Uttarakhand

सूखती ‘नीर’ देने वाली ‘छतरियां’

उत्तराखण्ड में बहने वाली बड़ी-छोटी नदियों का पानी लगातार रिस रहा है। उत्तराखण्ड के करीब 40 प्रतिशत भूभाग को गैरहिमानी नदियां सींचती हैं। लोगों की प्यास बुझाने व खेतों को सींचने वाली इन नदियों पर अब संकट आ खड़ा हुआ है। गैर हिमानी नदियों पर यह संकट इनकी सहायक जलधाराओं के सूखने से बढ़ा है जो इन नदियों को सदानीरा बनाने में अपना योगदान देती रही हैं। उत्तराखण्ड में नदियों व इनकी सहायक धाराओं को बचाने के लिए कागजी काम तो बहुत हुआ है लेकिन धरातल ठोस काम कम ही हो पाया है। जल संग्रहण के नाम पर लगातार खानापूर्ति होती रही है। व्यक्तिगत स्तर पर जरूर कुछ ठोस पहल हुई हैं लेकिन सरकारी स्तर पर हमेशा से सुस्ती व उदासीनता के चलते प्रदेश की 353 गैर हिमानी नदियां अपने अस्तित्व को बचाने के लिए संघर्ष कर रही हैं

देश की नदियों का अस्तित्व गहरे संकट में है। नदियों पर शोध करने वाले प्रो. जीवन सिंह रावत ने कुमाऊं की लाइफ लाइन कही जाने वाली ‘कोसी’ व गढ़वाल में ‘रिस्पना’ नदी को मौसमी नदियों में बदल जाने की जो चेतावनी बहुत पहले दी थी, उस पर भी अमल के नाम पर खानापूर्ति ही अधिक होती रही है। उदाहरण के तौर पर अगर कोसी नदी को ही लें तो विज्ञानी कहते हैं कि कोसी का जल प्रवाह नब्बे के दशक में 790 लीटर प्रति सेंकंड था जो वर्तमान में 35 लीटर प्रति सेकंड के आस-पास सरक गया है। कोसी ही नहीं पश्चिमी रामगंगा व गगास का उद्गम व कोसी की सहायक नदियां कौशल्या, गंगा, रूद्रगंगा, पीनाथगंगा व देवगढ़ नदियों की कोख सूख रही है। इसको सींचने वाले 105 गधेरे सूख चुके हैं। इससे ये नदियां विलुप्ति के कगार पर हैं। जागेश्वर में सदानीरा जटागंगा का अस्तित्व खतरे में है। कोसी की सहायक नदी कंुजगढ़ तो भूमिगत हो चली है। गोमती की सहायक गरूड़ गंगा और सरोदगाढ़ मौसमी नदी बन गई है। पश्चिमी रामगंगा को नीर देने वाली छतरियां, गिवाड़, कल्याणी व टोटापांगर नदी भी संकट में हैं। इसके अलावा कुमाऊं में कोसी, कुजगढ़, रामगढ़, सिरौता, उत्तर वाहिनी शिप्रा, पनार, लोहावती, नघारन, गौला तो वहीं गढ़वाल में पूर्वी व पश्चिमी नैयर, रिस्पना, आसण, बिदाल, सोना, सौंग आदि नदियों का अस्तित्व भी संकट में है। इन नदियों का पानी लगातार कम हो रहा है। सोचने वाली बात यह है कि आंखिर, आने वाले समय में बगैर जल की नदियों का नजारा कैसा होगा? जल बचाने की वकालत तो हो रही है लेकिन धरातल पर काम नहीं हो पा रहा है। उत्तराखण्ड के पर्वतीय क्षेत्र में लगातार गैर बर्फीली नदियों का अस्तित्व खतरे में में आ रहा है। इनमें से ज्यादातर नदियां केवल बरसाती बनकर रह गयी हैं। जबकि सदा बहती रहने वाली इन नदियों के सहारे ही पर्वतीय क्षेत्र का ताना-बाना, रचा-बसा है। इनके प्रभावित होने से गांव का जीवन भी प्रभावित हो रहा है।

