कि दिल्ली नेतृत्व नया प्रदेश अध्यक्ष नियुक्त करने जा रहा है, मगर अचानक ही रावत ने अपने पुराने प्रतिद्वंद्वी प्रीतम सिंह के समर्थन में बयान देने शुरू कर दिए जिससे केंद्रीय नेतृत्व असमंजस में आ गया।
इसी कड़ी में अब हरीश रावत की दिवाली से ठीक पहले की फेसबुक पोस्ट ने नई हलचल पैदा कर दी है। इस पोस्ट में उन्होंने लिखा-‘‘इस दिवाली के बाद दुनिया में और बड़े पैमाने पर धूम-धड़ाका, युद्ध, मिसाइलें, और बरबादियां देखने को मिलेंगी। भारत में एक अनचाहा तनाव, असहिष्णुता निरंतर बढ़ती हुई दिखाई दे रही है। भाजपा की राजनीति ने भारत के स्वाभाविक सनातनी मिजाज को बदल दिया है। देश की आजादी से पहले भी और आजादी के बाद भी उदार ब्राह्मण वादिता के हाथ में देश की राजनीति और समाज का संचालन रहा। कुछ कमियां थी, मगर राजनीति में सौहार्द व उदारता थी। आज उस उदारता को फिर से खोजने की आवश्यकता है। उत्तराखण्ड में भी मेरी मां लक्ष्मी से प्रार्थना है कि हमारी राजनीति का स्वाभाविक स्वरूप फिर से उभर करके सामने आए। ‘कांग्रेस संगठन सृजन अभियान’ के जरिए एक बड़े परिवर्तन की ओर बढ़ रही है। मुझे उम्मीद है कि इस संगठन सृजन में हम बहुत अच्छी संख्या में, जिलों में ब्राह्मण वर्ग से आने वाले नौजवानों को जिम्मेदारी पर देख सकेंगे। उदारता ब्राह्माण का स्वाभाविक गुण है। शुरुआत अच्छी सोच की कहीं से होनी चाहिए, शुरुआत उत्तराखण्ड से हो इसकी मैं मां लक्ष्मी से प्रार्थना करता हूं। यह पोस्ट देखने में सामान्य शुभकामना जैसी लगती है, लेकिन राजनीतिक अर्थों में इसके कई स्तर हैं। पार्टी भीतर इसे एक ‘संकेतात्मक राजनीतिक घोषणा’ की तरह देखा जा रहा है। कई वरिष्ठ नेता मानते हैं कि रावत इस पोस्ट के जरिए संगठन की दिशा पर पुनः प्रभाव डालना चाहते हैं।
‘उदार ब्राह्माणवाद’ और ‘संगठन सृजन’ जैसे शब्द उनके पुराने समर्थक गणेश गोदियाल के पुनः उभार की सम्भावना की ओर इशारा करते हैं। राजनीति के विश्लेषक कहते हैं कि हरीश रावत के इस बयान में दो बातें स्पष्ट हैं। एक, वे भाजपा की असहिष्णुता के खिलाफ खुद को उदार, सांस्कृतिक, संतुलित चेहरा पेश कर रहे हैं और दो, वे संगठन की दिशा को फिर से अपने ‘विचार वाले घेरे’ में लाने की कोशिश कर रहे हैं। पार्टी के भीतर इसे करण माहरा के लिए सीधी चुनौती के रूप में देखा जा रहा है।
करण समर्थक खेमे में इस पोस्ट को लेकर साफ है। उनका कहना है कि जब पार्टी पहले ही संगठनात्मक रूप से बिखरी हुई है, तब इस तरह के बयान या पोस्ट केवल भ्रम पैदा करते हैं। दूसरी तरफ रावत के करीबियों का कहना है कि इसमें राजनीति खोजने की कोई जरूरत नहीं। यह तो बस सांस्कृतिक और वैचारिक अपील है। लेकिन अनुभवी लोग जानते हैं कि रावत की राजनीति हमेशा संकेतों में चलती है।
पूर्व मुख्यमंत्री की यह शैली नई नहीं है वे कई बार फेसबुक और ट्वीट के माध्यम से ऐसे संदेश देते रहे हैं जो कुछ दिनों के लिए राजनीतिक दिशा तय कर देते हैं। उनके विरोधी कहते हैं कि यह ‘विरोधाभासी राजनीति’ है। कभी वे प्रीतम सिंह के पक्ष में बयान देते हैं तो कभी गणेश गोदियाल को संकेत करते हैं और कभी खुद को संगठन सृजन का चेहरा दिखाते हैं। लेकिन उनके समर्थक इसे ‘संतुलनकारी क्षमता’ कहते हैं यानी रावत हर गुट को किसी न किसी तरह जोड़े रखने की कोशिश करते हैं।
उत्तराखण्ड कांग्रेस के लिए असली समस्या यह है कि संगठन में न तो स्पष्ट नेतृत्व है, न एक दिशा। कुमारी शैलजा को प्रभारी बनाकर दिल्ली नेतृत्व ने मानो यह दिखा दिया कि उत्तराखण्ड अभी उनकी प्राथमिकता में नहीं है। शैलजा अब तक राज्य का कोई ठोस दौरा नहीं कर पाई हैं। दिल्ली से आदेश आते हैं, पर जमीन पर कोई हलचल नहीं होती। इस बीच भाजपा का संगठन गांव-गांव तक फैल चुका है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी लगातार युवाओं, महिला समूहों और पर्यटन विकास योजनाओं के जरिए अपनी सरकार की सक्रिय छवि बना रहे हैं, जबकि कांग्रेस अपने अंदरूनी झगड़ों से निकल ही नहीं पा रही। रावत की पोस्ट ने पूरी स्थिति को और जटिल बना दिया है। अब सवाल यह है कि क्या कांग्रेस 2027 में भाजपा जैसी संगठित और सशक्त पार्टी का मुकाबला कर पाएगी या फिर यह गुटबाजी उसे उसी तरह डुबो देगी जैसे 2022 में हुआ था?
