आज जब गली-कूचों से निकलने वाले अखबार, पोर्टल से लेकर बड़े मीडिया हाउसों तक काॅरपोरेट और सत्ता की गोद में बैठे सपष्ट नजर आ रहे हैं, तब सुरेंद्र प्रताप सिंह यानी एसपी सिंह की याद आना स्वाभाविक है। एसपी के बहाने मैं इसे आत्ममंथन का अवसर मानता हूं। एसपी सिंह वह नाम हैं जिन्होंने न केवल पत्रकारिता को नई भाषा और तेवर दिए, बल्कि उसे सत्ता के सामने तनकर खड़े होने का हौसला भी दिया। आज के पत्रकार, जिनमें बहुतों ने उनके शिष्यत्व में पत्रकारिता की शुरुआत की, चाहे जितनी ऊंचाइयों पर हों, एसपी सिंह जैसे बनने का साहस उनमें बहुत कम दिखाई देता है। सन 1970-80 के दशक में हिंदी पत्रकारिता में जो प्रभाव एसपी सिंह ने डाला, वह अद्वितीय था। वह पत्रकारिता में भाषा और शैली के ऐसे शिल्पी थे जिन्होंने खबर को न केवल ताकत दी, बल्कि उसका व्याकरण ही बदल डाला। उनका नाम जुड़ा है ‘रविवार’ पत्रिका से, जिसकी गूंज उस समय सत्ता के गलियारों में डर की तरह सुनी जाती थी। लेकिन वे यहीं नहीं रुके। हिंदी इलेक्ट्राॅनिक मीडिया का जो स्वरूप आज हमारे सामने है, उसकी नींव रखने वाले सबसे पहले व्यक्तियों में एसपी सिंह का नाम अग्रगण्य है।
सन् 1995 में जब ‘आज तक’ ने दूरदर्शन पर एक सीमित समय की साप्ताहिक समाचार प्रस्तुति के रूप में शुरुआत की थी, तब उसके पहले संपादक एसपी सिंह ही थे। एक सहज, आत्मविश्वासी और निर्भीक स्वर में जब वे कैमरे के सामने खबर सुनाते थे, तो देश के लाखों लोग चुपचाप उन्हें सुनते थे। उन्होंने टी.वी. पत्रकारिता को शोर-शराबे से अलग एक गरिमा दी, जहां न भाषाई भड़कीलापन था, न चेहरे पर बनावटी गुस्सा सिर्फ तथ्य और विश्लेषण। उनका समाचार पढ़ने का ढंग इतना असरदार था कि ‘आज तक’ का वह कार्यक्रम देशभर में हिंदी पत्रकारिता के लिए मानक बन गया। उन्होंने ‘टीवी’ को सिर्फ एक नया माध्यम नहीं माना, बल्कि एक नई जिम्मेदारी समझा, जहां कैमरे के पीछे भी ईमानदारी उतनी ही जरूरी थी जितनी कैमरे के सामने।
एसपी सिंह का जन्म 4 दिसम्बर 1948 को हुआ और 27 जून 1997 को मात्र 48 वर्ष की आयु में उन्होंने इस धरती को अलविदा कह दिया। लेकिन इतने कम समय में उन्होंने जो छाप छोड़ी, वह आज भी भारत की पत्रकारिता की चेतना में जीवित है। उनकी मृत्यु एक असमय गए सूर्यास्त की तरह थी, जिसने अपनी रोशनी के बल पर कई नक्षत्रों को जन्म दिया, लेकिन उनके बाद वह प्रकाश तितर-बितर होता गया। 27 जून को उनका स्मृति दिवस मनाया गया। सोशल मीडिया में उनकी तारीफ पर कसीदे लिखे गए। मुझे लगा एसपी को याद करते हुए थोड़ा आत्म मंथान-चिंतन तो बनता ही है।
1983 का साल था। देश में इंदिरा गांधी की सत्ता थी और मध्य प्रदेश में कांग्रेस की सरकार। इंदौर के विधायक यज्ञदत्त शर्मा विधानसभा अध्यक्ष थे और उन पर एक बड़े जमीन घोटाले में लिप्त होने के गम्भीर आरोप लगे। यह रिपोर्ट वसंत पोद्दार और सुभाष रानडे ने लिखी और उसे ‘रविवार’ के कुख्यात हो चुके अंक में सुरेंद्र प्रताप सिंह ने प्रकाशित किया। जैसे ही यह खबर प्रकाशित हुई, यज्ञदत्त शर्मा तिलमिला उठे। उन्होंने न सिर्फ उस अंक की प्रतियां बाजार से गायब करवाईं, बल्कि दो पत्रकारों को धमकियां दीं और रविवार के संपादक एसपी सिंह को ‘विधानसभा की अवमानना’ का नोटिस भेज दिया।