गैर बर्फीली नदियां गांव के अपने जल स्रोतों, नौलों व धारों के सहारे ही जीवित हैं। अब नल है, नल का पानी है। नलों से आने वाला पानी यूं बह रहा है। पानी की बरबादी की तरफ से सिस्टम ने मुंह मोड़ रखा है। पानी न आने पर हाहाकार है। जल संरक्षण के नाम पर खानापूर्ति अधिक है। ऐसे में अब सवाल यह है कि नदियां कब तक हमें पानी देती रहेंगी जबकि नदियों के जल स्रोत तो सूखते जा रहे हैं। पोखर, कुंड, हौस, चाल, चैरी, तौली, खाल, धारे, नौले तो अब बीते जमाने की बात हो गई हैं। यही नहीं नदियां लगातार प्रदूषित भी हो रही हैं। सीवेज सिस्टम की खामी के चलते नदियों का प्रदूषण बढ़ रहा है। जलशक्ति मंत्रालय का भी मानना रहा है कि सीवरों का गंदा पानी नदियों में जाकर उन्हें बिषाक्त बना रहा है। नदियों के किनारे जो सीवेज शोधन संयत्र हैं वे पूरी क्षमता से काम नहीं करते हैं। कहीं-कहीं तो उनकी क्षमता इतनी कम है कि वे सीवरों के आधे गंदे पानी का भी सोधन नहीं कर पाते। ये संयत्र समय-समय पर खराब होते रहते है। गंदे नालों का कचरा सीधे नदियों में जा रहा है। हालांकि सरकारी स्तर पर नदियों के पुनर्जीवीकरण के लिए स्प्रिंग एंड रिवर रिज्युविनेशन अथाॅरिटी (सारा) के तहत कई तरह की योजनाएं बनाई जा रही हैं। इसके तहत प्रत्येक जिले में एक नदी के पुनर्जीवीकरण का लक्ष्य भी रखा गया है। सरकार पांच नदियों का पुनर्जीवन करने जा रही है। राज्य में नदियों, जलस्रोतों एवं धाराओं के संरक्षण के लिए ही ‘सारा’ का गठन किया गया है। इसमें सौंग (देहरादून व टिहरी), पूर्वी एवं पश्चिमी नयार (पौड़ी), शिप्रा (नैनीताल) एवं गौड़ी (चम्पावत) को इस योजना में शामिल किया गया है। अभी तक 5428 जलस्रोत चिन्ह्ति किए जा चुके हैं।

नीति आयोग से नदी जोड़ो परियोजना के अंतर्गत पिंडर को कोसी, गगास, गोमती व गरूड़ नदी से जोड़ने का अनुरोध किया गया है। देहरादून एलिवेटेड कारिडोर के अंतर्गत रिस्पना और बिंदाल काॅरिडोर का कार्य किया जा रहा है। नदियों व जलस्रोतों के पुनर्जीवीकरण के कार्य तेजी से हों, इसके लिए यूकास्ट, यूसर्क के साथ ही जल संरक्षण- संवर्द्धन के लिए कार्य करने वाली संस्थाओं का सहयोग लिया जा रहा है। जिन नदियों व जलस्रोतों को पुनर्जीवीकरण के लिए चिन्हित किया गया है, उनका बेस लाइन डेटा तैयार करने के साथ ही लघु और दीर्घकालिक योजना के साथ कार्य किया जाएगा। प्रदेश में नदियों व जलस्रोतों के पुनर्जीवीकरण के लिए वैज्ञानिक आधार पर कार्य करना सरकार की प्राथमिकता है।

पुष्कर सिंह धामी, मुख्यमंत्री, उत्तराखण्ड

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