कांग्रेस के पुराने कार्यकर्ता आज भी मानते हैं कि अगर कोई व्यक्ति संगठन को एकजुट कर सकता है तो वह हरीश रावत ही हैं, लेकिन वे यह भी कहते हैं कि अब उन्हें खुद को ‘विवाद का कारण’ नहीं, बल्कि ‘समाधान का माध्यम’ बनाना होगा क्योंकि जनता के सामने सवाल यह नहीं है कि हरीश रावत का अगला कदम क्या होगा, बल्कि यह है कि कांग्रेस अब आगे कैसे बढ़ेगी।
भाजपा की मजबूत जड़ें, संगठनात्मक अनुशासन और लगातार प्रचार के बीच कांग्रेस के लिए सबसे बड़ी चुनौती अपने ही भीतर विश्वास बहाल करने की है। हरीश रावत की पोस्ट ने भले ही नया विमर्श छेड़ दिया हो, लेकिन इससे संगठन की दिशा और धुंधली हो गई है।
राजनीतिक पर्यवेक्षक मानते हैं कि अगर कांग्रेस को 2027 में कोई सम्भावना तलाशनी है तो उसे हरीश रावत, करण माहरा, रंजीत रावत, प्रीतम सिंह और गणेश गोदियाल जैसे बड़े नेताओं को एक मंच पर लाना ही होगा। लेकिन मौजूदा हालात यह बताते हैं कि ऐसा फिलहाल असम्भव दिखता है। कांग्रेस इस समय ऐसे चैराहे पर खड़ी है जहां हर राह किसी न किसी गुट की ओर जाती है, लेकिन कोई भी राह जनता की तरफ नहीं मुड़ती। यही उसकी असली विडम्बना है।

कांग्रेस का परम्परागत राजनीतिक एरोगेंस

मुझे लगता है कि इसे कांग्रेस का एक परम्परागत राजनीतिक एरोगेंस कहें या वह किसी बड़ी भूल की स्थिति में है कि उसके कुछ बड़े नेता एक रणनीति के तहत यह सब कर रहे हैं। जो दल उत्तराखण्ड में सीधे परम्परागत रूप से भाजपा का प्रतिद्वंदी दल भी है, उस दल के नेता इस तरह का आचरण करते आ रहे हैं। 2014 की बात से ही समझिए उस वक्त तो काग्रेस की ही सरकार थी।

2017 में जिस तरह से हरीश रावत जी को लगता था कि वह मुख्यमंत्री हैं और वह रिपीट होंगे क्योंकि बीजेपी ने उनके खिलाफ राष्ट्रपति शासन लगाने से लेकर बहुत से काम किए हैं। हालांकि सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद वो दोबारा मुख्यमंत्री बन गए थे। लेकिन उनको लगता था कि जनता में उनके प्रति सहानुभूति है और वह पुनः चुनाव जीतकर आएंगे। ऐसा लेकिन हुआ नहीं और परिपाटी का निर्वहन करते हुए जनता ने सरकार बदल डाली थी। 2022 विधानसभा चुनावों में जब हम और आप जैसे पत्रकार भी लिख रहे थे कि उत्तराखण्ड की जनता परम्परागत रूप से वही परम्परा के हिसाब से भागीदारी वाली जनादेश देगी और कांग्रेस को मौका मिलेगा क्योंकि बीजेपी तीन मुख्यमंत्री बदल चुकी थी। यह भी एक दल के तौर पर भाजपा की कमजोरी को दर्शाता था। पांच साल में जिस पार्टी पर सबसे ज्यादा उत्तराखण्ड में राजनीतिक अस्थिरता फैलाने का आरोप है और कांग्रेस की सम्भावनाएं भी लगने लगी थीं। जब कांग्रेस ने पहली सूची उम्मीदवारों की जारी की थी, तब यह मैसेज भी गया था कि कांग्रेस बहुत अच्छे प्रत्याशी लेकर आ रही है। लेकिन फिर हरीश रावत का लालकुआं से प्रत्याशी तय होना और रामनगर में उनका रंजीत रावत से झगड़ा चलना और कई सीटों पर गलत और डमी प्रत्याशी खड़े करना, जैसे डोईवाला की बात हो, ऋषिकेश की बात हो या रायपुर की बात हो बहुत सारी जगह कांग्रेस ने ऐसी गलतियां कीं और नतीजा यह रहा कि बीजेपी बहुत अच्छे खासे बहुमत से सरकार बनाने में सफल रही। 