बिहार में इस वर्ष के अंत में होने वाले विधानसभा चुनावों की आहट ने राजनीतिक तापमान चढ़ा दिया है। अपराध, असुरक्षा, वोटर लिस्ट का विवाद और अब एनडीए के भीतर उभरती दरारें, सबने मिलकर माहौल को बेहद पेचीदा बना दिया है। सबसे ताजा उदाहरण लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) के नेता और केंद्र में मंत्री चिराग पासवान का है जो खुद एनडीए में शामिल होने के बावजूद नीतीश कुमार की सरकार पर तीखा प्रहार कर रहे हैं और सभी सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारने की घोषणा करके एनडीए की अंदरूनी राजनीति को उलझा रहे हैं
बिहार बंद के दौरान तेजस्वी यादव और राहुल गांधी
चार जुलाई 2025 को 64 वर्षीय कारोबारी और बीजेपी नेता गोपाल खेमका की पटना में हत्या ने बिहार में अपराध की लहर को राष्ट्रीय बहस में ला खड़ा किया है। छह साल पहले उनके बेटे गुंजन की हत्या हुई थी और अब खुद गोपाल खेमका की मौत ने मारवाड़ी-अग्रवाल समुदाय के भीतर असुरक्षा और भय का माहौल पैदा कर दिया है। यह वही बिहार है जहां नीतीश कुमार ने 2005 में सत्ता में आने के बाद ‘जंगल राज’ को समाप्त करने का दावा किया था। लेकिन आज, सोशल मीडिया और विपक्ष का आरोप है कि वही जंगल राज, जिसे कभी लालू-राबड़ी शासन की पहचान कहा जाता था, अब नीतीश शासन में लौट आया है।
पटना में स्कूल संचालक अजीत कुमार की दिनदहाड़े हत्या, लूट, रंगदारी, बलात्कार के मामलों में इजाफा और पुलिस की सुस्त कार्रवाई ने जनता में गुस्सा भर दिया है। तेजस्वी यादव खुलेआम मीडिया पर आरोप लगा रहे हैं कि वह सत्तारूढ़ गठबंधन की ढाल बनी हुई है, जबकि उनके पिता के शासनकाल में मामूली घटनाओं को भी सनसनीखेज बना दिया जाता था।
एनडीए में चिराग पासवान की बगावत
चिराग पासवान
इस सबके बीच, एक और बड़ा मोड़ आया है, चिराग पासवान की बगावती मुद्रा। चिराग, जो केंद्रीय मंत्री और लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) के नेता हैं, औपचारिक रूप से एनडीए का हिस्सा हैं, लेकिन उनके हालिया बयान नीतीश कुमार और एनडीए नेतृत्व के लिए मुश्किलें पैदा कर रहे हैं।
चिराग ने घोषणा की है कि उनकी पार्टी बिहार की सभी 243 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारेगी। वे सार्वजनिक मंचों से नीतीश सरकार पर भ्रष्टाचार, अपराध और कुशासन के गम्भीर आरोप लगा रहे हैं। उनका कहना है कि नीतीश कुमार ने बिहार को विकास के रास्ते से भटका दिया है और राज्य को पुन: अराजकता की ओर धकेल दिया है। चिराग खुद को ‘बिहार फर्स्ट, बिहारी फर्स्ट’ का चेहरा बताकर युवाओं और शहरी मध्यम वर्ग को अपनी ओर खींचने की कोशिश कर रहे हैं।
एनडीए में यह अंदरूनी टकराव इसलिए अहम है क्योंकि चिराग पासवान का वोट बैंक, विशेषकर दलित (पासवान) समुदाय, कई सीटों पर निर्णायक भूमिका निभाता है। पिछली बार भी 2020 के विधानसभा चुनावों में चिराग ने जदयू के खिलाफ बगावती तेवर अपनाए थे, जिससे नीतीश कुमार को भारी नुकसान हुआ था। हालांकि बीजेपी ने तब चिराग को खुला समर्थन नहीं दिया, लेकिन राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा रही कि चिराग की रणनीति से जदयू कमजोर हुआ और बीजेपी को अधिक सीटें मिलीं। अब 2025 में फिर चिराग उसी राह पर चलते नजर आ रहे हैं, जिससे यह साफ है कि एनडीए में नीतीश और चिराग के बीच दरार और गहरी हो चुकी है।
मारवाड़ी-अग्रवाल समुदाय की चिंता
