उत्तराखण्ड में उपनल के माध्यम से कार्यरत करीब 22 हजार अस्थाई कर्मचारी वर्षों से नियमितीकरण का इंतजार कर रहे हैं। हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के आदेशों के बावजूद प्रक्रिया अधूरी, 10 नवम्बर से अनिश्चितकालीन हड़ताल की घोषणा
उत्तराखण्ड में उपनल के माध्यम से विभिन्न सरकारी विभागों में कार्यरत लगभग 22 हजार अस्थाई कर्मचारियों का सब्र अब टूट गया है। नियमितीकरण में देरी और ‘बराबर वेतन, बराबर काम’ की मांग को लेकर उपनल संयुक्त मोर्चा ने 10 नवम्बर से अनिश्चितकालीन हड़ताल पर जाने का एलान किया है। संयुक्त मोर्चा के प्रांतीय महामंत्री विनय प्रसाद ने कहा कि प्रदेश सरकार ने बार-बार आश्वासन देने के बावजूद अब तक कोई ठोस कदम नहीं उठाया है। हाईकोर्ट ने वर्ष 2018 में उपनल कर्मचारियों के पक्ष में फैसला सुनाया था और उसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने भी इस आदेश को बरकरार रखते हुए राज्य सरकार को उचित कार्रवाई करने के निर्देश दिए थे, लेकिन नियुक्ति प्रक्रिया और नीतिगत निर्णयों में देरी के कारण कर्मचारियों में गहरी नाराजगी फैल गई है।
कर्मचारियों का कहना है कि वर्षों तक सरकारी विभागों में काम करने के बावजूद उन्हें स्थाई कर्मचारी का दर्जा, समान वेतन और सेवा सुरक्षा नहीं मिल रही है। कई कर्मचारी बिजली, स्वास्थ्य, शिक्षा और अन्य महत्वपूर्ण विभागों में अहम जिम्मेदारियां निभा रहे हैं, फिर भी उन्हें सीमित वेतन और असुरक्षित नौकरी के सहारे काम करना पड़ रहा है। आंदोलन को उत्तरांचल बिजली कर्मचारी संघ सहित कई अन्य कर्मचारी संगठनों का भी समर्थन मिल चुका है। बिजली कर्मचारी संघ के पदाधिकारियों का कहना है कि उपनल कर्मियों के साथ लगातार अन्याय हो रहा है और सरकार को कोर्ट के आदेश का सम्मान करते हुए उन्हें स्थाई करना चाहिए।
बताया जाता है कि सरकार ने पहले स्थाईकरण का आश्वासन दिया था और नीति बनाने की बात कही गई थी, लेकिन अब भी फाइलें विभागों के बीच घूम रही हैं। उधर, कर्मचारी नेताओं ने साफ कर दिया है कि यदि शासन-प्रशासन ने समय रहते वार्ता कर समाधान नहीं निकाला तो 10 नवम्बर से पूरे प्रदेश में सेवाएं प्रभावित हो सकती हैं। स्वास्थ्य सेवाओं से लेकर बिजली व्यवस्था और प्रशासनिक कार्य तक कई विभागों पर असर पड़ने की आशंका है।
इस बीच, आम जनता भी चिंतित है कि त्योहारों और रजत जयंती कार्यक्रमों के दौरान हड़ताल से प्रदेश में कई व्यवस्थाएं बाधित हो सकती हैं। कर्मचारियों ने कहा कि वे टकराव नहीं चाहते, लेकिन सम्मानजनक सेवा शर्तों के लिए संघर्ष उनका हक है। यह भी सवाल उठ रहा है कि जब कोर्ट स्पष्ट आदेश दे चुका है और सरकार स्वयं नीति बनाने की बात कह चुकी है तो आखिर स्थाईकरण प्रक्रिया लटकी क्यों है?
उधर, राजनीतिक गलियारों में भी इस मुद्दे पर चर्चा शुरू हो गई है। सामाजिक-सैन्य पृष्ठभूमि वाले प्रदेश में पूर्व सैनिकों और उनके आश्रितों के संगठन भी इस मुद्दे को लेकर सक्रिय हैं, क्योंकि उत्तराखण्ड पूर्व सैनिक कल्याण निगम लिमिटेड मूल रूप से पूर्व सैनिकों और उनके आश्रितों को रोजगार उपलब्ध कराने के उद्देश्य से बनाई गई थी। समय के साथ विभिन्न विभागों ने इसके माध्यम से अस्थाई भर्ती शुरू कर दी, जिसके कारण बड़ी संख्या में सामान्य युवा भी इसके जरिए सेवा में जुड़े और आज वहीं अस्थाई कर्मचारी स्थाई भविष्य की लड़ाई लड़ रहे हैं।
कर्मचारी नेताओं ने चेतावनी दी है कि यह आंदोलन शांतिपूर्ण रहेगा, लेकिन सरकार की उदासीनता जारी रही तो इसे राज्यव्यापी जन-आंदोलन में बदला जाएगा। अब सबकी निगाहें इस बात पर हैं कि क्या सरकार 10 नवम्बर से पहले कोई निर्णायक कदम उठाती है या फिर प्रदेश को व्यापक हड़ताल का सामना करना पड़ेगा।