2024 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस करीब-करीब 100 सीटों पर आ गई। दो लोकसभा चुनाव हारने के बाद वह अच्छा करती दिखी थी। यूपी में अखिलेश यादव के साथ मिलकर उन्होंने अच्छा किया, लेकिन वह इसे उत्तराखण्ड में रिप्लिकेट नहीं कर पाए क्योंकि हरीश रावत ने कहा मैं हरिद्वार से नहीं लडूंगा मुझे अपने बेटे का राजनीतिक करियर शुरू करना है, प्रीतम सिंह ने कहा मैं भी नहीं लडूंगा। इस प्रकार हमने देखा कि तमाम सम्भावनाओं के बावजूद कांग्रेस गणेश गोदियाल तक को नहीं जीता पाई। बाकी सब सीटों पर बाॅबी पंवार जैसे लोगों को जो फर्स्ट टाइमर थे 168000 वोट ले आना जो कि कांग्रेस का अच्छा खासा वोट था। उसके बाद भी आप सम्भलते नजर नहीं आ रहे हैं। हरीश रावत जी कभी मुख्यमंत्री की तारीफ कर देते हैं, कभी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तारीफ कर देते हैं, यहां तक की कभी अमित शाह की भी तारीफ कर देते हैं। यह तो बड़े नेताओं का हाल है। करण माहरा भी प्रदेश अध्यक्ष के तौर पर उतना अच्छा नहीं कर पा रहे हैं जितना करना चाहिए। पूरे नेताओं को एक साथ बांध के रखना, अपनी खुद की टीम बनाने की बात हो। आलाकमान के स्तर पर उनका बहुत मजबूत दखल नहीं है, वरना उनकी एक टीम काम कर रही होती प्रदेश में। गणेश गोदियाल को बीच-बीच में लगता रहा है कि उनको आलाकमान मौका देने वाला है। लेकिन वह शायद हो नहीं पाया और जिस तरीके से प्रीतम सिंह ने जिला पंचायत चुनाव में सरकार की नाक के नीचे देहरादून में अपने बेटे को जिला पंचायत उपाध्यक्ष बना लिया, हालांकि आरक्षण की अदला-बदली के चलते वह जिला पंचायत अध्यक्ष पद से वंचित हो गए। देहरादून के जिला पंचायत का चुनाव जीतकर प्रीतम सिंह ने एक बड़ा मैसेज दिया है, पार्टी के अंदर भी और पार्टी के बाहर भी। करण माहरा और गणेश गोदियाल जैसे दूसरी पांत के दूसरे नेताओं को कंट्रोल करने के लिए इस समय हरीश रावत, प्रीतम सिंह के साथ हैं। उनके बीच में एक अंडरस्टैंडिंग भी नजर आती है। प्रीतम सिंह को भी प्रदेश अध्यक्ष बनना है, मुख्यमंत्री बनने के उनके सपने हैं। हरीश रावत के अपने सपने हैं। उनकी राजनीतिक मजबूरियां भी हैं। उनकी बिटिया अनुपमा रावत विधानसभा में है, संकट वीरेंद्र रावत और आनंद रावत की राजनीति का है क्योंकि उन पर पारिवारिक दबाव है तो ऐसे समय में जब कांग्रेस को बहुत यूनाइटेड हो करके अभी से फाइट करनी चाहिए क्योंकि बीजेपी 10 साल की सत्ता की एंटीइनकम्बेंसी के बाद चुनाव में जाएगी लेकिन इन सब अवसरों को भुनाने में, जहां कांग्रेस को लीड करना चाहिए था, वहां करण माहरा एक खानापूर्ति का प्रोटेस्ट करते हैं, महज रस्मअदायगी के लिए कुछ देर के लिए वह गांधी पार्क के बाहर बैठ जाते हैं और फिर थोड़ी देर बाद उठकर आ जाते हैं तो जिन मुद्दों पर सरकार की घेराबंदी प्रिंसिपल अपोजिशन पार्टी को करनी थी, वहां पर कोई भी नया चेहरा जाकर सरकार की घेराबंदी कर देता है। कभी वह बाॅबी पंवार हो जाते हैं, कभी कोई और हो जाता हैं, कभी बीजेपी के भीतर से त्रिवेंद्र सिंह रावत हो जाते हैं, कभी बिशन सिंह चुफाल हो जाते हैं और कभी अरविंद पाण्डे हो जाते हैं यानी कि सत्ताधारी दल की खास रणनीति भी नजर आती है कि भीतर के गुबार को निकालने के लिए अच्छा है पार्टी के भीतर ही ‘विद इन द पार्टी’ एक अपोजिशन तैयार हो जाए और जब विधानसभा चुनाव आए तो लोगों का एकदम गुस्सा ना फूट पड़े, विपक्ष की दमदार जिम्मेदारी निभाने के तौर पर कांग्रेस अभी उतना रुचि लेती हुई दिखाई