एसपी सिंह ने इस नोटिस का जो उत्तर दिया, वह भारतीय पत्रकारिता के इतिहास में स्वर्णाक्षरों में लिखा गया। उन्होंने लिखा-‘‘स्पीकर खुदा नहीं होता और हम भ्रष्ट खुदा के भी खिलाफ हैं।’’ यह सिर्फ जवाब नहीं था, यह पत्रकारिता की भूमिका पर एक घोषणा पत्र था। सत्ता चाहे जिस भी स्तर पर हो, विधायक, मुख्यमंत्री, प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति, पत्रकार का काम है सच को सामने लाना, ना कि सत्ता की पालकी उठाना। एसपी सिंह की निर्भीकता का असर इतना व्यापक हुआ कि खुद इंदिरा गांधी के दफ्तर तक यह मामला पहुंचा। नतीजा यज्ञदत्त शर्मा को दिल्ली बुलाया गया और इस्तीफा देने का निर्देश मिला। इसके साथ ही उनका राजनीतिक करियर ढलान पर चला गया।
यह प्रसंग मुझे 2003-2004 की उस घटना की याद दिलाता है जब उत्तराखण्ड की पहली निर्वाचित सरकार में, तत्कालीन विधानसभा अध्यक्ष यशपाल आर्य ने मुझे भी विधानसभा की अवमानना का नोटिस भेजा था। मुद्दा था हल्द्वानी के गौजाजाली गांव में एक स्टोन क्रशर का, जो पर्यावरण और लोगों की सेहत के लिए खतरा बन गया था। हमारा समाचार उस क्रशर के खिलाफ था और यह तथ्य भी सामने आया था कि यशपाल आर्य स्वयं उस क्रशर के साझेदारों में शामिल हैं। पांच साल तक मुझे लगातार नोटिस मिलते रहे। मुझे विधानसभा में पेश होने को कहा गया, और बार-बार यह संकेत दिया गया कि यदि मैं माफी नहीं मांगता तो मुझे जेल भेजा जा सकता है। उस समय के मुख्यमंत्री नारायण दत्त तिवारी जी मुझे स्नेह करते थे। उन्होंने मुझसे कहा-‘‘विधानसभा अगर आपको जेल भेजे तो?’’ मेरा उत्तर था-‘‘आप किसी गेस्ट हाउस को जेल घोषित कर दीजिए, मैं वहीं चला जाऊंगा लेकिन माफी नहीं मांगूंगा।’’ यह किस्सा एसपी सिंह की पत्रकारिता की परम्परा से ही जुड़ता है। हमने खबरें सत्ता के भय से नहीं, जनहित में लिखी थीं। आज उस तेवर की कितनी जरूरत है?
आपातकाल के बाद जब जनता पार्टी की सरकार बनी और श्री लालकृष्ण आडवाणी को सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय सौंपा गया, तब उन्होंने एक बार पत्रकारों की बैठक में कहा था- ‘‘इंदिरा जी ने आपसे झुकने को कहा था, लेकिन आप तो लेट ही गए।’’ यह कथन केवल कटाक्ष नहीं था, यह उस समय की पत्रकारिता पर एक टिप्पणी थी, जिसमें बड़े नाम सत्ता के सामने नतमस्तक हो गए थे और कुछ ही लोग थे जिन्होंने सच बोलने का जोखिम उठाया। एसपी सिंह उन्हीं विरले लोगों में एक थे जिन्होंने किसी कीमत पर अपने विवेक को नहीं बेचा।
आज का परिदृश्य देखें तो पत्रकारिता की वह आग बुझ चुकी है। आज स्टूडियो में बैठा एंकर सत्ता के तलवे चाटता है और सरकारी योजनाओं के पोस्टर जैसा बर्ताव करता है। एक जमाना था जब पत्रकार सत्ताधारी के खिलाफ सीधा सवाल पूछते थे, अब पत्रकार उस नेता के खिलाफ ट्वीट तक करने से डरते हैं, जिनका उन्होंने 10 साल तक साक्षात्कार किया हो। पत्रकारिता अब जन संपर्क हो गई है। सत्ता की आलोचना करना ‘देशद्रोह’ माना जाता है। कई टीवी चैनलों के पीछे चिल्लाते एंकर चुपचाप सत्ताधीशों की भाषा बोलते हैं। क्या यह पत्रकारिता है?
