Uttarakhand

स्मार्टनेस से दूर स्मार्ट सिटी

उत्तराखण्ड के सबसे बड़े शहर देहरादून को स्मार्ट सिटी बनाने में धामी सरकार असफल होती नजर आ रही है। परियोजना के अंतर्गत ग्रीन बिल्डिंग्स को छोड़कर सभी कार्य पूरे हो चुके हैं लेकिन निर्माण कार्यों में गुणवत्ता की कमी और भारी लेट-लतीफी जैसे विवाद स्मार्ट सिटी परियोजना से जुड़े रहे हैं। देहरादून शहर को स्मार्ट सिटी बनाने की अवधि 31 मार्च 2025 को पूरी हो गई है। जिसके बाद इस योजना को विस्तार दिया जाएगा या नहीं यह केंद्र और राज्य सरकार के बीच तय होना है। जानकारों की मानें तो अति आवश्यक ग्रीन बिल्डिंग्स को सबसे पहले पूरा किया जाना चाहिए था लेकिन परियोजना के कर्ताधर्ताओं और शासन के बीच बेहतर तालमेल न होने के चलते यह योजना पूरी नहीं हो पाई

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ड्रीम प्रोजेक्ट स्मार्ट सिटी में शामिल देहरादून की समय सीमा 31 मार्च 2025 को पूरी हो गई। लेकिन अभी भी देहरादून स्मार्ट सिटी में तब्दील नहीं हो पाया है। हालांकि ग्रीन बिल्डिंग्स काॅन्सेप्ट को छोड़कर सभी कार्य पूरे हो चुके हैं लेकिन निर्माण कार्यों में गुणवत्ता की कमी और भारी लेट-लतीफी जैसे विवाद स्मार्ट सिटी परियोजना से हमेशा जुड़े रहे। अब परियोजना का कार्यकाल पूरा हो चुका है जिसके बाद विस्तार दिया जाएगा या नहीं यह केंद्र सरकार और राज्य सरकार के बीच तय होना है। जानकारों की मानें तो ग्रीन बिल्डिंग्स जैसे अति महत्वपूर्ण फैक्टर जैसी अति आवश्यक योजना को सबसे पहले पूरा किया जाना चाहिए था लेकिन परियोजना के कर्ताधर्ताओं और शासन के बीच बेहतर तालमेल न होने से यह योजना पूरी नहीं हो पाई है। अगर विस्तार नहीं मिलता है तो राज्य सरकार पर ही इसका बोझ पड़ना निश्चित है।

वर्ष 2015 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा देश के 100 शहरों को स्मार्ट सिटी बनाए जाने का निर्णय लिया गया था। उत्तराखण्ड को भी इस योजना से जोड़ा गया और देहरादून शहर को स्मार्ट सिटी में रखा गया। पांच वर्ष के भीतर सभी कार्यों को पूरा किया जाना था। इस योजना में 21 कार्यों को रखा गया जिसमें वाटर मैनेजमंेट, सीवर लाईन, स्मार्ट शौचालय, दून लाईब्रेरी, पेयजल आपूर्ति, पेयजल लाईन, मुख्य बाजार पलटन बाजार का सौंदर्यीकरण, इलेक्ट्रिक बस, समार्ट पोल, ड्रेनेज सिस्टम, स्मार्ट पेयजल मीटर, वर्षा जल निकासी, मल्टीयूटिलिटी डक्ट, स्मार्ट रोड और ग्रीन बिल्डिंग्स के अलावा स्मार्ट स्कूल, पेयजल एटीएम, कमांड एंड कंट्रोल सेंटर, ई-क्लेक्ट्रेड, सिटीजन आउट रीच, पैडिस्ट्रिीयन क्राॅस स्मार्ट बस स्टेशन, इंडिकेटिव क्राॅस और कमांड सेंटर रखे गए थे।

उत्तराखण्ड के लिए वरदान मानी जा रही इस परियोजना के लिए प्रदेश का सरकारी सिस्टम और उसकी कार्यशैली कितनी गम्भीर रही इसका भी खुलासा परियोजना से बाहर निकलकर आया है। 2015 में स्वीकृत परियोजना चार वर्ष तक तो फाइलांे में ही घूमती रही। स्मार्ट सिटी परियोजना पर राजनीति भी खूब देखने को मिली। लेकिन इस दौरान 2015 में जब यह परियोजना शुरू की गई थी तब प्रदेश में कांग्रेस की हरीश रावत सरकार थी। हरीश रावत सरकार और केंद्र सरकार के बीच सम्बंध बेहद कटु थे। 2016 में कांग्रेस में बड़ी टूट हुई और हरीश रावत सरकार को केंद्र सरकार ने बर्खास्त करके राज्य में राष्ट्रपति शासन लगा दिया। हालांकि हाईकोर्ट नैनीताल के निर्णय के बाद हरीश रावत सरकार की वापसी हुई लेकिन परियोजना पर ग्रहण यथावत बना रहा।