नहीं दे रही है। मैं कांग्रेस को उत्तराखण्ड में कबिलाई पार्टी कहता हूं क्योंकि कबीलों के अपने-अपने नेता हैं। हरीश रावत का इंटरेस्ट है कि हरिद्वार जिले में मेरी राजनीति बची रहे। दरअसल हरीश रावत की राजनीति या हरीश रावत बीजेपी को राजनीतिक तौर पर भाते हैं। जिस तरह उन पर मुस्लिमपरस्ती के आरोप भाजपा लगती है और खुद ही अपना नैरेटिव गढ़ती है, जिसका फायदा उसको पूरे पहाड़ पर मिलता है और हरीश रावत की भी मजबूरी है कि पहाड़ में उनको वह समर्थन नहीं है जो समर्थन उन्हें हरिद्वार में मिल जाता है। इसलिए वीरेंद्र रावत की पूरी सक्रियता खानपुर पर है। कांग्रेस के नेता फिर यही साबित कर रहे हैं कि वह विपक्ष के नाते जो अपाॅर्चुनिटी उनको मिली है, उस अपाॅर्चुनिटी को पाॅलिटिकली इनकैश करने या भुनाने की बजाय वह आपस में अभी से गोल सेट कर रहे हैं। हरीश रावत करण माहरा में छत्तीस का आंकड़ा है। गणेश गोदियाल ने उनसे दूरी बना ली है और हरीश रावत के  कार्यक्रमों में वह कहीं दिखाई नहीं देते हैं। लोगों का कहना है कि गणेश गोदियाल को शायद यह मैसेज है कि पिछले विधानसभा चुनाव से ठीक पहले उनको प्रदेश अध्यक्ष बनाया जाता है, जिससे हरीश रावत अपनी कुछ चीजें साध लेना चाहते थे और दिल्ली में जो उनकी टैगिंग है उन पर हरीश रावत का ठप्पा है। इसीलिए जो उनके विरोधी हैं चाहे वह करण माहरा हो या कोई अन्य दिल्ली जाकर यही कहते हैं कि अगर आपने गणेश गोदियाल को अध्यक्ष बनाया तो रिमोट कंट्रोल फिर हरीश रावत के ही हाथ में होगा। मुझे लगता है कि राहुल गांधी के साथ या मल्लिकार्जुन खड़गे या पार्टी के आलाकमान पर हरीश रावत की उतनी पाॅलिटिकल गुडविल नहीं रही जो कि आज से 5-7 साल पहले तक हुआ करती थी। गणेश गोदियाल ने भी थोड़ा डिस्टेंस बनाने की कोशिश की है। इसके चलते गणेश गोदियाल और हरीश रावत के बीच वैसे सौहार्दपूर्ण सम्बंध नहीं हैं। यशपाल आर्य सबके साथ एक फील गुड वाली फीलिंग लेकर चल रहे हैं। लेकिन मोटा-मोटी देखा जाए तो इस वक्त कांग्रेस में एक तरफ प्रीतम सिंह इस समय संगठन को लीड करते हुए दिखाई दे रहे हैं। एक बड़ी अपाॅर्चुनिटी उनको चाहे वह संगठन की बात हो या अन्य उनको मिलनी चाहिए उन्हें ऐसा लगता है। इस वक्त हरीश रावत उनके साथ फिलहाल खड़े दिखाई दे रहे हैं। इस कबीले में बटी हुई पार्टी के भीतर नजर नहीं आ रहा है कि सारे नेता 2027 का मैदान जीतना चाहते हैं। उससे ज्यादा यह दिखाई दे रहा है कि बड़े मैदान में उतरने से पहले वह अपने-अपने इलाके बांट कर अपने घर को मजबूत कर लेना चाहते हैं। पिछले कई चुनाव से कांग्रेस की यही स्थिति बनी हुई है इसीलिए जब सत्ता पाने का अवसर होता है जीतने में वह चूक जाती है। हरीश रावत ने ब्राह्माण फेस को आगे करने की बात कही है, लेकिन मुझे लगता है कि प्रीतम सिंह प्रदेश अध्यक्ष से कम में नहीं मानेंगे क्योंकि जो प्रदेश अध्यक्ष होता है, वह चुनाव लड़ने में बहुत सी चीजों को तय करता है। उससे आपका चुनाव में वजूद बढ़ता है। कांग्रेस की इंटरनल