आज की सत्ताधारी व्यवस्था के सामने वही दृश्य उभर रहा है जो आपातकाल के समय था, जो आवाज उठाते हैं, उन्हें ‘देशद्रोही’, ‘गद्दार’ या ‘विकृति’ कहा जाता है। लेकिन सच्चा पत्रकार वही है जो अपनी कलम को तलवार की तरह प्रयोग करे, सत्ता के खिलाफ नहीं, बल्कि सत्य के पक्ष में। एसपी सिंह की पत्रकारिता हमें रास्ता दिखाती है। उन्होंने बताया कि एक पत्रकार सत्ता से डरकर खबरें नहीं लिखता, बल्कि डर को खबर बनाता है। उन्होंने पत्रकारिता को ऐसा पेशा नहीं बनाया जो सत्ता का विज्ञापन छापे, बल्कि ऐसा धर्म बनाया जो जनता का सच बोले।
एसपी सिंह का कहना था-‘‘हम पत्रकार हैं, दलाल नहीं।’’ उनकी यह बात आज के दौर में और भी प्रासंगिक हो गई है। पत्रकारिता को पुनः उसी धैर्य, संघर्ष और सत्य के पथ पर लौटाना होगा। क्योंकि देश को अब फिर चाहिए, एक एसपी सिंह, जो कह सके ‘‘स्पीकर खुदा नहीं होता और हम भ्रष्ट खुदा के भी खिलाफ हैं।’’
एसपी सिंह सिर्फ एक नाम नहीं, एक स्कूल थे। उन्होंने सिखाया कि कैसे भाषा को धार दी जा सकती है, कैसे तथ्यों को कविता की तरह पेश किया जा सकता है, और कैसे संपादकीय एक जन आंदोलन का रूप ले सकता है। ‘रविवार’ और ‘आज तक’ के जरिए उन्होंने जिस पत्रकारीय नैतिकता और वैचारिक प्रतिबद्धता की मिसाल दी, वह आज भी जीवित है लेकिन हाशिए पर। मुख्यधारा में अब वह जगह बची नहीं जहां ऐसे लोगों को सम्मान से याद किया जाए। हमें यह स्वीकार करने में कोई संकोच नहीं होना चाहिए कि पत्रकारिता की विश्वसनीयता आज संकट में है। लेकिन हर संकट में एक अवसर छिपा होता है। यदि हम पत्रकारिता को फिर से लोकतंत्र का चौथा स्तंभ बनाना चाहते हैं तो हमें एसपी सिंह जैसे लोगों की पत्रकारिता को सिर्फ स्मृति दिवस पर याद करने की बजाय, उसे अपनी दैनिक आचरण में उतारना होगा। हमें अपनी कलम और माइक को फिर से जन-सरोकारों की भाषा देनी होगी। सत्ता से सवाल पूछने की कला फिर से सीखनी होगी। पत्रकारिता को अगर फिर से सम्मान पाना है, तो उसे सत्ता से दूरी और जनता से नजदीकी बनानी होगी। जो पत्रकार सत्ता की गोदी में बैठता है, वह न तो सत्ता का भला कर सकता है और न ही जनता का। जो पत्रकार जनता की आंख बनता है, वह अपने आप में खुद एक संस्थान बन जाता है। एसपी सिंह एक ऐसे ही संस्थान थे, बिना दीवारों और दरवाजों वाले। आज जरूरत है कि हम फिर से पत्रकारिता को वही ताकत दें,जो सच को सच कहने से न डरे और झूठ के खिलाफ कलम को जंग लगी तलवार नहीं, बल्कि एक चकमक धार दे। क्योंकि अगर हम आज चुप रहे, तो कल कोई एसपी सिंह यह कहने नहीं आएगा कि ‘हम भ्रष्ट खुदा के भी खिलाफ हैं।’ तब हम केवल अफसोस करेंगे कि हमने अपने दौर के सबसे जरूरी हथियार, पत्रकारिता को अपनी आंखों के सामने सत्ता की थाली में परोस दिया।