केंद्र सरकार द्वारा देहरादून को स्मार्ट सिटी बनाए जाने के बाद शहर के विस्तारीकरण हेतु जमीन की आवश्यकता पड़ी। तत्कालीन प्रदेश सरकार द्वारा आरकेडिया स्थित चाय बागान की भूमि का प्रस्ताव केंद्र सरकार को भेजा। गौर करने वाली बात यह है कि हरीश रावत सरकार हुडको से करीब 2500 करोड़ का ऋण लेकर इस चाय बागान की भूमि का अधिग्रहण करने का निर्णय ले चुकी थी। इस पूरे मामले में एक बात यह भी सामने आई कि स्मार्ट सिटी के लिए महज 250 एकड़ भूमि की ही आवश्यकता थी जबकि राज्य सरकार चाय बागन की 720 एकड़ भूमि का अधिग्रहण करना चहती थी।

परियोजना के सभी कार्य पूरे हो चुके हैं, केवल ग्रीन बिल्डिंग का कार्य पूरा नहीं हुआ है। इसका एक कारण यह भी रहा है कि जमीन के चयन में विवाद थे। परिवहन डिपो की जमीन पर कर्मचारियों का आंदोलन हुआ जिसके कारण देरी हुई। फिर लैंड ट्रांसफर प्रक्रिया में भी देरी हुई, इस कारण ग्रीन बिल्डिंग का निर्माण समय पर शुरू नहीं हो पाया, अब काम हो रहा है। विस्तार खत्म होने से निर्माण कार्य नहीं रूकते जो काम चल रहे हैं उनको समय पर पूरा कर लिया जाएगा।

तीरथ पाल सिंह, सहायक मुख्य कार्य अधिकारी, स्मार्ट सिटी परियोजना देहरादून

प्रदेश में इस निर्णय का भारी विरोध हुआ और भाजपा ने इस को लेकर खासा हंगामा करते हुए भूमि के अधिग्रहण पर गम्भीर सवाल खड़े किए। आरोप लगाया गया कि चाय बागान की भूमि को बागान मालिक बेचने का प्रयास वर्षों से करते रहे हैं और उनके इस प्रयास को तत्कालीन कांग्रेस सरकार भूमि अधिग्रहण करके मदद कर रही है। इसके अलावा चाय बागान के समीप विख्यात भरतीय सैन्य अकादमी भी है जिसके चलते इस पूरे क्षेत्र में कई तरह की पाबंदियां भी हैं। बावजूद इसके राज्य सरकार द्वारा स्मार्ट सिटी के लिए चीन के तांगझी विश्वविद्यालय के साथ अनुबंध करने जा रही थी। इसके चलते भाजपा ने इस को राष्ट्र की सुरक्षा के लिए बड़ा खतरा बताते हुए केंद्र सरकार को राज्य सरकार के निर्णय की जानकारी दी जिसके बाद केंद्र सरकार ने चाय बागान की भूमि होने के चलते उक्त प्रस्ताव को खारिज कर दिया। हैरत की बात यह है कि 2023 में प्रदेश में भाजपा सरकार ने भी स्मार्ट सिटी परियोजना के लिए चाय बागान की भूमि को फिर से शामिल करने का निर्णय लिया लेकिन विरोध के बाद उसे भी अपने कदम पीछे करने पड़े। एक तरह से कहा जाए कि स्मार्ट सिटी की आड़ में दून में बचे-खुचे चाय बागान को भी खत्म करने का प्रयास सरकारी सिस्टम द्वारा किया जा रहा था तो गलत नहीं होगा।