पाॅलिटिक्स का मतलब है कि आप अपने कितने लोगों को लड़ा पा रहे हो और कितने लोगों को जीता के ला पा रहे हो और जो कल को मुख्यमंत्री की रेस में आपका प्रतिद्वंदी हो सकता है, उसे कितने लोग हरवा रहे हों। हो सकता है कि प्रीतम सिंह को अभी तक कुछ मिला नहीं है तो वो चुनाव अभियान समिति के अध्यक्ष के रूप में मान जाएं। उत्तराखण्ड राज्य के 25 वर्ष पूरे होने पर भाजपा मैसेज देती है कि प्रधानमंत्री उत्तराखण्ड आने वाले हैं, गृहमंत्री उत्तराखण्ड आने वाले हैं। विधानसभा के दो दिवसीय सत्र में राष्ट्रपति उत्तराखण्ड आईं और जब बीजेपी का कोई ना कोई बड़ा चेहरा चाहे मंत्री हो, चाहे प्रधानमंत्री हो, चाहे उनके पार्टी के बाद पदाधिकारी हों, उत्तराखण्ड में आते हैं। यह बताता है कि उत्तराखण्ड एक छोटा राज्य होने के बावजूद बीजेपी के लिए मैसेजिंग के लिए कितनी बड़ी टेरिटरी है। लगातार भाजपा का केंद्रीय नेतृत्व आता रहता है लेकिन कांग्रेस नेता राहुल गांधी उत्तराखण्ड से पीठ फेर रहे। प्रियंका गांधी भी गिनी चुनी जगह पर आईं। इसके चलते भी जो नेताओं की अंदरूनी गुटबाजी ज्यादा बढ़ती है, जब नेताओं को लगता है कि राष्ट्रीय नेतृत्व का ध्यान नहीं है तो अपने पाॅइंट बढ़ाने और गोल सेट करने में लगे रहते हैं। उत्तराखण्ड में कांग्रेस की कमजोरी की वजह यह भी है कि कांग्रेस की जो दिल्ली है उसको उत्तराखण्ड की उतनी चिंता नहीं है पाॅलिटिकली।
पवन लालचन्द, वरिष्ठ पत्रकार, राजनीतिक विश्लेषक

बात अपनी-अपनी

इस बार संगठनात्मक स्तर पर पार्टी ‘यदि’ शब्द के साथ नहीं चलेगी बल्कि एक निश्चित निर्णय के साथ आगे बढ़ेगी। नए साल बल्कि नए साल से पहले ही आप देखेंगे कि पार्टी के शीर्ष नेतृत्व ने अपने प्रत्येक स्तर पर संगठनात्मक कील कांटे दुरस्त कर लिए हैं। उसमें हर स्तर पर नियुक्तियां हो जाएंगी। उसमें यह रहेगा कि अनिश्चित या जो संशस है, का संगठन के प्रत्येक स्तर पर निराकरण हो जाएगा। जो मैं लीडरशिप के मूड से आकलन कर पाया मैं वो बता रहा हूं आपको। हमलोग जो भी अपने को नेता समझते हैं या कहते हैं, उनसे कह दिया जाएगा कि “either you follow the party line or you are out”. निर्णय जो भी है, आपका काम कर्म करना है। यह स्पष्ट कर दिया जाएगा कि उसका जो फल है, मैनडेट तो जनता देगी, लेकिन उस फल के बाद क्या निर्णय करना है वह पार्टी लीडरशिप तय करेगी। उसमें आप न रहिए या न पड़िए। A We can pick anyone, anybody from rank and file. यह हम तय करेंगे, केंद्रीय नेतृत्व द्वारा ये स्पष्ट कह दिया जाएगा। यह दो बातें तो निश्चित मानकर चलिए। मैं यह समझता हूं कि मेरा अपना मत है कि हमारे जितने क्षमतावान नेता हैं, उन्हें अपने आप को अपने जिले में, अपने क्षेत्र में, अपनी विधानसभा में और राज्य में तीनों जगह प्रूफ करना है। उसके लिए संगठित तौर पर चलना पड़ेगा। जहां एकांगी हो, वहां एकांगी करो, जहां सब मिल-जुलकर कर सकते हो मिल-जुलकर करो। सबको मिल-जुलकर चलने की जरूरत है। जो ओकेजन मिलजुल कर खड़े होने का है, वहां पर मिल- जुलकर खड़े रहो और जहां पर एकांगी होने की जरूरत है, अब वह एकांगी होकर करो। ऐसे ओकेजन निकालने पड़ेंगे। क्योंकि हर जगह हर समय हर कोई नेता उपस्थित नहीं रह सकता। यह काम करना पड़ेगा प्रदेश अध्यक्ष को और जो विधायक दल के नेता हैं उनको। मैं भी उसमें एक भूमिका अदा कर सकता हूं। हम ऐसे बिंदु निकालेंगे की जिनमें हम सब मिलजुल कर चल सकें ताकि ये जो भाजपा और मीडिया के एक हिस्से का फैलाया झूठा भ्रम है कि हम सब हम एक नहीं हैं, हम लड़ते हैं। यह हमारे ऊपर है और इससे हमारे नेतृत्व की भी परीक्षा होगी। 2027 के बाद कांग्रेस के राज्य के शीर्ष में वही नेता सरवाइव करेगा, जो नेता अपनी पूरी क्षमता का उपयोग करते हुए सामूहिकता की भावना को आगे बढ़ाएगा। जो चीज मेरे हाथ में है नहीं, मैं उसके विषय में सोचता नहीं। इसलिए केंद्रीय नेतृत्व ने उत्तराखण्ड कांग्रेस के संगठन की संरचना के संदर्भ में क्या सोचा है, मैं टिप्पणी नहीं कर सकता।