गोपाल खेमका की हत्या ने बिहार के मारवाड़ी-अग्रवाल समुदाय की सुरक्षा को लेकर बड़ा सवाल खड़ा किया है। यह समुदाय 18वीं सदी के उत्तरार्ध में पश्चिम, मध्य और उत्तर भारत के अस्थिर इलाकों से बिहार आया था और अंग्रेजों की प्रशासनिक व्यवस्था में व्यापार और वित्त में समृद्ध हुआ। इस समुदाय ने न केवल व्यापार में, बल्कि स्वतंत्रता संग्राम, साहित्य और समाज सेवा में अहम योगदान दिया। आजादी के बाद बिहार में बदलती राजनीति, बढ़ता अपराध और उद्योगों का लगातार पतन इस समुदाय के लिए चिंता का विषय बन गया। नीतिगत अदूरदशिज़्ता, भ्रष्ट प्रशासन और राजनीतिक अपराधीकरण ने बिहार को उद्योगों का ‘कब्रिस्तान’ बना दिया और मारवाड़ी जैसे समुदाय, जो कभी सुरक्षा और स्थिरता की तलाश में यहां आए थे, खुद को असहाय पा रहे हैं।
लोकतंत्र की जड़ में दरार
अक्टूबर-नवम्बर में होने वाले विधानसभा चुनावों की तैयारी के तहत राज्य में मतदाता सूची का पुनरीक्षण चल रहा है। लेकिन इस पर भी जबरदस्त विवाद खड़ा हो गया है। चुनाव आयोग ने मतदाता पहचान के लिए आधार, वोटर आईडी, पासपोर्ट, ड्राइविंग लाइसेंस जैसे दस्तावेज अनिवार्य किए हैं, लेकिन विपक्षी दलों का आरोप है कि यह गरीब, दलित, मुसलमान और प्रवासी मजदूर समुदायों के वोट काटने की साजिश है। तेजस्वी यादव, कांग्रेस, वामपंथी दल और यहां तक कि एआईएमआईएम जैसे क्षेत्रीय दल इस मुद्दे को जोर-शोर से उठा रहे हैं। उनका दावा है कि जिन इलाकों में एनडीए कमजोर है, वहां सूची सुधार में गड़बड़ी की जा रही है, जिससे हजारों लोगों के नाम गायब हो सकते हैं। यह विवाद चुनावी माहौल में बड़ा मुद्दा बन सकता है। अगर बड़ी संख्या में मतदाता खुद को सूची से बाहर पाएंगे तो लोकतंत्र की वैधता पर ही प्रश्नचिन्ह लग जाएगा और चुनाव के बाद बड़े आंदोलन और न्यायिक हस्तक्षेप की भूमिका बन सकती है।
नीतीश कुमार के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार अपनी छवि बचाने के लिए संघर्ष कर रही है। ‘सुशासन बाबू’ की छवि अब कई वर्गों में खोखली लग रही है। बीजेपी, जदयू, हम (सेक्युलर) और लोजपा (रामविलास) के बीच आंतरिक खींचतान ने गठबंधन को कमजोर कर दिया है। दूसरी तरफ, तेजस्वी यादव, कांग्रेस और अन्य विपक्षी दल नीतीश-बीजेपी की नीतियों के खिलाफ बेरोजगारी, महंगाई, अपराध और वोटर लिस्ट जैसे मुद्दों पर आक्रामक दिख रहे हैं। एक दिलचस्प तथ्य यह भी है कि युवा मतदाता, जो सोशल मीडिया के जरिए जागरूक हो रहे हैं, अब जातीय समीकरणों से परे रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य जैसे मुद्दों की तरफ झुक रहे हैं। ऐसे में सवाल उठता है – क्या ‘जंगल राज’ का पुराना भय दिखाकर सत्ता बरकरार रखी जा सकती है या इस बार जनता सरकार से जवाब मांगेगी?
वोटर लिस्ट विवाद को लेकर बिहार बंद
बिहार, जिसकी मिट्टी ने बुद्ध, महावीर, चाणक्य, अशोक जैसे महापुरुषों को जन्म दिया, आज अपराध, बेरोजगारी और राजनीतिक अदूरदर्शिता से जूझ रहा है। मारवाड़ी-अग्रवाल समुदाय जैसे सदियों पुराने साझेदार आज खुद को असुरक्षित महसूस कर रहे हैं। वोटर लिस्ट विवाद ने लोकतंत्र की बुनियाद पर सवाल खड़े कर दिए हैं और एनडीए के भीतर चिराग पासवान की बगावत ने सत्तारूढ़ गठबंधन को अस्थिर कर दिया है। अक्टूबर-नवम्बर 2025 का विधानसभा चुनाव बिहार के लिए केवल सत्ता परिवर्तन नहीं, बल्कि भविष्य की दिशा तय करने वाला चुनाव होगा। सवाल वही है – क्या बिहार पिछली यादों के जाल में फंसकर रहेगा या नई राह चुनेगा? और क्या सत्ताधारी दल यह समझ पाएंगे कि जंगलराज का डर दिखाना अब शायद उनके खुद के खिलाफ एक बूमरैंग बन चुका है? यह चुनाव बिहार के लिए एक ऐतिहासिक मोड़ साबित हो सकता है।