यही नहीं परियोजना पर अनेक विवाद होते रहे जिसमें बजट को लेकर भी विवाद सामने आया। दरअसल, केंद्र सरकार से स्मार्ट सिटी परियोजना के लिए 1 हजार करोड़ रुपए का बजट निर्धारित किया गया था। इसमें राज्यों को 50 फीसदी बजट स्वयं अपने बजट से खर्च करना था लेकिन कई हिमालयी और पूर्वोत्तर के राज्यों द्वारा 50 प्रतिशत बजट उपलब्ध करवाने में असमर्थता जताई तो केंद्र सरकार द्वारा इसके लिए 90/10 का फाॅर्मूला तय किया। जिसमें केंद्र सरकार बजट का 90 प्रतिशत खर्च करेगी और राज्य सरकार को महज दस प्रतिशत ही खर्च करना था। इस तरह से उत्तराखण्ड राज्य को स्मार्ट सिटी के लिए 1 हजार करोड़ में केंद्र सरकार द्वारा 9 सौ करोड़ रुपए मिलने थे और प्रदेश को सिर्फ 100 करोड़ ही खर्च करने थे। परंतु 2023 में स्मार्ट सिटी परियोजना के लिए तय बजट में केंद्र सरकार द्वारा 50 प्रतिशत की कटौती किए जाने की भी बात सामने आई जिसके चलते अब 1 हजार करोड़ की बजाए महज 550 करोड़ का ही बजट स्मार्ट सिटी के लिए रह गया। इसके बाद परियोजना के शेष निर्माणाधीन कामों के पूरे होने पर भी सवाल खड़े होने लगे लेकिन राज्य सरकार ने दावा किया कि 450 करोड़ का खर्च राज्य सरकार स्वयं खर्च करेगी जिसकेे लिए सरकार अतिरिक्त फंडिंग की व्यवस्था करेगी। हालांकि बजट का विवाद सुलझ गया और आखिरकार स्मार्ट सिटी के काम होते रहे।

बेहतरीन परियोजना में राजनीति के अलावा सरकारी सिस्टम की लचर कार्यशैली और निर्माण कार्यों में गुणवत्ता की कमी के विवाद भी खूब हुए। 2019 में परियोजना के निर्माण कार्य आरम्भ हुए लेकिन उनका परीक्षण और निरीक्षण के लिए कोई ठोस कार्ययोजना तक नहीं बनाई गई। परियोजना के ठेकेदारों पर काम में लापरवाही और परियोजना में स्वीकृत ब्लू प्रिंट के इतर काम करने के आरोप भी जमकर लगते रहे। जबकि प्रदेश में भाजपा की प्रचंड बहुमत की सरकार थी जो भाजपा कांग्रेस की हरीश रावत सरकार पर परियोजना को लटकाने का आरोप लगाते हुए नहीं थकती थी, वही भाजपा सत्ता में आने के बाद अचानक से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के इस ड्रीम प्रोजेक्ट को गम्भीरता से लेना ही भूल गई। यहां तक कि नगर निगम देहरादून में भाजपा का कब्जा होने के बावजूद परियोजना के कामांे पर कोई नियंत्रण और देखरेख तक नहीं रखा गया। लगभग पूरी परियोजना ठेकेदारांे और परियोजना प्रबंधन स्मार्ट सिटी परियोजना के हवाले छोड़ दी गई। इसका परिणाम यह हुआ कि निर्माण कार्य कछुआ गति से चलने लगे जिससे समूचे देहरादून शहर में भारी अव्यवस्था होने लगी।

साथ ही स्मार्ट की नोडल एजेंसी को लेकर भी विवाद सामने आया तो कभी इसके टेंडर प्रक्रिया को लेकर हंगामा मचा। सरकार ने इसके लिए बीच का रास्ता अपनाते हुए एमडीडीए को नोडल एजेंसी बनाया और जिलाधिकारी देहरादून को स्मार्ट सिटी योजना का सीईओ बनाकर सिटी के निर्माण का रास्ता साफ कर दिया। बावजूद इसके स्मार्ट सिटी के कामांे में पहले की तरह ही लेट-लतीफी कम नहीं हुई और कामों की गुणवत्ता पर गम्भीर सवाल खड़े होते ही रहेे। हैरानी की बात यह है कि विपक्ष के अलावा सत्तापक्ष के विधायक भी निर्माण कार्यों की गुणवत्ता को लेकर सवाल उठाते रहे लेकिन न तो सरकार और न ही जिलाधिकारी
देहरादून ने इन आरोपों की सच्चाई जानने के प्रयास किए। एक तरह से सरकार ने सभी आरोपांे को खारिज करते हुए निर्माण कार्यों को सही ठहराते हुए सभी के मंुह बंद कर दिए।