हरीश रावत, पूर्व मुख्यमंत्री, उत्तराखण्ड

इसमें जहां तक मेरी जानकारी है इस तरह की बात मेरे नाॅलेज में नहीं है कि किसी बदलाव की कोई बात हुई है। यह अधिकार पार्टी आलाकमान का है। ये आलाकमान का विशेषधिकार है कि वह किसको किस जिम्मेदारी पर लगाएगा और मैं तो पार्टी का ईमानदार कार्यकर्ता हूं, सिपाही हूं, मुझसे जैसा कहा जाएगा मैं उस निर्देश का पालन करूंगा। जहां मेरी ड्यूटी लगेगी, मैं वहां काम करूंगा। लेकिन मुझे बदलाव की जानकारी नहीं है न ही ऐसे कोई संकेत ऊपर से मिले हैं।
करणा माहरा, प्रदेश अध्यक्ष, उत्तराखण्ड कांग्रेस

कांग्रेस सम्भावनाओं और संगठनात्मक दोनों स्तर में मजबूत स्थिति में है। 2027 का विधानसभा चुनाव भारतीय जनता पार्टी के 10 साल के कुशासन से लोग परेशान होकर इससे मुक्ति चाहेंगे और अतीत में कांग्रेस ने जो विकास के कार्य किए हैं खासकर रोजगार के क्षेत्र में कांग्रेस की सरकारों ने काम किया, उसकी संभावनाओं को फिर दोबारा देखते हुए लोग कांग्रेस को वापस लाएंगे। 2022 में जो यह नैरेटिव फैलाया गया कि कांग्रेस बटी हुई है, ऐसा नहीं था। यह जरूर है कि हम चुनाव हारे। हारने के कई कारण होते हैं। उसमें से सबसे बड़ा कारण जो था वह यह था कि प्रधानमंत्री जी ने श्रीनगर, देहरादून, हल्द्वानी आकर जो झूठ बोला कि कांग्रेस धर्म विशेष के लिए एक अलग यूनिवर्सिटी बनाने जा रही है, उस झूठ का मीडिया के एक वर्ग ने चिल्ला-चिल्ला कर प्रचार किया। इससे लोग भम का शिकार हुए और गलतफहमी में लोगों ने एक आती हुई कांग्रेस की सरकार रोक दी। जहां तक आपने गुटबाजी का प्रश्न किया, 2022 में भी ऐसी कोई गुटबाजी नहीं थी और अब तो है भी नहीं। लेकिन सवाल यह है कि इस बात को भी भारतीय जनता पार्टी का जो गोदी मीडिया है, वह उसको प्रचारित करते रहता है। प्रचारित करने के बाद वह कांग्रेस की संभावनाओं को कमजोर करने की कोशिश करते हैं। इस प्रश्न को निश्चित तौर पर सभी लोग पूछते हैं। लेकिन उन्हें भारतीय जनता पार्टी का अंतर्द्वंद नहीं दिखाई देता। अभी त्रिवेंद्र सिंह रावत जी और मुख्यमंत्री जी के बीच कैसे सम्बंध हैं? उत्तराखण्ड के सांसदों की बात लें तो उत्तराखण्ड सरकार और उसके सांसदों, अजय भट्ट मुख्यमंत्री जी के, अनिल बलूनी जी और मुख्यमंत्री जी के सम्बंध कैसे हैं, यह जग जाहिर है, लेकिन मीडिया का एक वर्ग इसे नहीं दिखाता। भाजपा के अंदर क्या यह गुटबाजी नहीं है? देखिए प्रतिस्पर्धा की राजनीति हर जगह होती है। हमारे दल में भी है और भाजपा में भी है। लेकिन इसको इस रूप में कहना कि कांग्रेस बटी हुई है, एक साजिश है। जहां तक नेतृत्व परिवर्तन का सवाल है, यह हमारे हाईकमान का निर्णय होता है और उसके विवेक पर निर्भर करता है। सभी पार्टियां, चाहे वह भारतीय जनता पार्टी हो, कांग्रेस हो राज्य की अपनी यूनिट के सम्भावनाओं और क्षमताओं के आधार पर आकलन करते हैं। हमारे यहां भी अगर इस प्रकार का कोई आकलन कोई कर रहा हो तो वह हो सकता है। लेकिन मैं इस बारे में नहीं जानता कि क्या चल रहा है। जहां तक चर्चा की बात है तो चर्चा कांग्रेस की भी चल रही है तो भारतीय जनता पार्टी के अंदर भी चल रही है। कांग्रेस के अध्यक्ष के बारे में भी चर्चा हो सकती है। मुख्यमंत्री बदलने की भी चर्चा हो सकती है। मेरा जहां तक प्रश्न है पार्टी ने मुझे 2022 में अध्यक्ष के लिए काम सौंपा। यह सही बात है कि मुझे बहुत कम समय मिला। अभी हमारी जो भी मीटिंग होती है, उसमें मानना है कि पार्टी जो भी निर्णय करे, समय पर करे। ऐसा नहीं है कि प्रदेश कांग्रेस में बदलाव ही एकमात्र रास्ता है। वर्तमान स्थितियों में भी हम अगर चुनाव में जाते हैं तो भी हमारी संभावनाएं अच्छी हैं। यह निर्णय पार्टी को करना है। जो निर्णय पार्टी का होगा, मैं उसको स्वीकार करूंगा और दूसरी बात ये कि मेरा कर्तव्य है कि मुझे अगर कोई काम मिला है तो पूरा निष्ठा लगन से  उसको करूं और करता भी हूं और जो भी पार्टी में निर्णय समय पर हो।
गणेश गोदियाल, पूर्व प्रदेश अध्यक्ष, उत्तराखण्ड कांग्रेस

धामी सरकार भले ही 4 साल में पूरी तरह फेल हुई हो, 47 विधायक होने के बावजूद भी अपने मंत्रिमंडल का पूरा गठन नहीं कर पाए हों, विभागों के बंटवारे से लेकर वहां हर जगह झगड़ा है लेकिन पुष्कर सिंह धामी कांग्रेस को खरीदने में कामयाब रहे हैं। कांग्रेस की फूट से पुष्कर सिंह धामी की खरीद ज्यादा बड़ी है। हरीश रावत, यशपाल आर्य, करण माहरा और प्रीतम सिंह, कांग्रेस के जो यह चार टाॅप लीडर हैं, वह उन्होंने अपनी जेब में रखे हुए हैं। अभी आपने पूर्व मुख्यमंत्री भगत सिंह कोश्यारी का एक वीडियो सुना होगा, जिसमें वह कह रहे हैं कि हरीश रावत तक पुष्कर सिंह धामी की भरपूर प्रशंसा कर रहे हैं। निश्चित रूप से आप इसको पुष्कर सिंह धामी का एक स्किल मान सकते हैं, यह जो कांग्रेस मुक्त भारत चल रहा है, उसके लिए जो लोग सुबह कह रहे हैं कि ‘पेपर चोर, गद्दी छोड़’, वही लोग शाम को कह रहे हैं कि धामी जी बहुत बढ़िया आदमी हैं। उनके अपने वाइड इंटरेस्ट हैं। हरीश रावत अपनी लड़की के, अपने बेटे के चुनाव क्षेत्र के लिए काम मांग रहे हैं। प्रीतम सिंह भी उसी काम में लगे हुए हैं, यशपाल आर्य नेता प्रतिपक्ष होने के बावजूद पुष्कर सिंह धामी का नाम लेने में परहेज करते हैं। आजतक यशपाल आर्य ने अपने मुंह से पुष्कर सिंह धामी नाम तक नहीं बोला। यही हाल करण माहरा का है। करण के पास एक बहुत बड़ी टीम होनी चाहिए थी लड़ने के लिए, उन्होंने अपनी कार्यकारिणी तक नहीं बनाई जबकि उनका कार्यकाल खत्म भी हो गया। सत्ता तानाशाह हो सकती है, होती ही है, ये उसका चरित्र है लेकिन लोकतंत्र के लिए सबसे घातक है विपक्ष का सत्ता के आगे नतमस्तक हो जाना।
गजेंद्र रावत, वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक

कांग्रेस की ऐसी हालत आज से नहीं पहले से ही है। कांग्रेसी आपस में लड़ते रहे यह पहली बार नहीं हो रहा है। लेकिन इस दौरान जो बीजेपी का उदय हो रहा है। सम्प्रदायिककरण जो हुआ है उसका नुकसान कांग्रेस को हुआ क्योंकि अपनी नीतियों के प्रति कांग्रेस का उतना कमिटमेंट नहीं है जितना कि भाजपा का है। भारतीय जनता पार्टी एक कैडर बेस्ड पार्टी है, आईडियोलाॅजी के प्रति वह बहुत मजबूत है और कुछ कांग्रेसी जो सत्ता का सुख भोगने के लिए ही बने थे, भारतीय जनता पार्टी की बढ़ती ताकत देखकर उन्हें लगा कि सत्ता का झुकाव