स्मार्ट सिटी परियोजना पर मैं पहले भी सवाल उठाता रहा और आज भी उठा रहा हूं। करोड़ों रुपए खर्च कर दिए गए हैं लेकिन आज भी मुझे ऐसा नहीं दिखता है कि देहरादून स्मार्ट शहर बना हो। हमें लोग कह रहे हैं कि जितने करोड़ खर्च करके ये काम किए गए हैं उतने में तो एक नया शहर ही खड़ा हो जाता। तीन- तीन बार एक्टेंशन दिए जाने के बाद भी स्मार्ट सिटी के काम पूरे नहीं हो पाए हैं। जो निर्माण कार्य किए गए हैं उनकी स्थिति को देखकर यह नहीं कह सकते कि यह स्मार्ट सिटी के काम किए गए होंगे। मैं कल ही ग्रीन बिल्डिंग्स के काम को देखने के लिए गया वहां देखकर मैं इतना निराश हुआ कि क्या कहूं। अभी सिर्फ 15 प्रतिशत ही काम हो पाया है। सुरक्षा के कोई इंतजाम तक नहीं किए गए हैं। स्थानीय लोगों की बिल्डिंग को भी खतरा बन गया है। जिस तरह से स्मार्ट सिटी परियोजना का काम इन वर्षों में हुआ है उसे देखकर मुझे नहीं लगता कि ग्रीन बिल्डिंग्स का काम अगले पांच साल में भी पूरा हो पाएगा।

खजान दास, विधायक, राजपुर

भाजपा के जो विधायक गुणवत्ता पर सवाल उठा रहे थे, उनको पार्टी अनुशासन का हवाला देकर चुप करवा दिया और कांग्रेस के आरोपांे को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि कांग्रेस सरकार पूरे दो वर्ष तक स्मार्ट सिटी के कामों पर उदासीन रही। 2018 में नगर निगम महापौर रहे धर्मपुर के भाजपा विधायक के कार्यकाल में स्मार्ट सिटी का ब्लू पिं्रट तैयार किया गया था लेकिन अब स्वयं विनोद चमोली ही इस पर सवाल खड़े करते रहे हैं कि जो 2018 में ब्लू पिं्रट तैयार किया गया था उसके अनुरूप काम ही नहीं किए गए।

स्मार्ट सिटी के निर्माण कार्यों पर राजपुर के विधायक और पूर्व मंत्री रहे खजानदास ने सबसे ज्यादा सवाल खड़े करते हुए अधिकारियों को चेतावनी तो दी ही साथ ही इसकी शिकायत केंद्रीय शहरी विकास मंत्रालय सेे भी की। करीब एक वर्ष पूर्व भेजे गए शिकायती पत्र में विधायक खजानदास ने स्मार्ट सिटी के निर्माण कार्यों पर गम्भीर सवाल खड़े किए थे जिसमें राजपुर रोड में घंटाघर से लेकर दिलाराम चैक और किशननगर चैक तक किए गए निर्माण कार्यों को गुणवत्ता के बगैर किए जाने का उल्लेख किया। साथ ही बार-बार अधिकारियों को निर्देश देने के बाद भी निर्माण कार्यों में सुधार नहीं किए जाने की शिकायत की गई थी।

केंद्रीय शहरी विकास मंत्रालय द्वारा विधायक खजानदास के शिकायती पत्र को संज्ञान में लिया गया और प्रदेश के मुख्य सचिव को कार्यवाही के लिए पत्र भेजा। हैरत की बात यह है कि पत्र मिलने के बावजूद शासन इस पत्र पर कार्यवाही करने के बजाय उदासीन ही रहा। एक वर्ष के बाद प्रदेश का शासन नींद से जागा और शहरी विकास विभाग से रिपोर्ट मांगी गई। इससे यह पूरी तरह से साफ हो जाता है कि स्मार्ट सिटी परियोजना के लिए प्रदेश सरकार और उसका शासन-प्रशासन किस तरह से प्रतिबद्ध था। परियोजना को तय समय सीमा में पूरा करने के लिए काई ठोस आदेश या कार्यवाही देने के बजाय परियोजना को लगातार तीन- तीन बार विस्तार दिया जाता रहा तीसरा विस्तार भी 31 मार्च 2025 को खत्म हो गया लेकिन ग्रीन बिल्डिग्ंस का काम अभी महज 25 फीसदी ही हो पाया है। अब परियोजना की समय सीमा भी खत्म हो चुकी है। परियोजना के लिए अवमुक्त बजट में से 765 करोड़ निर्माण कार्यों में खर्च हो चुके हैं, शेष 235 करोड़ रुपया खर्च होना बाकी है जो कि सम्भवतया ग्रीन बिल्डिंग इत्यादि के निर्माण में खर्च होना है।

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