भाजपा की ओर है तो वह भी भारतीय जनता पार्टी की ओर चले गए। कांग्रेसी आपसी झगड़ों को तो कभी सम्भाल ही नहीं पाए, फिर चाहे ब्रह्मादत्त वर्सेस गुलाब सिंह हो, नारायण दत्त तिवारी वर्सेज हरीश रावत हो, सतपाल महाराज वर्सेस हरीश रावत हो, इंदिरा हृदयेश वर्सेस हरीश रावत होता था। उसके बावजूद भी कांग्रेस सत्ता में आई। इसका असली कारण है, बीजेपी कितने आगे गई, वो भी धर्म की राजनीति के कारण। जैसे कम्युनिस्ट अपनी विचारधारा के प्रति कट्टर होते थे वैसे ही भारतीय जनता पार्टी भी अपनी विचारधारा के प्रति कट्टर है। लेकिन कांग्रेस मध्यमार्गी पार्टी थी। वही कट्टरता बीजेपी ने अपने समर्थकों में भर दी। अब उदाहरण के तौर पर देखिए कि कोई भाजपा नेता अगर रेप या किसी अन्य मामले में फंसता है तो भाजपा समर्थक उसे बहुत सामान्य तरीके से लेता है। लेकिन दूसरी पार्टियों के प्रति उनका यही नजरिया बदल जाता है। लोगों का आजकल इतना रेडिकलाइजेशन हो गया है उसी का नतीजा है कि भारतीय जनता पार्टी वालों को हर चीज में जिहाद नजर आता है। उन्हें लगता है कि जिहाद-जिहाद बोलेंगे तो हमारी कुर्सी बची रहेगी और हमारा आधार बढ़ेगा। उसका असर भी कांग्रेस पर पड़ा 2022 में ही देखिए, कांग्रेस का तो मुस्लिम यूनिवर्सिटी का कोई एजेंडा नहीं था। हरीश रावत का कोई एक शब्द दिखा दीजिए जिसमें उन्होंने मुस्लिम यूनिवर्सिटी की बात कही हो। लेकिन भाजपा ने ऐसा नैरेटिव गढ़ा कि वह मुद्दा कांग्रेस को चुनाव में भारी पड़ गया। चुनाव से 10 दिन पहले जब मान बैठे थे कि कांग्रेस सत्ता में आ रही है लेकिन एक मुस्लिम यूनिवर्सिटी के मुद्दे ने पूरा नैरेटिव चेंज कर दिया। कांग्रेसी तो हमेशा से ही ऐसे रहे हैं आपस में लड़ते रहे हैं। लचर रहे हैं। लेकिन एक राष्ट्रीय पार्टी है, प्रोग्रेसिव पार्टी है, वहां आपको हर मजहब और जाति के लोग मिल जाएंगे। आज जो स्थिति है तो कांग्रेस अपनी वजह से नहीं जीतेगी। अगर वह जीतेगी भी तो बीजेपी के प्रति बढ़ती एंटी इनकमबेंसी के कारण जीतेगी। अर्थशास्त्र में कहते हैं कि लाॅ आॅफ डेमिशन तो आज भाजपा अपने सैचुरेशन के उच्च स्तर पहुंच चुकी है। वह जितना ऊंचा जा सकते थे, वह जा चुके हैं। मोदी जी का भी वह प्रभाव अब नहीं रहा। एंटीइंकमबेंसी साफ नजर आ रही है और इसका असर पंचायत चुनाव में भी नजर आया। कांग्रेस को अगर कोई जिताएगा तो कांग्रेसी नेता नहीं जिताएंगे, जनता जिताएगी। किसी भी संगठन को अपने कार्यकर्ताओं को एनरजाइज करना पड़ता है। एनरजाइज तब होते हैं जब आपके लगातार कार्यक्रम चलते रहें। जब आप विपक्ष में हो तो विपक्ष की भूमिका अदा करो ना। भू-कानून पर आप आंदोलन कर सकते थे, आपने नहीं किया। आपने लोकायुक्त बनाया भाजपा सरकार ने उसे खत्म करने की तैयारी करी, आप वहां पर भी चुप रहे, कुछ नहीं किया। कांग्रेस के पास सरकार के खिलाफ 50 मुद्दे हैं लेकिन कांग्रेस कुछ नहीं कर पा रही। हरीश रावत हमेशा चर्चा में रहते हैं वो घूम भी रहे हैं, लेकिन उम्र के कारण उनकी भी अपनी सीमाएं हैं, वो कहां-कहां तक जाएंगे। कहां हैं करण माहरा? जबकि वह तो युवा हैं पार्टी में ऊर्जा भर सकते थे। वो अपनी पार्टी के वरिष्ठ नेताओं के साथ ही समन्वय नहीं बना पाए।
जय सिंह रावत, वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक

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